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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 24/205-209 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—इस प्रकार मैंने तुम्हें उन्नीस अर्थ बतलाये हैं, अब तुम आगे सुनो। 'आत्मा'-शब्दका एक अर्थ 'देह' भी है, इस अर्थके द्वारा अन्य चार अर्थ प्रकाशित होंगे ॥ 205 ॥ अनुभाष्य—'चारि अर्थ तार'—(1) औपाधिक ब्रह्मदेह (206 संख्या); (2) कर्मनिष्ठ याज्ञिकोंकी कर्मदेह (208 संख्या); (3) तपोदेह (210 संख्या); (4) सर्वकाम-देह (212 संख्या) ॥ 205 ॥ साधुसङ्गके फलसे देहात्मबुद्धि अथवा विवर्त्तवादियोंको भी विवर्त्त बुद्धिके त्यागसे श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :— देहाराभी देहे भजे 'देहोपाधि ब्रह्म'। सत्सङ्गे सेह करे कृष्णेर भजन ॥ 206 ॥ अनुवाद—जो देहको ही मैं माननेवाले 'देह-उपाधि ब्रह्म'का अर्थात् अपनी देहको ब्रह्म मानकर भजन करते हैं, यदि उन्हें भी सत्सङ्गकी प्राप्ति हो जाय, तो वे भी श्रीकृष्णका भजन करते हैं ॥ 206 ॥ अनुभाष्य—देहाराभी देहको औपाधिक ब्रह्ममूर्ति समझकर अपनी देहकी सेवा करते-करते साधुसङ्गसे उस विवर्त्त-बुद्धिको छोड़कर श्रीकृष्णसेवा करते हैं॥ 206 ॥ श्रीमद्भागवत (10/87/18)— उदरमुपासते य ऋषिवर्त्मसु कूर्पदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो डहरम्। तत उदगादनन्त तव धाम शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ 207 ॥ अनुवाद—(ऋषियोंके सम्प्रदाय मार्गमें) जो कर्मयोगमें उदर अर्थात् मणिपुरमें स्थित ब्रह्मकी उपासना करते हैं, वे 'शार्कराक्ष' ऋषि कहलाते हैं और वे कूर्पदृक् अर्थात् स्थूलदृष्टि हैं। और आरुणि ऋषिगण (उस सम्प्रदायके ऋषिगण) जहाँसे नाड़ियोंका विस्तार होता है उस हृदयाकाशमें (सूक्ष्म ब्रह्मकी) उपासना करते हैं। हे अनन्त, उससे उत्कृष्ट जो योगीगण शिरोगत (मूलाधार उदरसे आरम्भ करके हृदयके मध्यमेंसे होकर मस्तक और ब्रह्मरन्ध्र तक बढ़ते हुए) सहस्रदल-पद्मस्वरूप आपकी उपलब्धिके स्थान सुषुम्ना-नामक परमश्रेष्ठ ज्योतिर्मय धाममें पहुँच जाते हैं, वे पुनः मृत्युके मुख अर्थात् संसारमें पतित नहीं होते ॥ 207 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 24/160 संख्या देखें ॥ 207 ॥ साधुसङ्गके फलसे कर्मका त्याग करके देहारामी कर्मीको भी शुद्धभक्तिकी प्राप्ति :— देहाराभी—कर्मनिष्ठ याज्ञिकादि जन। सत्सङ्गे 'कर्म' त्यजि' करये भजन ॥ 208 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 208 ॥ अनुभाष्य—'देहाराभी कर्मनिष्ठ'—यज्ञादि परायण; वे भी सुकृतिके फलसे भक्तोंके सङ्गसे कर्मनिष्ठारूपी यज्ञका त्याग करके श्रीकृष्णका भजन करते हैं ॥ 208 ॥ शौनकादिके द्वारा कर्मकाण्डकी निन्दा और श्रीसूतकी हरिकथा-कीर्तनमें प्रवृत्तिकी प्रशंसा :— श्रीमद्भागवत (1/18/12)में— कर्मण्यस्मिन्ननाश्वासे धूमधूम्रात्मनां भवान्। आपाययति गोविन्दपादपद्मासवं मधु ॥ 209 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 209 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(हे सूत!) हम आश्वास (अर्थात् निश्चय ही फल मिलेगा, इस आशासे) रहित इस कर्ममार्गमें धुएँसे धूमिल हो गये हैं, [ऐसी अवस्थामें] आप हमें श्रीगोविन्दके चरण-कमलोंके मधुमय [मादक] आसवका पान करा रहे हैं ॥ 209 ॥ अनुभाष्य—महाभागवत श्रीसूत-गोस्वामीके द्वारा शुश्रुषु शौनकादिको हरिकथारूपी भागवतका वर्णन आरम्भ करनेपर ऋषिगण अपने तुच्छ कर्मकाण्डके अनुष्ठानकी निन्दा कर रहे हैं,— अस्मिन् अनाश्वासे (अविश्वसनीय) कर्मणि (सत्रे) धूमधूम्रात्मनां (धूमेन धूम्रौ विवर्णौ आत्मानौ शरीर-चित्ते येषां तेषां तान् इत्यर्थः) भवान् मधु (मधुरं) गोविन्दपादपद्मासवं (श्रीकृष्ण-चरणाब्जयोः मकरन्दं श्रीहरिकथामृतमित्यर्थः) आपाययति (श्रावयति)। 446 |

चौबीसवाँ अध्याय 24/209-214 ] श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 209 ॥ साधुसङ्गमें तपस्यारूपी भोगके त्यागसे देहारामी तपस्वी विषयीको भी शुद्धभक्तिकी प्राप्ति :- 'तपस्वी' प्रभृति यत देहारामी हय। साधुसङ्गे तप छाड़ि' श्रीकृष्ण भजय ॥ 210 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 210 ॥ अनुभाष्य—'तपस्वी' आदि जितने भी देहारामी होते हैं, वे श्रीकृष्णभक्तसङ्गसे तपस्याका त्याग करके श्रीकृष्णभजन करते हैं ॥ 210 ॥ शास्त्र प्रमाण :- श्रीमद्भागवत (4/21/31)में— यत्पादसेवाभिरुचिस्तपस्विना- मशेषजन्मोपचितं मलं धियः। सद्यः क्षिणोत्यन्वहमेधती सती यथा पदाङ्गुष्ठविनिःसृता सरित् ॥ 211 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 211 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णके चरणकमलके अँगूठेसे निकली गङ्गा-नदीकी भाँति श्रीकृष्णकी चरणसेवाकी रुचि प्रतिदिन वृद्धि प्राप्त करके (विषयी) तपस्वियोंके समस्त जन्मोंमें एकत्रित बुद्धिके मलका शीघ्र ही नाश कर देती है ॥ 211 ॥ अनुभाष्य—प्राचीनकालमें पृथ्वीके अधिपति पृथु महाराज एक महायज्ञका अनुष्ठान करके वहाँ एकत्रित देवताओं, ऋषियों और राजाओंके समक्ष खड़े होकर पूर्व-पूर्व महाजनोंके द्वारा लक्षित विष्णुसेवाकी अनिवार्य कर्त्तव्यता और प्रयोजनीयताका वर्णन कर रहे हैं,— यत्पादसेवाभिरुचिः (यस्य हरेः पादयोः सेवायाम् अभिरुचिः), यथा [तस्य हरेः] पदाङ्गुष्ठविनिःसृता (पादपद्मोद्भवा) सरित् (नदी, गङ्गा इवेत्यर्थः) अन्वहम् (अहनि अहनि प्रतिदिनम्) एधती (वर्द्धमाना) सती (सात्त्विकी सती) तपस्विनां (याज्ञिकानां) अशेषजन्मोपचितं (पूर्व-पूर्व-जन्मभिः संवृद्धं) धियः (बुद्धेः) मलं (कामादि-वासना-लक्षणं) सद्यः क्षिणोति (क्षपयति, तं यूयं स्वकर्मभिः भजतेति तृतीयेणान्वयः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। इसका (भाः 4/21/33) श्लोकके साथ अन्वय करें ॥ 211 ॥ श्रीकृष्णकी कृपासे सकाम देहारामीका भी कामका त्याग अथवा निष्काम होकर शुद्ध श्रीकृष्णभजन :- देहारामी, सर्वकाम—सब आत्माराम। कृष्णकृपाय कृष्ण भजे छाड़ि' सब काम ॥ 212 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 212 ॥ अनुभाष्य—देहारामी सर्वकामी [आत्मारामगण] समस्त कामनारूपी अनर्थका परित्याग करके श्रीकृष्ण-अनुग्रहके बलसे श्रीकृष्णभजन करते हैं ॥ 212 ॥ हरिभक्तिसुधोदयके ध्रुवचरित्र (7/28)में— स्थानाभिलाषी तपसि स्थितोऽहं त्वां प्राप्तवान् देवमुनीन्द्रगुह्यम्। काचं विचिन्वन्नपि दिव्यरत्नं स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे ॥ 213 ॥ अनुवाद—ध्रुवको जब श्रीकृष्णने वर देनेकी इच्छा की, तब ध्रुवने कहा,—हे स्वामी, मैं (विश्वके स्वामी) पदकी अभिलाषासे आपकी तपस्यामें रत हुआ था, किन्तु अब देवताओं और मुनियोंके लिये भी दुर्लभ आपको प्राप्त करके मैं कृतार्थ हो गया हूँ। सामान्य काँचको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मुझे दिव्यरत्न मिल गया है। मैं कृतार्थ हो गया हूँ, अब किसी अन्य वरकी याचना नहीं करता हूँ ॥ 213 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 22/42 संख्या देखें ॥ 213 ॥ यहाँ तक तेईस प्रकारके अर्थ :- एइ चारि अर्थ सह हइल 'तेइश' अर्थ। आर तिन अर्थ शुन परम समर्थ ॥ 214 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 214 ॥ अनुभाष्य—पहले कहे गये उन्नीस प्रकारके अर्थोंके साथ (204 संख्याका अनुभाष्य देखें) 'आत्माराम'-शब्दका अर्थ इन चार प्रकारके 'देहाराम'को (205 संख्याका । 447

[ 24/214-221 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य देखें) समझनेपर 'तेईस' प्रकारके अर्थ होते हैं। और तीन अर्थ- (1) च-शब्दका 'अन्वाचय'- अर्थ, (2) च-शब्दका 'एव'- अर्थ और 'अपि'- शब्दका 'गर्हा' (निन्दा)-अर्थ एवं (3) निर्ग्रन्थ-शब्दका 'निर्धन'- अर्थ॥ 214 ॥ च-शब्दकी 'समुच्चय'के अर्थमें व्याख्या :- च-शब्दे 'समुच्चये', आर अर्थ कय। 'आत्मारामश्च मुनयश्च' कृष्णेरे भजय ॥ 215 ॥ 'निर्ग्रन्थाः' हञा इँहा 'अपि'-निर्द्धारणे। 'रामश्च कृष्णश्च' यथा विहरये वने ॥ 216 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 215-216 ॥ अनुभाष्य-च-शब्दका समुच्चय अर्थ पहले ही (146 संख्यामें) कथित हुआ है; उसके द्वारा 'आत्माराम' और 'मुनि' श्रीकृष्णभजन करते हैं। 'आर अर्थ'-'समुच्चय'-अर्थके अतिरिक्त अन्य अर्थ। 'अपि' निर्द्धारणके अर्थमें प्रयुक्त हुआ है; 'निर्ग्रन्थाः' आत्माराम और मुनि, दोनोंका 'विशेषण' है। 'इँहा'-इस स्थानपर; जैसे, 'राम और कृष्ण वनमें विहार करते हैं' कहनेपर दोनोंका ही वनविहार उद्दिष्ट होता है॥ 215-216 ॥ च-शब्दकी अन्वाच्यार्थमें व्याख्या :- च-शब्दे 'अन्वाचये' अर्थ कहे आर। 'वटो, भिक्षामट, गाम्चानय' यैछे प्रकार ॥ 217 ॥ इस अर्थसे मुनिका मुख्य भजन, आत्मारामका गौण भजन :- कृष्णमनने मुनि कृष्णे सर्वदा भजय। 'आत्माराम अपि' भजे, - गौण अर्थ कय ॥ 218 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 217-218 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'वटो, भिक्षामट, गाम्चानय'-"हे वटु (ब्राह्मण), भिक्षामें चलो, गायको भी लाओ।" इस वाक्यमें च-शब्द जिस प्रकार 'अन्वाचय' अर्थ करता है, आत्माराम-श्लोकमें भी वैसा ही अर्थ करता है॥ 217 ॥ अनुभाष्य-च-शब्दसे अन्वाचय-अर्थ अर्थात् एककी प्रधानता और अन्य अप्रधान हैं। उदाहरणमें कहा जाता है,-'हे ब्राह्मण-बालक, भिक्षा करो और यदि मिले, तो गायको भी लाओ'; - इस स्थानपर भिक्षाकी ही प्रधानता है और गायको लाना अप्रधान सूचित हुआ है; (उसी प्रकार) श्रीकृष्णमननशील मुनियोंकी ही सदा श्रीकृष्ण- भजनमें मुख्य रूपसे 'प्रधानता' है और आत्मारामगणोंकी श्रीकृष्णभजनमें गौणरूपसे 'अप्रधानता' है-यही अन्वाचयार्थका प्रयोग है ॥ 217-218 ॥ च-शब्दकी 'एव'-अर्थमें और 'अपि'-शब्दकी 'निन्दा'-अर्थमें व्याख्या :- 'च' एवार्थे 'मुनयः एव' कृष्णेरे भजय। 'आत्माराम अपि'-'अपि' 'गर्हा' अर्थ कय ॥ 219 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 219 ॥ अनुभाष्य-च-शब्द 'एव-अर्थमें' और अपि-शब्द 'निन्दा-अर्थमें' प्रयुक्त होनेपर इस प्रकारका अर्थ होता है,-'आत्माराम होनेपर भी वैसी अवस्थाके गौरवको त्यागकर मुनिगण ही श्रीकृष्णका भजन करते हैं।' 219 ॥ इन दोनों स्थानोंपर ही 'निर्ग्रन्थ'-शब्द विशेषण है :- 'निर्ग्रन्थ हञा'-एइ दुँहार 'विशेषण'। आर अर्थ शुन, यैछे साधुर सङ्गम ॥ 220 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 220 ॥ अनुभाष्य-'निर्ग्रन्थ' आत्माराम और मुनि, इन दोनोंका ही 'विशेषण' है; अन्य तीसरा अर्थात् छब्बीसवाँ अर्थ,-श्रेष्ठ-साधु श्रीनारदके सङ्गका फल व्याधमें जिस प्रकारसे दिखलायी दिया था, उस प्रकार ॥ 220 ॥ निर्ग्रन्थ-शब्दका अर्थ :- निर्ग्रन्थ-शब्दे कहे तब 'व्याध', 'निर्धन'। साधुसङ्गे सेइ करे श्रीकृष्ण-भजन ॥ 221 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 221 ॥ 448 ।

