श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1904, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 24/303-313 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला है) और कर्म नामक अविद्या-शक्तिका नाम 'माया' है॥ 303 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 7/119 संख्या देखें ॥ 303 ॥ क्षेत्रज्ञका पर्यायवाची शब्द :- अमरकोषके स्वर्गवर्ग (7) में— “क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः प्रधानं प्रकृतिः स्त्रियाम् ॥”304 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 304 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—क्षेत्रज्ञ शब्दसे—आत्मा, पुरुष, प्रधान और प्रकृतिको समझना है॥ 304 ॥ साधुसङ्गके फलसे श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :- भ्रमिते भ्रमिते यदि साधुसङ्ग पाय। सब त्यजि' तबे तिँहो कृष्णेरे भजय ॥ 305 ॥ षाटि अर्थ कहिलुँ, सब—कृष्णेर भजने। सेइ अर्थ हय, एइ सब उदाहरणे ॥ 306 ॥ अनुवाद—सभी जीव संसारमें अनेक योनियोंमें और लोकोंमें भ्रमण कर रहे हैं, ऐसे भ्रमण करते-करते जब वे साधुसङ्ग प्राप्त करते हैं, तब वे सब कुछ त्याग करके श्रीकृष्णका भजन करते हैं। मैंने जो साठ अर्थ बतलाये हैं, वे सभी श्रीकृष्णभजनको लक्ष्य करते हैं। इन समस्त उदाहरणोंका यही अर्थ है॥ 305-306 ॥ कुल मिलाकर यहाँ तक इकसठ प्रकारके अर्थोंकी व्याख्या :- 'एकषष्टि' अर्थ एबे स्फुरिल तोमा-सङ्गे। तोमार भक्तिवशे उठे अर्थेर तरङ्गे ॥” 307 ॥ अनुवाद—मुझमें तुम्हारे सङ्गसे 'इकसठ' अर्थोंकी स्फूर्ति हुई है। तुम्हारी भक्तिके प्रभावसे इन अर्थोंकी तरङ्ग उठ रही हैं॥ 307 ॥ अनुभाष्य—आत्मा शब्दका 'जीव' अर्थ करनेपर ब्रह्मासे आरम्भ करके कीट तक सभी जीवशक्ति हैं, वे क्षेत्रज्ञ जीवगण निर्ग्रन्थ मुनि होकर श्रीकृष्णभजन करते हैं—यही इकसठवाँ अर्थ है ॥ 307 ॥ इकसठ प्रकारके अर्थोंके श्रवणसे श्रीसनातनका विस्मय और महाप्रभुकी स्तुति :- अर्थ शुनि' सनातन विस्मित हञा। स्तुति करे महाप्रभुर चरणे धरिया ॥ 308 ॥ पुरुषरूपमें महाप्रभुके निश्वास छोड़नेके साथ ही वेदोंका प्रकाश :- “साक्षात् ईश्वर तुमि व्रजेन्द्रनन्दन। तोमार निश्वासे सर्ववेद-प्रवर्त्तन ॥ 309 ॥ शेषादि विष्णुरूपमें महाप्रभुके द्वारा ही भागवतकी व्याख्या और उसके विषयमें अभिज्ञता :- तुमि वक्ता भागवतेर, तुमि जान अर्थ। तोमा बिना अन्य जानिते नाहिक समर्थ ॥” 310 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके श्रीमुखसे आत्माराम-श्लोकके इकसठ प्रकारके अर्थ सुनकर श्रीसनातन गोस्वामी विस्मित हो गये और वे महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर उनकी स्तुति करने लगे,—“आप साक्षात् भगवान् श्रीव्रजेन्द्रनन्दन हैं, आपके निश्वाससे ही सभी वेद प्रकाशित हुए हैं। आप ही भागवतके वक्ता हैं और आप ही उसके समस्त अर्थोंको जानते हैं। आपके अतिरिक्त भागवतके अर्थोंको जाननेमें कोई भी समर्थ नहीं है॥” 308-310 ॥ महाप्रभुके द्वारा भागवत-माहात्म्य कहना :- प्रभु कहे,—“केने कर आमार स्तवन। भागवतेर स्वरूप केने ना कर विचारण ? ॥ 311 ॥ कृष्ण-तुल्य भागवत—विभु, सर्वाश्रय। प्रति-श्लोके प्रति-अक्षरे नाना अर्थ कय ॥ 312 ॥ पूर्वकालमें श्रीपरीक्षित और श्रीशुकदेव और उसके बाद शौनकादि और श्रीसूतके प्रश्नोत्तरमें श्रीभागवत-प्रकाशित :- प्रश्नोत्तरे भागवते करियाछे निर्धार। याँहार श्रवणे लोके लागे चमत्कार ॥ 313 ॥ 458