श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1923, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपचीसवाँ अध्याय कथासार—महाराष्ट्र महाप्रभुका यश सुननेसे उन्हें आनन्द मिलता था। एक दिन उन्होंने संन्यासियों और महाप्रभुको निमन्त्रण देकर एकत्रित करके संन्यासियोंको महाप्रभुका कृपापात्र बनाया था, यह आदिलीलाके सातवें अध्यायमें लिखा है। उस दिनसे वाराणसीपुरमें महाप्रभुका माहात्म्य प्रचारित हुआ। वहाँके नगरवासी बहुतसे व्यक्ति महाप्रभुके अनुगत हुए। प्रकाशानन्द सरस्वतीका कोई शिष्य भी महाप्रभुका अनुगत था। जब उसने मायावादकी निन्दा और महाप्रभुके द्वारा उपदिष्ट शुद्धभक्तिवादके माहात्म्यका वर्णन किया, तब प्रकाशानन्द-स्वामीने अनेक युक्तियोंके द्वारा उसके पक्षका समर्थन किया। पञ्चनदीमें स्नान करनेके बाद महाप्रभुने जब भक्तोंके साथ बिन्दुमाधवके मन्दिरमें कीर्तन आरम्भ किया था, तब शिष्यों सहित प्रकाशानन्द भी वहाँ आ गये। प्रकाशानन्दने महाप्रभुके चरणोंमें गिरकर उन्हें पकड़कर अपने पूर्व कार्योंको धिक्कारा और वेदान्त-सङ्गत भक्तितत्त्वके विषयमें जिज्ञासा की। महाप्रभुने उन्हें ब्रह्म-सम्प्रदायमें सिद्ध अपूर्व भक्तिवाद सिखलाकर श्रीमद्भागवत ही ब्रह्मसूत्रका भाष्य है, उसे दिखला दिया और चतुःश्लोकीकी व्याख्यामें सारे तत्त्व बतलाये। उस दिनसे वे मायावादी संन्यासी 'भक्त' बन गये। महाप्रभुने श्रीसनातनको उपदेश देकर और उन्हें वृन्दावन जानेकी आज्ञा देकर पुरुषोत्तमकी यात्रा की। उसके बाद श्रीकविराज-गोस्वामीने श्रीरूप, श्रीसनातन और श्रीसुबुद्धि-रायका इतिहास कुछ-कुछ वर्णन किया है। झारिखण्डसे होकर महाप्रभु बलभद्रके साथ यात्रा करके श्रीपुरुषोत्तममें पहुँचे। इस अध्यायके अन्तिम भागमें मध्यलीलाके प्रत्येक अध्यायके विषयोंको बतलाकर श्रीकविराज-गोस्वामीने सभी जीवोंको इस श्रीचैतन्यचरितामृतका पाठ करने (पढ़ने) का उपदेश दिया है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीकृष्ण-विमुख मायावादियोंको श्रीकृष्णोन्मुख बनानेवाले श्रीगौरसुन्दर :— वैष्णवीकृत्य संन्यासिमुखान् काशीनिवासिनः। सनातनं सुसंस्कृत्य प्रभुर्नीलाद्रिमागमत् ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—संन्यासी आदि काशीवासियोंको 'वैष्णव' बनाकर और श्रीसनातनका उत्तमरूपसे संस्कार करके (सुवैष्णव-वेश देकर) महाप्रभुने नीलाद्रिमें आगमन किया ॥ 1 ॥ अनुभाष्य— प्रभुः (श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्रः) काशीनिवासिनः (वाराणसी- वास्तव्यान्) संन्यासिमुखान् (तुर्याश्रमि-प्रमुखान् प्रकाशानन्दादीन्) वैष्णवीकृत्य (शुद्धभक्तिमार्गे समानीय) सनातनं सुसंस्कृत्य (सुवैष्णववेशं दत्वा च) नीलाद्रिं (श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्रम्) आगतत्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो ॥ 2 ॥ श्रीसनातनको काशीमें दो मास तक शिक्षा-प्रदान :— एइ मत महाप्रभु दुइ मास पर्यन्त। शिखाइला ताँरे भक्तिसिद्धान्तेर अन्त ॥ 3 ॥ । 477