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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 24/329 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

'षोड़शोपचार'-1) आसन, 2) स्वागत (कुशलप्रश्न), 3) अर्घ्य, 4) पाद्य, 5) आचमनीय, 6) मधुपर्क, 7) आचमन, 8) स्नान, 9) वस्त्र, 10) अलङ्कार 11) सुगन्ध, 12) सुपुष्प, 13) धूप, 14) दीप, 15) नैवेद्य और 16) वन्दना। 'पञ्चशोपचार'-हरिभक्तिविलासमें पचास उपचारकी बात नहीं है, तो भी चौंसठ उपचारोंमेंसे चौदह छोड़ देनेसे पचास उपचार हो सकते हैं। कौनसे चौदह छोड़ने होंगे, उसका निरूपण करनेका उपाय नहीं है। 'दशोपचार'-1) अर्घ्य, 2) पाद्य, 3) आचमन, 4) मधुपर्क 5) आचमन, 6) गन्ध, 7) पुष्प, 8) धूप, 9) दीप, 10) नैवेद्य। 'चतुःषष्टि उपचार'-'चौघन'का अर्थ चौंसठ होता है। (हःभःविः 11/127-140)- 1) वाद्य-स्तबके द्वारा जगाना, 2) जय-शब्दका उच्चारण, 3) नमस्कार, 4) मङ्गळारात्रिक, 5) आसन, 6) दन्तकाष्ठ, 7) पाद्य, 8) अर्घ्य, 9) आचमन, 10) मधुपर्क सहित आचमन, 11) पादुका-समर्पण, 12) अङ्गमार्जन, 13) तैलाभ्यञ्जन, 14) तैलाद्यपसारण, 15) सुगन्धि-पुष्पजलमें स्नान, 16) दुग्धस्नान, 17) दधिस्नान, 18) घृतस्नान, 19) मधुस्नान, 20) शर्करास्नान, 21) मन्त्रजलसे स्नान, 22) गमछा, 23) वस्त्र और ओढ़नी, 24) यज्ञसूत्र, 25) पुनराचमन, 26) अनुलेपन, 27) अलङ्कार, 28) पुष्प, 29) धूप, 30) दीप, 31) दुष्टदृष्टिनिवारण, 32) नैवेद्य, 33) मुखवास, 34) ताम्बूल, 35) उत्तम शय्या, 36) केश-प्रसाधन, 37) उत्तम वस्त्र, 38) उत्तम मुकुट, 39) उत्तम गन्धलेपन, 40) कौस्तुभादि भूषण, 41) विचित्रदिव्यपुष्प, 42) मङ्गळारात्रिक, 43) दर्पण, 44) उत्तमयानमें मण्डप-यात्रा, 45) सिंहासनपर बैठाना, 46) पुनः वाद्य, 47) पुनः नैवेद्य अर्पण, 48) महा-आरती, 49) चामरव्यजन-छत्र, 50) गीत, 51) वाद्य, 52) नृत्य, 53) प्रदक्षिण, 54) प्रणाम, 55) श्रीचरण-युगलमें स्तुति, 56) चरणमें मस्तक रखना, 57) सिरपर निर्माल्य-धारण, 58) उच्छिष्ट-भक्षण, 59) पाद सम्वाहन हेतु बैठाना, 60) पुष्प-शय्या, 61) हस्तप्रदान, 62) शय्यामें आगमन, 63) पदप्रक्षालन कराके शय्यापर बैठाना, 64) सबसे अन्तमें पलङ्गपर शयन और पाद-सम्वाहनादि। 'पञ्चकाल'-अरुणोदय, प्रातः, मध्याह, सायाह्न, प्रदोष। 'पूजारति'-पूजा और आरती तथा अर्चनादि। 'कृष्णोर भोजन'-(हःभःविः 8म विः 50-51)- मङ्गुलव्यवहारेण भोजयन्ति हरिं मुदा।" xx “शालीभक्तं सुभक्तं शिशिर-करसितं पायसं पूपसूपम्। लेह्यं पेयं सुचूष्यं सितममृतफलं घारिकाह्यं सुखाद्यम्। आज्यं प्राज्यं समिज्यं नयनरुचिकरं वाजिकैलामरीचस्वादीयः शाकराजी परिकरममृताहारजोषं जुषस्व॥" [अर्थात् “भगवद्भक्त सभ्य व्यवहारके द्वारा श्रीहरिको आनन्दपूर्वक भोजन कराते हैं, हे भगवन्! शालि-धानका अन्न, चन्द्रके समान श्वेतवन अन्न, खीर, मालपूआ, रसेवाली सब्जी, दाल, लेह्य (चाटनेवाले), पेय (पीनेवाले), चूष्य (चूसनेवाले) और शुद्ध अमृतस्वरूप फल, घीमें बनी मिठाईयाँ आदि उत्कृष्ट खानेकी वस्तुएँ, घी, नेत्रोंको प्रिय लगनेवाले घी-इलाइची-काली मिर्च आदिसे सजाये अति स्वादिष्ट घीसे बने व्यञ्जन और सागादि-इन सब अमृततुल्य वस्तुओंका आस्वादन करके सुख भोग कीजिये।"] 