श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 24/303-313 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला है) और कर्म नामक अविद्या-शक्तिका नाम 'माया' है॥ 303 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 7/119 संख्या देखें ॥ 303 ॥ क्षेत्रज्ञका पर्यायवाची शब्द :- अमरकोषके स्वर्गवर्ग (7) में— “क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः प्रधानं प्रकृतिः स्त्रियाम् ॥”304 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 304 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—क्षेत्रज्ञ शब्दसे—आत्मा, पुरुष, प्रधान और प्रकृतिको समझना है॥ 304 ॥ साधुसङ्गके फलसे श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :- भ्रमिते भ्रमिते यदि साधुसङ्ग पाय। सब त्यजि' तबे तिँहो कृष्णेरे भजय ॥ 305 ॥ षाटि अर्थ कहिलुँ, सब—कृष्णेर भजने। सेइ अर्थ हय, एइ सब उदाहरणे ॥ 306 ॥ अनुवाद—सभी जीव संसारमें अनेक योनियोंमें और लोकोंमें भ्रमण कर रहे हैं, ऐसे भ्रमण करते-करते जब वे साधुसङ्ग प्राप्त करते हैं, तब वे सब कुछ त्याग करके श्रीकृष्णका भजन करते हैं। मैंने जो साठ अर्थ बतलाये हैं, वे सभी श्रीकृष्णभजनको लक्ष्य करते हैं। इन समस्त उदाहरणोंका यही अर्थ है॥ 305-306 ॥ कुल मिलाकर यहाँ तक इकसठ प्रकारके अर्थोंकी व्याख्या :- 'एकषष्टि' अर्थ एबे स्फुरिल तोमा-सङ्गे। तोमार भक्तिवशे उठे अर्थेर तरङ्गे ॥” 307 ॥ अनुवाद—मुझमें तुम्हारे सङ्गसे 'इकसठ' अर्थोंकी स्फूर्ति हुई है। तुम्हारी भक्तिके प्रभावसे इन अर्थोंकी तरङ्ग उठ रही हैं॥ 307 ॥ अनुभाष्य—आत्मा शब्दका 'जीव' अर्थ करनेपर ब्रह्मासे आरम्भ करके कीट तक सभी जीवशक्ति हैं, वे क्षेत्रज्ञ जीवगण निर्ग्रन्थ मुनि होकर श्रीकृष्णभजन करते हैं—यही इकसठवाँ अर्थ है ॥ 307 ॥ इकसठ प्रकारके अर्थोंके श्रवणसे श्रीसनातनका विस्मय और महाप्रभुकी स्तुति :- अर्थ शुनि' सनातन विस्मित हञा। स्तुति करे महाप्रभुर चरणे धरिया ॥ 308 ॥ पुरुषरूपमें महाप्रभुके निश्वास छोड़नेके साथ ही वेदोंका प्रकाश :- “साक्षात् ईश्वर तुमि व्रजेन्द्रनन्दन। तोमार निश्वासे सर्ववेद-प्रवर्त्तन ॥ 309 ॥ शेषादि विष्णुरूपमें महाप्रभुके द्वारा ही भागवतकी व्याख्या और उसके विषयमें अभिज्ञता :- तुमि वक्ता भागवतेर, तुमि जान अर्थ। तोमा बिना अन्य जानिते नाहिक समर्थ ॥” 310 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके श्रीमुखसे आत्माराम-श्लोकके इकसठ प्रकारके अर्थ सुनकर श्रीसनातन गोस्वामी विस्मित हो गये और वे महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर उनकी स्तुति करने लगे,—“आप साक्षात् भगवान् श्रीव्रजेन्द्रनन्दन हैं, आपके निश्वाससे ही सभी वेद प्रकाशित हुए हैं। आप ही भागवतके वक्ता हैं और आप ही उसके समस्त अर्थोंको जानते हैं। आपके अतिरिक्त भागवतके अर्थोंको जाननेमें कोई भी समर्थ नहीं है॥” 308-310 ॥ महाप्रभुके द्वारा भागवत-माहात्म्य कहना :- प्रभु कहे,—“केने कर आमार स्तवन। भागवतेर स्वरूप केने ना कर विचारण ? ॥ 311 ॥ कृष्ण-तुल्य भागवत—विभु, सर्वाश्रय। प्रति-श्लोके प्रति-अक्षरे नाना अर्थ कय ॥ 312 ॥ पूर्वकालमें श्रीपरीक्षित और श्रीशुकदेव और उसके बाद शौनकादि और श्रीसूतके प्रश्नोत्तरमें श्रीभागवत-प्रकाशित :- प्रश्नोत्तरे भागवते करियाछे निर्धार। याँहार श्रवणे लोके लागे चमत्कार ॥ 313 ॥ 458
चौबीसवाँ अध्याय 24/311-316 ] अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“हे सनातन! तुम मेरी स्तुति क्यों कर रहे हो? तुम भागवतके स्वरूपका विचार क्यों नहीं करते? भागवत श्रीकृष्णके ही समान विभु और सबका आश्रय है। भागवतके प्रति श्लोकमें और प्रति अक्षरमें अनेक अर्थ छिपे हैं। प्रश्नोत्तरके द्वारा भागवतमें समस्त सिद्धान्त स्थापित हुए हैं। इन प्रश्नोत्तरोंको सुनकर लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं॥ 311-313 ॥ प्राचीनकृत श्लोकमें श्रीशिवके वचन :— अहं वेद्मि शुको वेत्ति व्यासो वेत्ति न वेत्ति वा। भक्त्या भागवतं ग्राह्यं न बुद्ध्या न च टीकया ॥ 314 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 314 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महादेवने कहा,—मैं भागवत जानता हूँ, शुक भागवत जानते हैं, व्यास जानते हैं अथवा नहीं जानते हैं। भक्तिके द्वारा ही भागवत ग्रहण की जा सकती है, बुद्धि अथवा टीकाके द्वारा कभी भी ग्रहण नहीं की जा सकती॥ 314 ॥ अनुभाष्य— अहं (शिवः) [भागवतं शास्त्रं] वेद्मि (जानामि), शुकः (वैयासकिः) वेत्ति (जानाति), व्यासः वेत्ति वा न वेत्ति (इति सन्देहः); भागवतं (पारमहंसी-संहिताख्यं शास्त्रं) भक्त्या (विष्णोः कीर्त्तन-श्रवण-धारा-पारम्पर्येण, विष्णौ शरणागत्यात्मक-हरिसेवनेन एव) ग्राह्यं, बुद्ध्या न, टीकया न च (न तु तर्केणेत्यर्थः— “यस्य देवे परा भक्तिः” इति, “नायमात्मा प्रवचनेन” इति, “तद्विधि प्रणिपातेन” इत्यादि-श्रुतिस्मृतिवचनेभ्यश्च)। श्लोक-भावानुवाद—मैं, शिव, भागवत शास्त्रको जानता हूँ, शुक इसे जानते हैं, व्यास जानते हैं अथवा नहीं जानते हैं (इसमें सन्देह है)। पारमहंसी-संहिता शास्त्र भागवत विष्णुकी कीर्त्तन-श्रवण-धारा परम्परामें स्थित होकर विष्णुके शरणागत होकर उनकी सेवारूपी भक्तिके द्वारा ही ग्रहण की जा सकती है, बुद्धि अथवा टीकाके द्वारा कभी भी ग्रहण नहीं की जा सकती। (यह तर्कके द्वारा नहीं ग्रहण की जा सकती, किन्तु श्रुति-स्मृति वचनों “यस्य देवे परा भक्तिः”, “नायमात्मा प्रवचनेन”, “तद्विधि प्रणिपातेन” आदिके द्वारा ही ग्रहण की जा सकती है।)॥ 314 ॥ श्रीकृष्णके अप्रकट होनेपर भागवत ही ग्रन्थरूपी श्रीकृष्णका विग्रह :— श्रीमद्भागवत (1/1/23)— ब्रूहि योगेश्वरे कृष्णे ब्रह्मण्ये धर्मवर्मणि। स्वां काष्ठामधुनोपेते धर्मः कं शरणं गतः ॥ 315 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 315 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—[हे सूत!] योगेश्वर ब्रह्मण्यदेव, धर्मकी रक्षाके लिये कवचस्वरूप श्रीकृष्णके अपने नित्यधामको प्राप्त करनेपर धर्म इस समय किसके शरणागत हुआ है, यह बतलाओ॥ 315 ॥ अनुभाष्य—नैमिषारण्यमें शौनकादि ऋषियोंने महाभागवत श्रीसूत गोस्वामीसे जिन छः प्रश्नोंके उत्तरकी जिज्ञासा की थी, उनमेंसे यही सबसे श्रेष्ठ छठा प्रश्न है और अगले श्लोकमें श्रीसूतने इसका ही उत्तर प्रदान किया है,— [हे सूत,] योगेश्वरे (योगिनः एव योगाः तेषाम् ईश्वरे षडैश्वर्यपूर्णे) ब्रह्मण्ये (ब्राह्मण-रक्षके) धर्मवर्मणि (सनातन-धर्मस्य वर्मणि कवचवद्-गोप्तरि) कृष्णे स्वां काष्ठां (दिशं स्वरूपं, निजनित्यधाम, अप्रकटलीलामित्यर्थः) उपेते (प्राप्ते सति), धर्मः (सनातनः) अधुना कं शरणम् (आश्रयं) गतः (प्राप्तः,—कमाश्रित्य सनातनोधर्मः तिष्ठति, तत्) ब्रूहि (कथय)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 315 ॥ श्रीमद्भागवत (1/3/43)में— कृष्णे स्वधामोपगते धर्मज्ञानादिभिः सह। कलौ नष्टदृशामेषः पुराणार्कोऽधुनोदितः ॥ 316 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 316 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—धर्म-ज्ञानादिके साथ श्रीकृष्णके स्वधाम जानेपर इस कलिकालमें अज्ञानके अन्धकारसे अन्धे हो रहे लोगोंके हितके लिये यही पुराणरूपी सूर्य अब उदित हुए हैं॥ 316 ॥ । 459
