श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1910, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 24/325-326 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
वर्ष तक देखना उचित है। शिष्यकी अप्राकृत उपलब्धिकी योग्यता कैसी है, उसे गुरु भी विशेषरूपसे देखेंगे, क्योंकि, विषयी शिष्यके सङ्गसे गुरुब्रुवका (जो गुरु अभी साधक है, उसका) गुरुत्व कम होना अवश्यम्भावी है। गुरुब्रुव यदि शिष्यको 'भोग्य' मानकर उससे धनादि प्राप्त करनेके लिये उसके साथ अनित्य लौकिक स्वार्थपरक सम्बन्ध स्थापित करता है, तो वह लौकिक स्मार्तोंकी भाँति परमार्थसे च्युत हो जायेगा। ऐसे गुरु कहलानेवाले व्यक्तिको 'वञ्चक' (ठग) और शिष्योंको 'वञ्चित' (ठगा गया) कहा जाता है। ऐसे गुरुब्रुव परमार्थ-धर्मसे वञ्चित हो जाते हैं। स्वयंको आचार्य, सम्प्रदाय-आश्रित गोस्वामी मतमें स्थित कहकर अभिमान करनेपर भी वे प्राकृत बाउल और सहजिया-दलकी ही एक शाखामें परिणत हो जाते हैं। 'सेव्य-भगवान्' - भगवान् विष्णु ही एकमात्र सेव्य हैं; विष्णुके अतिरिक्त अन्य किसी देवताकी उपासनाकी आवश्यकता नहीं है। “वासुदेवं परित्यज्य योऽन्यदेवमुपासते। स्वमातरं परित्यज्य श्वपचीं वन्दते हि सः॥” [अर्थात् “वासुदेवका परित्याग करके जो अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, वे मानो अपनी माताका त्याग करके चाण्डालिनीकी पूजा करते हैं।"] “येऽपन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥” [अर्थात् “हे कौन्तेय! जो सकाम भक्त स्वतन्त्रभावसे अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, वे अविधिपूर्वक मेरी ही उपासना करते हैं।"] “यस्तु नारायणं देवं ब्रह्मरुद्रादिदैवतैः। समत्वेनैव वीक्षेत स पाषण्डी भवेद्-ध्रुवम्॥” [अर्थात् “जो ब्रह्मा-रुद्रादि देवताओंके साथ श्रीनारायणको 'समान' रूपमें देखते हैं, वे निश्चय ही 'पाखण्डी' हैं।"] विशुद्ध-सत्त्वगुणमें अधिष्ठित होनेपर निर्गुण जीव मुक्त होकर भी भगवान्की उपासना करता है। सत्त्वगुणमें रजोगुणके मिलनेपर जीव 'सूर्य'की, सत्त्वगुणमें तमोगुणके मिलनेपर 'गणपति'की, रजोगुणमें तमोगुणके मिलनेपर जीव 'मायाशक्ति'की, केवल तमोगुणमें उपासना करनेपर 'शिव'की और रजोगुणके प्रबल होनेपर जीव पाँच-उपास्योंमेंसे सभीका ही भजन करता है। वास्तवमें मायाके गुणोंसे मुक्त होनेपर भगवान् विष्णु ही एकमात्र नित्य सेव्य हैं, यह समझ सकते हैं। 'सर्वमन्त्रविचारण'–द्वादशाक्षर, अष्टदशाक्षर, नारसिंह, राम, गोपालादि मन्त्रोंकी शक्तिके तारतम्यका विचार (श्रीहरिभक्तिविलास प्रथम विलास 121-193 संख्या देखें) ॥ 325 ॥ मन्त्र-अधिकारी, मन्त्र-सिद्ध्यादि-शोधन। दीक्षा, प्रातःस्मृति-कृत्य, शौच, आचमन ॥ 326 ॥ अनुवाद-मन्त्र ग्रहण करनेके अधिकारके विषयमें, मन्त्रकी सिद्धि, मन्त्रकी शुद्धि, दीक्षा, प्रातःस्मृति-कृत्य, शौच, आचमनादिकी विधिका भी वर्णन करना॥ 326 ॥ अनुभाष्य-मन्त्र-अधिकारी- “तान्त्रिकेषु च मन्त्रेषु दीक्षायां योषितामपि। साध्वीनामधिकारोऽस्ति शूद्रादीनाञ्च सद्धियाम्॥” पाञ्चरात्रिकी मन्त्र-दीक्षामें साध्वी स्त्री और सद्बुद्धि युक्त पुरुषोंकी भाँति स्त्रियों और शूद्रोंका भी अधिकार है। वैदिकी-दीक्षामें स्वाध्यायमें रत ब्राह्मणका ही अधिकार है और अयोग्य शूद्र अथवा स्त्रियोंका वैदिकी-दीक्षामें अधिकार नहीं है। योग्यता-प्राप्त व्यक्तिका ही भागवत- वैदिक अधिकार है और योग्यता प्राप्त करनेके आकाङ्क्षी व्यक्तिका पाञ्चरात्रिक तान्त्रिक अधिकार है,-दोनों मागोंका फल 'एक' ही है। 'सिद्ध्यादि'- “सिद्ध-साध्य-सुसिद्धारि क्रमाज्ज्ञेया विचक्षणैः।” (क) सिद्ध, (ख) साध्य, (ग) सुसिद्ध, (घ) अरि-
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