'कृष्णोर शयन'-(हःभःविः 11 विः)- “बलीयसा पदा स्वामिन् पदवीमवधारय। आगच्छ शयनस्थानं प्रियाभिः सह केशव॥ एवं प्रार्थ्य समर्प्यास्मै पादुके शयनालयम्। आनीय देवं तत्रत्यानुपचारान् प्रकल्पयेत्॥ विशेषतोऽर्पयेत्तत्र घनं दुग्धं सशर्करम्। ताम्बूलञ्च सकर्पूरं दिव्यमाल्यानुलेपनम्॥” [अर्थात् “हे स्वामिन् ! बलशाली चरणोंके द्वारा पादुका धारण कीजिये। हे केशव ! सब प्रियाओंके साथ आप शयन स्थानपर आगमन कीजिये। इस प्रकार प्रार्थना करते हुए पादुका समर्पण करके श्रीकृष्णको शयन-स्थानपर लाकर शयनके उपयोगी उपचारोंकी रचना करनी होगी। विशेषतः शयनके स्थानपर मीठा

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चौबीसवाँ अध्याय 24/329-333 ] घना दूध, कर्पूरयुक्त ताम्बूल, दिव्यमाला और अनुलेपन अर्पण करना चाहिये।"] ॥ 329 ॥ श्रीमूर्त्तिलक्षण, आर शालग्रामलक्षण। कृष्णक्षेत्र-यात्रा, कृष्णमूर्त्ति-दरशन ॥ 330 ॥ अनुवाद—श्रीमूर्तिलक्षण, शालग्रामलक्षण, श्रीकृष्णक्षेत्र- यात्रा, श्रीकृष्णमूर्ति-दर्शनका भी वर्णन करना ॥ 330 ॥ अनुभाष्य—'श्रीमूर्त्तिलक्षण'—मध्यलीला 20/224-238 संख्या देखें। 'शालग्रामलक्षण'—हःभःविः 5वाँ विभाग देखें॥ 330 ॥ नाममहिमा, नामापराध दूरे वर्जन। वैष्णवलक्षण, सेवापराध-खण्डन ॥ 331 ॥ शङ्ख-जल-गन्ध-पुष्प-धूपादि-लक्षण। जप, स्तुति, परिक्रमा, दण्डवत्, वन्दन ॥ 332 ॥ पुरश्चरण-विधि, कृष्णप्रसाद-भोजन। अनिवेदित-त्याग, वैष्णवनिन्दादि-वर्जन ॥ 333 ॥ अनुवाद—नामकी महिमा, नामापराधका दूरसे त्याग, वैष्णव-लक्षण, सेवापराध-खण्डन, शङ्ख-जल-गन्ध-पुष्प- धूपादि-लक्षण, जप, स्तुति, परिक्रमा, दण्डवत्, वन्दन, पुरश्चरण-विधि, कृष्णप्रसादका ही भोजन करना, अनिवेदित वस्तुओंका त्याग, वैष्णवनिन्दादिका वर्जन—इनके बारेमें लिखना ॥ 331-333 ॥ अनुभाष्य—'नाम महिमा'—हःभःविः 11वाँ विभाग देखें। 'नामापराध'—आदिलीला 8/24 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य देखें। 'वैष्णव-लक्षण'— “विष्णुरेव हि यस्यैष देवता वैष्णवः स्मृतः।” [अर्थात् “विष्णु ही जिनके अभीष्ट देवता हैं, वे वैष्णव कहे जाते हैं।”] हःभःविः 10वाँ विः देखें। 'सेवापराध-खण्डन'—स्कन्दपुराणमें अवन्तीखण्डमें श्रीव्यासवाक्य— “अहन्यहनि यो मर्त्यो गीताध्यायं पठेत्तु वै। द्वात्रिंशदपराधांस्तु क्षमते तस्य केशवः॥” द्वारकामाहात्म्ये,—“सहस्रनाममाहात्म्यं यः पठेत् शृणुयादपि। अपराधसहस्राणि न स लिप्येत कदाचन ॥ द्वादश्यां जागरे विष्णोर्यः पठेत्तुलसीस्तवम्। द्वात्रिंशदपराधान् हि क्षमते तस्य केशवः। तुलस्या कुरुते यस्तु शालग्राम-शिलार्चनम्। द्वात्रिंशदपराधांश्च क्षमते तस्य केशवः॥ [अर्थात् “जो मनुष्य प्रतिदिन गीताके अध्यायोंका अध्ययन करता है, वह प्रतिदिन बत्तीस प्रकारके अपराधोंसे मुक्त हो जाता है। जो विष्णुसहस्त्र नामकी महिमाका पाठ करता है, अथवा श्रवण ही करता है, वह कभी भी सहस्र अपराधोंमें लिप्त नहीं होता। जो द्वादशीमें जागरण करके तुलसीके स्तवका पाठ करता है, श्रीकेशव उनके बत्तीस प्रकारके अपराधोंको दूर कर देते हैं। जो तुलसीके द्वारा शालग्राम-शिलाकी पूजा करते हैं, श्रीकेशव उनके बत्तीस प्रकारके अपराध क्षमा करते हैं।”] बत्तीस सेवापराध—(1) यान अथवा पादुका पहनकर भगवान्‌के मन्दिरमें जाना, (2) भगवान्‌के सामने आकर भी उन्हें प्रणाम नहीं करना, (3) उच्छिष्ट अथवा अपवित्र अवस्थामें भगवान्‌की वन्दना, (4) एक हाथके द्वारा प्रणाम करना, (5) भगवान्‌के सामने अन्यदेवताकी परिक्रमा, (6) भगवान्‌के सामने पैर फैलाना, (7) दोनों जंघाओंको हाथके द्वारा घेरकर बैठना, (8) शयन करना, (9) भोजन करना, (10) मिथ्या-बोलना, (11) ऊँचा बोलना, (12) आपसमें बातें करना, (13) क्रन्दन, (14) दूसरे व्यक्तिपर कृपा, (15) कठोर वचनोंका प्रयोग, (16) कम्बल ओढ़ना, (17) दूसरोंकी निन्दा करना, (18) दूसरोंकी प्रशंसा करना, (19) अश्लील बातें करना, (20) अधोवायु छोड़ना, (21) सामर्थ्य रहनेपर भी उपचारके बिना पूजा करना, (22) अनिवेदित वस्तुको खाना, (23) मौसमके फलोंको अर्पण न करना, (24) अवशिष्ट (बचे हुए) अंशका । 471

[ 24/331-339 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला निवेदन, (25) देवताको पीठ दिखाकर बैठना, (26) दूसरेका अभिवादन, (27) गुरुके आनेपर उनका स्तव नहीं करके बैठे रहना, (28) आत्म-प्रशंसा, (29) देवनिन्दा, (30) अन्य व्यक्तिके प्रति निर्दयता, (31) उत्सव नहीं मनाना, (32) कलह करना। 'पुष्प-लक्षण'—हःभःविः सातवाँ विभाग देखें। 'धूपादि लक्षण'—हःभःविः आठवाँ विभाग देखें। 'जप, स्तुति, परिक्रमा, दण्डवत् और वन्दना'—हःभःविः आठवाँ विभाग देखें। 'पुरश्चरण-विधि'—मध्यलीला 15/108 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'कृष्णप्रसाद भोजन'— “संभोज्य भोजनं कुर्यादन्यथा नरकं व्रजेत्। अपूज्य भोजनं कुर्वन् नरकाणि व्रजेन्नरः ॥” [अर्थात् “श्रीहरिको भोजन कराके स्वयं भोजन करना, अन्यथा नरकमें जाना पड़ेगा। श्रीहरिकी पूजा नहीं करके भोजन करनेसे मनुष्यको नरकोंकी प्राप्ति होती है।”] 'अनिवेदित-त्याग'— “अनिवेद्य तु भुञ्जानः प्रायश्चित्ती भवेन्नरः। तस्मात् सर्वं निवेद्यैव विष्णोर्भुञ्जीत सर्वदा॥” [अर्थात् “अनिवेदित द्रव्य उपभोग करनेसे मनुष्यको प्रायश्चित करना पड़ता है, इसलिये सदैव सभी द्रव्य श्रीविष्णुको निवेदन करके भोजन करना चाहिये।”] हःभःविः 9म विः 108 संख्या देखें। 