चौबीसवाँ अध्याय 24/221-230 ] अनुभाष्य-निर्ग्रन्थ-शब्द निर्द्धारणके अर्थमें प्रयुक्त होनेपर, साधनरूपी धनसे विहीन अयोग्य व्याध भी श्रीनारद जैसे साधुके सङ्गके प्रभावसे श्रीकृष्णाराम होकर भजन करता है॥ 221 ॥ साधुसङ्गके फलसे शिकारीकी भी पापसे निवृत्ति और श्रीकृष्णमें चित्त निवेश होना अथवा महाभागवत होना :- 'कृष्णारामाश्च' एव कृष्ण-मनन। व्याध हञा हय पूज्य भागवतोत्तम॥ 222 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 222 ॥ अनुभाष्य- 'आत्मा'-शब्दका अर्थ-'श्रीकृष्ण'; श्रीकृष्णमें रमणशील होनेके कारण श्रीकृष्णाराम और वह श्रीकृष्णाराम ही श्रीकृष्णमननशील है। [व्याध होनेपर भी वह पूज्य भागवतोत्तम बन गया।]॥ 222 ॥ स्कन्द-पुराणमें कथित शिकारी-नारद-संवादका वर्णन :- एक भक्त-व्याधेर कथा शुन सावधाने। याहा हैते हय सत्सङ्ग-महिमार ज्ञाने॥ 223 ॥ अनुवाद-हे सनातन, एक भक्त-शिकारीकी कथा ध्यान देकर सुनो। इस कथासे सत्सङ्गकी महिमाको समझ सकते हैं॥ 223 ॥ एक दिन श्रीनारद देखि' नारायण। त्रिवेणी-स्नाने प्रयाग करिला गमन॥ 224 ॥ अनुवाद-एक समय श्रीनारदने भगवान् श्रीनारायणका दर्शन करके त्रिवेणीमें स्नान करनेके लिये प्रयागकी ओर गमन किया॥ 224 ॥ वनपथे देखे मृग आछे भूमे पड़ि'। बाण-विद्ध भग्नपाद करे धड्फड़ि॥ 225 ॥ अनुवाद-वनके पथपर चलते हुए श्रीनारदने देखा कि बाणसे बिंधा एक हिरण भूमिपर पड़ा था। उसकी टाँगे भी टूटी हुईं थी और वह छटपट कर रहा था॥ 225 ॥ आर कतदूरे एक देखेन शूकर। तैछे विद्ध भग्नपाद करे धड्फड़॥ 226 ॥ अनुवाद-थोड़ी दूरीपर श्रीनारदने एक सुअरको देखा, वह भी हिरणकी ही भाँति बाणसे बिंधा हुआ था। उसकी भी टाँगें टूटी हुईं थी और वह छटपट कर रहा था॥ 226 ॥ ऐछे एक शशक देखे आर कतदूरे। जीवेर दुःख देखि' नारद व्याकुल-अन्तरे॥ 227 ॥ अनुवाद-थोड़ा आगे जानेपर श्रीनारदने एक खरगोशको देखा जो पीड़ासे तड़प रहा था। जीवोंके दुःखोंको देखकर श्रीनारदका हृदय व्याकुल हो गया॥ 227 ॥ कतदूरे देखे व्याध वृक्षे आँत हञा। मृग मारिवारे आछे बाण जुड़िया ॥ 228 ॥ अनुवाद-कुछ दूर जानेपर श्रीनारदने देखा कि एक शिकारी वृक्षकी ओटमें छिपकर खड़ा है और पशुओंको मारनेके लिये बाण लेकर खड़ा है॥ 228 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'आँत'-छिपकर, बीचमें होकर॥ 228 ॥ श्यामवर्ण, रक्तनेत्र, महाभयङ्कर। धनुर्बाण हस्ते, -येन यम दण्डधर॥ 229 ॥ अनुवाद-वह शिकारी काले रङ्गका था, उसकी आँखें लाल रङ्गकी थीं और वह बहुत भयङ्कर लग रहा था। उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि मानो वह हाथोंमें धनुष-बाण लिये साक्षात् यम हो॥ 229 ॥ पथ छाड़ि' नारद तार निकटे चलिल। नारदे देखि' मृग सब पलाञा गेल॥ 230 ॥ अनुवाद-श्रीनारद उस वन-मार्गको छोड़कर उसकी ओर चल दिये। श्रीनारदको देखकर सब पशु भाग गये॥ 230 ॥ 449

[ 24/231-242 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला क्रुद्ध हञा व्याध ताँरे गालि दिते चाय। नारद-प्रभावे मुखे गालि नाहि आय ॥ 231 ॥ अनुवाद-पशुओंको वहाँसे भागते देखकर शिकारीको बहुत क्रोध आया और वह श्रीनारदको गाली देना चाहता था, किन्तु श्रीनारदके प्रभावसे उसके मुखसे कोई गाली निकली ही नहीं ॥ 231 ॥ “गोसाञि, प्रयाण-पथ छाड़ि' केने आइला। तोमा देखि' मोर लक्ष्य मृग पलाइला ॥" 232 ॥ अनुवाद-शिकारीने कहा,-“हे गोसाईं ! आप वनमें चलनेवाले मार्गको छोड़कर मेरी ओर क्यों आये हैं? आपको देखकर मेरे शिकार भाग गये ॥" 232 ॥ अनुभाष्य-'प्रयाण-पथ'-पाठान्तरमें 'प्रमाण-पथ'; जिस निर्दिष्ट पथसे पथिक जाते हैं अर्थात् प्रचलित पथ ॥ 232 ॥ नारद कहे, - “पथ भूलि' आइलाङ पूछिते। मने एक संशय हय, ताहा खण्डाइते ॥ 233 ॥ पथे ये शूकर-मृग, जानि तोमार हय।” व्याध कहे, - “येइ कह, सेइ त' निश्चय ॥" 234 ॥ अनुवाद-श्रीनारदने कहा, - "मैं अपने मार्गको छोड़कर तुमसे कुछ पूछनेके लिये ही आया हूँ। मेरे मनमें एक संशय है; मैं उसे दूर करना चाहता हूँ। मुझे लगता है कि मार्गमें पड़े हुए सूअर और हिरणादि तुम्हारे हैं।” शिकारीने कहा, - “आप जो कह रहे हैं, वैसा ही है॥" 233-234 ॥ नारद कहे,-“यदि जीवे मार' तुमि बाण। अर्द्ध-मारा कर केने, ना लओ पराण ?" 235 ॥ अनुवाद-श्रीनारदने कहा, - "यदि तुम किसी जीवको बाण मारते हो तो उसके प्राण ही क्यों नहीं ले लेते? उसे अधमरा क्यों करते हो ?" 235 ॥ व्याध कहे,-“शुन गोसाञि, 'मृगारि' मोर नाम। पितार शिक्षाते आमि करि ऐछे काम ॥ 236 ॥ अर्द्ध-मारा जीव यदि धड्फड़ करे। तबे त' आनन्द मोर बाड़ये अन्तरे ॥" 237 ॥ अनुवाद-शिकारीने कहा, - 'हे गोसाईं, सुनो! मेरा नाम 'मृगारि' है और मैं अपने पिताकी शिक्षाके अनुसार ही ऐसा कार्य करता हूँ। अधमरा जीव जब छटपटाता है, तब मुझे बहुत आनन्द होता है ॥" 236-237 ॥ नारद कहे,-"एकवस्तु मागि तोमार स्थाने।" व्याध कहे,-“मृगादि लह, येइ तोमार मने ॥ 238 ॥ मृगछाल चाह यदि, आइस मोर घरे। येइ चाह, ताहा दिब मृगव्याघ्राम्बरे ॥" 239 ॥ अनुवाद-श्रीनारदने कहा, - "मैं तुमसे एक वस्तु माँगना चाहता हूँ।" शिकारीने कहा, - "हिरणादि कोई भी पशु लेनेकी आपकी इच्छा हो, आप ले लो। यदि आप हिरणकी छाल चाहते हैं, तब फिर आप मेरे घर आइये। हिरणकी छाल, बाघकी छाल-जो कुछ भी आप चाहेंगे, मैं दे दूँगा ॥" 238-239 ॥ नारद कहे, - “इहा आमि किछु नाहि चाहि। आर एक वस्तु आमि मागि तोमा-ठाञि ॥ 240 ॥ कालि हैते तुमि येइ मृगादि मारिबा। प्रथमे मारिबा, अर्द्ध-मारा ना करिबा ॥" 241 ॥ अनुवाद-श्रीनारदने कहा, - "मुझे यह सब कुछ नहीं चाहिये। मैं तो तुमसे कुछ और माँगता हूँ। कलसे तुम जिस हिरणादिको मारोगे, उसे पहली बारमें ही पूरी तरहसे मार देना, उसे अधमरा मत करना ॥" 240-241 ॥ व्याध कहे,-“किवा दान मागिला आमारे। अर्द्ध मारिले किवा हय, ताहा कह मोरे ॥" 242 ॥ अनुवाद-शिकारीने कहा, - "आपने मुझसे यह कैसा दान माँगा है? आधा मारनेसे क्या होता है, मुझे इस विषयमें बतलाइये ॥" 242 ॥ 450 |

