भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1911, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1911

चौबीसवाँ अध्याय 24/326 ] (1) सिद्ध-सिद्ध, (2) सिद्ध-साध्य, (3) सिद्ध-सुसिद्ध, (4) सिद्ध अरि; (5) साध्य-सिद्ध, (6) साध्य-साध्य, (7) साध्य-सुसिद्ध, (8) साध्य-अरि; (9) सुसिद्ध-सिद्ध, (10) सुसिद्ध-साध्य, (11) सुसिद्ध-सुसिद्ध, (12) सुसिद्ध-अरि; (13) अरिसिद्ध, (14) अरि-साध्य, (15) अरि-सुसिद्ध, (16) अरि-अरि। अष्टादशाक्षर मन्त्रमें सिद्धादि प्राकृत-विचार नहीं है। (त्रैलोक्यसम्मोहनतन्त्रमें श्रीशिववाक्य)- "न चात्र शात्रवा दोषा नर्णस्वादिविचारणा। ऋक्षराशिविचारो वा न कर्त्तव्यो मनौ प्रिये॥ (वृहद्गौतमीय तन्त्र)- नात्र चिन्त्योऽरिशुद्ध्यादिनारिमित्रादिलक्षणम्। सिद्ध-साध्यसुसिद्धारिरूपा नात्र विचारणा॥" [अर्थात् “प्रिये! अष्टादशाक्षर गोपाल-मन्त्रमें सिद्धादि- शोधन-वर्णित शत्रुजनित सब दोष नहीं हैं। ऋण-धन- विचारकी भी आवश्यकता नहीं है, नक्षत्र-राशिका भी विचार करना कर्त्तव्य नहीं है।" “श्रीकृष्ण मन्त्रमें शत्रुशुद्धि आदिकी चिन्ता नहीं है, शत्रु-मित्रादि लक्षणोंको देखनेकी भी आवश्यकता नहीं है-इसमें सिद्ध, साध्य, सुसिद्ध और शत्रु-विचार आवश्यक नहीं है।"] 'शोधन'- “जननं जीवनश्चेति ताड़नं रोधनं तथा। अथाभिषेको विमलीकरणाप्यायने पुनः॥ तर्पणं दीपनं गुप्तिर्दशैता मन्त्रसंक्रियाः। ×× बलित्वात् कृष्णमन्त्राणां संस्कारापेक्षं न हि।” [अर्थात् “जनन, जीवन, ताड़न, रोधन, अभिषेक, विमलीकरण, आप्यायन, तर्पण, दीपन और गोपन-ये दस प्रकारके मन्त्र संस्कार हैं। ×× श्रीकृष्णमन्त्र समूह बलवान् होनेके कारण उक्त दस प्रकारके संस्कारोंकी अपेक्षा नहीं रखते।"] 'दीक्षा'-मध्यलीला 15/108 संख्या देखें। पाञ्चरात्रिकी दीक्षामें दीक्षित व्यक्ति 'ब्राह्मणता' प्राप्त करता है',- “यथा काञ्चनतां याति कांस्यं रसविधानतः। तथा दीक्षाविधानेन द्विजत्वं जायते नृणाम्॥” 'दीक्षाकाल'-(तत्त्वसागरमें) “दुर्लभे सद्गुरुणाञ्च सकृत्सङ्ग उपस्थिते। तदनुज्ञा यदा लब्धा स दीक्षावसरो महान्॥ ग्रामे वा यदि वारण्ये क्षेत्रे वा दिवसे निशि। आगच्छति गुरुर्देवादू यथा दीक्षा तदाज्ञया॥ यदैवेच्छा तदा दीक्षा गुरोराज्ञानुरूपतः। न तीर्थं न व्रतं होमो न स्नानं न जपक्रिया। दीक्षायाः करणं किन्तु स्वेच्छाप्राप्ते तु सद्गुरौ॥” [अर्थात् “एक विशेष विधिसे रसके द्वारा जैसे कांसा-धातु सोना बन जाता है, उसी प्रकार दीक्षा-विधिके द्वारा मनुष्यमें द्विजत्व उत्पन्न होता है।" “सद्गुरुका दुर्लभ सङ्ग एकबार मात्र उपस्थित होनेसे, जब भी उनकी आज्ञा प्राप्त होती है, वही दीक्षाका शुभ काल है। गाँवमें, वनमें, क्षेत्रमें, दिनमें अथवा रात्रिमें गुरुदेव जब दैवात् आगमन करें, तभी उनकी आज्ञासे दीक्षा ग्रहण करनी चाहिये। जब गुरुकी इच्छा होगी, तभी उनकी आज्ञानुसार दीक्षा हो सकती है। सद्गुरुके स्वयं इच्छा करनेपर ही, किन्तु तीर्थ, व्रत, होम, स्नान, जपक्रिया कुछ भी दीक्षाका कारण नहीं होते।"] 'प्रातःस्मृति'- 'ब्राह्ममुहूर्ते उत्थाय कृष्ण कृष्णेति कीर्त्तयन्। ×× स्तुत्वा च कीर्त्तयन् कृष्णं स्मरंश्चैतदुदीरयेत्॥' 'जयति जननिवासः' इत्यादि (भाः 10/90/48)। 'स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते। पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम्॥' “उद्गायतीनामरविन्दलोचनम्” इत्यादि (भाः 10/46/46)। 'स्मर्त्तव्य सततं विष्णुर्विस्मर्त्तव्यो न जातुचित्। सर्वे विधि-निषेधाः स्युरे तयोरेव किङ्कराः॥"-(पाद्मे बृहत्सहस्रनामस्तोत्रे)। [अर्थात् “ब्रह्ममुहूर्त्तमें 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम कीर्तन करते-करते शय्यासे उठना चाहिये। ×× गुरुपादपद्मका ध्यान और स्तव करते हुए श्रीकृष्णकीर्तन और स्मरण करते हुए यह श्लोक पाठ करना- 'जयति जननिवासः' (भाः 10/90/48) इत्यादि। 'जिन्हें स्मरण करनेसे सब प्रकारके कल्याणका पात्र बना जा सकता है, उन अजन्मा सनातन पुरुष श्रीहरिकी शरण ग्रहण करता । 465