श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1898, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 24/252-265 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
नदीके तटपर एक कुटिया बनाकर उसके आगे एक चबूतरा बनाकर उसपर तुलसीका पौधा लगाओ। तुम लोग तुलसीकी परिक्रमा, तुलसीकी सेवा और निरन्तर श्रीकृष्णनामका कीर्तन करना। मैं दिनके समय तुम्हारे पास बहुतसी भोजन सामग्री भेजूँगा। तुम उसमेंसे उतनी ही सामग्री लेना, जितना तुम दोनों खा सको॥" 252-256 ॥
तबे सेइ मृगादि तिने नारद सुस्थ कैल। सुस्थ हञा मृगादि तिने धाञा पलाइल ॥ 257 ॥
अनुवाद-तब श्रीनारदने उन अधमरे मृगादि तीनों पशुओंको स्वस्थ किया और स्वस्थ होते ही मृगादि तीनों पशु दौड़कर चले गये ॥ 257 ॥
देखिया व्याधेर मने हैल चमत्कार। घरे गेल व्याध, गुरुके करि' नमस्कार ॥ 258 ॥
अनुवाद-ऐसा देखकर शिकारीके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। अपने गुरु श्रीनारदको प्रणाम करके शिकारी अपने घर लौट गया ॥ 258 ॥
यथा-स्थाने नारद गेला, व्याध घरे आइल। नारदेर उपदेशे सकल करिल ॥ 259 ॥
अनुवाद-श्रीनारद अपने गन्तव्य स्थान प्रयागकी ओर चल दिये और शिकारी अपने घर आ गया। शिकारीने श्रीनारदके उपदेशानुसार सब कार्य किया ॥ 259 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'नारदेर उपदेशे'-श्रीनारदके उपदेशके अनुसार ॥ 259 ॥
ग्रामे ध्वनि हैल, - 'व्याध 'वैष्णव' हइल।' ग्रामेर लोक सब अन्न आनिते लागिल ॥ 260 ॥ एकदिन अन्न आने दश-बिश जने। दिले तत लय, यत खाय दुइजने ॥ 261 ॥
अनुवाद-पूरे ग्राममें यह बात फैल गयी,-'शिकारी 'वैष्णव' बन गया है।" ग्रामके सभी लोग उसके पास भोजनकी सामग्री लाने लगे। एक दिनमें दस-बीस लोग भोजनकी सामग्री लेकर आते, किन्तु शिकारी उतना ही लेता जितना वे दो लोग खा सकते थे ॥ 260-261 ॥
एकदिन नारद कहे, - "शुनह, पर्वते। आमार एक शिष्य आछे, चलह देखिते ॥" 262 ॥
अनुवाद-एक दिन श्रीनारदने श्रीपर्वत ऋषिसे कहा,-"हे पर्वत ! सुनो, मेरा एक शिष्य है, चलो उसे देखनेके लिये चलें ॥" 262 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'शुनह, पर्वते'-ओहे पर्वत मुनि, सुनो ॥ 262 ॥
तबे दुइ ऋषि आइला सेइ व्याध-स्थाने। दूर हैते व्याध पाइल गुरुर दर्शने ॥ 263 ॥
अनुवाद-तब दोनों ऋषि शिकारीके स्थानपर आये। शिकारीने दूरसे ही अपने गुरुदेवको आते देख लिया ॥ 263 ॥
आस्ते-व्यस्ते धाञा आसे, पथ नाहि पाय। पथेर पिपीलिका इति-उति धरे पाय ॥ 264 ॥
अनुवाद-शिकारी तेजीसे दौड़कर गुरुदेवके पास जाने लगा, किन्तु उसे मार्ग नहीं मिल रहा था, क्योंकि मार्गमें चींटियाँ इधर-उधर आ-जा रहीं थीं और कहीं पैर रखनेसे कोई चींटी मर न जाय, इसलिये वह आगे बढ़ नहीं पा रहा था ॥ 264 ॥
दण्डवत्-स्थाने पिपीलिकारे देखिया। वस्त्रे स्थान झाड़ि' पड़े दण्डवत् हञा ॥ 265 ॥
अनुवाद-जब गुरुदेव निकट आ गये तब उनको दण्डवत् प्रणाम करने लगा, तो उसने देखा कि गुरुदेवके चरणोंके पास भी चींटियाँ हैं। उसने उस स्थानको अपने वस्त्रसे झाड़कर चींटियोंको दूर किया और फिर गुरुदेवको दण्डवत् प्रणाम किया ॥ 265 ॥
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