चौबीसवाँ अध्याय २४/२४३-२५६ ] नारद कहे, —“अर्द्ध मारिले जीव पाय व्यथा। जीवे दुःख दितेछ, तोमार हइबे ऐछे अवस्था॥ २४३ ॥ व्याध तुमि, जीव मार—'अल्प' अपराध तोमार। कदर्थना दिया मार'—ए पाप 'अपार' ॥ २४४ ॥ कदर्थिया तुमि यत मारिला जीवेरे। तारा तैछे तोमा मारिबे जन्म-जन्मान्तरे॥” २४५ ॥ अनुवाद—श्रीनारदने कहा,—“आधा मारनेसे जीवको तुम जानबूझकर दुःख दे रहे हो, इसलिये तुम्हारी भी वैसी ही अवस्था होगी। तुम शिकारी हो, जीवोंको मारना तुम्हारा धंधा है, इसलिये तुम्हारा बहुत कम अपराध होता है। किन्तु तुम उन्हें जानबूझकर तड़पा-तड़पाकर मारते हो, यह 'अपार' (घोर) पाप है। तुमने तड़पा-तड़पाकर जितने जीवोंको मारा है, वे भी तुम्हें जन्म-जन्मान्तरमें वैसे ही मारेंगे॥” २४३-२४५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कदर्थना दिया'—कष्ट देकर॥ २४४ ॥ ॥ नारद-सङ्गे व्याधेर मन परसन्न हइल। ताँर वाक्य शुनि' मने भय उपजिल॥ २४६ ॥ अनुवाद—श्रीनारदके सङ्गसे शिकारीका मन निर्मल हो गया था, इसलिये उसे अपने पापोंकी प्रतीति हो गयी। किन्तु पापोंका परिणाम बतानेवाले उनके वचन सुनकर उसके मनमें भय उत्पन्न हो गया॥ २४६ ॥ व्याध कहे, —“बाल्य हैते एइ आमार कर्म। केमने तरिब आमि पामर अधम? ॥ २४७ ॥ एइ पाप याय मोर, केमन उपाये? निस्तार करह मोरे, पड़ों तोमार पाये॥” २४८ ॥ अनुवाद—शिकारीने कहा,—“बचपनसे ही मेरा यही कार्य है। मैं अधम, पापी इन पापोंसे कैसे पार होऊँगा? किस उपायसे मेरे द्वारा किये गये ये पाप दूर हो सकते हैं? आप मेरा उद्धार कीजिये, मैं आपके चरणोंमें पड़ा हूँ॥” २४७-२४८ ॥ नारद कहे, —“यदि धर आमार वचन। तबे से करिते पारि तोमार मोचन॥” २४९ ॥ अनुवाद—श्रीनारदने कहा,—“यदि तुम मेरी बात मानो, तब मैं तुम्हारा उद्धार कर सकता हूँ॥” २४९ ॥ व्याध कहे, —“येइ कह, सेइ त' करिब।” नारद कहे, —“धनुक भाङ्ग, तबे से कहिब॥” २५० ॥ अनुवाद—शिकारीने कहा,—“आप जो कहेंगे, मैं वही करूँगा।” श्रीनारदने कहा,—“तुम अपना धनुष तोड़ दो, तब मैं कुछ कहूँगा॥” २५० ॥ व्याध कहे, —“धनुक भाङ्गिले बाँचिब केमने?” नारद कहे, —“आमि अन्न दिब प्रतिदिन ॥” २५१ ॥ अनुवाद—शिकारीने कहा,—“यदि मैं धनुषको तोड़ दूँगा, तब मेरा पालन कैसे होगा?” श्रीनारदने कहा,—“मैं प्रतिदिन तुम्हें भोजन दूँगा॥” २५१ ॥ धनुक भाङ्गि व्याध ताँर चरणे पड़िल। तारे उठाया नारद उपदेश कैल॥ २५२ ॥ “घरे गिया ब्राह्मणे देह' यत आछे धन। एक एक वस्त्र परि' बाहिर हओ दुइजन॥ २५३ ॥ नदी-तीरे एकखानि कुँड़िया करिया। तार आगे एकपिण्ड तुलसी रोपिया॥ २५४ ॥ तुलसी-परिक्रमा कर, तुलसी-सेवन। निरन्तर कृष्णनाम करिह कीर्त्तन॥ २५५ ॥ आमि तोमाय बहु अन्न पाठाइमु दिने। सेइ अन्न लबे, यत खाओ दुइजने॥” २५६ ॥ अनुवाद—धनुषको तोड़कर शिकारी श्रीनारदके चरणोंमें गिर पड़ा। उसे उठाकर श्रीनारदने उसे उपदेश प्रदान किया,—“घर जाकर तुम्हारे पास जो भी धन है, वह सब ब्राह्मणोंको दे दो। तुम और तुम्हारी पत्नी केवल एक-एक वस्त्र पहनकर उस घरको छोड़ दो। । ४५१

[ 24/252-265 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला


नदीके तटपर एक कुटिया बनाकर उसके आगे एक चबूतरा बनाकर उसपर तुलसीका पौधा लगाओ। तुम लोग तुलसीकी परिक्रमा, तुलसीकी सेवा और निरन्तर श्रीकृष्णनामका कीर्तन करना। मैं दिनके समय तुम्हारे पास बहुतसी भोजन सामग्री भेजूँगा। तुम उसमेंसे उतनी ही सामग्री लेना, जितना तुम दोनों खा सको॥" 252-256 ॥

तबे सेइ मृगादि तिने नारद सुस्थ कैल। सुस्थ हञा मृगादि तिने धाञा पलाइल ॥ 257 ॥

अनुवाद-तब श्रीनारदने उन अधमरे मृगादि तीनों पशुओंको स्वस्थ किया और स्वस्थ होते ही मृगादि तीनों पशु दौड़कर चले गये ॥ 257 ॥

देखिया व्याधेर मने हैल चमत्कार। घरे गेल व्याध, गुरुके करि' नमस्कार ॥ 258 ॥

अनुवाद-ऐसा देखकर शिकारीके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। अपने गुरु श्रीनारदको प्रणाम करके शिकारी अपने घर लौट गया ॥ 258 ॥

यथा-स्थाने नारद गेला, व्याध घरे आइल। नारदेर उपदेशे सकल करिल ॥ 259 ॥

अनुवाद-श्रीनारद अपने गन्तव्य स्थान प्रयागकी ओर चल दिये और शिकारी अपने घर आ गया। शिकारीने श्रीनारदके उपदेशानुसार सब कार्य किया ॥ 259 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य- 'नारदेर उपदेशे'-श्रीनारदके उपदेशके अनुसार ॥ 259 ॥

ग्रामे ध्वनि हैल, - 'व्याध 'वैष्णव' हइल।' ग्रामेर लोक सब अन्न आनिते लागिल ॥ 260 ॥ एकदिन अन्न आने दश-बिश जने। दिले तत लय, यत खाय दुइजने ॥ 261 ॥

अनुवाद-पूरे ग्राममें यह बात फैल गयी,-'शिकारी 'वैष्णव' बन गया है।" ग्रामके सभी लोग उसके पास भोजनकी सामग्री लाने लगे। एक दिनमें दस-बीस लोग भोजनकी सामग्री लेकर आते, किन्तु शिकारी उतना ही लेता जितना वे दो लोग खा सकते थे ॥ 260-261 ॥

एकदिन नारद कहे, - "शुनह, पर्वते। आमार एक शिष्य आछे, चलह देखिते ॥" 262 ॥

अनुवाद-एक दिन श्रीनारदने श्रीपर्वत ऋषिसे कहा,-"हे पर्वत ! सुनो, मेरा एक शिष्य है, चलो उसे देखनेके लिये चलें ॥" 262 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य- 'शुनह, पर्वते'-ओहे पर्वत मुनि, सुनो ॥ 262 ॥

तबे दुइ ऋषि आइला सेइ व्याध-स्थाने। दूर हैते व्याध पाइल गुरुर दर्शने ॥ 263 ॥

अनुवाद-तब दोनों ऋषि शिकारीके स्थानपर आये। शिकारीने दूरसे ही अपने गुरुदेवको आते देख लिया ॥ 263 ॥

आस्ते-व्यस्ते धाञा आसे, पथ नाहि पाय। पथेर पिपीलिका इति-उति धरे पाय ॥ 264 ॥

अनुवाद-शिकारी तेजीसे दौड़कर गुरुदेवके पास जाने लगा, किन्तु उसे मार्ग नहीं मिल रहा था, क्योंकि मार्गमें चींटियाँ इधर-उधर आ-जा रहीं थीं और कहीं पैर रखनेसे कोई चींटी मर न जाय, इसलिये वह आगे बढ़ नहीं पा रहा था ॥ 264 ॥

दण्डवत्-स्थाने पिपीलिकारे देखिया। वस्त्रे स्थान झाड़ि' पड़े दण्डवत् हञा ॥ 265 ॥

अनुवाद-जब गुरुदेव निकट आ गये तब उनको दण्डवत् प्रणाम करने लगा, तो उसने देखा कि गुरुदेवके चरणोंके पास भी चींटियाँ हैं। उसने उस स्थानको अपने वस्त्रसे झाड़कर चींटियोंको दूर किया और फिर गुरुदेवको दण्डवत् प्रणाम किया ॥ 265 ॥


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चौबीसवाँ अध्याय 24/266-275 ] नारद कहे, - “व्याध, एइ ना हय आश्चर्य। हरिभक्त्ये हिंसा-शून्य हय साधुवर्य ॥” 266 ॥ अनुवाद—श्रीनारदने कहा, - “हे शिकारी, तुम्हारा ऐसा करना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। हरिभक्तिके प्रभावसे व्यक्ति हिंसारहित होकर सर्वश्रेष्ठ साधु बन जाता है ॥" 266 ॥ स्कन्दवचन :- एते न ह्यद्भुता व्याध तवाहिंसादयो गुणाः। हरिभक्तौ प्रवृत्ता ये न ते स्युः परतापिनः ॥ 267 ॥ अनुवाद—हे व्याध, तुममें जो अहिंसादि गुण उत्पन्न हुए हैं, वह अद्भुत नहीं है, क्योंकि, जो हरिभक्तिमें प्रवृत्त होता है, वह दूसरोंको कष्ट देनेवाला नहीं होता ॥ 267 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/143 संख्या देखें ॥ 267 ॥ तबे सेइ व्याध दोंहारे अङ्गने आनिल। कुशासन आनि' दोंहारे भक्त्ये बसाइल ॥ 268 ॥ अनुवाद—तब वह शिकारी उन दोनोंको अपने आँगनमें ले आया और उसने कुशासन लाकर उन दोनोंको भक्तिपूर्वक बैठाया ॥ 268 ॥ जल आनि' भक्त्ये दोंहार पाद प्रक्षालिल। सेइ जल स्त्री-पुरुषे पिया शिरे लइल ॥ 269 ॥ अनुवाद—शिकारीने जल लाकर भक्तिपूर्वक उन दोनोंके चरणोंका अभिषेक किया। तब शिकारी और उसकी पत्नी, दोनोंने उस जलका पान किया और उसे अपने सिरपर भी छिड़का ॥ 269 ॥ कम्प-पुलकाश्रु हैल कृष्णनाम गाञा। ऊर्द्धबाहु नृत्य करे वस्त्र उड़ाञा ॥ 270 ॥ अनुवाद—जब शिकारी गुरुदेवके सामने श्रीकृष्णनामका कीर्तन करने लगा, तब उसके शरीरमें कम्प-पुलक-अश्रु आदि सात्त्विक विकार उत्पन्न हो गये। वह भावावेशमें गान करते हुए दोनों हाथोंको उठाकर और कपड़ेको हाथोंसे उड़ाते हुए नृत्य करने लगा ॥ 270 ॥ देखिया व्याधेर प्रेम पर्वत-महामुनि। नारदेरे कहे,-“तुमि हओ स्पर्शमणि ॥” 271 ॥ अनुवाद—शिकारीके प्रेमको देखकर महामुनि श्रीपर्वतने श्रीनारदसे कहा, - “आप स्पर्शमणि हैं॥” 271 ॥ स्कन्दवचन :- “अहो धन्योऽसि देवर्षे कृपया यस्य तत्क्षणात्। नीचोऽप्युत्पुलको लेभे लुब्धको रतिमच्युते ॥ 272 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 272 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे देवर्षे! आप धन्य हैं। आपकी कृपासे नीच लुब्धक अर्थात् शिकारीने भी पुलकित होकर श्रीकृष्णमें रति प्राप्त की है ॥ 272 ॥ अनुभाष्य- हे देवर्षे (नारद,) अहो, (विस्मये, त्वं) धन्यः असि, यस्य (तव) कृपया नीचः (नीचवृत्तिः) लुब्धकः (व्याधः) अपि उत्पुलकः (रोमाञ्चितदेहः सन्) अच्युते (भगवति विष्णौ) रतिं लेभे (प्राप)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 272 ॥ परम वैष्णवश्रेष्ठ श्रीनारदकी कृपासे भक्त-शिकारीके योग-क्षेमका समाधान :- नारद कहे,-“वैष्णव, तोमार अन्न किछु आय?” व्याध कहे, -“यारे पाठिओ, सेइ दिया याय ॥ 273 ॥ एत अन्न ना पाठिओ, किछु कार्य नाइ। सबे दुइजनार योग्य भक्ष्यमात्र चाइ ॥” 274 ॥ नारद कहे, - “ऐछे रह, तुमि भाग्यवान् ।” एत बलि' दुइजन हइला अन्तर्धान ॥ 275 ॥ अनुवाद—श्रीनारदने शिकारीसे पूछा, - “हे वैष्णव, तुम्हारे पास कुछ भोजनकी सामग्री आती है तो?' । 453

[ 24/273-279 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

शिकारीने उत्तर दिया, — “आप जिन्हें भेजते हैं, वे दे जाते हैं। किन्तु आप इतनी अधिक भोजन सामग्री मत भेजा कीजिये, उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। हमें तो केवल दो प्राणियोंके पेट भरने जितना ही भोजन चाहिये।” श्रीनारदने कहा, — “ऐसे ही रहते रहो, तुम बहुत भाग्यशाली हो।” इतना कहकर श्रीनारद ऋषि और श्रीपर्वत ऋषि—दोनों अन्तर्धान हो गये॥ 273-275॥

व्याधके उपाख्यानके श्रवणसे साधुसङ्गके माहात्म्यकी उपलब्धि :— एइ त' कहिलुँ तोमार व्याधेर आख्यान। या शुनिले हय साधुसङ्ग-प्रभाव-ज्ञान॥ 276 ॥

अनुवाद—हे सनातन, इस प्रकार मैंने तुम्हें शिकारीकी कथा सुनायी है, जिसे सुननेसे साधुसङ्गके प्रभावका ज्ञान होता है॥ 276॥

