श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1924, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 25/3-12 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीको दो मास तक भक्तिके सिद्धान्तोंकी अन्तिम सीमा तक शिक्षा प्रदान की॥ ३ ॥ परमानन्द कीर्तनीयाके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :— 'परमानन्द कीर्तनीया'—शेखरेर सङ्गी। प्रभुरे कीर्त्तन शुनाय, अति बड़ रङ्गी॥ 4 ॥ अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखरके एक साथी 'परमानन्द कीर्तनीया' थे। वे महाप्रभुको बड़े अनुरागके साथ कीर्त्तन सुनाते थे॥ 4 ॥ भक्तोंकी इच्छाको पूर्ण करनेके लिये ही काशीके मायावादियोंका उद्धार-करना :— संन्यासीर गण प्रभुरे यदि उपेक्षिल। भक्त-दुःख खण्डाइते तारे कृपा कैल॥ 5 ॥ अनुवाद—यद्यपि मायावादी संन्यासियोंने महाप्रभुकी निन्दा की थी, तथापि महाप्रभुने भक्तोंके दुःखको दूर करनेके लिये उन मायावादी संन्यासियोंपर कृपा की॥ 5 ॥ पहले आदिलीलामें मायावादियोंका उद्धार वर्णित, पुनः संक्षेपमें वर्णन :— संन्यासीरे कृपा पूर्वे लिखियाँछो विस्तारिया। उद्देशे कहिये इँहा संक्षेप करिया॥ 6 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी मायावादी संन्यासियोंपर कृपाका मैं पहले ही विस्तारपूर्वक वर्णन कर चुका हूँ, परन्तु पुनः उसका संक्षेपमें वर्णन कर रहा हूँ॥ 6 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पूर्वे लिखियाँछो विस्तारिया' (पहले विस्तारसे लिखा है)—आदिलीला सातवाँ अध्याय देखें॥ 6 ॥ मायावादी संन्यासियोंके द्वारा महाप्रभुकी निन्दा; महाराष्ट्र ब्राह्मणके मनके दुःखसे उनके कल्याणकी चिन्ता :— याँहा ताँहा प्रभुर निन्दा करे संन्यासीर गण। शुनि' दुःखे महाराष्ट्र 'प्रभुर स्वभाव,—येबा देखे सन्निधाने। 'स्वरूप' अनुभवि' ताँरे 'ईश्वर' करि' माने॥ 8 ॥ कोनप्रकारे पारों यदि एकत्र करिते। इहा देखि' संन्यासिगण हबे इँहार भक्ते॥ 9 ॥ वाराणसी-वास आमार हय सर्वकाले। सर्वकाल दुःख पाब, इहा ना करिले॥'10॥ अनुवाद—जब काशीमें जहाँ-तहाँ मायावादी संन्यासी महाप्रभुकी निन्दा करते थे, उनके मुखसे महाप्रभुकी निन्दा सुनकर महाराष्ट्र करने लगे,—'महाप्रभुके स्वभावको जो कोई भी निकटसे देखता है, वह महाप्रभुके 'स्वरूप'का अनुभव करके उन्हें 'ईश्वर' मानने लगता है। यदि किसी प्रकारसे मैं महाप्रभु और मायावादी संन्यासियोंको एक ही स्थानपर एकत्रित कर पाऊँ, तब मायावादी संन्यासी महाप्रभुके स्वरूपको देखकर अवश्य ही इनके भक्त बन जायेंगे। मुझे तो सब समय वाराणसीमें ही रहना है, इसलिये यदि मैं उनका मिलन नहीं करा पाया, तो मैं सब समय मायावादियोंके द्वारा महाप्रभुकी निन्दा सुनकर दुःख ही भोग करूँगा॥'7-10॥ मायावादी संन्यासियोंको अपने घरपर निमन्त्रण :— एत चिन्ति' निमन्त्रिल संन्यासीर गणे। तबे सेइ विप्र आइल महाप्रभुर स्थाने॥ 11 ॥ अनुवाद—ऐसा विचार बनाकर उन महाराष्ट्र ब्राह्मणने सभी मायावादी संन्यासियोंको निमन्त्रित किया। और तब फिर वे ब्राह्मण महाप्रभुके पास उनको निमन्त्रण देने आ गये॥ 11 ॥ श्रीचन्द्रशेखर और श्रीतपनमिश्रका भी एक साथ महाप्रभुसे एक ही निवेदन :— हेनकाले निन्दा शुनि' शेखर, तपन। दुःख पाञा प्रभु-पदे कैला निवेदन॥ 12 ॥ अनुवाद—मायावादियोंके मुखसे महाप्रभुकी निन्दा सुनकर श्रीचन्द्रशेखर और श्रीतपनमिश्र भी उसी समय महाप्रभुके निकट आकर उनके श्रीचरणोंमें दुःखित 478 ।