भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1913

चौबीसवाँ अध्याय [ 24/327 ]

चक्षुराततम्” इत्याचमनम्। प्रोक्षणानन्तरं सन्ध्यामुपासयेत्। गायत्रीं दशधा जप्त्वा आपोमार्जिनम्– “ॐ शन्न आपो धन्वन्थाः शमनः सन्तु नूप्याः शन्नः समुद्रिया आपः शमनः सन्तु कूप्याः। ॐ द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव। पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुद्धन्तु मैनसः। ॐ आपो हिष्ठामयो भुवस्ता न ऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे। ॐ यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः। ॐ तस्मा अरङ्गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जनयथा च नः। ॐ ऋतञ्च सत्यञ्चाभीद्धात् तपसोऽध्यजायत। ततो राज्यजायत ततः समुद्रोऽर्णवः। समुद्रादर्णवादधिसंवत्सरोऽजायत। अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी सूर्य्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत्। दिवञ्च पृथिवीञ्चान्तररीक्षमथो स्वः।” 'तान्त्रिकी सन्ध्या'– “मूलमन्त्रमथोच्चार्य ध्यायन् कृष्णाङ्घ्रिपङ्कजे। श्रीकृष्णं तर्पयामीति त्रिः सम्यक् तर्पयेत् कृती॥ ध्यानोद्दिष्टस्वरूपाय सूर्यमण्डलवर्त्तिने। कृष्णाय कामगायत्र्या दद्यादर्घ्यमनन्तरम्॥” [अर्थात् “इसके बाद सन्ध्या करनेवाले व्यक्ति मूलमन्त्रका उच्चारण करके श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करके 'श्रीकृष्णको अर्पित कर रहा हूँ'–यह कहकर तीन बार सम्पूर्णरूपसे तर्पण करेंगे। उसके बाद ध्यानमें जो स्वरूप उद्दिष्ट हुआ है, सूर्यमण्डलस्थ उन श्रीकृष्णको कामगायत्री उच्चारण करते हुए अर्घ्य प्रदान करेंगे।”] 'गुरुसेवा'– “प्रथमन्तु गुरुं पूज्य ततश्चैव ममार्च्चनम्। कुर्वन् सिद्धिमवाप्नोति ह्यन्यथा निष्फलं भवेत्॥ गुरौ सन्निहिते यस्तु पूजयेदन्यमग्रतः। स दुर्गतिमवाप्नोति पूजनं तस्य निष्फलम्॥ नाहमिज्याप्रजातिभ्यां तपसोपशमेन च। तुष्येयं सर्वभूतात्मा गुरुशुश्रूषया यथा॥ गुरुशुश्रूषणं नाम सर्वधर्मोत्तमोत्तमम्। तस्माद्धर्मात् परो धर्मः पवित्रं नैव विद्यते॥” [अर्थात् “सर्वप्रथम गुरुदेवकी पूजा करके उसके बाद मेरी पूजा करनेसे सिद्धिकी प्राप्ति होती है, अन्यथा वह निष्फल होती है। श्रीगुरुदेव निकटमें रहनेपर जो व्यक्ति उनके आगे किसी अन्यकी पूजा करता है, उसकी दुर्गति होती है और उसकी पूजा भी निष्फल हो जाती है। सर्वभूतात्मा मैं गुरुसेवाके द्वारा जिस प्रकार सन्तुष्ट होता हूँ,–इज्या, प्रजाति, तपस्या और उपशमके द्वारा भी तथा गृहस्थ, वानप्रस्थ, ब्रह्मचर्य और संन्यास धर्मके द्वारा भी वैसा सन्तुष्ट नहीं होता। गुरुसेवा ही सबसे श्रेष्ठ उत्तम धर्म है, इस धर्मसे उत्तम अथवा पवित्र धर्म और कोई नहीं है।”] 'ऊर्ध्वपुण्ड्र “मद्भक्तो धारयेन्नित्यमूर्ध्वपुण्ड्र मनुष्याणामूर्ध्वपुण्ड्र भवेत्॥ वैष्णवानां ब्राह्मणानां ऊर्ध्वपुण्ड्रं नासादिकेशपर्यन्तमूर्ध्वपुण्ड्र तद्विद्याद्धरिमन्दिरम्॥ मध्ये विष्णुं विजानीयात् तस्मान्मध्यं न लेपयेत्॥ [अर्थात् “मेरे भक्त भयका नाश करनेवाले ऊर्ध्वपुण्ड्र नित्य धारण करेंगे। मनुष्यकी जो देह ऊर्ध्वपुण्ड्र होती है, वह श्मशानके समान होनेके कारण देखनेके योग्य नहीं है। वैष्णवों और ब्राह्मणोंके लिये ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना आवश्यक कर्त्तव्य है। नाकसे लेकर केश तक विस्तृत, अति सुन्दर और बीचमें रिक्त (खाली) ऊर्ध्वपुण्ड्र श्रीहरि अधिष्ठित रहते हैं, इसलिये उसके बीचमें लेपन नहीं करना चाहिये।”] मध्यलीला 20/202 संख्या देखें। 'चक्रादि (मुद्रा)-धारण'– “चक्रञ्च दक्षिणे बाहौ शङ्खं वामेऽपि दक्षिणे। गदां वामे गदाधस्तात् पुनश्चक्रञ्च धारयेत्॥ शङ्खोपरि तथा पद्मं पुनः पद्मञ्च दक्षिणे। खड्गं वक्षसि चापञ्च सशरं शीर्षि्ण धारयेत्॥ इति पश्चायुधान्यादौ धारयेद्वैष्णवो जनः। श्रीगोपीचन्दनेनैवं चक्रादीनि बुधोऽन्वहम्। धारयेच्छयनादौ तु तप्तानि किल तानि हि॥ शङ्खचक्रोर्ध्वपुण्ड्र राष्ट्र [अर्थात् “दायें हाथमें चक्र, बायीं और दाहिनी दोनों भुजाओंमें शङ्ख, बायीं भुजामें गदा और गदाके नीचे पुनः चक्र धारण करेंगे। शङ्खके ऊपर दोनों भुजाओंमें

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