यहाँ तक छब्बीस प्रकारके अर्थ :— एइ आर तिन अर्थ गणनाते पाइल। एइ दुइ अर्थ मिलि' 'छाब्बिश' अर्थ हैल॥ 277॥

अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 277॥ अनुभाष्य—'एइ दुइ अर्थ मिलि'’—ये दो अर्थ मिलकर अर्थात् पहले कहे गये तेईस प्रकारके अर्थ (214 संख्याका अनुभाष्य देखें) और अब ये तीन प्रकारके अर्थ, कुल मिलाकर छब्बीस प्रकारके अर्थ हुए॥ 277॥

छब्बीस प्रकारके अर्थोंके अतिरिक्त स्थूलरूपसे दो प्रकारके अर्थोंमें सूक्ष्मतः बत्तीस प्रकारके अर्थ :— आर अर्थ शुन, याहा—अर्थेर भाण्डार। स्थूले 'दुइ' अर्थ, सूक्ष्मे 'बत्रिश' प्रकार॥ 278॥

अनुवाद—'आत्माराम' श्लोकका एक अन्य अर्थ सुनो, जो अर्थोंका भण्डार है। जिसमें साधारणरूपसे 'दो' अर्थ दिखलायी देते हैं, किन्तु सूक्ष्मरूपसे विचार करनेपर इसमें 'बत्तीस' प्रकारके अर्थ हैं॥ 278॥

अनुभाष्य—'स्थूले दुइ'—प्रायः साधारण रूपमें दो प्रकारके—(1) वैधभक्त और (2) रागभक्त। 'सूक्ष्मे 'बत्रिश' प्रकार'—सूक्ष्मरूपसे भेदकी गणना करनेपर बत्तीस प्रकारके अर्थ होते हैं। वैधभक्त—सोलह प्रकारके, जैसे,—(1) पार्षद दास, (2) पार्षद सखा, (3) पार्षद पितादि-गुरु, (4) पार्षद कान्ता, (5) साधनसिद्ध दास, (6) साधनसिद्ध सखा, (7) साधनसिद्ध पितादि-गुरु, (8) साधनासिद्ध कान्ता, (9) जातरति साधक दास, (10) जातरति साधक सखा, (11) जातरति साधक पितादि-गुरु, (12) जातरति साधक कान्ता, (13) अजातरति साधक दास, (14) अजातरति साधक सखा, (15) अजातरति साधक पितादि-गुरु, (16) अजातरति साधक कान्ता। रागभक्त भी इस प्रकार सोलह प्रकारके हैं; — कुल बत्तीस प्रकारके आत्माराम भक्त हैं॥ 278॥

आत्मा-शब्दसे श्रीकृष्णके सभी अवतार :— 'आत्मा'-शब्दे कहे,—सर्वविध भगवान्। एक 'स्वयं भगवान्', आर 'भगवान्'-आख्यान॥ 279॥

अनुवाद—'आत्मा'-शब्दका एक अर्थ सब प्रकारके भगवान् है। इसके अन्तर्गत 'स्वयं भगवान्' और 'भगवान्'के अन्यान्य स्वरूप परिगणित होते हैं॥ 279॥

अनुभाष्य—आत्म-शब्दके द्वारा सब प्रकारके भगवान्को समझा जाता है; 'सर्वविध'—अर्थसे—सब प्रकारके शुद्ध भक्तोंके आराध्य अर्थात् स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण और अन्यान्य श्रीकृष्णस्वरूप भगवान्गणको समझना होगा। 'एक' अर्थात् सर्वविध प्रतीतिमय भगवान्के भी भगवान्—एकमात्र पूर्णतम स्वयं-भगवान् 'श्रीकृष्ण' हैं। ज्ञानियों और योगियोंकी प्राप्य वस्तुकी गणना भगवान्के समान किये जानेपर भी वह सच्चिदानन्द-विग्रह नहीं है, केवल भगवान्की प्रतीति मात्र ही है। यहाँपर एकमात्र स्वयंरूप व्रजेन्द्रनन्दन ही ब्रजके रागभक्तिमार्गसे प्राप्त हो सकते हैं, श्रीकृष्णके

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चौबीसवाँ अध्याय 24/279–288 ] अन्यान्य स्वरूप, सभी भगवान्नामके द्वारा कहलाये जानेवाले और उनसे अभिन्न भगवद्-विग्रह होनेपर भी वैधीभक्तिके मार्गसे ही प्राप्य हैं॥ 279 ॥ स्थूलरूपमें दो प्रकारके भक्त-(1) विधिपूजक, (2) रागयुक्त भक्त :- ताँते रमे येह, सेइ सब—‘आत्माराम’। ‘विधिभक्त’, ‘रागभक्त’,—दुइविध नाम ॥ 280 ॥ अनुवाद—स्वयं-भगवान् अथवा उनके अन्य भगवद्-स्वरूपोंके सेवानन्दको जो अनुभव करते हैं, वे सब ‘आत्माराम’ हैं। ऐसे आत्माराम ‘विधिभक्त’ और ‘रागभक्त’—इन दो प्रकारके होते हैं॥ 280 ॥ दोनोंमेंसे प्रत्येकके चार प्रकार—(1) नित्यसिद्ध, (2) साधनसिद्ध, (3) और (4) दो प्रकारके साधक :- दुइविध भक्त हय चारि चारि प्रकार। पार्षद, साधनसिद्ध, साधकगण आर ॥ 281 ॥ कुल मिलाकर आठ प्रकारके :- जात-अजात-रतिभेदे साधक दुइ भेद। विधि-राग-मार्गे चारि चारि—अष्ट भेद ॥ 282 ॥ अनुवाद—विधिभक्त और रागभक्त आत्माराम—ये दोनों चार-चार प्रकारके होते हैं। पार्षद, साधनसिद्ध, जातरति-साधक और अजातरति-साधक। चार प्रकारके विधिमार्गके भक्त और चार प्रकारके रागमार्गके भक्त—इस प्रकार कुल मिलाकर आठ प्रकारके भेद हैं॥ 281–282 ॥ वैधीभक्तिमें उक्त चार प्रकारके भक्तोंमेंसे प्रत्येकके चार प्रकारके भेद, कुल मिलाकर सोलह प्रकार :- विधिभक्त्ये नित्यसिद्ध पार्षद—‘दास’। ‘सखा’, ‘गुरु’, ‘कान्तागण’,—चारिविध प्रकाश ॥ 283 ॥ साधनसिद्ध—दास, सखा, गुरु, कान्तागण। जातरति साधकभक्त—चारिविध जन ॥ 284 ॥ अजातरति साधकभक्त,—ए चारि प्रकार। विधिमार्गे भक्ते षोड़श भेद प्रचार ॥ 285 ॥ रागमयी-भक्ति भी वैधी-भक्तिकी भाँति सोलह प्रकारकी; इसलिये आत्माराम बत्तीस प्रकारके :- रागमार्गे ऐछे भक्ते षोड़श विभेद। दुइ मार्गे आत्मारामेर बत्रिश विभेद ॥ 286 ॥ अनुवाद—‘दास’, ‘सखा’, ‘गुरु’ और ‘कान्तागण’—ये चार प्रकारके विधिभक्तिके नित्यसिद्ध पार्षद हैं। विधिभक्तिके साधनसिद्ध भक्त भी दास, सखा, गुरु और कान्तागण—ये चार प्रकारके हैं। जो जातरति साधक भक्त हैं, वे भी दासादि चार प्रकारके हैं और उसी प्रकार अजातरति साधक भी दासादि चार प्रकारके हैं। इस प्रकार विधिमार्गके कुल सोलह प्रकारके भक्त हैं। इसी प्रकार रागमार्गके भी सोलह प्रकारके भक्त हैं। इन दोनों मार्गोंके कुल बत्तीस प्रकारके आत्माराम हैं॥ 283–286 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पार्षद अर्थात् नित्यसिद्ध, साधनसिद्ध, जातरतिसाधक और अजातरति-साधक—वैध और रागमार्गके भेदसे चार प्रकारके हैं। नित्यसिद्ध पार्षदगण—दास-सखा-गुरु-कान्ताके भेदसे पुनः चार प्रकारके हैं। साधनसिद्ध, जातरति साधक, अजातरति साधक, ये सब भी पुनः चार-चार प्रकारके हैं॥ 281–285 ॥ इनके साथ मुनि, निर्ग्रन्थ, च और अपिका लगना :- ‘मुनि’, ‘निर्ग्रन्थ’, ‘च’, ‘अपि’,—चारि शब्देर अर्थ। याँहा येइ लागे, ताहा करिये समर्थ ॥ 287 ॥ अनुवाद—‘मुनि’, ‘निर्ग्रन्थ’, ‘च’ और ‘अपि’—इन चारों शब्दोंके जो सब अर्थ पहले बतलाये हैं, उनकी उपरोक्त विधि और रागमार्गके बत्तीस प्रकारके आत्मारामोंके साथ जहाँ सङ्गति होती है, वैसे ही मिलाकर अर्थ करने चाहिये ॥ 287 ॥ यहाँ तक अट्ठावन प्रकारके अर्थ :- बत्रिशे छाब्बिशे मिलि’ अष्टपञ्चाश। आर एक भेद शुन अर्थेर प्रकाश ॥ 288 ॥ अनुवाद—पूर्वकथित छब्बीस अर्थोंके साथ इन । 455

[ 24/288-297 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला बत्तीस अर्थोंको मिलाकर कुल अट्ठावन अर्थ हो गये। जायेगा, उसके द्वारा ही सभी अट्ठावन प्रकारके अब एक ओर प्रकारका अर्थ श्रवण करो ॥ 288 ॥ आत्मारामोंका अर्थ प्रकाशित होगा ॥ 292 ॥ अनुभाष्य-भक्तोंकी श्रेणीमें बत्तीस प्रकार (278 “स्वरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ- संख्याका अनुभाष्य देखें) एवं ज्ञानियों और योगियोंकी उक्तार्थानामप्रयोगः ॥ ”293 ॥ श्रेणीमें छब्बीस प्रकार (276 संख्याका अनुभाष्य देखें)- अश्वत्थवृक्षाश्च वटवृक्षाश्च कपित्थवृक्षाश्च। कुल मिलाकर अट्ठावन प्रकारके हुए ॥ 288 ॥ आम्रवृक्षाश्च वृक्षाः ॥ 294 ॥ च-शब्दके द्वारा अर्थ :- अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 293-294 ॥ इतरेतर 'च' दिया समास करिये। अमृतप्रवाह भाष्य-स्वरूपसे एक जैसे और एक 'आटात्रं'वार आत्माराम नाम लइये ॥ 289 ॥ विभक्तिमें जिनका अर्थ कहा जाता है, वहाँ एक 'आत्मारामश्च आत्मारामश्च' आटात्रबार। स्वरूपको रखकर अन्य सब स्वरूपोंका प्रयोग नहीं शेषे सब लोप करि' राखि एकबार ॥ 290 ॥ होता है, जैसे,-'रामश्च, रामश्च, रामश्च',-इनके स्थानपर अनुवाद-अट्ठावन अर्थोंमें आत्माराम-शब्दके साथ एक 'रामा:' शब्दका प्रयोग होता है। 'वृक्षा:' (बहुवचन) 'च'-शब्दका समास करनेपर 'आत्मारामश्च, आत्मारामश्च' शब्दसे पीपलका वृक्ष, बड़का वृक्ष, बेलका वृक्ष, अट्ठावन बार कहे जायेंगे। (पहले जैसे पयार 143में आमका वृक्ष सभीको कहा गया है; इसलिये यहाँपर कहा गया है) आखिरीको छोड़कर अन्य सब लोप हो वृक्षोंके पृथक् पृथक् नामोंका प्रयोग नहीं किया गया जायेंगे और अन्तमें एक ही रहेगा जो अन्य सबका है ॥ 293-294 ॥ सूचक होगा ॥ 289-290 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 24/145 संख्या देखें ॥ 291-293 ॥ विश्वप्रकाश, पाणिनि और सिद्धान्त-कौमुदी :- “अस्मिन् वने वृक्षाः फलन्ति” यैछे हय। स्वरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ तैछे सब आत्माराम कृष्णे भक्ति करय ॥ 295 ॥ उक्तार्थानामप्रयोग इति ॥ 291 ॥ अनुवाद-“अस्मिन् वने वृक्षाः फलन्ति"-अर्थात् अनुवाद-स्वरूपसे एक जैसे और एक विभक्तिमें इस वनमें वृक्ष फलते हैं- इस वाक्यमें वृक्षसे सभी जिनका अर्थ कहा जाता है, वहाँ एक स्वरूपको प्रकारके वृक्षोंका बोध होता है, उसी प्रकारसे सभी रखकर अन्य सब स्वरूपोंका प्रयोग नहीं होता है, आत्माराम श्रीकृष्णकी भक्ति करते हैं ॥ 295 ॥ जैसे,- 'रामश्च, रामश्च, रामश्च',-इनके स्थानपर एक 'मुनयश्च'-पदको गिनकर उनसठ प्रकारके अर्थ :- 'रामा:' शब्दका प्रयोग होता है ॥ 291 ॥ 'आत्मारामश्च' समुच्चये कहिये च-कार। अनुभाष्य-मध्यलीला 24/145 संख्या देखें ॥ 291 ॥ 'मुनयश्च' भक्ति करे, -एइ अर्थ तार ॥ 296 ॥ आटात्रबारे आत्माराम, सब लोप हय। 'निर्ग्रन्था एव' हञा, 'अपि'-निर्द्धारणे। एक आत्माराम-शब्दे आटात्र अर्थ हय ॥ 292 ॥ एइ 'ऊनषष्टि' प्रकार अर्थ करिलुँ व्याख्याने ॥ 297 ॥ अनुवाद-अट्ठावन बारमें अन्य सब आत्माराम अनुवाद-अट्ठावन बार आत्माराम-शब्दका उच्चारण लोप हो जायेंगे, केवल एक आत्माराम शब्द ही रह करनेपर च-कारको समुच्चयमें लेनेपर उसमें मुनय- 456 ।