[ 24/316-324 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य— [यद् युष्माभिः पृष्टं—‘धर्मः कं शरणं गतः?’ इति, तदिदमेव बुध्यस्वेत्याह—] धर्मज्ञानादिभिः (षड्भिः ऐश्वर्यैः) सह कृष्णे स्वधाम उपगते (प्रकटलीलां समाप्य अप्रकट-लीलां प्राप्ते सति) अधुना (सम्प्रति) कलौ (कलियुगे) नष्टदृशां (सद्धर्म-विष्णुभक्तितत्त्वज्ञानरहितानां हिताय) एषः पुराणार्कः (सूर्य इव उद्धर्मशार्वरहरः श्रीमद्भागवत-ग्रन्थः) उदितः (आविर्भूतः, प्रकटितः इत्यर्थः) । श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 316 ॥ श्रीचैतन्यका अनुसरण करते हुए शुद्ध चिद्धर्मके स्फुरित होनेसे अप्राकृत श्रीकृष्ण-सेवोन्मत्तके लिये ही भागवतके अर्थको जाननेमें योग्यताका निर्देश :- एइ मत कहिलुँ एक श्लोकेर व्याख्यान। वातुलेर प्रलाप करि' के करे प्रमाण ? ॥ 317 ॥ आमा-हेन येबा केह 'वातुल' हय। एइ दृष्टे भागवतेर अर्थ जानय ॥"318 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने भागवतके केवल एक श्लोककी ही व्याख्या की है। किन्तु पागलका प्रलाप समझकर कौन इसे प्रमाण मानेगा ? मेरे जैसा यदि कोई 'पागल' हो, तभी वह इस दृष्टिकोणसे भागवतके अर्थोंको जान सकता है॥"317-318 ॥ महाप्रभुसे श्रीसनातनके द्वारा 'वैष्णव-स्मृति'के सम्बन्धमें दीनतापूर्वक जिज्ञासा और श्रीमुखसे उपदेशको श्रवण करनेकी इच्छा :- पुनः सनातन कहे युड़ि' दुइ करे। “प्रभु, आज्ञा दिला 'वैष्णवस्मृति' करिबारे ॥ 319 ॥ मुञि—नीच-जाति, किछु ना जानि विचार। मो-हैते कैछे हय स्मृति-परचार ॥ 320 ॥ अनुवाद—दोनों हाथ जोड़कर श्रीसनातन गोस्वामीने तब महाप्रभुसे कहा, — “हे प्रभो! मुझे आपने 'वैष्णवस्मृति'की रचना करनेके लिये आज्ञा दी थी। मैं नीच-जातिका हूँ और वैष्णवाचारके विषयमें कुछ भी नहीं जानता हूँ। तब मैं कैसे वैष्णवाचारके नियमोंके ग्रन्थको लिख सकता हूँ? ॥ 319-320 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'नीचजाति' -श्रीसनातनने कहा, 'मैं म्लेच्छोंके संसर्गसे पतित ब्राह्मणजाति हूँ ॥'320 ॥ अनुभाष्य— 'वैष्णवस्मृति' - वैष्णवोंके लौकिक आचार-विषयक व्यवहार-शास्त्र 'श्रीहरिभक्तिविलास'-ग्रन्थ। जाति तीन प्रकारकी हैं—शौक्र (जन्मके अनुसार), सावित्र (उपनयन संस्कारके अनुसार) और दैक्ष (दीक्षाके अनुसार)। यद्यपि श्रीसनातन पवित्र कर्णाट ब्राह्मणकुलमें आविर्भूत हुए थे, तथापि लौकिक दृष्टिसे म्लेच्छोंकी दास्यवृत्ति नीचजातिके होनेका सङ्केतमात्र है। वर्तमानकालमें केवल मातृ-गर्भसे जन्म ही 'जाति'का परिचय है, वास्तवमें यह अनभिज्ञताका ही परिचायक मात्र है ॥ 319-320 ॥ सूत्र करि' दिशा यदि करह उपदेश। आपने करह यदि हृदये प्रवेश ॥ 321 ॥ तबे तार दिशा स्फुरे मो-नीचेर हृदये। ईश्वर तुमि, -ये कराह, सेइ सिद्ध हये ॥ "322 ॥ अनुवाद-आप कृपा करके सूत्ररूपमें वैष्णवस्मृतिकी प्रणालीका उपदेश प्रदान करें। आप स्वयं मेरे हृदयमें प्रवेश करें। आपके हृदयमें आनेपर और निर्देश प्रदान करनेपर मुझ नीचके हृदयमें इस ग्रन्थकी स्फूर्ति हो सकती है। आप ईश्वर हैं, आप जैसा करायेंगे, वही होगा ॥"321-322 ॥ अनुभाष्य— 'दिशा' - प्रणाली ॥ 322 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनको वरदान :- प्रभु कहे, – “ये करिते करिबा तुमि मन। कृष्ण सेइ सेइ तोमा कराबे स्फुरण ॥ 323 ॥ महाप्रभुके द्वारा वैष्णव-स्मृतिका सूत्र-वर्णन और 'हरिभक्तिविलास'की नींवकी संस्थापना :- तथापि एइ सूत्रेर शुन दिग्दरशन। सकारण लिखि आदौ गुरु-आश्रयण ॥ 324 ॥ 460 ।
चौबीसवाँ अध्याय [24/323-324]
अनुवाद- महाप्रभुने कहा,—“तुम जो कुछ भी करनेकी इच्छा करोगे, श्रीकृष्ण वही-वही तुम्हारे हृदयमें स्फुरित करा देंगे। तथापि वैष्णवस्मृतिके सूत्रोंका दिग्दर्शन सुनो। सर्वप्रथम तुम गुरुपदाश्रय करनेके महत्वको उसके कारणसहित लिखना॥ 323-324॥
अनुभाष्य- पाठान्तरमें, 'सर्वकारण',—सभीके कारणस्वरूप। 'गुरु-आश्रयण'—आदिलीला 1/35-46 संख्या देखें।
श्रीहरिभक्तिविलासके प्रथम-विलासमें— “आदौ सकारणं लेख्यं श्रीगुर्वाश्रयणं ततः। गुरुशिष्यपरीक्षादिर्भगवान् मनवोऽस्य च॥ मन्त्राधिकारी सिद्ध्यादिशोधनं मन्त्रसंस्क्रिया। दीक्षा नित्यं ब्राह्मकाले शुभोत्थानं पवित्रता॥ प्रातःस्मृत्यादि कृष्णस्य वाद्याद्यैश्च प्रबोधनम्। निर्माल्योत्तारणाद्यादौ मङ्गलारात्रिकं ततः॥ मैत्रादिकृत्यं शौचाचमनं दन्तस्य धावनम्। स्नानं तान्त्रिक-सन्ध्यादि देवसद्मादि-संस्क्रिया॥ तुलस्याद्याहृतिर्गृहेस्नान-मुष्णोदकादिकम्। वस्त्रं पीठं चोर्ध्वपुण्ड्रं चक्रादिमुद्रा माला च गृहसन्ध्यार्चनं गुरोः। माहात्म्यञ्चाथ कृष्णस्य द्वारवेश्मान्तरार्चनम्॥ पूजार्थासनमर्घ्यादिस्थापनं विघ्नवारणम्। श्रीगुर्वादिन्नतिर्भूतशुद्धिः प्राणविशोधनम्॥ न्यासा मुद्राप्रपञ्चश्च कृष्णध्यानान्तरर्चने। पूजापदानि श्रीमूर्त्तिशालग्रामशिलास्तथा॥ द्वारकोद्भवचक्राणि शुद्धयः पीठपूजनम्। आवाहनादि तन्मुद्रा आसनादिसमर्पणम्॥ स्नपनं शङ्ख-घण्टादिवाद्यं नामसहस्रकम्। पुराणपाठो वसनमुपवीतं विभूषणम्॥ गन्धः श्रीतुलसीकाष्ठचन्दनं कुसुमानि च। पत्राणि तुलसी चाङ्गोपाङ्गावरणपूजनम्॥ धूपो दीपश्च नैवेद्यं पानं होमो बलिक्रिया। अवगण्डुषाद्यास्यवासो दिव्यगन्धादिकं पुनः। राजोपचारा गीतादि महानीराजनं तथा॥ शङ्खादिवादनं साम्बुशङ्खनीराजनं स्तुतिः। नतिः प्रदक्षिणा कर्माह्यर्पणं जपयाचने। आगःक्षमापणं नानागांसि निर्माल्यधारणम्॥ शङ्खाम्बुतीर्थं तुलसीपूजा तन्मृत्तिकादि च। धात्री स्नान-निषेधस्य कालो वृत्तेरुपार्जनम्॥ मध्याह्ने वैश्व-देवादिश्श्राद्धं चानर्प्यमुच्यते। विनार्च्चामशने दोषास्तथानर्पितभोजने॥ नैवेद्यभक्षणं सन्तः सत्सङ्गोऽसत्सङ्गतिः। असद्गतिर्वैष्णवोपहास-निन्दादि-दुष्फलम्॥ सतां भक्तिर्विष्णुशास्त्रं श्रीमद्भागवतं तथा। लीलाकथा च भगवद्धर्माः सायं निज-क्रियाः॥ कर्मपातपरीहारस्त्रिकालाच्चार्चा विशेषतः। नक्तं कृत्यान्यथो पूजा-फलसिद्ध्यादि-दर्शनम्॥ विष्ण्वर्थदानं विविधोपचारा न्यूनपूरणम्। शयनं महिमाच्चार्याः श्रीमन्नाम्नस्तथाद्भुतः। नामापराधा भक्तिश्च प्रेमाद्याश्रयणादयः। पक्षेष्वेकादशी साङ्गा श्रीद्वादश्यष्टकं महत्। कृत्यानि मार्गशीर्षादि-मासेषु द्वादशस्वपि। पुरश्चरणकृत्यानि मन्त्रसिद्धस्य लक्षणम्॥ मूर्त्याविर्भावनं मूर्त्तिप्रतिष्ठा कृष्णमन्दिरम्। जीर्णोद्धृतिः श्रीतुलसीविवाहोऽन्यत्कर्म च॥”
[अर्थात् श्रीहरिभक्तिविलासमें वर्णित विषयसमूह— सर्वप्रथम कारण-सहित श्रीगुरुका आश्रय-ग्रहण, उसके बाद गुरुके लक्षण, शिष्यके लक्षण, गुरुशिष्य-परीक्षादि, भगवन्मन्त्र-माहात्म्य, मन्त्रके अधिकारी, सिद्ध्यादि-शोधन, मन्त्रका संस्कार, दीक्षा, नित्य ब्राह्ममुहूर्त्तमें शुभ उठना (अर्थात् कृष्ण-कीर्तनके साथ शय्यासे उठना), नित्य पवित्रता (अर्थात् हाथ-पैर धोना, दन्तधावन और आचमनादिके द्वारा पवित्र होना), श्रीकृष्ण विषयक प्रातः स्मरण-कीर्तन-विज्ञप्तिपाठ-प्रणामादि, वाद्यादिके साथ जगाना (भगवान्को जगाना), निर्माल्यको हटाना, उसके पश्चात् मङ्गलारात्रिक, उसके बाद मल-त्यागादि कार्य, शौच, आचमन, दन्तधावन, तान्त्रिक सन्ध्यादि, देवमन्दिरादिका संस्कार (सफाई), तुलसी आदिका चयन, अपने घरमें स्नान, गर्म जलादिसे स्नान, वस्त्र धारण करना, आसन, ऊर्ध्वपुण्ड्र गृहसन्ध्या, गुरुपूजा और गुरु-माहात्म्य, उसके बाद श्रीकृष्णकी द्वार और घरमें पूजा, पूजाके लिये आसन, अर्घ्य-पात्र आदिका स्थापन, विघ्न-निराकरण, श्रीगुर्वादि
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[ 24/324-325 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ / Left Column] प्रणाम, भूतशुद्धि, प्राणायाम, न्यास, मुद्रापञ्चक, श्रीकृष्ण ध्यान, उसके बाद अन्तर्याग, पूजाका स्थान, श्रीमूर्त्ति और शालग्राम-शिलाका लक्षण, द्वारका-उद्भूत चक्रसमूह, श्रीमूर्त्ति-स्नानादि शुद्धिसमूह, पीठ-पूजा, आवाहन- संस्थापन-निकटमें रहनादि और वैसी-वैसी-मुद्रा, आसनादि समर्पण, स्नान, उस समय शङ्ख-घण्टादि वाद्य, सहस्रनाम, पुराणपाठ, वस्त्र, उपवीत, अलङ्कार, गन्ध, तुलसीकाष्ठ-चन्दन, पुष्प, विल्व-पत्रादि, तुलसी, अङ्ग-उपाङ्ग-आवरणपूजा, धूप, दीप, नैवेद्य, पान, होम, बलिक्रिया (विष्वक्सेनादि भक्तोंको भगवान्का उच्छिष्ट-अंश देना), कुल्लाके लिये जल, लौंग-पानादि मुखवास, पुनः दिव्यगन्ध द्रव्यादि, छत्र-चामरादि राजोपकरण, गीतादि, महा-अर्चन, शङ्खादि वाद्य, शङ्खमें जल भरके अर्चन, स्तुति, प्रणाम, प्रदक्षिणा, कर्मादि-अर्पण, जप, प्रार्थना, अपराधोंके लिये क्षमा याचना, निर्माल्य (प्रसादी माला)-धारण, भगवद्-अर्चनसे बचा शङ्खजल, तीर्थ (चरणामृत), तुलसीके काननमें भगवान् और तुलसीकी पूजा, तुलसी-मृत्तिका- काष्ठादि, आँवलेका माहात्म्य, स्नानका निषेधकाल, जीविका-उपार्जन, मध्याह्नमें वैश्य-देवतादि-श्राद्ध, भगवान्में जो सब द्रव्य अर्पण योग्य नहीं हैं, भगवान्की पूजाके अतिरिक्त भोजनमें और अनिवेदित वस्तुके भोजनमें दोषसमूह, नैवेद्य-भक्षण, भगवद्भक्तगण, साधुसङ्ग, असाधुसङ्ग-वर्जन, असत् व्यक्तियोंकी गति, उपासनादि निजकृत्य, वैष्णवोंके कर्मपातके दोष-निराकरण-सिद्धान्त, विशेषतः तीनों कालोंमें अर्चनका विशेष विधान, रात्रिकृत्य (अर्थात् गीत-वाद्यादि सहित भगवान्के शयनोपचारकी रचना), पूजाके फलकी सिद्धि आदि, पूजा अथवा श्रीमूर्त्ति-दर्शन, विष्णु प्रीतिके लिये दान, विविध पूजोपचार, द्रव्यके अभावमें पूजाका समाधान, अपने शयनकी विधि, श्रीभगवान्की पूजा और श्रीनामकी महिमा, नामापराधसमूह, भक्तिका माहात्म्य, प्रेम-सम्पत्ति लक्षण, आश्रयण (शरणागति), कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष, दोनोंमें अङ्गों सहित श्रीएकादशी-व्रतोपवास, अष्ट- महाद्वादशी, अग्रहायणादि बारह मासोंके कृत्य,
