श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1897, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय २४/२४३-२५६ ] नारद कहे, —“अर्द्ध मारिले जीव पाय व्यथा। जीवे दुःख दितेछ, तोमार हइबे ऐछे अवस्था॥ २४३ ॥ व्याध तुमि, जीव मार—'अल्प' अपराध तोमार। कदर्थना दिया मार'—ए पाप 'अपार' ॥ २४४ ॥ कदर्थिया तुमि यत मारिला जीवेरे। तारा तैछे तोमा मारिबे जन्म-जन्मान्तरे॥” २४५ ॥ अनुवाद—श्रीनारदने कहा,—“आधा मारनेसे जीवको तुम जानबूझकर दुःख दे रहे हो, इसलिये तुम्हारी भी वैसी ही अवस्था होगी। तुम शिकारी हो, जीवोंको मारना तुम्हारा धंधा है, इसलिये तुम्हारा बहुत कम अपराध होता है। किन्तु तुम उन्हें जानबूझकर तड़पा-तड़पाकर मारते हो, यह 'अपार' (घोर) पाप है। तुमने तड़पा-तड़पाकर जितने जीवोंको मारा है, वे भी तुम्हें जन्म-जन्मान्तरमें वैसे ही मारेंगे॥” २४३-२४५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कदर्थना दिया'—कष्ट देकर॥ २४४ ॥ ॥ नारद-सङ्गे व्याधेर मन परसन्न हइल। ताँर वाक्य शुनि' मने भय उपजिल॥ २४६ ॥ अनुवाद—श्रीनारदके सङ्गसे शिकारीका मन निर्मल हो गया था, इसलिये उसे अपने पापोंकी प्रतीति हो गयी। किन्तु पापोंका परिणाम बतानेवाले उनके वचन सुनकर उसके मनमें भय उत्पन्न हो गया॥ २४६ ॥ व्याध कहे, —“बाल्य हैते एइ आमार कर्म। केमने तरिब आमि पामर अधम? ॥ २४७ ॥ एइ पाप याय मोर, केमन उपाये? निस्तार करह मोरे, पड़ों तोमार पाये॥” २४८ ॥ अनुवाद—शिकारीने कहा,—“बचपनसे ही मेरा यही कार्य है। मैं अधम, पापी इन पापोंसे कैसे पार होऊँगा? किस उपायसे मेरे द्वारा किये गये ये पाप दूर हो सकते हैं? आप मेरा उद्धार कीजिये, मैं आपके चरणोंमें पड़ा हूँ॥” २४७-२४८ ॥ नारद कहे, —“यदि धर आमार वचन। तबे से करिते पारि तोमार मोचन॥” २४९ ॥ अनुवाद—श्रीनारदने कहा,—“यदि तुम मेरी बात मानो, तब मैं तुम्हारा उद्धार कर सकता हूँ॥” २४९ ॥ व्याध कहे, —“येइ कह, सेइ त' करिब।” नारद कहे, —“धनुक भाङ्ग, तबे से कहिब॥” २५० ॥ अनुवाद—शिकारीने कहा,—“आप जो कहेंगे, मैं वही करूँगा।” श्रीनारदने कहा,—“तुम अपना धनुष तोड़ दो, तब मैं कुछ कहूँगा॥” २५० ॥ व्याध कहे, —“धनुक भाङ्गिले बाँचिब केमने?” नारद कहे, —“आमि अन्न दिब प्रतिदिन ॥” २५१ ॥ अनुवाद—शिकारीने कहा,—“यदि मैं धनुषको तोड़ दूँगा, तब मेरा पालन कैसे होगा?” श्रीनारदने कहा,—“मैं प्रतिदिन तुम्हें भोजन दूँगा॥” २५१ ॥ धनुक भाङ्गि व्याध ताँर चरणे पड़िल। तारे उठाया नारद उपदेश कैल॥ २५२ ॥ “घरे गिया ब्राह्मणे देह' यत आछे धन। एक एक वस्त्र परि' बाहिर हओ दुइजन॥ २५३ ॥ नदी-तीरे एकखानि कुँड़िया करिया। तार आगे एकपिण्ड तुलसी रोपिया॥ २५४ ॥ तुलसी-परिक्रमा कर, तुलसी-सेवन। निरन्तर कृष्णनाम करिह कीर्त्तन॥ २५५ ॥ आमि तोमाय बहु अन्न पाठाइमु दिने। सेइ अन्न लबे, यत खाओ दुइजने॥” २५६ ॥ अनुवाद—धनुषको तोड़कर शिकारी श्रीनारदके चरणोंमें गिर पड़ा। उसे उठाकर श्रीनारदने उसे उपदेश प्रदान किया,—“घर जाकर तुम्हारे पास जो भी धन है, वह सब ब्राह्मणोंको दे दो। तुम और तुम्हारी पत्नी केवल एक-एक वस्त्र पहनकर उस घरको छोड़ दो। । ४५१