शब्दका योग करेंगे। इसका अर्थ होगा कि मुनिगण भी श्रीकृष्णका भजन करते हैं। इस प्रकार यह उनसठवाँ अर्थ है। तब निर्ग्रन्थ-शब्द लेकर 'अपि'-शब्दको निर्धारण रूपमें लेनेपर मैंने इन उनसठ प्रकारके अर्थोंकी व्याख्या की है॥ 296-297॥ अनुभाष्य—अट्ठावन प्रकारके आत्माराम और मुनिगण निर्ग्रन्थ होकर श्रीकृष्णकी भक्ति करते हैं, —यही उनसठवाँ अर्थ है॥ 296-297॥ और एक प्रकारका अर्थ :— सर्वसमुच्चये आर एक अर्थ हय। 'आत्मारामश्च मुनयश्च निर्ग्रन्थाश्च' भजय ॥ 298 ॥ 'अपि'-शब्द—अवधारणे, सेइ चारि बार। चारिशब्द-सङ्गे 'एव' करिबे उच्चार ॥ 299 ॥ अनुवाद—सभी शब्दोंको साथ लेनेपर एक और अर्थ होता है। आत्माराम हो अथवा मुनि हो अथवा निर्ग्रन्थ हो, सभी श्रीकृष्णका भजन करेंगे। 'अपि'-शब्द तब निश्चयके रूपमें प्रयोग होता है, और चार बार चारों शब्दोंके साथ 'एव'का उच्चारण हो सकता है॥ 298-299॥ अनुभाष्य—सर्व समुच्चय अर्थात् आत्माराम, मुनि और निर्ग्रन्थगण, सभी श्रीकृष्णभजन करते हैं। अपि- शब्दका अवधारण अर्थात् निश्चय-अर्थ ग्रहण करके साठ प्रकारके अर्थ हुए हैं॥ 299॥ महाप्रभुपादोक्त-व्याख्या :— “उरुक्रमे एव भक्तिमेव अहैतुकीमेव कुर्वन्त्येव ॥" 300 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 300 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उरुक्रम', 'भक्ति', 'अहैतुकी' और 'कुर्वन्ति'—इन चार शब्दोंके साथ 'एव' योग करके और एक अर्थ करूँगा ॥ 300 ॥ अमृतानुकरणा—'च'-शब्दसे सर्वसमुच्चयमें एक और अर्थ होता है—'आत्मारामश्च मुनयश्च निर्ग्रन्थश्च' अर्थात् आत्मारामगण, मुनिगण और निर्ग्रन्थगण, सभी श्रीकृष्णका भजन करते हैं। उस स्थानपर जो अपि-शब्द है, वह 'एव'-रूपमें अवधारण-अर्थमें (निश्चयके अर्थमें) चार शब्दोंके साथ चार बार प्रयोग होगा, जैसे— (1) 'उरुक्रम एव'—उरुक्रम-श्रीकृष्णकी ही, ब्रह्म, परमात्मा अथवा अन्य भगवत्स्वरूपकी नहीं, (2) 'भक्तिम् एव'—केवल भक्ति ही, कर्म-ज्ञान-योगादि नहीं, (3) 'अहैतुकीम् एव'—अहैतुकी ही, धर्म, अर्थ, काम, मोक्षादि स्वसुख- वासनादि किसी हेतु-निमित्त नहीं और (4) 'कुर्वन्ति एव'—परस्मैपदमैं 'कुर्वन्ति' प्रयोगके कारण (25 संख्या देखें) श्रीकृष्णप्रीतिके उद्देश्य मात्रसे ही भक्ति करते हैं॥ 298-300 ॥ यहाँ तक साठ प्रकारके अर्थ :— एइ त' कहिलुँ श्लोकेर 'षष्ठि' संख्यक अर्थ। एक अर्थ शुन आर प्रमाणे समर्थ ॥ 301 ॥ सबसे अन्तमें और एक प्रकारका अर्थ— आत्मा-शब्दसे 'क्षेत्रज्ञा-शक्ति' :— 'आत्मा'-शब्दे कहे—'क्षेत्रज्ञ-जीव'-लक्षण। ब्रह्मादि कीटपर्यन्त—ताँर शक्तिते गणन ॥ 302 ॥ अनुवाद—अब तक मैंने श्लोकके 'साठ' अर्थ बतलाये हैं। अब एक और अर्थ सुनो जिसका बड़ा प्रबल प्रमाण है। 'आत्मा'-शब्दका एक अर्थ है—'क्षेत्रज्ञ जीव'। ब्रह्मासे लेकर क्षुद्र कीट तक जितने भी जीव हैं—उन सबकी गणना श्रीकृष्णकी जीव-शक्तिमें होती है॥ 301-302 ॥ विष्णुपुराण (6/7/61)में— विष्णुशक्तिः पराः प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा। अविद्या-कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥ 303 ॥ अनुवाद—विष्णुशक्ति—परा, क्षेत्रज्ञा और अविद्या नामक, तीन प्रकारकी है। विष्णुकी पराशक्ति ही 'चित्-शक्ति' है, क्षेत्रज्ञा-शक्ति ही जीवशक्ति है (जिसको मायारूपा 'अविद्या' से 'अपरा' अर्थात् भिन्ना कहा गया । 457

[ 24/303-313 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला है) और कर्म नामक अविद्या-शक्तिका नाम 'माया' है॥ 303 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 7/119 संख्या देखें ॥ 303 ॥ क्षेत्रज्ञका पर्यायवाची शब्द :- अमरकोषके स्वर्गवर्ग (7) में— “क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः प्रधानं प्रकृतिः स्त्रियाम् ॥”304 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 304 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—क्षेत्रज्ञ शब्दसे—आत्मा, पुरुष, प्रधान और प्रकृतिको समझना है॥ 304 ॥ साधुसङ्गके फलसे श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :- भ्रमिते भ्रमिते यदि साधुसङ्ग पाय। सब त्यजि' तबे तिँहो कृष्णेरे भजय ॥ 305 ॥ षाटि अर्थ कहिलुँ, सब—कृष्णेर भजने। सेइ अर्थ हय, एइ सब उदाहरणे ॥ 306 ॥ अनुवाद—सभी जीव संसारमें अनेक योनियोंमें और लोकोंमें भ्रमण कर रहे हैं, ऐसे भ्रमण करते-करते जब वे साधुसङ्ग प्राप्त करते हैं, तब वे सब कुछ त्याग करके श्रीकृष्णका भजन करते हैं। मैंने जो साठ अर्थ बतलाये हैं, वे सभी श्रीकृष्णभजनको लक्ष्य करते हैं। इन समस्त उदाहरणोंका यही अर्थ है॥ 305-306 ॥ कुल मिलाकर यहाँ तक इकसठ प्रकारके अर्थोंकी व्याख्या :- 'एकषष्टि' अर्थ एबे स्फुरिल तोमा-सङ्गे। तोमार भक्तिवशे उठे अर्थेर तरङ्गे ॥” 307 ॥ अनुवाद—मुझमें तुम्हारे सङ्गसे 'इकसठ' अर्थोंकी स्फूर्ति हुई है। तुम्हारी भक्तिके प्रभावसे इन अर्थोंकी तरङ्ग उठ रही हैं॥ 307 ॥ अनुभाष्य—आत्मा शब्दका 'जीव' अर्थ करनेपर ब्रह्मासे आरम्भ करके कीट तक सभी जीवशक्ति हैं, वे क्षेत्रज्ञ जीवगण निर्ग्रन्थ मुनि होकर श्रीकृष्णभजन करते हैं—यही इकसठवाँ अर्थ है ॥ 307 ॥ इकसठ प्रकारके अर्थोंके श्रवणसे श्रीसनातनका विस्मय और महाप्रभुकी स्तुति :- अर्थ शुनि' सनातन विस्मित हञा। स्तुति करे महाप्रभुर चरणे धरिया ॥ 308 ॥ पुरुषरूपमें महाप्रभुके निश्वास छोड़नेके साथ ही वेदोंका प्रकाश :- “साक्षात् ईश्वर तुमि व्रजेन्द्रनन्दन। तोमार निश्वासे सर्ववेद-प्रवर्त्तन ॥ 309 ॥ शेषादि विष्णुरूपमें महाप्रभुके द्वारा ही भागवतकी व्याख्या और उसके विषयमें अभिज्ञता :- तुमि वक्ता भागवतेर, तुमि जान अर्थ। तोमा बिना अन्य जानिते नाहिक समर्थ ॥” 310 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके श्रीमुखसे आत्माराम-श्लोकके इकसठ प्रकारके अर्थ सुनकर श्रीसनातन गोस्वामी विस्मित हो गये और वे महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर उनकी स्तुति करने लगे,—“आप साक्षात् भगवान् श्रीव्रजेन्द्रनन्दन हैं, आपके निश्वाससे ही सभी वेद प्रकाशित हुए हैं। आप ही भागवतके वक्ता हैं और आप ही उसके समस्त अर्थोंको जानते हैं। आपके अतिरिक्त भागवतके अर्थोंको जाननेमें कोई भी समर्थ नहीं है॥” 308-310 ॥ महाप्रभुके द्वारा भागवत-माहात्म्य कहना :- प्रभु कहे,—“केने कर आमार स्तवन। भागवतेर स्वरूप केने ना कर विचारण ? ॥ 311 ॥ कृष्ण-तुल्य भागवत—विभु, सर्वाश्रय। प्रति-श्लोके प्रति-अक्षरे नाना अर्थ कय ॥ 312 ॥ पूर्वकालमें श्रीपरीक्षित और श्रीशुकदेव और उसके बाद शौनकादि और श्रीसूतके प्रश्नोत्तरमें श्रीभागवत-प्रकाशित :- प्रश्नोत्तरे भागवते करियाछे निर्धार। याँहार श्रवणे लोके लागे चमत्कार ॥ 313 ॥ 458

