श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1886, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 24/173-178 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 173 ॥ 'धृति'-शब्दका अन्य अर्थ :- किंवा 'धृति'-शब्दे निजपूर्णतादि-ज्ञान कय। दुःखाभावे उत्तमप्राप्त्ये महापूर्ण हय ॥ 174 ॥ अनुवाद-अथवा 'धृति'-शब्दका अर्थ अपनी पूर्णता आदिका ज्ञान भी कहा गया है। उत्तम वस्तु अर्थात् भगवद्-प्रेम प्राप्त होनेपर पूर्णताका ज्ञान होता है और सांसारिक वस्तुओंमें आसक्ति दूर हो जाती है, इसलिये दुःखका अभाव होता है, तब व्यक्ति महापूर्ण हो जाता है॥ 174 ॥ धृतिकी संज्ञा :- भक्तिरसामृतसिन्धु (2/4/144)- धृतिः स्यात् पूर्णता-ज्ञानं दुःखाभावोत्तमाप्तिभिः। अप्राप्तातीत-नष्टार्थानभिशोचनादिकृत् ॥ 175 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-उत्तम लाभके द्वारा दुःखका न होना और पूर्णता-ज्ञानमें ही 'धृति' होती है। जो प्राप्त नहीं हुआ और अतीतमें संग्रह किये धनके नष्ट होनेपर जो शोक होता है, उसे 'धृति' ही दूर करती है॥ 175 ॥ अनुभाष्य- दुःखाभावोत्तमाप्तिभिः (दुःखस्य अभावः तेन उत्तमस्य उद्गतं तमः यस्मात् सः प्रेमा, तस्य परमपुरुषार्थस्य प्रेम्णः आप्तिभिः च यत्) पूर्णता-ज्ञानम् (आत्मप्रसादानुभवः, तत् एव) धृतिः ; (सा)-अप्राप्तातीतनष्टार्थानभिशोचनादिकृत् (अप्राप्तस्य अतीतस्य नष्टस्य च अर्थस्य विषयस्य हेतोः अनभिशोचनं करोति या सा, अभिशोचनाभावः या सम्पाद्यते इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥ श्लोकका अर्थ :- कृष्णभक्त-दुःखहीन, वाञ्छान्तर-हीन। कृष्णप्रेम-सेवा-पूर्णानन्द-प्रवीण ॥ 176 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णभक्तकी श्रीकृष्णसेवाके अतिरिक्त अन्य कोई इच्छा ही नहीं होती, इसलिये उसे अन्य कोई इच्छा पूर्ण नहीं होनेका दुःख अनुभव नहीं होता। श्रीकृष्णकी प्रेमपूर्वक की गयी सेवाके द्वारा उसका हृदय सदा पूर्णतमरूपमें आनन्दित रहता है॥ 176 ॥ श्रीकृष्णसेवामें ही भक्त सन्तुष्ट, असन्तोषजनक अन्य कामनाओंका अभाव :- श्रीमद्भागवत (9/4/67)में- मत्सेवया प्रतीतं ते सालोक्यादि-चतुष्टयम्। नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत् कालविप्लुतम् ॥ 177 ॥ अनुवाद-मेरी सेवासे ही परिपूर्ण-हृदयवाले शुद्धभक्त मेरी सेवाके द्वारा सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्तियाँ स्वयं आनेपर भी जब उन्हें ग्रहण नहीं करते हैं, तब मायिक (स्वर्गादि) भोग और सायुज्य मुक्ति, जो कालके द्वारा अति शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, उनकी इच्छा वे क्यों करेंगे? सायुज्यमुक्तिके द्वारा जीवकी सत्ता कालका ग्रास बन जाती है, इसलिये भुक्ति और सायुज्य-मुक्ति, ये स्थायी नहीं हैं॥ 177 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/208 संख्या देखें ॥ 177 ॥ सभी इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णके अनुशीलनमें निष्ठ भक्त ही धीर और स्थिर :- श्रीगोस्वामिपादोक्त-श्लोक- हृषीकेशे हृषीकाणि यस्य स्थैर्यगतानि हि। स एव धैर्यमाप्नोति संसारे जीवचञ्चले ॥ 178 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 178 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इस जीवचञ्चल (क्षण-भङ्गुर) संसारमें जिस व्यक्तिकी समस्त इन्द्रियाँ हृषीकेश-श्रीकृष्णमें स्थिर हुई हैं, उस व्यक्तिने ही धैर्य प्राप्त किया है॥ 178 ॥ अनुभाष्य- यस्य हृषीकाणि (इन्द्रियाणि) हृषीकेशे (सर्वानियन्तरि भगवति) स्थैर्यगतानि (उपशमं लब्धानि) स एव जीवचञ्चले (क्षणभङ्गुर) संसारे धैर्यम् आप्नोति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 178 ॥ 440 ।