श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1908, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 24/324-325 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ / Left Column] प्रणाम, भूतशुद्धि, प्राणायाम, न्यास, मुद्रापञ्चक, श्रीकृष्ण ध्यान, उसके बाद अन्तर्याग, पूजाका स्थान, श्रीमूर्त्ति और शालग्राम-शिलाका लक्षण, द्वारका-उद्भूत चक्रसमूह, श्रीमूर्त्ति-स्नानादि शुद्धिसमूह, पीठ-पूजा, आवाहन- संस्थापन-निकटमें रहनादि और वैसी-वैसी-मुद्रा, आसनादि समर्पण, स्नान, उस समय शङ्ख-घण्टादि वाद्य, सहस्रनाम, पुराणपाठ, वस्त्र, उपवीत, अलङ्कार, गन्ध, तुलसीकाष्ठ-चन्दन, पुष्प, विल्व-पत्रादि, तुलसी, अङ्ग-उपाङ्ग-आवरणपूजा, धूप, दीप, नैवेद्य, पान, होम, बलिक्रिया (विष्वक्सेनादि भक्तोंको भगवान्का उच्छिष्ट-अंश देना), कुल्लाके लिये जल, लौंग-पानादि मुखवास, पुनः दिव्यगन्ध द्रव्यादि, छत्र-चामरादि राजोपकरण, गीतादि, महा-अर्चन, शङ्खादि वाद्य, शङ्खमें जल भरके अर्चन, स्तुति, प्रणाम, प्रदक्षिणा, कर्मादि-अर्पण, जप, प्रार्थना, अपराधोंके लिये क्षमा याचना, निर्माल्य (प्रसादी माला)-धारण, भगवद्-अर्चनसे बचा शङ्खजल, तीर्थ (चरणामृत), तुलसीके काननमें भगवान् और तुलसीकी पूजा, तुलसी-मृत्तिका- काष्ठादि, आँवलेका माहात्म्य, स्नानका निषेधकाल, जीविका-उपार्जन, मध्याह्नमें वैश्य-देवतादि-श्राद्ध, भगवान्में जो सब द्रव्य अर्पण योग्य नहीं हैं, भगवान्की पूजाके अतिरिक्त भोजनमें और अनिवेदित वस्तुके भोजनमें दोषसमूह, नैवेद्य-भक्षण, भगवद्भक्तगण, साधुसङ्ग, असाधुसङ्ग-वर्जन, असत् व्यक्तियोंकी गति, उपासनादि निजकृत्य, वैष्णवोंके कर्मपातके दोष-निराकरण-सिद्धान्त, विशेषतः तीनों कालोंमें अर्चनका विशेष विधान, रात्रिकृत्य (अर्थात् गीत-वाद्यादि सहित भगवान्के शयनोपचारकी रचना), पूजाके फलकी सिद्धि आदि, पूजा अथवा श्रीमूर्त्ति-दर्शन, विष्णु प्रीतिके लिये दान, विविध पूजोपचार, द्रव्यके अभावमें पूजाका समाधान, अपने शयनकी विधि, श्रीभगवान्की पूजा और श्रीनामकी महिमा, नामापराधसमूह, भक्तिका माहात्म्य, प्रेम-सम्पत्ति लक्षण, आश्रयण (शरणागति), कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष, दोनोंमें अङ्गों सहित श्रीएकादशी-व्रतोपवास, अष्ट- महाद्वादशी, अग्रहायणादि बारह मासोंके कृत्य,
[दायाँ स्तम्भ / Right Column] पुरश्चरण-कृत्य, मन्त्रसिद्धिके लक्षण, श्रीभगवान्की मूर्त्तिका शिल्प आदिके द्वारा सम्पादन, श्रीमूर्त्ति प्रतिष्ठा, श्रीकृष्णमन्दिर, जीर्णमन्दिरादिका उद्धार, श्रीतुलसी विवाह और ऐकान्तिक भक्तोंके कृत्य।] ॥ 324 ॥ गुरुलक्षण, शिष्यलक्षण, दोँहार परीक्षण। सेव्य-भगवान्, सर्वमन्त्र-विचारण ॥ 325 ॥ अनुवाद— उस ग्रन्थमें गुरु और शिष्य, दोनोंके लक्षणोंका वर्णन करना। साथ ही गुरु और शिष्यकी एक दूसरेकी परीक्षा लेनेकी आवश्यकता बतलाना। स्वयं-भगवान् सबके सेव्य हैं एवं श्रीकृष्ण और अन्य भगवद्-स्वरूपोंकी उपासनाके मन्त्रोंको उस ग्रन्थमें लिखना ॥ 325 ॥ अनुभाष्य— 'गुरु-लक्षण'—(पद्मपुराणमें)— “महाभागवतश्रेष्ठो ब्राह्मणो वै गुरुर्नृणाम्। सर्वेषामेव लोकानामसौ पूज्यो यथा हरिः॥ महाकुलप्रसूतोऽपि सर्वयज्ञेषु दीक्षितः। सहस्रशाखाध्यायी च न गुरुः स्यादवैष्णवः॥” भाः 7/11/35 श्लोकमें उक्त लक्षणोंके अनुसार ही ब्राह्मणादि 'वर्ण' निर्दिष्ट होते हैं। इस श्लोककी श्रीधरस्वामिपादकी टीका,— “शमादिभिरेव ब्राह्मणादि-व्यवहारो मुख्यः, न जाति-मात्रादित्याह- यस्येति। यद् यदि अन्यत्र वर्णान्तरेऽपि दृश्यते, तद्वर्णान्तरं तेनैव लक्षणनिमित्तेनैव वर्णेन विनिर्देशेत्, न तु जातिनिमित्तेनेत्यर्थः।” महाभारतकी टीकामें नीलकण्ठ कहते हैं,— “शूद्रोऽपि शमाद्युपेत्य ब्राह्मण एव। ब्राह्मणोऽपि कामाद्युपेतः शूद्र एव।” [अर्थात् (पद्मपुराणमें गुरुलक्षण)—“महाभागवत श्रेष्ठ ब्राह्मण ही सभी मनुष्योंके गुरु हैं, वे सभी लोगोंमेंसे श्रीहरिके समान ही पूजनीय हैं। महाकुलमें उत्पन्न होनेपर भी, समस्त यज्ञोंमें दीक्षित होनेपर भी और सहस्र शाखाओंका अध्ययन करनेपर भी अवैष्णव होनेपर वे 'गुरु' नहीं कहे जा सकते।” (भाः 7/11/35 श्लोककी श्रीधरस्वामि-कृत टीका)—“शमादि गुणोंके
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