चौबीसवाँ अध्याय 24/311-316 ] अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“हे सनातन! तुम मेरी स्तुति क्यों कर रहे हो? तुम भागवतके स्वरूपका विचार क्यों नहीं करते? भागवत श्रीकृष्णके ही समान विभु और सबका आश्रय है। भागवतके प्रति श्लोकमें और प्रति अक्षरमें अनेक अर्थ छिपे हैं। प्रश्नोत्तरके द्वारा भागवतमें समस्त सिद्धान्त स्थापित हुए हैं। इन प्रश्नोत्तरोंको सुनकर लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं॥ 311-313 ॥ प्राचीनकृत श्लोकमें श्रीशिवके वचन :— अहं वेद्मि शुको वेत्ति व्यासो वेत्ति न वेत्ति वा। भक्त्या भागवतं ग्राह्यं न बुद्ध्या न च टीकया ॥ 314 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 314 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महादेवने कहा,—मैं भागवत जानता हूँ, शुक भागवत जानते हैं, व्यास जानते हैं अथवा नहीं जानते हैं। भक्तिके द्वारा ही भागवत ग्रहण की जा सकती है, बुद्धि अथवा टीकाके द्वारा कभी भी ग्रहण नहीं की जा सकती॥ 314 ॥ अनुभाष्य— अहं (शिवः) [भागवतं शास्त्रं] वेद्मि (जानामि), शुकः (वैयासकिः) वेत्ति (जानाति), व्यासः वेत्ति वा न वेत्ति (इति सन्देहः); भागवतं (पारमहंसी-संहिताख्यं शास्त्रं) भक्त्या (विष्णोः कीर्त्तन-श्रवण-धारा-पारम्पर्येण, विष्णौ शरणागत्यात्मक-हरिसेवनेन एव) ग्राह्यं, बुद्ध्या न, टीकया न च (न तु तर्केणेत्यर्थः— “यस्य देवे परा भक्तिः” इति, “नायमात्मा प्रवचनेन” इति, “तद्विधि प्रणिपातेन” इत्यादि-श्रुतिस्मृतिवचनेभ्यश्च)। श्लोक-भावानुवाद—मैं, शिव, भागवत शास्त्रको जानता हूँ, शुक इसे जानते हैं, व्यास जानते हैं अथवा नहीं जानते हैं (इसमें सन्देह है)। पारमहंसी-संहिता शास्त्र भागवत विष्णुकी कीर्त्तन-श्रवण-धारा परम्परामें स्थित होकर विष्णुके शरणागत होकर उनकी सेवारूपी भक्तिके द्वारा ही ग्रहण की जा सकती है, बुद्धि अथवा टीकाके द्वारा कभी भी ग्रहण नहीं की जा सकती। (यह तर्कके द्वारा नहीं ग्रहण की जा सकती, किन्तु श्रुति-स्मृति वचनों “यस्य देवे परा भक्तिः”, “नायमात्मा प्रवचनेन”, “तद्विधि प्रणिपातेन” आदिके द्वारा ही ग्रहण की जा सकती है।)॥ 314 ॥ श्रीकृष्णके अप्रकट होनेपर भागवत ही ग्रन्थरूपी श्रीकृष्णका विग्रह :— श्रीमद्भागवत (1/1/23)— ब्रूहि योगेश्वरे कृष्णे ब्रह्मण्ये धर्मवर्मणि। स्वां काष्ठामधुनोपेते धर्मः कं शरणं गतः ॥ 315 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 315 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—[हे सूत!] योगेश्वर ब्रह्मण्यदेव, धर्मकी रक्षाके लिये कवचस्वरूप श्रीकृष्णके अपने नित्यधामको प्राप्त करनेपर धर्म इस समय किसके शरणागत हुआ है, यह बतलाओ॥ 315 ॥ अनुभाष्य—नैमिषारण्यमें शौनकादि ऋषियोंने महाभागवत श्रीसूत गोस्वामीसे जिन छः प्रश्नोंके उत्तरकी जिज्ञासा की थी, उनमेंसे यही सबसे श्रेष्ठ छठा प्रश्न है और अगले श्लोकमें श्रीसूतने इसका ही उत्तर प्रदान किया है,— [हे सूत,] योगेश्वरे (योगिनः एव योगाः तेषाम् ईश्वरे षडैश्वर्यपूर्णे) ब्रह्मण्ये (ब्राह्मण-रक्षके) धर्मवर्मणि (सनातन-धर्मस्य वर्मणि कवचवद्-गोप्तरि) कृष्णे स्वां काष्ठां (दिशं स्वरूपं, निजनित्यधाम, अप्रकटलीलामित्यर्थः) उपेते (प्राप्ते सति), धर्मः (सनातनः) अधुना कं शरणम् (आश्रयं) गतः (प्राप्तः,—कमाश्रित्य सनातनोधर्मः तिष्ठति, तत्) ब्रूहि (कथय)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 315 ॥ श्रीमद्भागवत (1/3/43)में— कृष्णे स्वधामोपगते धर्मज्ञानादिभिः सह। कलौ नष्टदृशामेषः पुराणार्कोऽधुनोदितः ॥ 316 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 316 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—धर्म-ज्ञानादिके साथ श्रीकृष्णके स्वधाम जानेपर इस कलिकालमें अज्ञानके अन्धकारसे अन्धे हो रहे लोगोंके हितके लिये यही पुराणरूपी सूर्य अब उदित हुए हैं॥ 316 ॥ । 459

[ 24/316-324 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य— [यद् युष्माभिः पृष्टं—‘धर्मः कं शरणं गतः?’ इति, तदिदमेव बुध्यस्वेत्याह—] धर्मज्ञानादिभिः (षड्भिः ऐश्वर्यैः) सह कृष्णे स्वधाम उपगते (प्रकटलीलां समाप्य अप्रकट-लीलां प्राप्ते सति) अधुना (सम्प्रति) कलौ (कलियुगे) नष्टदृशां (सद्धर्म-विष्णुभक्तितत्त्वज्ञानरहितानां हिताय) एषः पुराणार्कः (सूर्य इव उद्धर्मशार्वरहरः श्रीमद्भागवत-ग्रन्थः) उदितः (आविर्भूतः, प्रकटितः इत्यर्थः) । श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 316 ॥ श्रीचैतन्यका अनुसरण करते हुए शुद्ध चिद्धर्मके स्फुरित होनेसे अप्राकृत श्रीकृष्ण-सेवोन्मत्तके लिये ही भागवतके अर्थको जाननेमें योग्यताका निर्देश :- एइ मत कहिलुँ एक श्लोकेर व्याख्यान। वातुलेर प्रलाप करि' के करे प्रमाण ? ॥ 317 ॥ आमा-हेन येबा केह 'वातुल' हय। एइ दृष्टे भागवतेर अर्थ जानय ॥"318 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने भागवतके केवल एक श्लोककी ही व्याख्या की है। किन्तु पागलका प्रलाप समझकर कौन इसे प्रमाण मानेगा ? मेरे जैसा यदि कोई 'पागल' हो, तभी वह इस दृष्टिकोणसे भागवतके अर्थोंको जान सकता है॥"317-318 ॥ महाप्रभुसे श्रीसनातनके द्वारा 'वैष्णव-स्मृति'के सम्बन्धमें दीनतापूर्वक जिज्ञासा और श्रीमुखसे उपदेशको श्रवण करनेकी इच्छा :- पुनः सनातन कहे युड़ि' दुइ करे। “प्रभु, आज्ञा दिला 'वैष्णवस्मृति' करिबारे ॥ 319 ॥ मुञि—नीच-जाति, किछु ना जानि विचार। मो-हैते कैछे हय स्मृति-परचार ॥ 320 ॥ अनुवाद—दोनों हाथ जोड़कर श्रीसनातन गोस्वामीने तब महाप्रभुसे कहा, — “हे प्रभो! मुझे आपने 'वैष्णवस्मृति'की रचना करनेके लिये आज्ञा दी थी। मैं नीच-जातिका हूँ और वैष्णवाचारके विषयमें कुछ भी नहीं जानता हूँ। तब मैं कैसे वैष्णवाचारके नियमोंके ग्रन्थको लिख सकता हूँ? ॥ 319-320 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'नीचजाति' -श्रीसनातनने कहा, 'मैं म्लेच्छोंके संसर्गसे पतित ब्राह्मणजाति हूँ ॥'320 ॥ अनुभाष्य— 'वैष्णवस्मृति' - वैष्णवोंके लौकिक आचार-विषयक व्यवहार-शास्त्र 'श्रीहरिभक्तिविलास'-ग्रन्थ। जाति तीन प्रकारकी हैं—शौक्र (जन्मके अनुसार), सावित्र (उपनयन संस्कारके अनुसार) और दैक्ष (दीक्षाके अनुसार)। यद्यपि श्रीसनातन पवित्र कर्णाट ब्राह्मणकुलमें आविर्भूत हुए थे, तथापि लौकिक दृष्टिसे म्लेच्छोंकी दास्यवृत्ति नीचजातिके होनेका सङ्केतमात्र है। वर्तमानकालमें केवल मातृ-गर्भसे जन्म ही 'जाति'का परिचय है, वास्तवमें यह अनभिज्ञताका ही परिचायक मात्र है ॥ 319-320 ॥ सूत्र करि' दिशा यदि करह उपदेश। आपने करह यदि हृदये प्रवेश ॥ 321 ॥ तबे तार दिशा स्फुरे मो-नीचेर हृदये। ईश्वर तुमि, -ये कराह, सेइ सिद्ध हये ॥ "322 ॥ अनुवाद-आप कृपा करके सूत्ररूपमें वैष्णवस्मृतिकी प्रणालीका उपदेश प्रदान करें। आप स्वयं मेरे हृदयमें प्रवेश करें। आपके हृदयमें आनेपर और निर्देश प्रदान करनेपर मुझ नीचके हृदयमें इस ग्रन्थकी स्फूर्ति हो सकती है। आप ईश्वर हैं, आप जैसा करायेंगे, वही होगा ॥"321-322 ॥ अनुभाष्य— 'दिशा' - प्रणाली ॥ 322 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनको वरदान :- प्रभु कहे, – “ये करिते करिबा तुमि मन। कृष्ण सेइ सेइ तोमा कराबे स्फुरण ॥ 323 ॥ महाप्रभुके द्वारा वैष्णव-स्मृतिका सूत्र-वर्णन और 'हरिभक्तिविलास'की नींवकी संस्थापना :- तथापि एइ सूत्रेर शुन दिग्दरशन। सकारण लिखि आदौ गुरु-आश्रयण ॥ 324 ॥ 460 ।

चौबीसवाँ अध्याय [24/323-324]

अनुवाद- महाप्रभुने कहा,—“तुम जो कुछ भी करनेकी इच्छा करोगे, श्रीकृष्ण वही-वही तुम्हारे हृदयमें स्फुरित करा देंगे। तथापि वैष्णवस्मृतिके सूत्रोंका दिग्दर्शन सुनो। सर्वप्रथम तुम गुरुपदाश्रय करनेके महत्वको उसके कारणसहित लिखना॥ 323-324॥

अनुभाष्य- पाठान्तरमें, 'सर्वकारण',—सभीके कारणस्वरूप। 'गुरु-आश्रयण'—आदिलीला 1/35-46 संख्या देखें।

श्रीहरिभक्तिविलासके प्रथम-विलासमें— “आदौ सकारणं लेख्यं श्रीगुर्वाश्रयणं ततः। गुरुशिष्यपरीक्षादिर्भगवान् मनवोऽस्य च॥ मन्त्राधिकारी सिद्ध्यादिशोधनं मन्त्रसंस्क्रिया। दीक्षा नित्यं ब्राह्मकाले शुभोत्थानं पवित्रता॥ प्रातःस्मृत्यादि कृष्णस्य वाद्याद्यैश्च प्रबोधनम्। निर्माल्योत्तारणाद्यादौ मङ्गलारात्रिकं ततः॥ मैत्रादिकृत्यं शौचाचमनं दन्तस्य धावनम्। स्नानं तान्त्रिक-सन्ध्यादि देवसद्मादि-संस्क्रिया॥ तुलस्याद्याहृतिर्गृहेस्नान-मुष्णोदकादिकम्। वस्त्रं पीठं चोर्ध्वपुण्ड्रं चक्रादिमुद्रा माला च गृहसन्ध्यार्चनं गुरोः। माहात्म्यञ्चाथ कृष्णस्य द्वारवेश्मान्तरार्चनम्॥ पूजार्थासनमर्घ्यादिस्थापनं विघ्नवारणम्। श्रीगुर्वादिन्नतिर्भूतशुद्धिः प्राणविशोधनम्॥ न्यासा मुद्राप्रपञ्चश्च कृष्णध्यानान्तरर्चने। पूजापदानि श्रीमूर्त्तिशालग्रामशिलास्तथा॥ द्वारकोद्भवचक्राणि शुद्धयः पीठपूजनम्। आवाहनादि तन्मुद्रा आसनादिसमर्पणम्॥ स्नपनं शङ्ख-घण्टादिवाद्यं नामसहस्रकम्। पुराणपाठो वसनमुपवीतं विभूषणम्॥ गन्धः श्रीतुलसीकाष्ठचन्दनं कुसुमानि च। पत्राणि तुलसी चाङ्गोपाङ्गावरणपूजनम्॥ धूपो दीपश्च नैवेद्यं पानं होमो बलिक्रिया। अवगण्डुषाद्यास्यवासो दिव्यगन्धादिकं पुनः। राजोपचारा गीतादि महानीराजनं तथा॥ शङ्खादिवादनं साम्बुशङ्खनीराजनं स्तुतिः। नतिः प्रदक्षिणा कर्माह्यर्पणं जपयाचने। आगःक्षमापणं नानागांसि निर्माल्यधारणम्॥ शङ्खाम्बुतीर्थं तुलसीपूजा तन्मृत्तिकादि च। धात्री स्नान-निषेधस्य कालो वृत्तेरुपार्जनम्॥ मध्याह्ने वैश्व-देवादिश्श्राद्धं चानर्प्यमुच्यते। विनार्च्चामशने दोषास्तथानर्पितभोजने॥ नैवेद्यभक्षणं सन्तः सत्सङ्गोऽसत्सङ्गतिः। असद्गतिर्वैष्णवोपहास-निन्दादि-दुष्फलम्॥ सतां भक्तिर्विष्णुशास्त्रं श्रीमद्भागवतं तथा। लीलाकथा च भगवद्धर्माः सायं निज-क्रियाः॥ कर्मपातपरीहारस्त्रिकालाच्चार्चा विशेषतः। नक्तं कृत्यान्यथो पूजा-फलसिद्ध्यादि-दर्शनम्॥ विष्ण्वर्थदानं विविधोपचारा न्यूनपूरणम्। शयनं महिमाच्चार्याः श्रीमन्नाम्नस्तथाद्भुतः। नामापराधा भक्तिश्च प्रेमाद्याश्रयणादयः। पक्षेष्वेकादशी साङ्गा श्रीद्वादश्यष्टकं महत्। कृत्यानि मार्गशीर्षादि-मासेषु द्वादशस्वपि। पुरश्चरणकृत्यानि मन्त्रसिद्धस्य लक्षणम्॥ मूर्त्याविर्भावनं मूर्त्तिप्रतिष्ठा कृष्णमन्दिरम्। जीर्णोद्धृतिः श्रीतुलसीविवाहोऽन्यत्कर्म च॥”

