भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1909, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1909

चौबीसवाँ अध्याय 24/325 ] द्वारा ही ब्राह्मणादि वर्णका निर्णय मुख्य है—केवल जातिके द्वारा नहीं, यही 'यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं' श्लोकमें कहा गया है। यदि अन्यत्र अर्थात् अन्य वर्णमें भी शमादि-गुण दिखलायी दें, तब उस अन्य वर्णवालेको उस वर्ण लक्षणके द्वारा ही मानना चाहिये, जाति निमित्तके द्वारा नहीं।” (महाभारतकी टीकामें श्रीनीलकण्ठ)—“शूद्रकुलमें उत्पन्न व्यक्ति शमादि-गुणोंसे भूषित होनेपर वह निश्चय ही 'ब्राह्मण' है और ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न व्यक्ति कामादिसे युक्त होनेपर अवश्य ही 'शूद्र' है।”] ब्राह्मण कहकर अपना परिचय देनेपर ही अथवा अनभिज्ञ व्यक्तियोंके द्वारा वैसा परिचय दिये जानेपर ही कोई व्यक्ति गुरुपदके योग्य 'ब्राह्मण' कहकर माने जायेंगे, ऐसा नहीं है। श्रीठाकुर नरोत्तम, श्यामानन्द आदि सद्ब्राह्मणोंके गुरु थे और वास्तविक शुद्ध ब्राह्मण थे, इसलिये ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न श्रीगङ्गा-नारायण, रामकृष्णादिने उन्हें गुरुपदके योग्य विशुद्ध 'ब्राह्मण' कहकर निरूपण किया था। “तापादि-पञ्चसंस्कारी नवेज्ज्या-कर्मकारकः। अर्थपञ्चकविद् विप्रो महाभागवतः स्मृतः॥” अर्थात् “महाभागवत कहनेसे 'ताप, पुण्ड्र नाम, मन्त्र और उपासना-युक्त'—पञ्चसंस्कार सम्पन्न, अर्चन, मन्त्रपठन, योग, याग, वन्दन, नाम-सङ्कीर्तन, सेवा, चिह्नोंके द्वारा शरीरपर अङ्कन, वैष्णवाराधन सम्पन्न,—इन नौ इज्ज्या (पूजा) कर्मकारक; और 'उपास्य भगवान्, उनका परमपद, उनके द्रव्य, उनका मन्त्र और जीवात्मा'—इन अर्थपञ्चकज्ञ अर्थात् पाँच-तत्त्वोंके तात्पर्यको जाननेवाले ब्राह्मणको ही समझना चाहिये।” इस प्रकारके महाभागवतोंमें श्रेष्ठता प्राप्त करके जो मनुष्योंमें हरिके समान पूजनीय होते हैं, वे 'गुरु'-पदप्राप्तिके योग्य हैं। दूसरी ओर महान् कुलमें जन्म लेनेवाले, सभी यज्ञोंमें दीक्षित व्यक्ति और वेदोंकी सहस्र-शाखाओंके अध्ययनमें पारङ्गत व्यक्ति भी 'अवैष्णव' होनेपर कभी भी 'गुरु' नहीं हो सकते। जहाँ वैष्णवतासे ब्राह्मणता—'भिन्न' है अर्थात् जहाँ ब्राह्मण वैष्णवोंका आनुगत्य नहीं करते हैं, वहाँ वैसे ब्राह्मणोंमें गुरुयोग्य ब्राह्मणता नहीं है। दूसरी ओर, जहाँ वैष्णवता है, वहाँ लौकिक-दृष्टिसे जन्मके अनुसार अन्य वर्ण दिखलायी देनेपर भी वास्तविक शुद्ध-ब्राह्मणताका अभाव नहीं है। यद्यपि आचार्यके कृत्य अध्यापनादि कार्योंमें ब्राह्मणके अतिरिक्त अन्य वर्णोंकी सम्भावना नहीं है, तथापि जो गुरुपदके योग्य है, उसमें ब्राह्मणता—स्वतःसिद्ध है। वैष्णव-मात्र ही जगत्के गुरु हैं, इसलिये उनका ब्राह्मण-आचार और उनकी ब्राह्मणता सदैव साथ-साथ विद्यमान है। बाहरसे अपना दैन्य दिखलाते हुए अनेक वैष्णवोंने लौकिक-दृष्टिसे ब्राह्मण-आचारको ग्रहण नहीं किया, परन्तु उससे वैष्णवोंमें ब्राह्मणताका कभी भी अभाव नहीं होता। शिष्यलक्षण'—(भाः 11/10/6)— “अमान्यमत्सरदक्षो निर्ममो दृढसौहृदः। असत्वरोऽर्थजिज्ञासुरनसूयुरमोघवाक्॥” [अर्थात् “शिष्य अमानी, मात्सर्य-रहित, आलस्यरहित, स्त्री-पुत्रादिमें ममताहीन, गुरु-वैष्णवोंमें सौहार्दयुक्त, शास्त्र तत्त्वजिज्ञासु, असूया-रहित और वृथावाक्य-शून्य होंगे।”] जो जागतिक अभिमानके वशीभूत नहीं है, जो काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्यका परित्याग करके अप्राकृत भगवद्-तत्त्वके विचारोंको ग्रहण करनेमें निपुण है, जो प्राकृत वस्तुओंमें 'मैं' और 'मेरे'की बुद्धिसे रहित है और अप्राकृत गुरुपादपद्ममें अविनाशी प्रणयसे युक्त है, जो धैर्यशीलताके द्वारा चञ्चलता-रहित और परमार्थ-जिज्ञासा परायण है, जो गुणोंमें दोष नहीं देखता है एवं अन्याभिलाष-कर्म-ज्ञानादि-सम्बन्धी वृथा बातोंमें प्रमत्त नहीं होकर हरिकथामें स्थिरबुद्धिवाला है, वही 'शिष्य' होनेके योग्य है। 'दोँहार परीक्षण'—जो अप्राकृत वस्तु शिष्यके लिये आवश्यक है, उसको पानेका इच्छुक होकर जब वह गुरुपादपद्मका आश्रय ग्रहण करनेके लिये जाता है, तब वह वस्तु किसी गुरु कहलानेवाले व्यक्तिमें है या नहीं और यदि है, तो किस परिमाणमें है, उसे शिष्यको एक । 463