श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1912, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 24/326-327 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला हूँ।' श्रीविष्णुको सदा ही स्मरण करना चाहिये—कभी भी उन्हें भूलना नहीं चाहिये, समस्त 'विधि' और 'निषेध' इन दोनों बातोंके अनुगत हैं।"] 'प्रातःकृत्य'—मैत्रादिकृत्य,— “ततः कल्ये समुत्थाय कुर्यान्मैत्रं नरेश्वर। xx दुरादावस्थान्मूत्रं पुरीषञ्च समुत्सृजेत्॥” [अर्थात् “इसके बाद हे राजन्! ऊषाकालमें उठकर घरसे दूर जाकर मल-मूत्र परित्याग करना।”] 'शौच'— “गुह्ये दद्यान्मृदं चैकां पायौ पश्चाम्बु सान्तराः। दश वामकरे चापि सप्तपाणिद्वये मृदः॥ एकैकां पदयोर्दद्यात् तिस्रः पाण्योर्मृदः स्मृताः। इत्थं शौचं गृही कुर्याद्-गन्ध-लेपक्षयावधि॥” [अर्थात् “शिश्नमें एक बार, मलद्वारमें पाँच बार, बायें हाथमें दस बार, दोनों हाथोंमें सात बार, दोनों पैरोंमें एक बार और पुनः दोनों हाथोंमें तीन बार, इस प्रकार बीच-बीचमें जलके साथमें मिट्टी लगानी चाहिये। जब तक गन्ध सम्पूर्ण रूपमें दूर नहीं हो, तब तक गृहस्थ व्यक्ति इस प्रकार शौच करेंगे। (गृहस्थकी अपेक्षा ब्रह्मचारी दो गुणा, वानप्रस्थ तीन गुणा और भिक्षु (संन्यासी) चार गुणा शौचका आचरण करेंगे।"] 'आचमन'— “अच्छेनागन्धफेनेन जलेनबुद्बुदेन च। आचामेत मृदं भूयस्तथा दद्यात् समाहितः॥ निष्पादिताङ्घ्रिशौचस्तु पादावभ्युक्ष्य वै पुनः। त्रि पिबेत् सलिलं तेन तथा द्विः परिमार्जयेत्॥” [अर्थात् “स्वच्छ, गन्धरहित, फेनहीन, बुलबुलेसे रहित जलके द्वारा आचमन करना होगा। पुनः सावधानीसे चरणोंमें मिट्टी लगानी होगी। पाद-शौच समाप्त करके पुनः दोनों पैरोंका प्रक्षालन करके तीन बार जलपान (आचमन) करना होगा और इसी जलके द्वारा ही दो बार मुख धोना होगा।”] ॥ 326 ॥ दन्तधावन, स्नान, सन्ध्यादि-वन्दन। गुरुसेवा, ऊर्ध्वपुण्ड्र अनुवाद—दन्तधावन, स्नान, सन्ध्यादि-वन्दन, गुरुसेवा, ऊर्ध्वपुण्ड्र 327 ॥ अनुभाष्य— 'दन्तधावन'— “अथो मुखविशुद्ध्यर्थं गृह्णीयात् दन्तधावनम्। आचान्तोऽप्यशुचि- र्यस्मादकृत्वा दन्तधावनम्॥ दन्तकाष्ठमखादित्वो यस्तु मामुपसर्पति। सर्वकालकृतं कर्म तेन चैकेन नश्यति॥” [अर्थात् “इसके बाद मुख शोधनके लिये दातुन करना, क्योंकि दातुन नहीं करनेपर आचमन करनेसे भी मनुष्य अशुद्ध ही रहता है। दातुनको नहीं चबाकर जो व्यक्ति मेरी आराधना करता है, वह इसी एक कर्मके द्वारा ही अपने द्वारा सब समय किये गये कर्मोंको ध्वंस कर लेता है।”] 'स्नान'— “प्रातर्मध्याह्नयोः स्नानं वानप्रस्थगृहस्थयोः। यतेस्त्रिसवनं स्नानं सकृत्तु ब्रह्मचारिणः॥ सर्वे चापि सकृत् कुर्युरशक्तौ चोदकं बिना॥” [अर्थात् “वानप्रस्थ और गृहस्थके लिये प्रातःकाल और दोपहरमें स्नान, संन्यासीके लिये तीनों संध्याओंमें और ब्रह्मचारीके लिये केवल एकबार मात्र स्नान करना कर्त्तव्य है। असमर्थ होनेपर सभीके लिये एकबार मात्र स्नान करना चाहिये और उसमें भी असमर्थ होनेपर जलके बिना मन्त्र-स्नान आदि करणीय है।”] 'सन्ध्यावन्दन'—सन्ध्या दो प्रकारकी है—वैदिकी और तान्त्रिकी। वैदिकी सन्ध्या— “ध्यात्वार्कमण्डलगतां सावित्रीं तां जपेद्बुधः। प्राङ्मुखः सततं विप्रः सन्ध्योपासनमाचरेत्॥ विहाय सन्ध्या-प्रणतिं स याति नरकायुतम्॥” [अर्थात् “पण्डित व्यक्ति सूर्यमण्डलवर्तिनी गायत्रीका ध्यान करके उसका जप करेंगे। ब्राह्मण सदैव पूर्वमें मुख करके सन्ध्या उपासना करेंगे। सन्ध्या वन्दना नहीं करनेपर वे दस हजार नरकोंमें जायेंगे।”] “ॐ तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः दिवीव 466 ।