[दायाँ स्तम्भ / Right Column] पुरश्चरण-कृत्य, मन्त्रसिद्धिके लक्षण, श्रीभगवान्की मूर्त्तिका शिल्प आदिके द्वारा सम्पादन, श्रीमूर्त्ति प्रतिष्ठा, श्रीकृष्णमन्दिर, जीर्णमन्दिरादिका उद्धार, श्रीतुलसी विवाह और ऐकान्तिक भक्तोंके कृत्य।] ॥ 324 ॥ गुरुलक्षण, शिष्यलक्षण, दोँहार परीक्षण। सेव्य-भगवान्, सर्वमन्त्र-विचारण ॥ 325 ॥ अनुवाद— उस ग्रन्थमें गुरु और शिष्य, दोनोंके लक्षणोंका वर्णन करना। साथ ही गुरु और शिष्यकी एक दूसरेकी परीक्षा लेनेकी आवश्यकता बतलाना। स्वयं-भगवान् सबके सेव्य हैं एवं श्रीकृष्ण और अन्य भगवद्-स्वरूपोंकी उपासनाके मन्त्रोंको उस ग्रन्थमें लिखना ॥ 325 ॥ अनुभाष्य— 'गुरु-लक्षण'—(पद्मपुराणमें)— “महाभागवतश्रेष्ठो ब्राह्मणो वै गुरुर्नृणाम्। सर्वेषामेव लोकानामसौ पूज्यो यथा हरिः॥ महाकुलप्रसूतोऽपि सर्वयज्ञेषु दीक्षितः। सहस्रशाखाध्यायी च न गुरुः स्यादवैष्णवः॥” भाः 7/11/35 श्लोकमें उक्त लक्षणोंके अनुसार ही ब्राह्मणादि 'वर्ण' निर्दिष्ट होते हैं। इस श्लोककी श्रीधरस्वामिपादकी टीका,— “शमादिभिरेव ब्राह्मणादि-व्यवहारो मुख्यः, न जाति-मात्रादित्याह- यस्येति। यद् यदि अन्यत्र वर्णान्तरेऽपि दृश्यते, तद्वर्णान्तरं तेनैव लक्षणनिमित्तेनैव वर्णेन विनिर्देशेत्, न तु जातिनिमित्तेनेत्यर्थः।” महाभारतकी टीकामें नीलकण्ठ कहते हैं,— “शूद्रोऽपि शमाद्युपेत्य ब्राह्मण एव। ब्राह्मणोऽपि कामाद्युपेतः शूद्र एव।” [अर्थात् (पद्मपुराणमें गुरुलक्षण)—“महाभागवत श्रेष्ठ ब्राह्मण ही सभी मनुष्योंके गुरु हैं, वे सभी लोगोंमेंसे श्रीहरिके समान ही पूजनीय हैं। महाकुलमें उत्पन्न होनेपर भी, समस्त यज्ञोंमें दीक्षित होनेपर भी और सहस्र शाखाओंका अध्ययन करनेपर भी अवैष्णव होनेपर वे 'गुरु' नहीं कहे जा सकते।” (भाः 7/11/35 श्लोककी श्रीधरस्वामि-कृत टीका)—“शमादि गुणोंके
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चौबीसवाँ अध्याय 24/325 ] द्वारा ही ब्राह्मणादि वर्णका निर्णय मुख्य है—केवल जातिके द्वारा नहीं, यही 'यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं' श्लोकमें कहा गया है। यदि अन्यत्र अर्थात् अन्य वर्णमें भी शमादि-गुण दिखलायी दें, तब उस अन्य वर्णवालेको उस वर्ण लक्षणके द्वारा ही मानना चाहिये, जाति निमित्तके द्वारा नहीं।” (महाभारतकी टीकामें श्रीनीलकण्ठ)—“शूद्रकुलमें उत्पन्न व्यक्ति शमादि-गुणोंसे भूषित होनेपर वह निश्चय ही 'ब्राह्मण' है और ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न व्यक्ति कामादिसे युक्त होनेपर अवश्य ही 'शूद्र' है।”] ब्राह्मण कहकर अपना परिचय देनेपर ही अथवा अनभिज्ञ व्यक्तियोंके द्वारा वैसा परिचय दिये जानेपर ही कोई व्यक्ति गुरुपदके योग्य 'ब्राह्मण' कहकर माने जायेंगे, ऐसा नहीं है। श्रीठाकुर नरोत्तम, श्यामानन्द आदि सद्ब्राह्मणोंके गुरु थे और वास्तविक शुद्ध ब्राह्मण थे, इसलिये ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न श्रीगङ्गा-नारायण, रामकृष्णादिने उन्हें गुरुपदके योग्य विशुद्ध 'ब्राह्मण' कहकर निरूपण किया था। “तापादि-पञ्चसंस्कारी नवेज्ज्या-कर्मकारकः। अर्थपञ्चकविद् विप्रो महाभागवतः स्मृतः॥” अर्थात् “महाभागवत कहनेसे 'ताप, पुण्ड्र नाम, मन्त्र और उपासना-युक्त'—पञ्चसंस्कार सम्पन्न, अर्चन, मन्त्रपठन, योग, याग, वन्दन, नाम-सङ्कीर्तन, सेवा, चिह्नोंके द्वारा शरीरपर अङ्कन, वैष्णवाराधन सम्पन्न,—इन नौ इज्ज्या (पूजा) कर्मकारक; और 'उपास्य भगवान्, उनका परमपद, उनके द्रव्य, उनका मन्त्र और जीवात्मा'—इन अर्थपञ्चकज्ञ अर्थात् पाँच-तत्त्वोंके तात्पर्यको जाननेवाले ब्राह्मणको ही समझना चाहिये।” इस प्रकारके महाभागवतोंमें श्रेष्ठता प्राप्त करके जो मनुष्योंमें हरिके समान पूजनीय होते हैं, वे 'गुरु'-पदप्राप्तिके योग्य हैं। दूसरी ओर महान् कुलमें जन्म लेनेवाले, सभी यज्ञोंमें दीक्षित व्यक्ति और वेदोंकी सहस्र-शाखाओंके अध्ययनमें पारङ्गत व्यक्ति भी 'अवैष्णव' होनेपर कभी भी 'गुरु' नहीं हो सकते। जहाँ वैष्णवतासे ब्राह्मणता—'भिन्न' है अर्थात् जहाँ ब्राह्मण वैष्णवोंका आनुगत्य नहीं करते हैं, वहाँ वैसे ब्राह्मणोंमें गुरुयोग्य ब्राह्मणता नहीं है। दूसरी ओर, जहाँ वैष्णवता है, वहाँ लौकिक-दृष्टिसे जन्मके अनुसार अन्य वर्ण दिखलायी देनेपर भी वास्तविक शुद्ध-ब्राह्मणताका अभाव नहीं है। यद्यपि आचार्यके कृत्य अध्यापनादि कार्योंमें ब्राह्मणके अतिरिक्त अन्य वर्णोंकी सम्भावना नहीं है, तथापि जो गुरुपदके योग्य है, उसमें ब्राह्मणता—स्वतःसिद्ध है। वैष्णव-मात्र ही जगत्के गुरु हैं, इसलिये उनका ब्राह्मण-आचार और उनकी ब्राह्मणता सदैव साथ-साथ विद्यमान है। बाहरसे अपना दैन्य दिखलाते हुए अनेक वैष्णवोंने लौकिक-दृष्टिसे ब्राह्मण-आचारको ग्रहण नहीं किया, परन्तु उससे वैष्णवोंमें ब्राह्मणताका कभी भी अभाव नहीं होता। शिष्यलक्षण'—(भाः 11/10/6)— “अमान्यमत्सरदक्षो निर्ममो दृढसौहृदः। असत्वरोऽर्थजिज्ञासुरनसूयुरमोघवाक्॥” [अर्थात् “शिष्य अमानी, मात्सर्य-रहित, आलस्यरहित, स्त्री-पुत्रादिमें ममताहीन, गुरु-वैष्णवोंमें सौहार्दयुक्त, शास्त्र तत्त्वजिज्ञासु, असूया-रहित और वृथावाक्य-शून्य होंगे।”] जो जागतिक अभिमानके वशीभूत नहीं है, जो काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्यका परित्याग करके अप्राकृत भगवद्-तत्त्वके विचारोंको ग्रहण करनेमें निपुण है, जो प्राकृत वस्तुओंमें 'मैं' और 'मेरे'की बुद्धिसे रहित है और अप्राकृत गुरुपादपद्ममें अविनाशी प्रणयसे युक्त है, जो धैर्यशीलताके द्वारा चञ्चलता-रहित और परमार्थ-जिज्ञासा परायण है, जो गुणोंमें दोष नहीं देखता है एवं अन्याभिलाष-कर्म-ज्ञानादि-सम्बन्धी वृथा बातोंमें प्रमत्त नहीं होकर हरिकथामें स्थिरबुद्धिवाला है, वही 'शिष्य' होनेके योग्य है। 'दोँहार परीक्षण'—जो अप्राकृत वस्तु शिष्यके लिये आवश्यक है, उसको पानेका इच्छुक होकर जब वह गुरुपादपद्मका आश्रय ग्रहण करनेके लिये जाता है, तब वह वस्तु किसी गुरु कहलानेवाले व्यक्तिमें है या नहीं और यदि है, तो किस परिमाणमें है, उसे शिष्यको एक । 463
[ 24/325-326 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
वर्ष तक देखना उचित है। शिष्यकी अप्राकृत उपलब्धिकी योग्यता कैसी है, उसे गुरु भी विशेषरूपसे देखेंगे, क्योंकि, विषयी शिष्यके सङ्गसे गुरुब्रुवका (जो गुरु अभी साधक है, उसका) गुरुत्व कम होना अवश्यम्भावी है। गुरुब्रुव यदि शिष्यको 'भोग्य' मानकर उससे धनादि प्राप्त करनेके लिये उसके साथ अनित्य लौकिक स्वार्थपरक सम्बन्ध स्थापित करता है, तो वह लौकिक स्मार्तोंकी भाँति परमार्थसे च्युत हो जायेगा। ऐसे गुरु कहलानेवाले व्यक्तिको 'वञ्चक' (ठग) और शिष्योंको 'वञ्चित' (ठगा गया) कहा जाता है। ऐसे गुरुब्रुव परमार्थ-धर्मसे वञ्चित हो जाते हैं। स्वयंको आचार्य, सम्प्रदाय-आश्रित गोस्वामी मतमें स्थित कहकर अभिमान करनेपर भी वे प्राकृत बाउल और सहजिया-दलकी ही एक शाखामें परिणत हो जाते हैं। 