श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1917, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय 24/329-333 ] घना दूध, कर्पूरयुक्त ताम्बूल, दिव्यमाला और अनुलेपन अर्पण करना चाहिये।"] ॥ 329 ॥ श्रीमूर्त्तिलक्षण, आर शालग्रामलक्षण। कृष्णक्षेत्र-यात्रा, कृष्णमूर्त्ति-दरशन ॥ 330 ॥ अनुवाद—श्रीमूर्तिलक्षण, शालग्रामलक्षण, श्रीकृष्णक्षेत्र- यात्रा, श्रीकृष्णमूर्ति-दर्शनका भी वर्णन करना ॥ 330 ॥ अनुभाष्य—'श्रीमूर्त्तिलक्षण'—मध्यलीला 20/224-238 संख्या देखें। 'शालग्रामलक्षण'—हःभःविः 5वाँ विभाग देखें॥ 330 ॥ नाममहिमा, नामापराध दूरे वर्जन। वैष्णवलक्षण, सेवापराध-खण्डन ॥ 331 ॥ शङ्ख-जल-गन्ध-पुष्प-धूपादि-लक्षण। जप, स्तुति, परिक्रमा, दण्डवत्, वन्दन ॥ 332 ॥ पुरश्चरण-विधि, कृष्णप्रसाद-भोजन। अनिवेदित-त्याग, वैष्णवनिन्दादि-वर्जन ॥ 333 ॥ अनुवाद—नामकी महिमा, नामापराधका दूरसे त्याग, वैष्णव-लक्षण, सेवापराध-खण्डन, शङ्ख-जल-गन्ध-पुष्प- धूपादि-लक्षण, जप, स्तुति, परिक्रमा, दण्डवत्, वन्दन, पुरश्चरण-विधि, कृष्णप्रसादका ही भोजन करना, अनिवेदित वस्तुओंका त्याग, वैष्णवनिन्दादिका वर्जन—इनके बारेमें लिखना ॥ 331-333 ॥ अनुभाष्य—'नाम महिमा'—हःभःविः 11वाँ विभाग देखें। 'नामापराध'—आदिलीला 8/24 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य देखें। 'वैष्णव-लक्षण'— “विष्णुरेव हि यस्यैष देवता वैष्णवः स्मृतः।” [अर्थात् “विष्णु ही जिनके अभीष्ट देवता हैं, वे वैष्णव कहे जाते हैं।”] हःभःविः 10वाँ विः देखें। 'सेवापराध-खण्डन'—स्कन्दपुराणमें अवन्तीखण्डमें श्रीव्यासवाक्य— “अहन्यहनि यो मर्त्यो गीताध्यायं पठेत्तु वै। द्वात्रिंशदपराधांस्तु क्षमते तस्य केशवः॥” द्वारकामाहात्म्ये,—“सहस्रनाममाहात्म्यं यः पठेत् शृणुयादपि। अपराधसहस्राणि न स लिप्येत कदाचन ॥ द्वादश्यां जागरे विष्णोर्यः पठेत्तुलसीस्तवम्। द्वात्रिंशदपराधान् हि क्षमते तस्य केशवः। तुलस्या कुरुते यस्तु शालग्राम-शिलार्चनम्। द्वात्रिंशदपराधांश्च क्षमते तस्य केशवः॥ [अर्थात् “जो मनुष्य प्रतिदिन गीताके अध्यायोंका अध्ययन करता है, वह प्रतिदिन बत्तीस प्रकारके अपराधोंसे मुक्त हो जाता है। जो विष्णुसहस्त्र नामकी महिमाका पाठ करता है, अथवा श्रवण ही करता है, वह कभी भी सहस्र अपराधोंमें लिप्त नहीं होता। जो द्वादशीमें जागरण करके तुलसीके स्तवका पाठ करता है, श्रीकेशव उनके बत्तीस प्रकारके अपराधोंको दूर कर देते हैं। जो तुलसीके द्वारा शालग्राम-शिलाकी पूजा करते हैं, श्रीकेशव उनके बत्तीस प्रकारके अपराध क्षमा करते हैं।”] बत्तीस सेवापराध—(1) यान अथवा पादुका पहनकर भगवान्के मन्दिरमें जाना, (2) भगवान्के सामने आकर भी उन्हें प्रणाम नहीं करना, (3) उच्छिष्ट अथवा अपवित्र अवस्थामें भगवान्की वन्दना, (4) एक हाथके द्वारा प्रणाम करना, (5) भगवान्के सामने अन्यदेवताकी परिक्रमा, (6) भगवान्के सामने पैर फैलाना, (7) दोनों जंघाओंको हाथके द्वारा घेरकर बैठना, (8) शयन करना, (9) भोजन करना, (10) मिथ्या-बोलना, (11) ऊँचा बोलना, (12) आपसमें बातें करना, (13) क्रन्दन, (14) दूसरे व्यक्तिपर कृपा, (15) कठोर वचनोंका प्रयोग, (16) कम्बल ओढ़ना, (17) दूसरोंकी निन्दा करना, (18) दूसरोंकी प्रशंसा करना, (19) अश्लील बातें करना, (20) अधोवायु छोड़ना, (21) सामर्थ्य रहनेपर भी उपचारके बिना पूजा करना, (22) अनिवेदित वस्तुको खाना, (23) मौसमके फलोंको अर्पण न करना, (24) अवशिष्ट (बचे हुए) अंशका । 471