'वैष्णवनिन्दा-वर्जन'— मध्यलीला 15/261 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 331-333 ॥ साधुलक्षण, साधुसङ्ग, साधुसेवन। असत्सङ्ग-त्याग, श्रीभागवत-श्रवण ॥ 334 ॥ अनुवाद—अर्थ स्पष्ट है ॥ 334 ॥ दिनकृत्य, पक्षकृत्य, एकादश्यादि-विवरण। मासकृत्य, जन्माष्टमीयादि-विधि-विचारण ॥ 335 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 335 ॥ अनुभाष्य—'दिनकृत्य'—दिवसके कालोचित कृत्यसमूह। 'पक्षकृत्य'—तिथिमें, विशेषतः एकादशी आदिमें अनुष्ठान योग्य कृत्यसमूह। 'मासकृत्य'—बारह महीनोंके कृत्यसमूह। 'एकादशी आदिका विवरण'—हःभःविः 12वाँ विः देखें। 'जन्माष्टमी-आदि-विधि-विचारण'—हःभःविः 12वाँ विः देखें ॥ 335 ॥ एकादशी, जन्माष्टमी, वामनद्वादशी। श्रीरामनवमी, आर नृसिंहचतुर्दशी ॥ 336 ॥ एइ सबे बिद्धा-त्याग, अबिद्धा-करण। अकरणे दोष, कैले भक्तिर लभन ॥ 337 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 336-337 ॥ अनुभाष्य—एकादशीमें अरुणोदय-बिद्धा त्याग और अन्य (जन्माष्टमी, वामनद्वादशी, श्रीरामनवमी और नृसिंहचतुर्दशी) व्रतोंमें सूर्योदय-बिद्धा त्याग करके अबिद्ध (शुद्ध) व्रत ही पालनीय है। बिद्ध-व्रतका पालन करनेसे 'दोष' और अबिद्ध व्रत-पालनसे ही 'भक्ति' होती है। विशेष रूपसे जाननेके लिये हःभःविः 12वाँ और 13वाँ विः देखें ॥ 337 ॥ महाप्रभुके द्वारा सात्वत पुराणको 'प्रमाण' कहकर स्वीकार करना :- सर्वत्र प्रमाण दिबे पुराण-वचन। श्रीमूर्त्ति-विष्णुमन्दिरकरण-लक्षण ॥ 338 ॥ अनुवाद—सर्वत्र पुराणके वचनोंके द्वारा प्रमाण प्रस्तुत करना। श्रीमूर्त्ति और विष्णुमन्दिर बनानेके लक्षण बतलाना ॥ 338 ॥ हरिभक्तिविलासमें सामान्य और वैष्णव सदाचारके वर्णनकी आज्ञा :- 'सामान्य' सदाचार, आर 'वैष्णव'-आचार। कर्त्तव्याकर्त्तव्य 'स्मार्त्त' व्यवहार ॥ 339 ॥ अनुवाद—उस ग्रन्थमें 'सामान्य' सदाचार और 472 |

चौबीसवाँ अध्याय 24/339-344 ] 'वैष्णव'-आचारके विषयमें बतलाना। कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य आदि 'स्मार्त्त' व्यवहारके विषयमें भी लिखना ॥ 339 ॥ श्रीसनातनको आशीर्वाद :- एइ त' संक्षेपे कहिलुँ दिग्दर्शन। यबे तुमि लिखिबा, कृष्ण कराबे स्फुरण ॥ "340 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने संक्षेपमें वैष्णव-स्मृतिकी विषय-वस्तुका दिग्दर्शन कराया है। जब तुम इसे लिखोगे, तब श्रीकृष्ण तुम्हें सब कुछ स्फुरित करायेंगे ॥ "340 ॥ महाप्रभुके मुखसे श्रीसनातन-शिक्षा अथवा श्रीसनातनके प्रति महाप्रभुके कृपा-प्रसादके श्रवणसे अनर्थ-निवृत्ति और आत्म-प्रसादका उदय :- एइ त' कहिलु प्रभुर सनातने प्रसाद। याहार श्रवणे चित्तेर खण्डे अवसाद ॥ 341 ॥ अनुवाद—(ग्रन्थकार कह रहे हैं) इस प्रकार मैंने श्रीसनातन गोस्वामीके ऊपर महाप्रभुकी कृपाका वर्णन किया है। इसके श्रवणसे चित्तके समस्त अनर्थ दूर हो जाते हैं ॥ 341 ॥ चैतन्यचन्द्रोदय-नाटकमें वर्णित :- निज-ग्रन्थे कर्णपूर विस्तार करिया। सनातने प्रभुर प्रसाद राखियाछे लिखिया ॥ 342 ॥ अनुवाद—श्रीकविकर्णपूरने स्वरचित श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकमें श्रीसनातन गोस्वामीके ऊपर महाप्रभुकी कृपाके विषयमें विस्तारपूर्वक लिखा है ॥ 342 ॥ उपमाके द्वारा श्रीसनातनकी महिमाका वर्णन :- श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (9/34-35)-श्लोकमें प्रतापरुद्रके प्रति वार्त्ताहारि-वाक्य— गौड़ेन्द्रस्य सभा-विभूषणमणिस्त्यक्त्वा य ऋद्धां श्रियं रूपस्याग्रज एष एव तरुणीं वैराग्यलक्ष्मीं दधे। अन्तर्भक्तिरसेन पूर्णसरसो बाह्येऽवधूताकृतिः शैवालैः पिहितं महा-सर इव प्रीतिप्रदस्तद्विदाम् ॥ 343 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 343 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गौड़के राजा हुसेनशाह बादशाहकी सभामें विभूषणमणिस্বরূপ श्रीरूप गोस्वामीके बड़े भाई इन श्रीसनातनने समृद्ध-राजश्रीका परित्याग करके नवीनवैराग्य-लक्ष्मीको धारण किया था। अन्तःकरणमें भक्तिरससे पूर्णरस, बाहरमें अवधूतका रूप, काईके द्वारा आच्छादित महासरोवरकी भाँति वे श्रीसनातन भक्तितत्त्वके पण्डितोंको प्रीति प्रदान करनेवाले थे ॥ 343 ॥ अनुभाष्य— गौड़ेन्द्रस्य (गोड़ेश्वरस्य) सभाविभूषणमणिः (सभायां विभूषणे अलङ्करणे मणिः इव) यः ऋद्धां (समृद्धां) श्रियं (राजसम्पदं) त्यक्त्वा (परित्यज्य) तरुणीं (नवीनां) वैराग्यलक्ष्मीं (वैराग्यसम्पत्तिं) दधे (आश्रितवान्); शैवालैः पिहितम् (आच्छादितं) महासरः (गभीर-सरोवरम्) इव अन्तः (हृदये) भक्तिरसेन (कृष्ण-प्रेमरसेन) पूर्णसरसः (रसितः) बाह्ये (बहिः) अवधूताकृतिः (अवधूतस्य परमहंसस्य इव आकृतिः यस्य सः) रूपस्य अग्रजः सः एषः (सनातनः) एव तद्विदां (भक्तितत्त्वाभिज्ञानां तत्त्वकोविदानां विदुषां देशिकानां) प्रीतिप्रदः (प्रेमभाक्) अभूत्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 343 ॥ तं सनातनमुपागतमक्ष्णोर्दृष्टि- मात्रमतिमात्रदयार्द्रः। आलिलिङ्ग परिधायत-दोर्भ्यां सानुकम्पमथ चम्पकगौरः॥ 344 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 344 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसनातनके आनेपर, उन्हें देखते-ही चम्पकवर्ण श्रीगौरसुन्दरने अत्यन्त दयासे आर्द्र होकर दोनों हाथ फैलाकर कृपा प्रकाश करते हुए उनका आलिङ्गन किया ॥ 344 ॥ चौबीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य— अतिमात्रदयार्द्रः (निरतिशयया दयया आर्द्रः) चम्पकगौरः (चम्पक-कुसुमवत् पीतवर्णः) अक्ष्णोः (नयनयोः) दृष्टिमात्रं (दर्शनमात्रेण) उपागतं (हीनवेशेन समायातं) तं सनातनं । 473