'सेव्य-भगवान्' - भगवान् विष्णु ही एकमात्र सेव्य हैं; विष्णुके अतिरिक्त अन्य किसी देवताकी उपासनाकी आवश्यकता नहीं है। “वासुदेवं परित्यज्य योऽन्यदेवमुपासते। स्वमातरं परित्यज्य श्वपचीं वन्दते हि सः॥” [अर्थात् “वासुदेवका परित्याग करके जो अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, वे मानो अपनी माताका त्याग करके चाण्डालिनीकी पूजा करते हैं।"] “येऽपन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥” [अर्थात् “हे कौन्तेय! जो सकाम भक्त स्वतन्त्रभावसे अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, वे अविधिपूर्वक मेरी ही उपासना करते हैं।"] “यस्तु नारायणं देवं ब्रह्मरुद्रादिदैवतैः। समत्वेनैव वीक्षेत स पाषण्डी भवेद्-ध्रुवम्॥” [अर्थात् “जो ब्रह्मा-रुद्रादि देवताओंके साथ श्रीनारायणको 'समान' रूपमें देखते हैं, वे निश्चय ही 'पाखण्डी' हैं।"] विशुद्ध-सत्त्वगुणमें अधिष्ठित होनेपर निर्गुण जीव मुक्त होकर भी भगवान्की उपासना करता है। सत्त्वगुणमें रजोगुणके मिलनेपर जीव 'सूर्य'की, सत्त्वगुणमें तमोगुणके मिलनेपर 'गणपति'की, रजोगुणमें तमोगुणके मिलनेपर जीव 'मायाशक्ति'की, केवल तमोगुणमें उपासना करनेपर 'शिव'की और रजोगुणके प्रबल होनेपर जीव पाँच-उपास्योंमेंसे सभीका ही भजन करता है। वास्तवमें मायाके गुणोंसे मुक्त होनेपर भगवान् विष्णु ही एकमात्र नित्य सेव्य हैं, यह समझ सकते हैं। 'सर्वमन्त्रविचारण'–द्वादशाक्षर, अष्टदशाक्षर, नारसिंह, राम, गोपालादि मन्त्रोंकी शक्तिके तारतम्यका विचार (श्रीहरिभक्तिविलास प्रथम विलास 121-193 संख्या देखें) ॥ 325 ॥ मन्त्र-अधिकारी, मन्त्र-सिद्ध्यादि-शोधन। दीक्षा, प्रातःस्मृति-कृत्य, शौच, आचमन ॥ 326 ॥ अनुवाद-मन्त्र ग्रहण करनेके अधिकारके विषयमें, मन्त्रकी सिद्धि, मन्त्रकी शुद्धि, दीक्षा, प्रातःस्मृति-कृत्य, शौच, आचमनादिकी विधिका भी वर्णन करना॥ 326 ॥ अनुभाष्य-मन्त्र-अधिकारी- “तान्त्रिकेषु च मन्त्रेषु दीक्षायां योषितामपि। साध्वीनामधिकारोऽस्ति शूद्रादीनाञ्च सद्धियाम्॥” पाञ्चरात्रिकी मन्त्र-दीक्षामें साध्वी स्त्री और सद्बुद्धि युक्त पुरुषोंकी भाँति स्त्रियों और शूद्रोंका भी अधिकार है। वैदिकी-दीक्षामें स्वाध्यायमें रत ब्राह्मणका ही अधिकार है और अयोग्य शूद्र अथवा स्त्रियोंका वैदिकी-दीक्षामें अधिकार नहीं है। योग्यता-प्राप्त व्यक्तिका ही भागवत- वैदिक अधिकार है और योग्यता प्राप्त करनेके आकाङ्क्षी व्यक्तिका पाञ्चरात्रिक तान्त्रिक अधिकार है,-दोनों मागोंका फल 'एक' ही है। 'सिद्ध्यादि'- “सिद्ध-साध्य-सुसिद्धारि क्रमाज्ज्ञेया विचक्षणैः।” (क) सिद्ध, (ख) साध्य, (ग) सुसिद्ध, (घ) अरि-
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चौबीसवाँ अध्याय 24/326 ] (1) सिद्ध-सिद्ध, (2) सिद्ध-साध्य, (3) सिद्ध-सुसिद्ध, (4) सिद्ध अरि; (5) साध्य-सिद्ध, (6) साध्य-साध्य, (7) साध्य-सुसिद्ध, (8) साध्य-अरि; (9) सुसिद्ध-सिद्ध, (10) सुसिद्ध-साध्य, (11) सुसिद्ध-सुसिद्ध, (12) सुसिद्ध-अरि; (13) अरिसिद्ध, (14) अरि-साध्य, (15) अरि-सुसिद्ध, (16) अरि-अरि। अष्टादशाक्षर मन्त्रमें सिद्धादि प्राकृत-विचार नहीं है। (त्रैलोक्यसम्मोहनतन्त्रमें श्रीशिववाक्य)- "न चात्र शात्रवा दोषा नर्णस्वादिविचारणा। ऋक्षराशिविचारो वा न कर्त्तव्यो मनौ प्रिये॥ (वृहद्गौतमीय तन्त्र)- नात्र चिन्त्योऽरिशुद्ध्यादिनारिमित्रादिलक्षणम्। सिद्ध-साध्यसुसिद्धारिरूपा नात्र विचारणा॥" [अर्थात् “प्रिये! अष्टादशाक्षर गोपाल-मन्त्रमें सिद्धादि- शोधन-वर्णित शत्रुजनित सब दोष नहीं हैं। ऋण-धन- विचारकी भी आवश्यकता नहीं है, नक्षत्र-राशिका भी विचार करना कर्त्तव्य नहीं है।" “श्रीकृष्ण मन्त्रमें शत्रुशुद्धि आदिकी चिन्ता नहीं है, शत्रु-मित्रादि लक्षणोंको देखनेकी भी आवश्यकता नहीं है-इसमें सिद्ध, साध्य, सुसिद्ध और शत्रु-विचार आवश्यक नहीं है।"] 'शोधन'- “जननं जीवनश्चेति ताड़नं रोधनं तथा। अथाभिषेको विमलीकरणाप्यायने पुनः॥ तर्पणं दीपनं गुप्तिर्दशैता मन्त्रसंक्रियाः। ×× बलित्वात् कृष्णमन्त्राणां संस्कारापेक्षं न हि।” [अर्थात् “जनन, जीवन, ताड़न, रोधन, अभिषेक, विमलीकरण, आप्यायन, तर्पण, दीपन और गोपन-ये दस प्रकारके मन्त्र संस्कार हैं। ×× श्रीकृष्णमन्त्र समूह बलवान् होनेके कारण उक्त दस प्रकारके संस्कारोंकी अपेक्षा नहीं रखते।"] 'दीक्षा'-मध्यलीला 15/108 संख्या देखें। पाञ्चरात्रिकी दीक्षामें दीक्षित व्यक्ति 'ब्राह्मणता' प्राप्त करता है',- “यथा काञ्चनतां याति कांस्यं रसविधानतः। तथा दीक्षाविधानेन द्विजत्वं जायते नृणाम्॥” 'दीक्षाकाल'-(तत्त्वसागरमें) “दुर्लभे सद्गुरुणाञ्च सकृत्सङ्ग उपस्थिते। तदनुज्ञा यदा लब्धा स दीक्षावसरो महान्॥ ग्रामे वा यदि वारण्ये क्षेत्रे वा दिवसे निशि। आगच्छति गुरुर्देवादू यथा दीक्षा तदाज्ञया॥ यदैवेच्छा तदा दीक्षा गुरोराज्ञानुरूपतः। न तीर्थं न व्रतं होमो न स्नानं न जपक्रिया। दीक्षायाः करणं किन्तु स्वेच्छाप्राप्ते तु सद्गुरौ॥” [अर्थात् “एक विशेष विधिसे रसके द्वारा जैसे कांसा-धातु सोना बन जाता है, उसी प्रकार दीक्षा-विधिके द्वारा मनुष्यमें द्विजत्व उत्पन्न होता है।" “सद्गुरुका दुर्लभ सङ्ग एकबार मात्र उपस्थित होनेसे, जब भी उनकी आज्ञा प्राप्त होती है, वही दीक्षाका शुभ काल है। गाँवमें, वनमें, क्षेत्रमें, दिनमें अथवा रात्रिमें गुरुदेव जब दैवात् आगमन करें, तभी उनकी आज्ञासे दीक्षा ग्रहण करनी चाहिये। जब गुरुकी इच्छा होगी, तभी उनकी आज्ञानुसार दीक्षा हो सकती है। सद्गुरुके स्वयं इच्छा करनेपर ही, किन्तु तीर्थ, व्रत, होम, स्नान, जपक्रिया कुछ भी दीक्षाका कारण नहीं होते।"] 'प्रातःस्मृति'- 'ब्राह्ममुहूर्ते उत्थाय कृष्ण कृष्णेति कीर्त्तयन्। ×× स्तुत्वा च कीर्त्तयन् कृष्णं स्मरंश्चैतदुदीरयेत्॥' 'जयति जननिवासः' इत्यादि (भाः 10/90/48)। 'स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते। पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम्॥' “उद्गायतीनामरविन्दलोचनम्” इत्यादि (भाः 10/46/46)। 'स्मर्त्तव्य सततं विष्णुर्विस्मर्त्तव्यो न जातुचित्। सर्वे विधि-निषेधाः स्युरे तयोरेव किङ्कराः॥"-(पाद्मे बृहत्सहस्रनामस्तोत्रे)। [अर्थात् “ब्रह्ममुहूर्त्तमें 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम कीर्तन करते-करते शय्यासे उठना चाहिये। ×× गुरुपादपद्मका ध्यान और स्तव करते हुए श्रीकृष्णकीर्तन और स्मरण करते हुए यह श्लोक पाठ करना- 'जयति जननिवासः' (भाः 10/90/48) इत्यादि। 'जिन्हें स्मरण करनेसे सब प्रकारके कल्याणका पात्र बना जा सकता है, उन अजन्मा सनातन पुरुष श्रीहरिकी शरण ग्रहण करता । 465
[ 24/326-327 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला हूँ।' श्रीविष्णुको सदा ही स्मरण करना चाहिये—कभी भी उन्हें भूलना नहीं चाहिये, समस्त 'विधि' और 'निषेध' इन दोनों बातोंके अनुगत हैं।"] 'प्रातःकृत्य'—मैत्रादिकृत्य,— “ततः कल्ये समुत्थाय कुर्यान्मैत्रं नरेश्वर। xx दुरादावस्थान्मूत्रं पुरीषञ्च समुत्सृजेत्॥” [अर्थात् “इसके बाद हे राजन्! ऊषाकालमें उठकर घरसे दूर जाकर मल-मूत्र परित्याग करना।”] 'शौच'— “गुह्ये दद्यान्मृदं चैकां पायौ पश्चाम्बु सान्तराः। दश वामकरे चापि सप्तपाणिद्वये मृदः॥ एकैकां पदयोर्दद्यात् तिस्रः पाण्योर्मृदः स्मृताः। इत्थं शौचं गृही कुर्याद्-गन्ध-लेपक्षयावधि॥” [अर्थात् “शिश्नमें एक बार, मलद्वारमें पाँच बार, बायें हाथमें दस बार, दोनों हाथोंमें सात बार, दोनों पैरोंमें एक बार और पुनः दोनों हाथोंमें तीन बार, इस प्रकार बीच-बीचमें जलके साथमें मिट्टी लगानी चाहिये। जब तक गन्ध सम्पूर्ण रूपमें दूर नहीं हो, तब तक गृहस्थ व्यक्ति इस प्रकार शौच करेंगे। (गृहस्थकी अपेक्षा ब्रह्मचारी दो गुणा, वानप्रस्थ तीन गुणा और भिक्षु (संन्यासी) चार गुणा शौचका आचरण करेंगे।"] 'आचमन'— “अच्छेनागन्धफेनेन जलेनबुद्बुदेन च। आचामेत मृदं भूयस्तथा दद्यात् समाहितः॥ निष्पादिताङ्घ्रिशौचस्तु पादावभ्युक्ष्य वै पुनः। त्रि पिबेत् सलिलं तेन तथा द्विः परिमार्जयेत्॥” [अर्थात् “स्वच्छ, गन्धरहित, फेनहीन, बुलबुलेसे रहित जलके द्वारा आचमन करना होगा। पुनः सावधानीसे चरणोंमें मिट्टी लगानी होगी। पाद-शौच समाप्त करके पुनः दोनों पैरोंका प्रक्षालन करके तीन बार जलपान (आचमन) करना होगा और इसी जलके द्वारा ही दो बार मुख धोना होगा।”] ॥ 326 ॥ दन्तधावन, स्नान, सन्ध्यादि-वन्दन। गुरुसेवा, ऊर्ध्वपुण्ड्र अनुवाद—दन्तधावन, स्नान, सन्ध्यादि-वन्दन, गुरुसेवा, ऊर्ध्वपुण्ड्र 327 ॥ अनुभाष्य— 'दन्तधावन'— “अथो मुखविशुद्ध्यर्थं गृह्णीयात् दन्तधावनम्। आचान्तोऽप्यशुचि- र्यस्मादकृत्वा दन्तधावनम्॥ दन्तकाष्ठमखादित्वो यस्तु मामुपसर्पति। सर्वकालकृतं कर्म तेन चैकेन नश्यति॥” [अर्थात् “इसके बाद मुख शोधनके लिये दातुन करना, क्योंकि दातुन नहीं करनेपर आचमन करनेसे भी मनुष्य अशुद्ध ही रहता है। दातुनको नहीं चबाकर जो व्यक्ति मेरी आराधना करता है, वह इसी एक कर्मके द्वारा ही अपने द्वारा सब समय किये गये कर्मोंको ध्वंस कर लेता है।”] 