[अर्थात् श्रीहरिभक्तिविलासमें वर्णित विषयसमूह— सर्वप्रथम कारण-सहित श्रीगुरुका आश्रय-ग्रहण, उसके बाद गुरुके लक्षण, शिष्यके लक्षण, गुरुशिष्य-परीक्षादि, भगवन्मन्त्र-माहात्म्य, मन्त्रके अधिकारी, सिद्ध्यादि-शोधन, मन्त्रका संस्कार, दीक्षा, नित्य ब्राह्ममुहूर्त्तमें शुभ उठना (अर्थात् कृष्ण-कीर्तनके साथ शय्यासे उठना), नित्य पवित्रता (अर्थात् हाथ-पैर धोना, दन्तधावन और आचमनादिके द्वारा पवित्र होना), श्रीकृष्ण विषयक प्रातः स्मरण-कीर्तन-विज्ञप्तिपाठ-प्रणामादि, वाद्यादिके साथ जगाना (भगवान्‌को जगाना), निर्माल्यको हटाना, उसके पश्चात् मङ्गलारात्रिक, उसके बाद मल-त्यागादि कार्य, शौच, आचमन, दन्तधावन, तान्त्रिक सन्ध्यादि, देवमन्दिरादिका संस्कार (सफाई), तुलसी आदिका चयन, अपने घरमें स्नान, गर्म जलादिसे स्नान, वस्त्र धारण करना, आसन, ऊर्ध्वपुण्ड्र गृहसन्ध्या, गुरुपूजा और गुरु-माहात्म्य, उसके बाद श्रीकृष्णकी द्वार और घरमें पूजा, पूजाके लिये आसन, अर्घ्य-पात्र आदिका स्थापन, विघ्न-निराकरण, श्रीगुर्वादि


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[ 24/324-325 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

[बायाँ स्तम्भ / Left Column] प्रणाम, भूतशुद्धि, प्राणायाम, न्यास, मुद्रापञ्चक, श्रीकृष्ण ध्यान, उसके बाद अन्तर्याग, पूजाका स्थान, श्रीमूर्त्ति और शालग्राम-शिलाका लक्षण, द्वारका-उद्भूत चक्रसमूह, श्रीमूर्त्ति-स्नानादि शुद्धिसमूह, पीठ-पूजा, आवाहन- संस्थापन-निकटमें रहनादि और वैसी-वैसी-मुद्रा, आसनादि समर्पण, स्नान, उस समय शङ्ख-घण्टादि वाद्य, सहस्रनाम, पुराणपाठ, वस्त्र, उपवीत, अलङ्कार, गन्ध, तुलसीकाष्ठ-चन्दन, पुष्प, विल्व-पत्रादि, तुलसी, अङ्ग-उपाङ्ग-आवरणपूजा, धूप, दीप, नैवेद्य, पान, होम, बलिक्रिया (विष्वक्सेनादि भक्तोंको भगवान्‌का उच्छिष्ट-अंश देना), कुल्लाके लिये जल, लौंग-पानादि मुखवास, पुनः दिव्यगन्ध द्रव्यादि, छत्र-चामरादि राजोपकरण, गीतादि, महा-अर्चन, शङ्खादि वाद्य, शङ्खमें जल भरके अर्चन, स्तुति, प्रणाम, प्रदक्षिणा, कर्मादि-अर्पण, जप, प्रार्थना, अपराधोंके लिये क्षमा याचना, निर्माल्य (प्रसादी माला)-धारण, भगवद्-अर्चनसे बचा शङ्खजल, तीर्थ (चरणामृत), तुलसीके काननमें भगवान् और तुलसीकी पूजा, तुलसी-मृत्तिका- काष्ठादि, आँवलेका माहात्म्य, स्नानका निषेधकाल, जीविका-उपार्जन, मध्याह्नमें वैश्य-देवतादि-श्राद्ध, भगवान्में जो सब द्रव्य अर्पण योग्य नहीं हैं, भगवान्‌की पूजाके अतिरिक्त भोजनमें और अनिवेदित वस्तुके भोजनमें दोषसमूह, नैवेद्य-भक्षण, भगवद्भक्तगण, साधुसङ्ग, असाधुसङ्ग-वर्जन, असत् व्यक्तियोंकी गति, उपासनादि निजकृत्य, वैष्णवोंके कर्मपातके दोष-निराकरण-सिद्धान्त, विशेषतः तीनों कालोंमें अर्चनका विशेष विधान, रात्रिकृत्य (अर्थात् गीत-वाद्यादि सहित भगवान्‌के शयनोपचारकी रचना), पूजाके फलकी सिद्धि आदि, पूजा अथवा श्रीमूर्त्ति-दर्शन, विष्णु प्रीतिके लिये दान, विविध पूजोपचार, द्रव्यके अभावमें पूजाका समाधान, अपने शयनकी विधि, श्रीभगवान्‌की पूजा और श्रीनामकी महिमा, नामापराधसमूह, भक्तिका माहात्म्य, प्रेम-सम्पत्ति लक्षण, आश्रयण (शरणागति), कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष, दोनोंमें अङ्गों सहित श्रीएकादशी-व्रतोपवास, अष्ट- महाद्वादशी, अग्रहायणादि बारह मासोंके कृत्य,

[दायाँ स्तम्भ / Right Column] पुरश्चरण-कृत्य, मन्त्रसिद्धिके लक्षण, श्रीभगवान्‌की मूर्त्तिका शिल्प आदिके द्वारा सम्पादन, श्रीमूर्त्ति प्रतिष्ठा, श्रीकृष्णमन्दिर, जीर्णमन्दिरादिका उद्धार, श्रीतुलसी विवाह और ऐकान्तिक भक्तोंके कृत्य।] ॥ 324 ॥ गुरुलक्षण, शिष्यलक्षण, दोँहार परीक्षण। सेव्य-भगवान्, सर्वमन्त्र-विचारण ॥ 325 ॥ अनुवाद— उस ग्रन्थमें गुरु और शिष्य, दोनोंके लक्षणोंका वर्णन करना। साथ ही गुरु और शिष्यकी एक दूसरेकी परीक्षा लेनेकी आवश्यकता बतलाना। स्वयं-भगवान् सबके सेव्य हैं एवं श्रीकृष्ण और अन्य भगवद्-स्वरूपोंकी उपासनाके मन्त्रोंको उस ग्रन्थमें लिखना ॥ 325 ॥ अनुभाष्य— 'गुरु-लक्षण'—(पद्मपुराणमें)— “महाभागवतश्रेष्ठो ब्राह्मणो वै गुरुर्नृणाम्। सर्वेषामेव लोकानामसौ पूज्यो यथा हरिः॥ महाकुलप्रसूतोऽपि सर्वयज्ञेषु दीक्षितः। सहस्रशाखाध्यायी च न गुरुः स्यादवैष्णवः॥” भाः 7/11/35 श्लोकमें उक्त लक्षणोंके अनुसार ही ब्राह्मणादि 'वर्ण' निर्दिष्ट होते हैं। इस श्लोककी श्रीधरस्वामिपादकी टीका,— “शमादिभिरेव ब्राह्मणादि-व्यवहारो मुख्यः, न जाति-मात्रादित्याह- यस्येति। यद् यदि अन्यत्र वर्णान्तरेऽपि दृश्यते, तद्वर्णान्तरं तेनैव लक्षणनिमित्तेनैव वर्णेन विनिर्देशेत्, न तु जातिनिमित्तेनेत्यर्थः।” महाभारतकी टीकामें नीलकण्ठ कहते हैं,— “शूद्रोऽपि शमाद्युपेत्य ब्राह्मण एव। ब्राह्मणोऽपि कामाद्युपेतः शूद्र एव।” [अर्थात् (पद्मपुराणमें गुरुलक्षण)—“महाभागवत श्रेष्ठ ब्राह्मण ही सभी मनुष्योंके गुरु हैं, वे सभी लोगोंमेंसे श्रीहरिके समान ही पूजनीय हैं। महाकुलमें उत्पन्न होनेपर भी, समस्त यज्ञोंमें दीक्षित होनेपर भी और सहस्र शाखाओंका अध्ययन करनेपर भी अवैष्णव होनेपर वे 'गुरु' नहीं कहे जा सकते।” (भाः 7/11/35 श्लोककी श्रीधरस्वामि-कृत टीका)—“शमादि गुणोंके

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चौबीसवाँ अध्याय 24/325 ] द्वारा ही ब्राह्मणादि वर्णका निर्णय मुख्य है—केवल जातिके द्वारा नहीं, यही 'यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं' श्लोकमें कहा गया है। यदि अन्यत्र अर्थात् अन्य वर्णमें भी शमादि-गुण दिखलायी दें, तब उस अन्य वर्णवालेको उस वर्ण लक्षणके द्वारा ही मानना चाहिये, जाति निमित्तके द्वारा नहीं।” (महाभारतकी टीकामें श्रीनीलकण्ठ)—“शूद्रकुलमें उत्पन्न व्यक्ति शमादि-गुणोंसे भूषित होनेपर वह निश्चय ही 'ब्राह्मण' है और ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न व्यक्ति कामादिसे युक्त होनेपर अवश्य ही 'शूद्र' है।”] ब्राह्मण कहकर अपना परिचय देनेपर ही अथवा अनभिज्ञ व्यक्तियोंके द्वारा वैसा परिचय दिये जानेपर ही कोई व्यक्ति गुरुपदके योग्य 'ब्राह्मण' कहकर माने जायेंगे, ऐसा नहीं है। श्रीठाकुर नरोत्तम, श्यामानन्द आदि सद्ब्राह्मणोंके गुरु थे और वास्तविक शुद्ध ब्राह्मण थे, इसलिये ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न श्रीगङ्गा-नारायण, रामकृष्णादिने उन्हें गुरुपदके योग्य विशुद्ध 'ब्राह्मण' कहकर निरूपण किया था। “तापादि-पञ्चसंस्कारी नवेज्ज्या-कर्मकारकः। अर्थपञ्चकविद् विप्रो महाभागवतः स्मृतः॥” अर्थात् “महाभागवत कहनेसे 'ताप, पुण्ड्र नाम, मन्त्र और उपासना-युक्त'—पञ्चसंस्कार सम्पन्न, अर्चन, मन्त्रपठन, योग, याग, वन्दन, नाम-सङ्कीर्तन, सेवा, चिह्नोंके द्वारा शरीरपर अङ्कन, वैष्णवाराधन सम्पन्न,—इन नौ इज्ज्या (पूजा) कर्मकारक; और 'उपास्य भगवान्, उनका परमपद, उनके द्रव्य, उनका मन्त्र और जीवात्मा'—इन अर्थपञ्चकज्ञ अर्थात् पाँच-तत्त्वोंके तात्पर्यको जाननेवाले ब्राह्मणको ही समझना चाहिये।” इस प्रकारके महाभागवतोंमें श्रेष्ठता प्राप्त करके जो मनुष्योंमें हरिके समान पूजनीय होते हैं, वे 'गुरु'-पदप्राप्तिके योग्य हैं। दूसरी ओर महान् कुलमें जन्म लेनेवाले, सभी यज्ञोंमें दीक्षित व्यक्ति और वेदोंकी सहस्र-शाखाओंके अध्ययनमें पारङ्गत व्यक्ति भी 'अवैष्णव' होनेपर कभी भी 'गुरु' नहीं हो सकते। जहाँ वैष्णवतासे ब्राह्मणता—'भिन्न' है अर्थात् जहाँ ब्राह्मण वैष्णवोंका आनुगत्य नहीं करते हैं, वहाँ वैसे ब्राह्मणोंमें गुरुयोग्य ब्राह्मणता नहीं है। दूसरी ओर, जहाँ वैष्णवता है, वहाँ लौकिक-दृष्टिसे जन्मके अनुसार अन्य वर्ण दिखलायी देनेपर भी वास्तविक शुद्ध-ब्राह्मणताका अभाव नहीं है। यद्यपि आचार्यके कृत्य अध्यापनादि कार्योंमें ब्राह्मणके अतिरिक्त अन्य वर्णोंकी सम्भावना नहीं है, तथापि जो गुरुपदके योग्य है, उसमें ब्राह्मणता—स्वतःसिद्ध है। वैष्णव-मात्र ही जगत्के गुरु हैं, इसलिये उनका ब्राह्मण-आचार और उनकी ब्राह्मणता सदैव साथ-साथ विद्यमान है। बाहरसे अपना दैन्य दिखलाते हुए अनेक वैष्णवोंने लौकिक-दृष्टिसे ब्राह्मण-आचारको ग्रहण नहीं किया, परन्तु उससे वैष्णवोंमें ब्राह्मणताका कभी भी अभाव नहीं होता। शिष्यलक्षण'—(भाः 11/10/6)— “अमान्यमत्सरदक्षो निर्ममो दृढसौहृदः। असत्वरोऽर्थजिज्ञासुरनसूयुरमोघवाक्॥” [अर्थात् “शिष्य अमानी, मात्सर्य-रहित, आलस्यरहित, स्त्री-पुत्रादिमें ममताहीन, गुरु-वैष्णवोंमें सौहार्दयुक्त, शास्त्र तत्त्वजिज्ञासु, असूया-रहित और वृथावाक्य-शून्य होंगे।”] जो जागतिक अभिमानके वशीभूत नहीं है, जो काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्यका परित्याग करके अप्राकृत भगवद्-तत्त्वके विचारोंको ग्रहण करनेमें निपुण है, जो प्राकृत वस्तुओंमें 'मैं' और 'मेरे'की बुद्धिसे रहित है और अप्राकृत गुरुपादपद्ममें अविनाशी प्रणयसे युक्त है, जो धैर्यशीलताके द्वारा चञ्चलता-रहित और परमार्थ-जिज्ञासा परायण है, जो गुणोंमें दोष नहीं देखता है एवं अन्याभिलाष-कर्म-ज्ञानादि-सम्बन्धी वृथा बातोंमें प्रमत्त नहीं होकर हरिकथामें स्थिरबुद्धिवाला है, वही 'शिष्य' होनेके योग्य है। 'दोँहार परीक्षण'—जो अप्राकृत वस्तु शिष्यके लिये आवश्यक है, उसको पानेका इच्छुक होकर जब वह गुरुपादपद्मका आश्रय ग्रहण करनेके लिये जाता है, तब वह वस्तु किसी गुरु कहलानेवाले व्यक्तिमें है या नहीं और यदि है, तो किस परिमाणमें है, उसे शिष्यको एक । 463