[ 24/344-350 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला परिघायतदोर्भ्यां (परिघाय्याम् इव आयताभ्यां दीर्घाभ्यां दोर्भ्यां भुजाभ्यां) सानुकम्पम् (अनुकम्पा यथा स्यात्तथा कृपयेत्यर्थः) आलिलिङ्ग। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 344 ॥ श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (9/38)में- कालेन वृन्दावनकेलि-वार्त्ता लुप्तेति तां ख्यापयितुं विशिष्य। कृपामृतेनाभिषिषेच देवस्तत्रैव रूपञ्च सनातनञ्च ॥ 345 ॥ अनुवाद-कालके प्रभावसे वृन्दावनकी रसक्रीड़ाओंकी कथा लुप्त हो गयी थी, उन कथाओंका विशेषरूपसे विस्तार करनेके लिये श्रीगौराङ्गदेवने कृपारूपी अमृतके द्वारा वहाँपर श्रीरूप एवं श्रीसनातनको अभिषिक्त किया था॥ 345 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 19/119 संख्या देखें॥ 345 ॥ चौबीसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। श्रीसनातन-शिक्षाके अनुशीलनके फलस्वरूप अनर्थसे मुक्ति और सम्बन्ध-ज्ञान, अभिधेय एवं प्रयोजनकी प्राप्ति :- एइ त' कहिलुँ सनातने प्रभुर प्रसाद। याहार श्रवणे चित्तेर खण्डे अवसाद ॥ 346 ॥ कृष्णेर स्वरूपगणेर सकल हय 'ज्ञान'। विधि-राग-मार्गे 'साधनभक्ति'र विधान ॥ 347 ॥ 'कृष्णप्रेम', 'भक्तिरस', 'भक्तिर सिद्धान्त'। इहार श्रवणे भक्त जानेन सब अन्त ॥ 348 ॥ अनुवाद-(ग्रन्थकार श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी कह रहे हैं)-इस प्रकार मैंने महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातन गोस्वामीके ऊपर की गयी कृपाका वर्णन किया है, जिसके श्रवणसे चित्तके समस्त अनर्थ दूर हो जाते हैं। इसके श्रवणसे श्रीकृष्णके समस्त स्वरूपोंका ज्ञान होता है एवं वैधी और रागमार्गकी साधनभक्तिकी विधिका ज्ञान होता है। इसके श्रवणसे भक्त 'श्रीकृष्णप्रेम', 'भक्तिरस' और 'भक्तिके सिद्धान्तों' आदिको पूर्णरूपसे जान जाता है॥ 346-348 ॥ श्रीनिताइ-गौर-अद्वैतके ऐकान्तिक भक्तोंमें ही श्रीकृष्णप्रेमधनको प्राप्त करनेकी योग्यता :- श्रीचैतन्य-नित्यानन्द-अद्वैत-चरण। याँर प्राणधन, सेइ-पाय सेइ धन ॥ 349 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्य प्रभुके श्रीचरण ही जिसके प्राणधन हैं, वही इस धनको (उपरोक्त वर्णित ज्ञानको) प्राप्त कर सकता है॥ 349 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 350 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे आत्मारामश्चेति-श्लोक- व्याख्यायां सनातनानुग्रहो नाम चतुर्विंशः परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 350 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें आत्मारामश्चेति-श्लोककी व्याख्या और श्रीसनातनपर अनुग्रह नामक चौबीसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। 474 ।

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श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 476 ।