'स्नान'— “प्रातर्मध्याह्नयोः स्नानं वानप्रस्थगृहस्थयोः। यतेस्त्रिसवनं स्नानं सकृत्तु ब्रह्मचारिणः॥ सर्वे चापि सकृत् कुर्युरशक्तौ चोदकं बिना॥” [अर्थात् “वानप्रस्थ और गृहस्थके लिये प्रातःकाल और दोपहरमें स्नान, संन्यासीके लिये तीनों संध्याओंमें और ब्रह्मचारीके लिये केवल एकबार मात्र स्नान करना कर्त्तव्य है। असमर्थ होनेपर सभीके लिये एकबार मात्र स्नान करना चाहिये और उसमें भी असमर्थ होनेपर जलके बिना मन्त्र-स्नान आदि करणीय है।”] 'सन्ध्यावन्दन'—सन्ध्या दो प्रकारकी है—वैदिकी और तान्त्रिकी। वैदिकी सन्ध्या— “ध्यात्वार्कमण्डलगतां सावित्रीं तां जपेद्बुधः। प्राङ्मुखः सततं विप्रः सन्ध्योपासनमाचरेत्॥ विहाय सन्ध्या-प्रणतिं स याति नरकायुतम्॥” [अर्थात् “पण्डित व्यक्ति सूर्यमण्डलवर्तिनी गायत्रीका ध्यान करके उसका जप करेंगे। ब्राह्मण सदैव पूर्वमें मुख करके सन्ध्या उपासना करेंगे। सन्ध्या वन्दना नहीं करनेपर वे दस हजार नरकोंमें जायेंगे।”] “ॐ तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः दिवीव 466 ।
चौबीसवाँ अध्याय [ 24/327 ]
चक्षुराततम्” इत्याचमनम्। प्रोक्षणानन्तरं सन्ध्यामुपासयेत्। गायत्रीं दशधा जप्त्वा आपोमार्जिनम्– “ॐ शन्न आपो धन्वन्थाः शमनः सन्तु नूप्याः शन्नः समुद्रिया आपः शमनः सन्तु कूप्याः। ॐ द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव। पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुद्धन्तु मैनसः। ॐ आपो हिष्ठामयो भुवस्ता न ऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे। ॐ यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः। ॐ तस्मा अरङ्गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जनयथा च नः। ॐ ऋतञ्च सत्यञ्चाभीद्धात् तपसोऽध्यजायत। ततो राज्यजायत ततः समुद्रोऽर्णवः। समुद्रादर्णवादधिसंवत्सरोऽजायत। अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी सूर्य्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत्। दिवञ्च पृथिवीञ्चान्तररीक्षमथो स्वः।” 'तान्त्रिकी सन्ध्या'– “मूलमन्त्रमथोच्चार्य ध्यायन् कृष्णाङ्घ्रिपङ्कजे। श्रीकृष्णं तर्पयामीति त्रिः सम्यक् तर्पयेत् कृती॥ ध्यानोद्दिष्टस्वरूपाय सूर्यमण्डलवर्त्तिने। कृष्णाय कामगायत्र्या दद्यादर्घ्यमनन्तरम्॥” [अर्थात् “इसके बाद सन्ध्या करनेवाले व्यक्ति मूलमन्त्रका उच्चारण करके श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करके 'श्रीकृष्णको अर्पित कर रहा हूँ'–यह कहकर तीन बार सम्पूर्णरूपसे तर्पण करेंगे। उसके बाद ध्यानमें जो स्वरूप उद्दिष्ट हुआ है, सूर्यमण्डलस्थ उन श्रीकृष्णको कामगायत्री उच्चारण करते हुए अर्घ्य प्रदान करेंगे।”] 'गुरुसेवा'– “प्रथमन्तु गुरुं पूज्य ततश्चैव ममार्च्चनम्। कुर्वन् सिद्धिमवाप्नोति ह्यन्यथा निष्फलं भवेत्॥ गुरौ सन्निहिते यस्तु पूजयेदन्यमग्रतः। स दुर्गतिमवाप्नोति पूजनं तस्य निष्फलम्॥ नाहमिज्याप्रजातिभ्यां तपसोपशमेन च। तुष्येयं सर्वभूतात्मा गुरुशुश्रूषया यथा॥ गुरुशुश्रूषणं नाम सर्वधर्मोत्तमोत्तमम्। तस्माद्धर्मात् परो धर्मः पवित्रं नैव विद्यते॥” [अर्थात् “सर्वप्रथम गुरुदेवकी पूजा करके उसके बाद मेरी पूजा करनेसे सिद्धिकी प्राप्ति होती है, अन्यथा वह निष्फल होती है। श्रीगुरुदेव निकटमें रहनेपर जो व्यक्ति उनके आगे किसी अन्यकी पूजा करता है, उसकी दुर्गति होती है और उसकी पूजा भी निष्फल हो जाती है। सर्वभूतात्मा मैं गुरुसेवाके द्वारा जिस प्रकार सन्तुष्ट होता हूँ,–इज्या, प्रजाति, तपस्या और उपशमके द्वारा भी तथा गृहस्थ, वानप्रस्थ, ब्रह्मचर्य और संन्यास धर्मके द्वारा भी वैसा सन्तुष्ट नहीं होता। गुरुसेवा ही सबसे श्रेष्ठ उत्तम धर्म है, इस धर्मसे उत्तम अथवा पवित्र धर्म और कोई नहीं है।”] 'ऊर्ध्वपुण्ड्र “मद्भक्तो धारयेन्नित्यमूर्ध्वपुण्ड्र मनुष्याणामूर्ध्वपुण्ड्र भवेत्॥ वैष्णवानां ब्राह्मणानां ऊर्ध्वपुण्ड्रं नासादिकेशपर्यन्तमूर्ध्वपुण्ड्र तद्विद्याद्धरिमन्दिरम्॥ मध्ये विष्णुं विजानीयात् तस्मान्मध्यं न लेपयेत्॥ [अर्थात् “मेरे भक्त भयका नाश करनेवाले ऊर्ध्वपुण्ड्र नित्य धारण करेंगे। मनुष्यकी जो देह ऊर्ध्वपुण्ड्र होती है, वह श्मशानके समान होनेके कारण देखनेके योग्य नहीं है। वैष्णवों और ब्राह्मणोंके लिये ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना आवश्यक कर्त्तव्य है। नाकसे लेकर केश तक विस्तृत, अति सुन्दर और बीचमें रिक्त (खाली) ऊर्ध्वपुण्ड्र श्रीहरि अधिष्ठित रहते हैं, इसलिये उसके बीचमें लेपन नहीं करना चाहिये।”] मध्यलीला 20/202 संख्या देखें। 'चक्रादि (मुद्रा)-धारण'– “चक्रञ्च दक्षिणे बाहौ शङ्खं वामेऽपि दक्षिणे। गदां वामे गदाधस्तात् पुनश्चक्रञ्च धारयेत्॥ शङ्खोपरि तथा पद्मं पुनः पद्मञ्च दक्षिणे। खड्गं वक्षसि चापञ्च सशरं शीर्षि्ण धारयेत्॥ इति पश्चायुधान्यादौ धारयेद्वैष्णवो जनः। श्रीगोपीचन्दनेनैवं चक्रादीनि बुधोऽन्वहम्। धारयेच्छयनादौ तु तप्तानि किल तानि हि॥ शङ्खचक्रोर्ध्वपुण्ड्र राष्ट्र [अर्थात् “दायें हाथमें चक्र, बायीं और दाहिनी दोनों भुजाओंमें शङ्ख, बायीं भुजामें गदा और गदाके नीचे पुनः चक्र धारण करेंगे। शङ्खके ऊपर दोनों भुजाओंमें
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[ 24/327-328 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
पद्म, वक्षःस्थलमें खड्ग और मस्तकपर बाण सहित धनुषको धारण करेंगे। इन पाँच प्रकारके आयुधोंको वैष्णवगण सर्वप्रथम धारण करेंगे। पण्डित व्यक्ति प्रतिदिन गोपीचन्दनके द्वारा चिह्न समूहकी रचना करेंगे और शयनद्वादशी और उत्थान द्वादशीमें इन सब मुद्राओंको तप्त करके धारण करेंगे। शङ्ख, चक्र और ऊर्ध्वपुण्ड्र रहित अधम ब्राह्मणको राजा गधेके ऊपर बिठाकर राज्यसे निकाल देंगे।"] ॥ 327 ॥ गोपीचन्दन-माला-धृति, तुलसी-आहरण। वस्त्र-पीठ-गृह-संस्कार, कृष्ण-प्रबोधन ॥ 328 ॥ अनुवाद-इसके बाद तुम गोपीचन्दन कैसे लगाया जाता है, माला-धारण, तुलसी-चयन, अपने वस्त्रोंकी, वेदीकी और अपने गृहकी सफाई, घण्टा बजाकर श्रीकृष्णका ध्यान आकर्षित करनेके विषयमें भी लिखना ॥ 328 ॥ अनुभाष्य- 'गोपीचन्दनधारण'- “यस्यान्तकाले खग गोपीचन्दनं बाह्वोर्ललाटे हृदि मस्तके च। प्रयाति लोकं कमलालयं प्रभोर्गोवालघाती यदि ब्रह्महा भवेत्॥” “दूताः शृणुत यद्भालं गोपीचन्दनलाञ्छितम्। ज्वलादिन्धनवत् सोऽपि त्याज्यो दूरे प्रयत्नतः॥” [अर्थात् “हे गरुड़! मरनेके समय जिसकी दोनों भुजाओंपर, ललाटपर, वक्षःस्थलपर और सिरपर गोपीचन्दन रहता है, वह गोघाती, शिशुघाती अथवा ब्रह्मघाती होनेपर भी लक्ष्मीके आलय श्रीविष्णुधाममें गमन करता है।”-(गरुड़पुराण) “हे यमदूतों! मेरे वचन सुनो, जिसका ललाट गोपीचन्दनसे अङ्कित हो, जलते हुए अङ्गारेकी भाँति यत्नपूर्वक उसे दूर ही रहना।”] 'मालाधारण'- “ततः कृष्णार्पिता माला धारयेत्तुलसीदलैः। पद्माक्षैस्तुलसीकाष्ठैः फलैर्धात्र्याश्च निर्मिताः। धारयेत्तुलसी-काष्ठ-भूषणानि च वैष्णवः ॥” पद्माक्ष-शब्दसे पद्म (कमल)के बीजोंकी माला कही गयी है। अक्ष-शब्दसे भ्रमवशतः कोई हड्डीकी माला अथवा 'रुदाक्ष'को न समझे। “धारयन्ति न ये मालां हैतुकाः पापबुद्धयः। नरकान्न निवर्त्तन्ते दग्धाः कोपाग्निना हरेः ॥” “ये कण्ठलग्नतुलसी- नलिनाक्षमाला ये वा ललाट-पटले लसदूर्ध्वपुण्ड्र बाहुमूल-परिचिह्नित-शङ्खचक्रास्ते वैष्णवा भुवनमाशु पवित्रयन्ति ॥” [अर्थात् “उसके बाद तुलसीपत्र, पद्मबीज (कमलके बीज), तुलसीकी लकड़ी और आँवलेके फलके द्वारा निर्मित माला श्रीकृष्णको अर्पित करके धारण करेंगे। वैष्णवगण तुलसीकी लकड़ीके भूषण धारण करेंगे। जो सब हेतुवाद-परायण पापमति मनुष्य माला धारण नहीं करते, वे हरिकी कोपाग्निसे दग्ध होते हैं और नरकसे लौटकर नहीं आते। जिनके गलेमें तुलसीमाला अथवा पद्मबीज माला है, ललाटपर ऊर्ध्वपुण्ड्र भुजाओंपर शङ्ख-चक्रादि चिह्न हैं, वे वैष्णवगण शीघ्र ही जगत्को पवित्र किया करते हैं।”] 'तुलसी-आहरण' (तुलसी-चयन)- “प्रणम्यथ महाविष्णुं प्रार्थ्यानुज्ञान्तु वैष्णवः। समाहरेत् श्रीतुलसीं पुष्पादिश्च तथोदितम् ॥ अस्नात्वा तुलसीं छित्वा यः पूजां कुरुते नरः। सोऽपराधी भवेत् सत्यं तत् सर्वं निष्फलं भवेत्॥” आहरण-मन्त्र-“तुलस्यामृत जन्मासि सदा त्वं केशवप्रिया। केशवार्थे विचिनोमि वरदा भव शोभने ॥” “इत्युक्तवा तुलसीं नत्वा छिन्द्यात् दक्षिणापाणिना। (चयन-निषेधकाल) न छिन्द्यात् तुलसीं विप्रा द्वादश्यां वैष्णवः क्वचित् ॥” [अर्थात् “इसके बाद वैष्णवजन महाविष्णुको प्रणाम करके उनकी आज्ञा लेकर श्रीतुलसी और प्रस्फुटित पुष्पादिका चयन करेंगे। जो मनुष्य स्नान नहीं करके तुलसी चयन करके पूजा करते हैं, वे अवश्य ही अपराधी होते हैं और उसका सब कुछ ही निष्फल होता है। चयन-मन्त्र-'हे सुन्दरी ! हे तुलसी ! अमृतसे आपका जन्म हुआ है, आप सदैव श्रीकेशवकी प्रिया हैं; श्रीकेशवकी पूजाके लिये मैं आपका चयन करता हूँ, आप वर प्रदान कीजिये।' इस प्रकार कहकर
