भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1916, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1916

[ 24/329 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

'षोड़शोपचार'-1) आसन, 2) स्वागत (कुशलप्रश्न), 3) अर्घ्य, 4) पाद्य, 5) आचमनीय, 6) मधुपर्क, 7) आचमन, 8) स्नान, 9) वस्त्र, 10) अलङ्कार 11) सुगन्ध, 12) सुपुष्प, 13) धूप, 14) दीप, 15) नैवेद्य और 16) वन्दना। 'पञ्चशोपचार'-हरिभक्तिविलासमें पचास उपचारकी बात नहीं है, तो भी चौंसठ उपचारोंमेंसे चौदह छोड़ देनेसे पचास उपचार हो सकते हैं। कौनसे चौदह छोड़ने होंगे, उसका निरूपण करनेका उपाय नहीं है। 'दशोपचार'-1) अर्घ्य, 2) पाद्य, 3) आचमन, 4) मधुपर्क 5) आचमन, 6) गन्ध, 7) पुष्प, 8) धूप, 9) दीप, 10) नैवेद्य। 'चतुःषष्टि उपचार'-'चौघन'का अर्थ चौंसठ होता है। (हःभःविः 11/127-140)- 1) वाद्य-स्तबके द्वारा जगाना, 2) जय-शब्दका उच्चारण, 3) नमस्कार, 4) मङ्गळारात्रिक, 5) आसन, 6) दन्तकाष्ठ, 7) पाद्य, 8) अर्घ्य, 9) आचमन, 10) मधुपर्क सहित आचमन, 11) पादुका-समर्पण, 12) अङ्गमार्जन, 13) तैलाभ्यञ्जन, 14) तैलाद्यपसारण, 15) सुगन्धि-पुष्पजलमें स्नान, 16) दुग्धस्नान, 17) दधिस्नान, 18) घृतस्नान, 19) मधुस्नान, 20) शर्करास्नान, 21) मन्त्रजलसे स्नान, 22) गमछा, 23) वस्त्र और ओढ़नी, 24) यज्ञसूत्र, 25) पुनराचमन, 26) अनुलेपन, 27) अलङ्कार, 28) पुष्प, 29) धूप, 30) दीप, 31) दुष्टदृष्टिनिवारण, 32) नैवेद्य, 33) मुखवास, 34) ताम्बूल, 35) उत्तम शय्या, 36) केश-प्रसाधन, 37) उत्तम वस्त्र, 38) उत्तम मुकुट, 39) उत्तम गन्धलेपन, 40) कौस्तुभादि भूषण, 41) विचित्रदिव्यपुष्प, 42) मङ्गळारात्रिक, 43) दर्पण, 44) उत्तमयानमें मण्डप-यात्रा, 45) सिंहासनपर बैठाना, 46) पुनः वाद्य, 47) पुनः नैवेद्य अर्पण, 48) महा-आरती, 49) चामरव्यजन-छत्र, 50) गीत, 51) वाद्य, 52) नृत्य, 53) प्रदक्षिण, 54) प्रणाम, 55) श्रीचरण-युगलमें स्तुति, 56) चरणमें मस्तक रखना, 57) सिरपर निर्माल्य-धारण, 58) उच्छिष्ट-भक्षण, 59) पाद सम्वाहन हेतु बैठाना, 60) पुष्प-शय्या, 61) हस्तप्रदान, 62) शय्यामें आगमन, 63) पदप्रक्षालन कराके शय्यापर बैठाना, 64) सबसे अन्तमें पलङ्गपर शयन और पाद-सम्वाहनादि। 'पञ्चकाल'-अरुणोदय, प्रातः, मध्याह, सायाह्न, प्रदोष। 'पूजारति'-पूजा और आरती तथा अर्चनादि। 'कृष्णोर भोजन'-(हःभःविः 8म विः 50-51)- मङ्गुलव्यवहारेण भोजयन्ति हरिं मुदा।" xx “शालीभक्तं सुभक्तं शिशिर-करसितं पायसं पूपसूपम्। लेह्यं पेयं सुचूष्यं सितममृतफलं घारिकाह्यं सुखाद्यम्। आज्यं प्राज्यं समिज्यं नयनरुचिकरं वाजिकैलामरीचस्वादीयः शाकराजी परिकरममृताहारजोषं जुषस्व॥" [अर्थात् “भगवद्भक्त सभ्य व्यवहारके द्वारा श्रीहरिको आनन्दपूर्वक भोजन कराते हैं, हे भगवन्! शालि-धानका अन्न, चन्द्रके समान श्वेतवन अन्न, खीर, मालपूआ, रसेवाली सब्जी, दाल, लेह्य (चाटनेवाले), पेय (पीनेवाले), चूष्य (चूसनेवाले) और शुद्ध अमृतस्वरूप फल, घीमें बनी मिठाईयाँ आदि उत्कृष्ट खानेकी वस्तुएँ, घी, नेत्रोंको प्रिय लगनेवाले घी-इलाइची-काली मिर्च आदिसे सजाये अति स्वादिष्ट घीसे बने व्यञ्जन और सागादि-इन सब अमृततुल्य वस्तुओंका आस्वादन करके सुख भोग कीजिये।"] 'कृष्णोर शयन'-(हःभःविः 11 विः)- “बलीयसा पदा स्वामिन् पदवीमवधारय। आगच्छ शयनस्थानं प्रियाभिः सह केशव॥ एवं प्रार्थ्य समर्प्यास्मै पादुके शयनालयम्। आनीय देवं तत्रत्यानुपचारान् प्रकल्पयेत्॥ विशेषतोऽर्पयेत्तत्र घनं दुग्धं सशर्करम्। ताम्बूलञ्च सकर्पूरं दिव्यमाल्यानुलेपनम्॥” [अर्थात् “हे स्वामिन् ! बलशाली चरणोंके द्वारा पादुका धारण कीजिये। हे केशव ! सब प्रियाओंके साथ आप शयन स्थानपर आगमन कीजिये। इस प्रकार प्रार्थना करते हुए पादुका समर्पण करके श्रीकृष्णको शयन-स्थानपर लाकर शयनके उपयोगी उपचारोंकी रचना करनी होगी। विशेषतः शयनके स्थानपर मीठा

470 |