भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1905, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1905

चौबीसवाँ अध्याय 24/311-316 ] अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“हे सनातन! तुम मेरी स्तुति क्यों कर रहे हो? तुम भागवतके स्वरूपका विचार क्यों नहीं करते? भागवत श्रीकृष्णके ही समान विभु और सबका आश्रय है। भागवतके प्रति श्लोकमें और प्रति अक्षरमें अनेक अर्थ छिपे हैं। प्रश्नोत्तरके द्वारा भागवतमें समस्त सिद्धान्त स्थापित हुए हैं। इन प्रश्नोत्तरोंको सुनकर लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं॥ 311-313 ॥ प्राचीनकृत श्लोकमें श्रीशिवके वचन :— अहं वेद्मि शुको वेत्ति व्यासो वेत्ति न वेत्ति वा। भक्त्या भागवतं ग्राह्यं न बुद्ध्या न च टीकया ॥ 314 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 314 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महादेवने कहा,—मैं भागवत जानता हूँ, शुक भागवत जानते हैं, व्यास जानते हैं अथवा नहीं जानते हैं। भक्तिके द्वारा ही भागवत ग्रहण की जा सकती है, बुद्धि अथवा टीकाके द्वारा कभी भी ग्रहण नहीं की जा सकती॥ 314 ॥ अनुभाष्य— अहं (शिवः) [भागवतं शास्त्रं] वेद्मि (जानामि), शुकः (वैयासकिः) वेत्ति (जानाति), व्यासः वेत्ति वा न वेत्ति (इति सन्देहः); भागवतं (पारमहंसी-संहिताख्यं शास्त्रं) भक्त्या (विष्णोः कीर्त्तन-श्रवण-धारा-पारम्पर्येण, विष्णौ शरणागत्यात्मक-हरिसेवनेन एव) ग्राह्यं, बुद्ध्या न, टीकया न च (न तु तर्केणेत्यर्थः— “यस्य देवे परा भक्तिः” इति, “नायमात्मा प्रवचनेन” इति, “तद्विधि प्रणिपातेन” इत्यादि-श्रुतिस्मृतिवचनेभ्यश्च)। श्लोक-भावानुवाद—मैं, शिव, भागवत शास्त्रको जानता हूँ, शुक इसे जानते हैं, व्यास जानते हैं अथवा नहीं जानते हैं (इसमें सन्देह है)। पारमहंसी-संहिता शास्त्र भागवत विष्णुकी कीर्त्तन-श्रवण-धारा परम्परामें स्थित होकर विष्णुके शरणागत होकर उनकी सेवारूपी भक्तिके द्वारा ही ग्रहण की जा सकती है, बुद्धि अथवा टीकाके द्वारा कभी भी ग्रहण नहीं की जा सकती। (यह तर्कके द्वारा नहीं ग्रहण की जा सकती, किन्तु श्रुति-स्मृति वचनों “यस्य देवे परा भक्तिः”, “नायमात्मा प्रवचनेन”, “तद्विधि प्रणिपातेन” आदिके द्वारा ही ग्रहण की जा सकती है।)॥ 314 ॥ श्रीकृष्णके अप्रकट होनेपर भागवत ही ग्रन्थरूपी श्रीकृष्णका विग्रह :— श्रीमद्भागवत (1/1/23)— ब्रूहि योगेश्वरे कृष्णे ब्रह्मण्ये धर्मवर्मणि। स्वां काष्ठामधुनोपेते धर्मः कं शरणं गतः ॥ 315 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 315 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—[हे सूत!] योगेश्वर ब्रह्मण्यदेव, धर्मकी रक्षाके लिये कवचस्वरूप श्रीकृष्णके अपने नित्यधामको प्राप्त करनेपर धर्म इस समय किसके शरणागत हुआ है, यह बतलाओ॥ 315 ॥ अनुभाष्य—नैमिषारण्यमें शौनकादि ऋषियोंने महाभागवत श्रीसूत गोस्वामीसे जिन छः प्रश्नोंके उत्तरकी जिज्ञासा की थी, उनमेंसे यही सबसे श्रेष्ठ छठा प्रश्न है और अगले श्लोकमें श्रीसूतने इसका ही उत्तर प्रदान किया है,— [हे सूत,] योगेश्वरे (योगिनः एव योगाः तेषाम् ईश्वरे षडैश्वर्यपूर्णे) ब्रह्मण्ये (ब्राह्मण-रक्षके) धर्मवर्मणि (सनातन-धर्मस्य वर्मणि कवचवद्-गोप्तरि) कृष्णे स्वां काष्ठां (दिशं स्वरूपं, निजनित्यधाम, अप्रकटलीलामित्यर्थः) उपेते (प्राप्ते सति), धर्मः (सनातनः) अधुना कं शरणम् (आश्रयं) गतः (प्राप्तः,—कमाश्रित्य सनातनोधर्मः तिष्ठति, तत्) ब्रूहि (कथय)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 315 ॥ श्रीमद्भागवत (1/3/43)में— कृष्णे स्वधामोपगते धर्मज्ञानादिभिः सह। कलौ नष्टदृशामेषः पुराणार्कोऽधुनोदितः ॥ 316 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 316 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—धर्म-ज्ञानादिके साथ श्रीकृष्णके स्वधाम जानेपर इस कलिकालमें अज्ञानके अन्धकारसे अन्धे हो रहे लोगोंके हितके लिये यही पुराणरूपी सूर्य अब उदित हुए हैं॥ 316 ॥ । 459

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