[ 24/325-326 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

वर्ष तक देखना उचित है। शिष्यकी अप्राकृत उपलब्धिकी योग्यता कैसी है, उसे गुरु भी विशेषरूपसे देखेंगे, क्योंकि, विषयी शिष्यके सङ्गसे गुरुब्रुवका (जो गुरु अभी साधक है, उसका) गुरुत्व कम होना अवश्यम्भावी है। गुरुब्रुव यदि शिष्यको 'भोग्य' मानकर उससे धनादि प्राप्त करनेके लिये उसके साथ अनित्य लौकिक स्वार्थपरक सम्बन्ध स्थापित करता है, तो वह लौकिक स्मार्तोंकी भाँति परमार्थसे च्युत हो जायेगा। ऐसे गुरु कहलानेवाले व्यक्तिको 'वञ्चक' (ठग) और शिष्योंको 'वञ्चित' (ठगा गया) कहा जाता है। ऐसे गुरुब्रुव परमार्थ-धर्मसे वञ्चित हो जाते हैं। स्वयंको आचार्य, सम्प्रदाय-आश्रित गोस्वामी मतमें स्थित कहकर अभिमान करनेपर भी वे प्राकृत बाउल और सहजिया-दलकी ही एक शाखामें परिणत हो जाते हैं। 'सेव्य-भगवान्' - भगवान् विष्णु ही एकमात्र सेव्य हैं; विष्णुके अतिरिक्त अन्य किसी देवताकी उपासनाकी आवश्यकता नहीं है। “वासुदेवं परित्यज्य योऽन्यदेवमुपासते। स्वमातरं परित्यज्य श्वपचीं वन्दते हि सः॥” [अर्थात् “वासुदेवका परित्याग करके जो अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, वे मानो अपनी माताका त्याग करके चाण्डालिनीकी पूजा करते हैं।"] “येऽपन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥” [अर्थात् “हे कौन्तेय! जो सकाम भक्त स्वतन्त्रभावसे अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, वे अविधिपूर्वक मेरी ही उपासना करते हैं।"] “यस्तु नारायणं देवं ब्रह्मरुद्रादिदैवतैः। समत्वेनैव वीक्षेत स पाषण्डी भवेद्-ध्रुवम्॥” [अर्थात् “जो ब्रह्मा-रुद्रादि देवताओंके साथ श्रीनारायणको 'समान' रूपमें देखते हैं, वे निश्चय ही 'पाखण्डी' हैं।"] विशुद्ध-सत्त्वगुणमें अधिष्ठित होनेपर निर्गुण जीव मुक्त होकर भी भगवान्‌की उपासना करता है। सत्त्वगुणमें रजोगुणके मिलनेपर जीव 'सूर्य'की, सत्त्वगुणमें तमोगुणके मिलनेपर 'गणपति'की, रजोगुणमें तमोगुणके मिलनेपर जीव 'मायाशक्ति'की, केवल तमोगुणमें उपासना करनेपर 'शिव'की और रजोगुणके प्रबल होनेपर जीव पाँच-उपास्योंमेंसे सभीका ही भजन करता है। वास्तवमें मायाके गुणोंसे मुक्त होनेपर भगवान् विष्णु ही एकमात्र नित्य सेव्य हैं, यह समझ सकते हैं। 'सर्वमन्त्रविचारण'–द्वादशाक्षर, अष्टदशाक्षर, नारसिंह, राम, गोपालादि मन्त्रोंकी शक्तिके तारतम्यका विचार (श्रीहरिभक्तिविलास प्रथम विलास 121-193 संख्या देखें) ॥ 325 ॥ मन्त्र-अधिकारी, मन्त्र-सिद्ध्यादि-शोधन। दीक्षा, प्रातःस्मृति-कृत्य, शौच, आचमन ॥ 326 ॥ अनुवाद-मन्त्र ग्रहण करनेके अधिकारके विषयमें, मन्त्रकी सिद्धि, मन्त्रकी शुद्धि, दीक्षा, प्रातःस्मृति-कृत्य, शौच, आचमनादिकी विधिका भी वर्णन करना॥ 326 ॥ अनुभाष्य-मन्त्र-अधिकारी- “तान्त्रिकेषु च मन्त्रेषु दीक्षायां योषितामपि। साध्वीनामधिकारोऽस्ति शूद्रादीनाञ्च सद्धियाम्॥” पाञ्चरात्रिकी मन्त्र-दीक्षामें साध्वी स्त्री और सद्बुद्धि युक्त पुरुषोंकी भाँति स्त्रियों और शूद्रोंका भी अधिकार है। वैदिकी-दीक्षामें स्वाध्यायमें रत ब्राह्मणका ही अधिकार है और अयोग्य शूद्र अथवा स्त्रियोंका वैदिकी-दीक्षामें अधिकार नहीं है। योग्यता-प्राप्त व्यक्तिका ही भागवत- वैदिक अधिकार है और योग्यता प्राप्त करनेके आकाङ्क्षी व्यक्तिका पाञ्चरात्रिक तान्त्रिक अधिकार है,-दोनों मागोंका फल 'एक' ही है। 'सिद्ध्यादि'- “सिद्ध-साध्य-सुसिद्धारि क्रमाज्ज्ञेया विचक्षणैः।” (क) सिद्ध, (ख) साध्य, (ग) सुसिद्ध, (घ) अरि-

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चौबीसवाँ अध्याय 24/326 ] (1) सिद्ध-सिद्ध, (2) सिद्ध-साध्य, (3) सिद्ध-सुसिद्ध, (4) सिद्ध अरि; (5) साध्य-सिद्ध, (6) साध्य-साध्य, (7) साध्य-सुसिद्ध, (8) साध्य-अरि; (9) सुसिद्ध-सिद्ध, (10) सुसिद्ध-साध्य, (11) सुसिद्ध-सुसिद्ध, (12) सुसिद्ध-अरि; (13) अरिसिद्ध, (14) अरि-साध्य, (15) अरि-सुसिद्ध, (16) अरि-अरि। अष्टादशाक्षर मन्त्रमें सिद्धादि प्राकृत-विचार नहीं है। (त्रैलोक्यसम्मोहनतन्त्रमें श्रीशिववाक्य)- "न चात्र शात्रवा दोषा नर्णस्वादिविचारणा। ऋक्षराशिविचारो वा न कर्त्तव्यो मनौ प्रिये॥ (वृहद्गौतमीय तन्त्र)- नात्र चिन्त्योऽरिशुद्ध्यादिनारिमित्रादिलक्षणम्। सिद्ध-साध्यसुसिद्धारिरूपा नात्र विचारणा॥" [अर्थात् “प्रिये! अष्टादशाक्षर गोपाल-मन्त्रमें सिद्धादि- शोधन-वर्णित शत्रुजनित सब दोष नहीं हैं। ऋण-धन- विचारकी भी आवश्यकता नहीं है, नक्षत्र-राशिका भी विचार करना कर्त्तव्य नहीं है।" “श्रीकृष्ण मन्त्रमें शत्रुशुद्धि आदिकी चिन्ता नहीं है, शत्रु-मित्रादि लक्षणोंको देखनेकी भी आवश्यकता नहीं है-इसमें सिद्ध, साध्य, सुसिद्ध और शत्रु-विचार आवश्यक नहीं है।"] 'शोधन'- “जननं जीवनश्चेति ताड़नं रोधनं तथा। अथाभिषेको विमलीकरणाप्यायने पुनः॥ तर्पणं दीपनं गुप्तिर्दशैता मन्त्रसंक्रियाः। ×× बलित्वात् कृष्णमन्त्राणां संस्कारापेक्षं न हि।” [अर्थात् “जनन, जीवन, ताड़न, रोधन, अभिषेक, विमलीकरण, आप्यायन, तर्पण, दीपन और गोपन-ये दस प्रकारके मन्त्र संस्कार हैं। ×× श्रीकृष्णमन्त्र समूह बलवान् होनेके कारण उक्त दस प्रकारके संस्कारोंकी अपेक्षा नहीं रखते।"] 'दीक्षा'-मध्यलीला 15/108 संख्या देखें। पाञ्चरात्रिकी दीक्षामें दीक्षित व्यक्ति 'ब्राह्मणता' प्राप्त करता है',- “यथा काञ्चनतां याति कांस्यं रसविधानतः। तथा दीक्षाविधानेन द्विजत्वं जायते नृणाम्॥” 'दीक्षाकाल'-(तत्त्वसागरमें) “दुर्लभे सद्गुरुणाञ्च सकृत्सङ्ग उपस्थिते। तदनुज्ञा यदा लब्धा स दीक्षावसरो महान्॥ ग्रामे वा यदि वारण्ये क्षेत्रे वा दिवसे निशि। आगच्छति गुरुर्देवादू यथा दीक्षा तदाज्ञया॥ यदैवेच्छा तदा दीक्षा गुरोराज्ञानुरूपतः। न तीर्थं न व्रतं होमो न स्नानं न जपक्रिया। दीक्षायाः करणं किन्तु स्वेच्छाप्राप्ते तु सद्गुरौ॥” [अर्थात् “एक विशेष विधिसे रसके द्वारा जैसे कांसा-धातु सोना बन जाता है, उसी प्रकार दीक्षा-विधिके द्वारा मनुष्यमें द्विजत्व उत्पन्न होता है।" “सद्गुरुका दुर्लभ सङ्ग एकबार मात्र उपस्थित होनेसे, जब भी उनकी आज्ञा प्राप्त होती है, वही दीक्षाका शुभ काल है। गाँवमें, वनमें, क्षेत्रमें, दिनमें अथवा रात्रिमें गुरुदेव जब दैवात् आगमन करें, तभी उनकी आज्ञासे दीक्षा ग्रहण करनी चाहिये। जब गुरुकी इच्छा होगी, तभी उनकी आज्ञानुसार दीक्षा हो सकती है। सद्गुरुके स्वयं इच्छा करनेपर ही, किन्तु तीर्थ, व्रत, होम, स्नान, जपक्रिया कुछ भी दीक्षाका कारण नहीं होते।"] 'प्रातःस्मृति'- 'ब्राह्ममुहूर्ते उत्थाय कृष्ण कृष्णेति कीर्त्तयन्। ×× स्तुत्वा च कीर्त्तयन् कृष्णं स्मरंश्चैतदुदीरयेत्॥' 'जयति जननिवासः' इत्यादि (भाः 10/90/48)। 'स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते। पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम्॥' “उद्गायतीनामरविन्दलोचनम्” इत्यादि (भाः 10/46/46)। 'स्मर्त्तव्य सततं विष्णुर्विस्मर्त्तव्यो न जातुचित्। सर्वे विधि-निषेधाः स्युरे तयोरेव किङ्कराः॥"-(पाद्मे बृहत्सहस्रनामस्तोत्रे)। [अर्थात् “ब्रह्ममुहूर्त्तमें 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम कीर्तन करते-करते शय्यासे उठना चाहिये। ×× गुरुपादपद्मका ध्यान और स्तव करते हुए श्रीकृष्णकीर्तन और स्मरण करते हुए यह श्लोक पाठ करना- 'जयति जननिवासः' (भाः 10/90/48) इत्यादि। 'जिन्हें स्मरण करनेसे सब प्रकारके कल्याणका पात्र बना जा सकता है, उन अजन्मा सनातन पुरुष श्रीहरिकी शरण ग्रहण करता । 465