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चौबीसवाँ अध्याय 24/328-329 ]
तुलसीको प्रणाम करके दायें हाथसे चयन करना चाहिये। हे ब्राह्मण ! वैष्णव कभी भी द्वादशीमें तुलसी नहीं तोड़ते।"] ‘वस्त्र-संस्कार’— “तान्तवं मलिनं पूर्वमद्भिः क्षारैश्च शोधयेत्। अंशुभिः शोषयित्वा वा वायुना वा समाहरेत्। ऊर्णपट्टांशुकक्षौमदुकूलाविकचर्मणाम्॥ अल्पाशौचे भवेच्छुद्धिः शोषणप्रोक्षणादिभिः॥ कुसुमभकुङ्कुमारक्तास्तथा लाक्षारसेन च। प्रक्षालनेन शुध्यन्ति चण्डालस्पर्शने तथा॥” [अर्थात् “कपासके रेशेसे निर्मित वस्त्रादि जो मैले हो गये हैं, सर्वप्रथम क्षार और जलके द्वारा उन वस्त्रोंको शुद्ध करेंगे, बादमें सूर्यकी किरणों अथवा वायुके द्वारा सुखाकर पहनेंगे। रोमसे बने वस्त्र, पट्टवस्त्र, रेशमी वस्त्र, भेड़के रोमसे बने वस्त्र और चमड़ा—इन सब द्रव्योंकी सामान्य शुद्धि करनेसे अर्थात् थोड़ा अशुद्ध होनेपर सुखाकर अथवा जल छिड़कनेसे शुद्ध हो जाते हैं। कुसुम्भ, कुङ्कुम और लाक्षारसके द्वारा रंगे वस्त्र चण्डालादिके द्वारा छुए जानेपर जलमें धोकर शुद्ध होते हैं।”] ‘पीठ-संस्कार’— “पादपीठञ्च कृष्णस्य बिल्वपत्रेण घर्षयेत्। उष्णाम्बुना च प्रक्षाल्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥’ [अर्थात् “बेलके पत्तेके द्वारा श्रीकृष्णकी पादपीठका मार्जन करेंगे। गर्म जलके द्वारा धोनेपर सब प्रकारके पापोंसे मुक्त हुआ जाता है।”] ‘गृह-संस्कार’— “मन्दिरं मार्जयेद्विष्णोर्विधाय्याचमनादिकम्। कृष्णं पश्यन् कीर्त्तयंश्च दास्येनात्मानमर्पयेत्॥ शुद्धं गोमयमादाय ततो मृत्स्नां जलं तथा। भक्त्या तत्परितो लिम्पेदभ्युक्षेच्च तदङ्गनम्॥” “स वै मनः कृष्ण-पदारविन्दयोर्वचांसि वैकुण्ठगुणानुवर्णने। करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु श्रुतिं चकाराच्युतसत्कथोदये॥” “सम्मार्जनाेपलेपाभ्यां सेकमण्डलवर्त्तनैः गृहशुश्रूषणं मह्यं दासद्यदमायया॥” [अर्थात् “आचमनादि करके विष्णुके मन्दिरको साफ करना चाहिये। बादमें श्रीकृष्णके दर्शन और श्रीनाम कीर्तन करते-करते दास्य भावसे आत्मसमर्पण करेंगे। उसके बाद शुद्ध गोबर, मिट्टी और जल लेकर भक्तिपूर्वक मन्दिरके चारों ओर तथा उसके आँगनमें लेपन और अभ्युक्षण अर्थात् गोबरसे मिले जलके छींटे देंगे। (भाः 9/4/18)—राजर्षि अम्बरीषने श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें मनको, वैकुण्ठगुणोंके वर्णनमें वचनोंको, हरिमन्दिरके मार्जनमें दोनों हाथोंको, भगवान्की कथाके श्रवणमें कानोंको लगाया था। (भाः 11/11/39)—अच्छेसे सफाई करना, गोबरके द्वारा लेपन, जलका छिड़काव और सब प्रकारसे सजावटादिके द्वारा सेवककी भाँति निष्कपट होकर मेरे घरकी सेवा करना।”] ‘कृष्णप्रबोधन’ (श्रीकृष्णके ध्यानको आकर्षित करना)— “ततो देवालये गत्वा घण्टाद्युद्घोषपूर्वकम्। प्रबोध्य स्तुतिभिः कृष्णं नीराज्य प्रार्थयेदिदम्॥”—“देव प्रपन्नार्तिहर प्रसादं कुरु केशव। अवलोकनदानेन भूयो मां पालयाच्युत॥” इति [अर्थात् “इसके बाद देवालयमें जाकर घण्टादि बजाकर जगानेके लिये उपयोगी स्तुतिके द्वारा श्रीकृष्णको जगाकर अर्चन करते हुए इस प्रकार प्रार्थना करेंगे,—हे देव ! शरणागतजनोंके दुःखोंका नाश करनेवाले ! हे केशव ! मेरे प्रति कृपा प्रकाशित कीजिये, हे अच्युत ! पुनः दर्शनके द्वारा मुझे पवित्र कीजिये।”] ॥ 328 ॥
पञ्च, षोड़श, पञ्चाशत उपचारे अर्चन। पञ्चकाल पूजारति, कृष्णेर भोजन-शयन॥ 329 ॥
अनुवाद—ग्रन्थमें पाँच, सोलह और पचास उपचारोंसे अर्चनकी विधि, पाँच कालोंमें पूजा, आरती और अर्चनादि, श्रीकृष्णको भोजन-अर्पण तथा उनके शयनके विषयमें लिखना॥ 329 ॥
अनुभाष्य—पाठान्तरमें— “पञ्च, दश, षोड़श, सपर्य्या चौघन। चौषष्टि षोड़श दश पञ्चोपचारे अर्चन॥” ‘पञ्चोपचार’—1) गन्ध, 2) पुष्प, 3) धूप, 4) दीप और 5) नैवेद्य।
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'षोड़शोपचार'-1) आसन, 2) स्वागत (कुशलप्रश्न), 3) अर्घ्य, 4) पाद्य, 5) आचमनीय, 6) मधुपर्क, 7) आचमन, 8) स्नान, 9) वस्त्र, 10) अलङ्कार 11) सुगन्ध, 12) सुपुष्प, 13) धूप, 14) दीप, 15) नैवेद्य और 16) वन्दना। 'पञ्चशोपचार'-हरिभक्तिविलासमें पचास उपचारकी बात नहीं है, तो भी चौंसठ उपचारोंमेंसे चौदह छोड़ देनेसे पचास उपचार हो सकते हैं। कौनसे चौदह छोड़ने होंगे, उसका निरूपण करनेका उपाय नहीं है। 'दशोपचार'-1) अर्घ्य, 2) पाद्य, 3) आचमन, 4) मधुपर्क 5) आचमन, 6) गन्ध, 7) पुष्प, 8) धूप, 9) दीप, 10) नैवेद्य। 'चतुःषष्टि उपचार'-'चौघन'का अर्थ चौंसठ होता है। (हःभःविः 11/127-140)- 1) वाद्य-स्तबके द्वारा जगाना, 2) जय-शब्दका उच्चारण, 3) नमस्कार, 4) मङ्गळारात्रिक, 5) आसन, 6) दन्तकाष्ठ, 7) पाद्य, 8) अर्घ्य, 9) आचमन, 10) मधुपर्क सहित आचमन, 11) पादुका-समर्पण, 12) अङ्गमार्जन, 13) तैलाभ्यञ्जन, 14) तैलाद्यपसारण, 15) सुगन्धि-पुष्पजलमें स्नान, 16) दुग्धस्नान, 17) दधिस्नान, 18) घृतस्नान, 19) मधुस्नान, 20) शर्करास्नान, 21) मन्त्रजलसे स्नान, 22) गमछा, 23) वस्त्र और ओढ़नी, 24) यज्ञसूत्र, 25) पुनराचमन, 26) अनुलेपन, 27) अलङ्कार, 28) पुष्प, 29) धूप, 30) दीप, 31) दुष्टदृष्टिनिवारण, 32) नैवेद्य, 33) मुखवास, 34) ताम्बूल, 35) उत्तम शय्या, 36) केश-प्रसाधन, 37) उत्तम वस्त्र, 38) उत्तम मुकुट, 39) उत्तम गन्धलेपन, 40) कौस्तुभादि भूषण, 41) विचित्रदिव्यपुष्प, 42) मङ्गळारात्रिक, 43) दर्पण, 44) उत्तमयानमें मण्डप-यात्रा, 45) सिंहासनपर बैठाना, 46) पुनः वाद्य, 47) पुनः नैवेद्य अर्पण, 48) महा-आरती, 49) चामरव्यजन-छत्र, 50) गीत, 51) वाद्य, 52) नृत्य, 53) प्रदक्षिण, 54) प्रणाम, 55) श्रीचरण-युगलमें स्तुति, 56) चरणमें मस्तक रखना, 57) सिरपर निर्माल्य-धारण, 58) उच्छिष्ट-भक्षण, 59) पाद सम्वाहन हेतु बैठाना, 60) पुष्प-शय्या, 61) हस्तप्रदान, 62) शय्यामें आगमन, 63) पदप्रक्षालन कराके शय्यापर बैठाना, 64) सबसे अन्तमें पलङ्गपर शयन और पाद-सम्वाहनादि। 'पञ्चकाल'-अरुणोदय, प्रातः, मध्याह, सायाह्न, प्रदोष। 'पूजारति'-पूजा और आरती तथा अर्चनादि। 'कृष्णोर भोजन'-(हःभःविः 8म विः 50-51)- मङ्गुलव्यवहारेण भोजयन्ति हरिं मुदा।" xx “शालीभक्तं सुभक्तं शिशिर-करसितं पायसं पूपसूपम्। लेह्यं पेयं सुचूष्यं सितममृतफलं घारिकाह्यं सुखाद्यम्। आज्यं प्राज्यं समिज्यं नयनरुचिकरं वाजिकैलामरीचस्वादीयः शाकराजी परिकरममृताहारजोषं जुषस्व॥" [अर्थात् “भगवद्भक्त सभ्य व्यवहारके द्वारा श्रीहरिको आनन्दपूर्वक भोजन कराते हैं, हे भगवन्! शालि-धानका अन्न, चन्द्रके समान श्वेतवन अन्न, खीर, मालपूआ, रसेवाली सब्जी, दाल, लेह्य (चाटनेवाले), पेय (पीनेवाले), चूष्य (चूसनेवाले) और शुद्ध अमृतस्वरूप फल, घीमें बनी मिठाईयाँ आदि उत्कृष्ट खानेकी वस्तुएँ, घी, नेत्रोंको प्रिय लगनेवाले घी-इलाइची-काली मिर्च आदिसे सजाये अति स्वादिष्ट घीसे बने व्यञ्जन और सागादि-इन सब अमृततुल्य वस्तुओंका आस्वादन करके सुख भोग कीजिये।"] 'कृष्णोर शयन'-(हःभःविः 11 विः)- “बलीयसा पदा स्वामिन् पदवीमवधारय। आगच्छ शयनस्थानं प्रियाभिः सह केशव॥ एवं प्रार्थ्य समर्प्यास्मै पादुके शयनालयम्। आनीय देवं तत्रत्यानुपचारान् प्रकल्पयेत्॥ विशेषतोऽर्पयेत्तत्र घनं दुग्धं सशर्करम्। ताम्बूलञ्च सकर्पूरं दिव्यमाल्यानुलेपनम्॥” [अर्थात् “हे स्वामिन् ! बलशाली चरणोंके द्वारा पादुका धारण कीजिये। हे केशव ! सब प्रियाओंके साथ आप शयन स्थानपर आगमन कीजिये। इस प्रकार प्रार्थना करते हुए पादुका समर्पण करके श्रीकृष्णको शयन-स्थानपर लाकर शयनके उपयोगी उपचारोंकी रचना करनी होगी। विशेषतः शयनके स्थानपर मीठा
