श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1915, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय 24/328-329 ]
तुलसीको प्रणाम करके दायें हाथसे चयन करना चाहिये। हे ब्राह्मण ! वैष्णव कभी भी द्वादशीमें तुलसी नहीं तोड़ते।"] ‘वस्त्र-संस्कार’— “तान्तवं मलिनं पूर्वमद्भिः क्षारैश्च शोधयेत्। अंशुभिः शोषयित्वा वा वायुना वा समाहरेत्। ऊर्णपट्टांशुकक्षौमदुकूलाविकचर्मणाम्॥ अल्पाशौचे भवेच्छुद्धिः शोषणप्रोक्षणादिभिः॥ कुसुमभकुङ्कुमारक्तास्तथा लाक्षारसेन च। प्रक्षालनेन शुध्यन्ति चण्डालस्पर्शने तथा॥” [अर्थात् “कपासके रेशेसे निर्मित वस्त्रादि जो मैले हो गये हैं, सर्वप्रथम क्षार और जलके द्वारा उन वस्त्रोंको शुद्ध करेंगे, बादमें सूर्यकी किरणों अथवा वायुके द्वारा सुखाकर पहनेंगे। रोमसे बने वस्त्र, पट्टवस्त्र, रेशमी वस्त्र, भेड़के रोमसे बने वस्त्र और चमड़ा—इन सब द्रव्योंकी सामान्य शुद्धि करनेसे अर्थात् थोड़ा अशुद्ध होनेपर सुखाकर अथवा जल छिड़कनेसे शुद्ध हो जाते हैं। कुसुम्भ, कुङ्कुम और लाक्षारसके द्वारा रंगे वस्त्र चण्डालादिके द्वारा छुए जानेपर जलमें धोकर शुद्ध होते हैं।”] ‘पीठ-संस्कार’— “पादपीठञ्च कृष्णस्य बिल्वपत्रेण घर्षयेत्। उष्णाम्बुना च प्रक्षाल्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥’ [अर्थात् “बेलके पत्तेके द्वारा श्रीकृष्णकी पादपीठका मार्जन करेंगे। गर्म जलके द्वारा धोनेपर सब प्रकारके पापोंसे मुक्त हुआ जाता है।”] ‘गृह-संस्कार’— “मन्दिरं मार्जयेद्विष्णोर्विधाय्याचमनादिकम्। कृष्णं पश्यन् कीर्त्तयंश्च दास्येनात्मानमर्पयेत्॥ शुद्धं गोमयमादाय ततो मृत्स्नां जलं तथा। भक्त्या तत्परितो लिम्पेदभ्युक्षेच्च तदङ्गनम्॥” “स वै मनः कृष्ण-पदारविन्दयोर्वचांसि वैकुण्ठगुणानुवर्णने। करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु श्रुतिं चकाराच्युतसत्कथोदये॥” “सम्मार्जनाेपलेपाभ्यां सेकमण्डलवर्त्तनैः गृहशुश्रूषणं मह्यं दासद्यदमायया॥” [अर्थात् “आचमनादि करके विष्णुके मन्दिरको साफ करना चाहिये। बादमें श्रीकृष्णके दर्शन और श्रीनाम कीर्तन करते-करते दास्य भावसे आत्मसमर्पण करेंगे। उसके बाद शुद्ध गोबर, मिट्टी और जल लेकर भक्तिपूर्वक मन्दिरके चारों ओर तथा उसके आँगनमें लेपन और अभ्युक्षण अर्थात् गोबरसे मिले जलके छींटे देंगे। (भाः 9/4/18)—राजर्षि अम्बरीषने श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें मनको, वैकुण्ठगुणोंके वर्णनमें वचनोंको, हरिमन्दिरके मार्जनमें दोनों हाथोंको, भगवान्की कथाके श्रवणमें कानोंको लगाया था। (भाः 11/11/39)—अच्छेसे सफाई करना, गोबरके द्वारा लेपन, जलका छिड़काव और सब प्रकारसे सजावटादिके द्वारा सेवककी भाँति निष्कपट होकर मेरे घरकी सेवा करना।”] ‘कृष्णप्रबोधन’ (श्रीकृष्णके ध्यानको आकर्षित करना)— “ततो देवालये गत्वा घण्टाद्युद्घोषपूर्वकम्। प्रबोध्य स्तुतिभिः कृष्णं नीराज्य प्रार्थयेदिदम्॥”—“देव प्रपन्नार्तिहर प्रसादं कुरु केशव। अवलोकनदानेन भूयो मां पालयाच्युत॥” इति [अर्थात् “इसके बाद देवालयमें जाकर घण्टादि बजाकर जगानेके लिये उपयोगी स्तुतिके द्वारा श्रीकृष्णको जगाकर अर्चन करते हुए इस प्रकार प्रार्थना करेंगे,—हे देव ! शरणागतजनोंके दुःखोंका नाश करनेवाले ! हे केशव ! मेरे प्रति कृपा प्रकाशित कीजिये, हे अच्युत ! पुनः दर्शनके द्वारा मुझे पवित्र कीजिये।”] ॥ 328 ॥
पञ्च, षोड़श, पञ्चाशत उपचारे अर्चन। पञ्चकाल पूजारति, कृष्णेर भोजन-शयन॥ 329 ॥
अनुवाद—ग्रन्थमें पाँच, सोलह और पचास उपचारोंसे अर्चनकी विधि, पाँच कालोंमें पूजा, आरती और अर्चनादि, श्रीकृष्णको भोजन-अर्पण तथा उनके शयनके विषयमें लिखना॥ 329 ॥
अनुभाष्य—पाठान्तरमें— “पञ्च, दश, षोड़श, सपर्य्या चौघन। चौषष्टि षोड़श दश पञ्चोपचारे अर्चन॥” ‘पञ्चोपचार’—1) गन्ध, 2) पुष्प, 3) धूप, 4) दीप और 5) नैवेद्य।
। 469