पचीसवाँ अध्याय कथासार—महाराष्ट्र महाप्रभुका यश सुननेसे उन्हें आनन्द मिलता था। एक दिन उन्होंने संन्यासियों और महाप्रभुको निमन्त्रण देकर एकत्रित करके संन्यासियोंको महाप्रभुका कृपापात्र बनाया था, यह आदिलीलाके सातवें अध्यायमें लिखा है। उस दिनसे वाराणसीपुरमें महाप्रभुका माहात्म्य प्रचारित हुआ। वहाँके नगरवासी बहुतसे व्यक्ति महाप्रभुके अनुगत हुए। प्रकाशानन्द सरस्वतीका कोई शिष्य भी महाप्रभुका अनुगत था। जब उसने मायावादकी निन्दा और महाप्रभुके द्वारा उपदिष्ट शुद्धभक्तिवादके माहात्म्यका वर्णन किया, तब प्रकाशानन्द-स्वामीने अनेक युक्तियोंके द्वारा उसके पक्षका समर्थन किया। पञ्चनदीमें स्नान करनेके बाद महाप्रभुने जब भक्तोंके साथ बिन्दुमाधवके मन्दिरमें कीर्तन आरम्भ किया था, तब शिष्यों सहित प्रकाशानन्द भी वहाँ आ गये। प्रकाशानन्दने महाप्रभुके चरणोंमें गिरकर उन्हें पकड़कर अपने पूर्व कार्योंको धिक्कारा और वेदान्त-सङ्गत भक्तितत्त्वके विषयमें जिज्ञासा की। महाप्रभुने उन्हें ब्रह्म-सम्प्रदायमें सिद्ध अपूर्व भक्तिवाद सिखलाकर श्रीमद्भागवत ही ब्रह्मसूत्रका भाष्य है, उसे दिखला दिया और चतुःश्लोकीकी व्याख्यामें सारे तत्त्व बतलाये। उस दिनसे वे मायावादी संन्यासी 'भक्त' बन गये। महाप्रभुने श्रीसनातनको उपदेश देकर और उन्हें वृन्दावन जानेकी आज्ञा देकर पुरुषोत्तमकी यात्रा की। उसके बाद श्रीकविराज-गोस्वामीने श्रीरूप, श्रीसनातन और श्रीसुबुद्धि-रायका इतिहास कुछ-कुछ वर्णन किया है। झारिखण्डसे होकर महाप्रभु बलभद्रके साथ यात्रा करके श्रीपुरुषोत्तममें पहुँचे। इस अध्यायके अन्तिम भागमें मध्यलीलाके प्रत्येक अध्यायके विषयोंको बतलाकर श्रीकविराज-गोस्वामीने सभी जीवोंको इस श्रीचैतन्यचरितामृतका पाठ करने (पढ़ने) का उपदेश दिया है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीकृष्ण-विमुख मायावादियोंको श्रीकृष्णोन्मुख बनानेवाले श्रीगौरसुन्दर :— वैष्णवीकृत्य संन्यासिमुखान् काशीनिवासिनः। सनातनं सुसंस्कृत्य प्रभुर्नीलाद्रिमागमत् ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—संन्यासी आदि काशीवासियोंको 'वैष्णव' बनाकर और श्रीसनातनका उत्तमरूपसे संस्कार करके (सुवैष्णव-वेश देकर) महाप्रभुने नीलाद्रिमें आगमन किया ॥ 1 ॥ अनुभाष्य— प्रभुः (श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्रः) काशीनिवासिनः (वाराणसी- वास्तव्यान्) संन्यासिमुखान् (तुर्याश्रमि-प्रमुखान् प्रकाशानन्दादीन्) वैष्णवीकृत्य (शुद्धभक्तिमार्गे समानीय) सनातनं सुसंस्कृत्य (सुवैष्णववेशं दत्वा च) नीलाद्रिं (श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्रम्) आगतत्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो ॥ 2 ॥ श्रीसनातनको काशीमें दो मास तक शिक्षा-प्रदान :— एइ मत महाप्रभु दुइ मास पर्यन्त। शिखाइला ताँरे भक्तिसिद्धान्तेर अन्त ॥ 3 ॥ । 477