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चौबीसवाँ अध्याय 24/329-333 ] घना दूध, कर्पूरयुक्त ताम्बूल, दिव्यमाला और अनुलेपन अर्पण करना चाहिये।"] ॥ 329 ॥ श्रीमूर्त्तिलक्षण, आर शालग्रामलक्षण। कृष्णक्षेत्र-यात्रा, कृष्णमूर्त्ति-दरशन ॥ 330 ॥ अनुवाद—श्रीमूर्तिलक्षण, शालग्रामलक्षण, श्रीकृष्णक्षेत्र- यात्रा, श्रीकृष्णमूर्ति-दर्शनका भी वर्णन करना ॥ 330 ॥ अनुभाष्य—'श्रीमूर्त्तिलक्षण'—मध्यलीला 20/224-238 संख्या देखें। 'शालग्रामलक्षण'—हःभःविः 5वाँ विभाग देखें॥ 330 ॥ नाममहिमा, नामापराध दूरे वर्जन। वैष्णवलक्षण, सेवापराध-खण्डन ॥ 331 ॥ शङ्ख-जल-गन्ध-पुष्प-धूपादि-लक्षण। जप, स्तुति, परिक्रमा, दण्डवत्, वन्दन ॥ 332 ॥ पुरश्चरण-विधि, कृष्णप्रसाद-भोजन। अनिवेदित-त्याग, वैष्णवनिन्दादि-वर्जन ॥ 333 ॥ अनुवाद—नामकी महिमा, नामापराधका दूरसे त्याग, वैष्णव-लक्षण, सेवापराध-खण्डन, शङ्ख-जल-गन्ध-पुष्प- धूपादि-लक्षण, जप, स्तुति, परिक्रमा, दण्डवत्, वन्दन, पुरश्चरण-विधि, कृष्णप्रसादका ही भोजन करना, अनिवेदित वस्तुओंका त्याग, वैष्णवनिन्दादिका वर्जन—इनके बारेमें लिखना ॥ 331-333 ॥ अनुभाष्य—'नाम महिमा'—हःभःविः 11वाँ विभाग देखें। 'नामापराध'—आदिलीला 8/24 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य देखें। 'वैष्णव-लक्षण'— “विष्णुरेव हि यस्यैष देवता वैष्णवः स्मृतः।” [अर्थात् “विष्णु ही जिनके अभीष्ट देवता हैं, वे वैष्णव कहे जाते हैं।”] हःभःविः 10वाँ विः देखें। 'सेवापराध-खण्डन'—स्कन्दपुराणमें अवन्तीखण्डमें श्रीव्यासवाक्य— “अहन्यहनि यो मर्त्यो गीताध्यायं पठेत्तु वै। द्वात्रिंशदपराधांस्तु क्षमते तस्य केशवः॥” द्वारकामाहात्म्ये,—“सहस्रनाममाहात्म्यं यः पठेत् शृणुयादपि। अपराधसहस्राणि न स लिप्येत कदाचन ॥ द्वादश्यां जागरे विष्णोर्यः पठेत्तुलसीस्तवम्। द्वात्रिंशदपराधान् हि क्षमते तस्य केशवः। तुलस्या कुरुते यस्तु शालग्राम-शिलार्चनम्। द्वात्रिंशदपराधांश्च क्षमते तस्य केशवः॥ [अर्थात् “जो मनुष्य प्रतिदिन गीताके अध्यायोंका अध्ययन करता है, वह प्रतिदिन बत्तीस प्रकारके अपराधोंसे मुक्त हो जाता है। जो विष्णुसहस्त्र नामकी महिमाका पाठ करता है, अथवा श्रवण ही करता है, वह कभी भी सहस्र अपराधोंमें लिप्त नहीं होता। जो द्वादशीमें जागरण करके तुलसीके स्तवका पाठ करता है, श्रीकेशव उनके बत्तीस प्रकारके अपराधोंको दूर कर देते हैं। जो तुलसीके द्वारा शालग्राम-शिलाकी पूजा करते हैं, श्रीकेशव उनके बत्तीस प्रकारके अपराध क्षमा करते हैं।”] बत्तीस सेवापराध—(1) यान अथवा पादुका पहनकर भगवान्के मन्दिरमें जाना, (2) भगवान्के सामने आकर भी उन्हें प्रणाम नहीं करना, (3) उच्छिष्ट अथवा अपवित्र अवस्थामें भगवान्की वन्दना, (4) एक हाथके द्वारा प्रणाम करना, (5) भगवान्के सामने अन्यदेवताकी परिक्रमा, (6) भगवान्के सामने पैर फैलाना, (7) दोनों जंघाओंको हाथके द्वारा घेरकर बैठना, (8) शयन करना, (9) भोजन करना, (10) मिथ्या-बोलना, (11) ऊँचा बोलना, (12) आपसमें बातें करना, (13) क्रन्दन, (14) दूसरे व्यक्तिपर कृपा, (15) कठोर वचनोंका प्रयोग, (16) कम्बल ओढ़ना, (17) दूसरोंकी निन्दा करना, (18) दूसरोंकी प्रशंसा करना, (19) अश्लील बातें करना, (20) अधोवायु छोड़ना, (21) सामर्थ्य रहनेपर भी उपचारके बिना पूजा करना, (22) अनिवेदित वस्तुको खाना, (23) मौसमके फलोंको अर्पण न करना, (24) अवशिष्ट (बचे हुए) अंशका । 471
[ 24/331-339 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला निवेदन, (25) देवताको पीठ दिखाकर बैठना, (26) दूसरेका अभिवादन, (27) गुरुके आनेपर उनका स्तव नहीं करके बैठे रहना, (28) आत्म-प्रशंसा, (29) देवनिन्दा, (30) अन्य व्यक्तिके प्रति निर्दयता, (31) उत्सव नहीं मनाना, (32) कलह करना। 'पुष्प-लक्षण'—हःभःविः सातवाँ विभाग देखें। 'धूपादि लक्षण'—हःभःविः आठवाँ विभाग देखें। 'जप, स्तुति, परिक्रमा, दण्डवत् और वन्दना'—हःभःविः आठवाँ विभाग देखें। 'पुरश्चरण-विधि'—मध्यलीला 15/108 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'कृष्णप्रसाद भोजन'— “संभोज्य भोजनं कुर्यादन्यथा नरकं व्रजेत्। अपूज्य भोजनं कुर्वन् नरकाणि व्रजेन्नरः ॥” [अर्थात् “श्रीहरिको भोजन कराके स्वयं भोजन करना, अन्यथा नरकमें जाना पड़ेगा। श्रीहरिकी पूजा नहीं करके भोजन करनेसे मनुष्यको नरकोंकी प्राप्ति होती है।”] 'अनिवेदित-त्याग'— “अनिवेद्य तु भुञ्जानः प्रायश्चित्ती भवेन्नरः। तस्मात् सर्वं निवेद्यैव विष्णोर्भुञ्जीत सर्वदा॥” [अर्थात् “अनिवेदित द्रव्य उपभोग करनेसे मनुष्यको प्रायश्चित करना पड़ता है, इसलिये सदैव सभी द्रव्य श्रीविष्णुको निवेदन करके भोजन करना चाहिये।”] हःभःविः 9म विः 108 संख्या देखें। 'वैष्णवनिन्दा-वर्जन'— मध्यलीला 15/261 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 331-333 ॥ साधुलक्षण, साधुसङ्ग, साधुसेवन। असत्सङ्ग-त्याग, श्रीभागवत-श्रवण ॥ 334 ॥ अनुवाद—अर्थ स्पष्ट है ॥ 334 ॥ दिनकृत्य, पक्षकृत्य, एकादश्यादि-विवरण। मासकृत्य, जन्माष्टमीयादि-विधि-विचारण ॥ 335 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 335 ॥ अनुभाष्य—'दिनकृत्य'—दिवसके कालोचित कृत्यसमूह। 'पक्षकृत्य'—तिथिमें, विशेषतः एकादशी आदिमें अनुष्ठान योग्य कृत्यसमूह। 'मासकृत्य'—बारह महीनोंके कृत्यसमूह। 'एकादशी आदिका विवरण'—हःभःविः 12वाँ विः देखें। 'जन्माष्टमी-आदि-विधि-विचारण'—हःभःविः 12वाँ विः देखें ॥ 335 ॥ एकादशी, जन्माष्टमी, वामनद्वादशी। श्रीरामनवमी, आर नृसिंहचतुर्दशी ॥ 336 ॥ एइ सबे बिद्धा-त्याग, अबिद्धा-करण। अकरणे दोष, कैले भक्तिर लभन ॥ 337 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 336-337 ॥ अनुभाष्य—एकादशीमें अरुणोदय-बिद्धा त्याग और अन्य (जन्माष्टमी, वामनद्वादशी, श्रीरामनवमी और नृसिंहचतुर्दशी) व्रतोंमें सूर्योदय-बिद्धा त्याग करके अबिद्ध (शुद्ध) व्रत ही पालनीय है। बिद्ध-व्रतका पालन करनेसे 'दोष' और अबिद्ध व्रत-पालनसे ही 'भक्ति' होती है। विशेष रूपसे जाननेके लिये हःभःविः 12वाँ और 13वाँ विः देखें ॥ 337 ॥ महाप्रभुके द्वारा सात्वत पुराणको 'प्रमाण' कहकर स्वीकार करना :- सर्वत्र प्रमाण दिबे पुराण-वचन। श्रीमूर्त्ति-विष्णुमन्दिरकरण-लक्षण ॥ 338 ॥ अनुवाद—सर्वत्र पुराणके वचनोंके द्वारा प्रमाण प्रस्तुत करना। श्रीमूर्त्ति और विष्णुमन्दिर बनानेके लक्षण बतलाना ॥ 338 ॥ हरिभक्तिविलासमें सामान्य और वैष्णव सदाचारके वर्णनकी आज्ञा :- 'सामान्य' सदाचार, आर 'वैष्णव'-आचार। कर्त्तव्याकर्त्तव्य 'स्मार्त्त' व्यवहार ॥ 339 ॥ अनुवाद—उस ग्रन्थमें 'सामान्य' सदाचार और 472 |
चौबीसवाँ अध्याय 24/339-344 ] 'वैष्णव'-आचारके विषयमें बतलाना। कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य आदि 'स्मार्त्त' व्यवहारके विषयमें भी लिखना ॥ 339 ॥ श्रीसनातनको आशीर्वाद :- एइ त' संक्षेपे कहिलुँ दिग्दर्शन। यबे तुमि लिखिबा, कृष्ण कराबे स्फुरण ॥ "340 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने संक्षेपमें वैष्णव-स्मृतिकी विषय-वस्तुका दिग्दर्शन कराया है। जब तुम इसे लिखोगे, तब श्रीकृष्ण तुम्हें सब कुछ स्फुरित करायेंगे ॥ "340 ॥ महाप्रभुके मुखसे श्रीसनातन-शिक्षा अथवा श्रीसनातनके प्रति महाप्रभुके कृपा-प्रसादके श्रवणसे अनर्थ-निवृत्ति और आत्म-प्रसादका उदय :- एइ त' कहिलु प्रभुर सनातने प्रसाद। याहार श्रवणे चित्तेर खण्डे अवसाद ॥ 341 ॥ अनुवाद—(ग्रन्थकार कह रहे हैं) इस प्रकार मैंने श्रीसनातन गोस्वामीके ऊपर महाप्रभुकी कृपाका वर्णन किया है। इसके श्रवणसे चित्तके समस्त अनर्थ दूर हो जाते हैं ॥ 341 ॥ चैतन्यचन्द्रोदय-नाटकमें वर्णित :- निज-ग्रन्थे कर्णपूर विस्तार करिया। सनातने प्रभुर प्रसाद राखियाछे लिखिया ॥ 342 ॥ अनुवाद—श्रीकविकर्णपूरने स्वरचित श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकमें श्रीसनातन गोस्वामीके ऊपर महाप्रभुकी कृपाके विषयमें विस्तारपूर्वक लिखा है ॥ 342 ॥ उपमाके द्वारा श्रीसनातनकी महिमाका वर्णन :- श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (9/34-35)-श्लोकमें प्रतापरुद्रके प्रति वार्त्ताहारि-वाक्य— गौड़ेन्द्रस्य सभा-विभूषणमणिस्त्यक्त्वा य ऋद्धां श्रियं रूपस्याग्रज एष एव तरुणीं वैराग्यलक्ष्मीं दधे। अन्तर्भक्तिरसेन पूर्णसरसो बाह्येऽवधूताकृतिः शैवालैः पिहितं महा-सर इव प्रीतिप्रदस्तद्विदाम् ॥ 343 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 343 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गौड़के राजा हुसेनशाह बादशाहकी सभामें विभूषणमणिस্বরূপ श्रीरूप गोस्वामीके बड़े भाई इन श्रीसनातनने समृद्ध-राजश्रीका परित्याग करके नवीनवैराग्य-लक्ष्मीको धारण किया था। अन्तःकरणमें भक्तिरससे पूर्णरस, बाहरमें अवधूतका रूप, काईके द्वारा आच्छादित महासरोवरकी भाँति वे श्रीसनातन भक्तितत्त्वके पण्डितोंको प्रीति प्रदान करनेवाले थे ॥ 343 ॥ अनुभाष्य— गौड़ेन्द्रस्य (गोड़ेश्वरस्य) सभाविभूषणमणिः (सभायां विभूषणे अलङ्करणे मणिः इव) यः ऋद्धां (समृद्धां) श्रियं (राजसम्पदं) त्यक्त्वा (परित्यज्य) तरुणीं (नवीनां) वैराग्यलक्ष्मीं (वैराग्यसम्पत्तिं) दधे (आश्रितवान्); शैवालैः पिहितम् (आच्छादितं) महासरः (गभीर-सरोवरम्) इव अन्तः (हृदये) भक्तिरसेन (कृष्ण-प्रेमरसेन) पूर्णसरसः (रसितः) बाह्ये (बहिः) अवधूताकृतिः (अवधूतस्य परमहंसस्य इव आकृतिः यस्य सः) रूपस्य अग्रजः सः एषः (सनातनः) एव तद्विदां (भक्तितत्त्वाभिज्ञानां तत्त्वकोविदानां विदुषां देशिकानां) प्रीतिप्रदः (प्रेमभाक्) अभूत्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 343 ॥ तं सनातनमुपागतमक्ष्णोर्दृष्टि- मात्रमतिमात्रदयार्द्रः। आलिलिङ्ग परिधायत-दोर्भ्यां सानुकम्पमथ चम्पकगौरः॥ 344 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 344 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसनातनके आनेपर, उन्हें देखते-ही चम्पकवर्ण श्रीगौरसुन्दरने अत्यन्त दयासे आर्द्र होकर दोनों हाथ फैलाकर कृपा प्रकाश करते हुए उनका आलिङ्गन किया ॥ 344 ॥ चौबीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य— अतिमात्रदयार्द्रः (निरतिशयया दयया आर्द्रः) चम्पकगौरः (चम्पक-कुसुमवत् पीतवर्णः) अक्ष्णोः (नयनयोः) दृष्टिमात्रं (दर्शनमात्रेण) उपागतं (हीनवेशेन समायातं) तं सनातनं । 473
[ 24/344-350 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला परिघायतदोर्भ्यां (परिघाय्याम् इव आयताभ्यां दीर्घाभ्यां दोर्भ्यां भुजाभ्यां) सानुकम्पम् (अनुकम्पा यथा स्यात्तथा कृपयेत्यर्थः) आलिलिङ्ग। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 344 ॥ श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (9/38)में- कालेन वृन्दावनकेलि-वार्त्ता लुप्तेति तां ख्यापयितुं विशिष्य। कृपामृतेनाभिषिषेच देवस्तत्रैव रूपञ्च सनातनञ्च ॥ 345 ॥ अनुवाद-कालके प्रभावसे वृन्दावनकी रसक्रीड़ाओंकी कथा लुप्त हो गयी थी, उन कथाओंका विशेषरूपसे विस्तार करनेके लिये श्रीगौराङ्गदेवने कृपारूपी अमृतके द्वारा वहाँपर श्रीरूप एवं श्रीसनातनको अभिषिक्त किया था॥ 345 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 19/119 संख्या देखें॥ 345 ॥ चौबीसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। श्रीसनातन-शिक्षाके अनुशीलनके फलस्वरूप अनर्थसे मुक्ति और सम्बन्ध-ज्ञान, अभिधेय एवं प्रयोजनकी प्राप्ति :- एइ त' कहिलुँ सनातने प्रभुर प्रसाद। याहार श्रवणे चित्तेर खण्डे अवसाद ॥ 346 ॥ कृष्णेर स्वरूपगणेर सकल हय 'ज्ञान'। विधि-राग-मार्गे 'साधनभक्ति'र विधान ॥ 347 ॥ 'कृष्णप्रेम', 'भक्तिरस', 'भक्तिर सिद्धान्त'। इहार श्रवणे भक्त जानेन सब अन्त ॥ 348 ॥ अनुवाद-(ग्रन्थकार श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी कह रहे हैं)-इस प्रकार मैंने महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातन गोस्वामीके ऊपर की गयी कृपाका वर्णन किया है, जिसके श्रवणसे चित्तके समस्त अनर्थ दूर हो जाते हैं। इसके श्रवणसे श्रीकृष्णके समस्त स्वरूपोंका ज्ञान होता है एवं वैधी और रागमार्गकी साधनभक्तिकी विधिका ज्ञान होता है। इसके श्रवणसे भक्त 'श्रीकृष्णप्रेम', 'भक्तिरस' और 'भक्तिके सिद्धान्तों' आदिको पूर्णरूपसे जान जाता है॥ 346-348 ॥ श्रीनिताइ-गौर-अद्वैतके ऐकान्तिक भक्तोंमें ही श्रीकृष्णप्रेमधनको प्राप्त करनेकी योग्यता :- श्रीचैतन्य-नित्यानन्द-अद्वैत-चरण। याँर प्राणधन, सेइ-पाय सेइ धन ॥ 349 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्य प्रभुके श्रीचरण ही जिसके प्राणधन हैं, वही इस धनको (उपरोक्त वर्णित ज्ञानको) प्राप्त कर सकता है॥ 349 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 350 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे आत्मारामश्चेति-श्लोक- व्याख्यायां सनातनानुग्रहो नाम चतुर्विंशः परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 350 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें आत्मारामश्चेति-श्लोककी व्याख्या और श्रीसनातनपर अनुग्रह नामक चौबीसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। 474 ।
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श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 476 ।
पचीसवाँ अध्याय कथासार—महाराष्ट्र महाप्रभुका यश सुननेसे उन्हें आनन्द मिलता था। एक दिन उन्होंने संन्यासियों और महाप्रभुको निमन्त्रण देकर एकत्रित करके संन्यासियोंको महाप्रभुका कृपापात्र बनाया था, यह आदिलीलाके सातवें अध्यायमें लिखा है। उस दिनसे वाराणसीपुरमें महाप्रभुका माहात्म्य प्रचारित हुआ। वहाँके नगरवासी बहुतसे व्यक्ति महाप्रभुके अनुगत हुए। प्रकाशानन्द सरस्वतीका कोई शिष्य भी महाप्रभुका अनुगत था। जब उसने मायावादकी निन्दा और महाप्रभुके द्वारा उपदिष्ट शुद्धभक्तिवादके माहात्म्यका वर्णन किया, तब प्रकाशानन्द-स्वामीने अनेक युक्तियोंके द्वारा उसके पक्षका समर्थन किया। पञ्चनदीमें स्नान करनेके बाद महाप्रभुने जब भक्तोंके साथ बिन्दुमाधवके मन्दिरमें कीर्तन आरम्भ किया था, तब शिष्यों सहित प्रकाशानन्द भी वहाँ आ गये। प्रकाशानन्दने महाप्रभुके चरणोंमें गिरकर उन्हें पकड़कर अपने पूर्व कार्योंको धिक्कारा और वेदान्त-सङ्गत भक्तितत्त्वके विषयमें जिज्ञासा की। महाप्रभुने उन्हें ब्रह्म-सम्प्रदायमें सिद्ध अपूर्व भक्तिवाद सिखलाकर श्रीमद्भागवत ही ब्रह्मसूत्रका भाष्य है, उसे दिखला दिया और चतुःश्लोकीकी व्याख्यामें सारे तत्त्व बतलाये। उस दिनसे वे मायावादी संन्यासी 'भक्त' बन गये। महाप्रभुने श्रीसनातनको उपदेश देकर और उन्हें वृन्दावन जानेकी आज्ञा देकर पुरुषोत्तमकी यात्रा की। उसके बाद श्रीकविराज-गोस्वामीने श्रीरूप, श्रीसनातन और श्रीसुबुद्धि-रायका इतिहास कुछ-कुछ वर्णन किया है। झारिखण्डसे होकर महाप्रभु बलभद्रके साथ यात्रा करके श्रीपुरुषोत्तममें पहुँचे। इस अध्यायके अन्तिम भागमें मध्यलीलाके प्रत्येक अध्यायके विषयोंको बतलाकर श्रीकविराज-गोस्वामीने सभी जीवोंको इस श्रीचैतन्यचरितामृतका पाठ करने (पढ़ने) का उपदेश दिया है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीकृष्ण-विमुख मायावादियोंको श्रीकृष्णोन्मुख बनानेवाले श्रीगौरसुन्दर :— वैष्णवीकृत्य संन्यासिमुखान् काशीनिवासिनः। सनातनं सुसंस्कृत्य प्रभुर्नीलाद्रिमागमत् ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—संन्यासी आदि काशीवासियोंको 'वैष्णव' बनाकर और श्रीसनातनका उत्तमरूपसे संस्कार करके (सुवैष्णव-वेश देकर) महाप्रभुने नीलाद्रिमें आगमन किया ॥ 1 ॥ अनुभाष्य— प्रभुः (श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्रः) काशीनिवासिनः (वाराणसी- वास्तव्यान्) संन्यासिमुखान् (तुर्याश्रमि-प्रमुखान् प्रकाशानन्दादीन्) वैष्णवीकृत्य (शुद्धभक्तिमार्गे समानीय) सनातनं सुसंस्कृत्य (सुवैष्णववेशं दत्वा च) नीलाद्रिं (श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्रम्) आगतत्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो ॥ 2 ॥ श्रीसनातनको काशीमें दो मास तक शिक्षा-प्रदान :— एइ मत महाप्रभु दुइ मास पर्यन्त। शिखाइला ताँरे भक्तिसिद्धान्तेर अन्त ॥ 3 ॥ । 477