[ 25/3-12 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीको दो मास तक भक्तिके सिद्धान्तोंकी अन्तिम सीमा तक शिक्षा प्रदान की॥ ३ ॥ परमानन्द कीर्तनीयाके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :— 'परमानन्द कीर्तनीया'—शेखरेर सङ्गी। प्रभुरे कीर्त्तन शुनाय, अति बड़ रङ्गी॥ 4 ॥ अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखरके एक साथी 'परमानन्द कीर्तनीया' थे। वे महाप्रभुको बड़े अनुरागके साथ कीर्त्तन सुनाते थे॥ 4 ॥ भक्तोंकी इच्छाको पूर्ण करनेके लिये ही काशीके मायावादियोंका उद्धार-करना :— संन्यासीर गण प्रभुरे यदि उपेक्षिल। भक्त-दुःख खण्डाइते तारे कृपा कैल॥ 5 ॥ अनुवाद—यद्यपि मायावादी संन्यासियोंने महाप्रभुकी निन्दा की थी, तथापि महाप्रभुने भक्तोंके दुःखको दूर करनेके लिये उन मायावादी संन्यासियोंपर कृपा की॥ 5 ॥ पहले आदिलीलामें मायावादियोंका उद्धार वर्णित, पुनः संक्षेपमें वर्णन :— संन्यासीरे कृपा पूर्वे लिखियाँछो विस्तारिया। उद्देशे कहिये इँहा संक्षेप करिया॥ 6 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी मायावादी संन्यासियोंपर कृपाका मैं पहले ही विस्तारपूर्वक वर्णन कर चुका हूँ, परन्तु पुनः उसका संक्षेपमें वर्णन कर रहा हूँ॥ 6 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पूर्वे लिखियाँछो विस्तारिया' (पहले विस्तारसे लिखा है)—आदिलीला सातवाँ अध्याय देखें॥ 6 ॥ मायावादी संन्यासियोंके द्वारा महाप्रभुकी निन्दा; महाराष्ट्र ब्राह्मणके मनके दुःखसे उनके कल्याणकी चिन्ता :— याँहा ताँहा प्रभुर निन्दा करे संन्यासीर गण। शुनि' दुःखे महाराष्ट्र 'प्रभुर स्वभाव,—येबा देखे सन्निधाने। 'स्वरूप' अनुभवि' ताँरे 'ईश्वर' करि' माने॥ 8 ॥ कोनप्रकारे पारों यदि एकत्र करिते। इहा देखि' संन्यासिगण हबे इँहार भक्ते॥ 9 ॥ वाराणसी-वास आमार हय सर्वकाले। सर्वकाल दुःख पाब, इहा ना करिले॥'10॥ अनुवाद—जब काशीमें जहाँ-तहाँ मायावादी संन्यासी महाप्रभुकी निन्दा करते थे, उनके मुखसे महाप्रभुकी निन्दा सुनकर महाराष्ट्र करने लगे,—'महाप्रभुके स्वभावको जो कोई भी निकटसे देखता है, वह महाप्रभुके 'स्वरूप'का अनुभव करके उन्हें 'ईश्वर' मानने लगता है। यदि किसी प्रकारसे मैं महाप्रभु और मायावादी संन्यासियोंको एक ही स्थानपर एकत्रित कर पाऊँ, तब मायावादी संन्यासी महाप्रभुके स्वरूपको देखकर अवश्य ही इनके भक्त बन जायेंगे। मुझे तो सब समय वाराणसीमें ही रहना है, इसलिये यदि मैं उनका मिलन नहीं करा पाया, तो मैं सब समय मायावादियोंके द्वारा महाप्रभुकी निन्दा सुनकर दुःख ही भोग करूँगा॥'7-10॥ मायावादी संन्यासियोंको अपने घरपर निमन्त्रण :— एत चिन्ति' निमन्त्रिल संन्यासीर गणे। तबे सेइ विप्र आइल महाप्रभुर स्थाने॥ 11 ॥ अनुवाद—ऐसा विचार बनाकर उन महाराष्ट्र ब्राह्मणने सभी मायावादी संन्यासियोंको निमन्त्रित किया। और तब फिर वे ब्राह्मण महाप्रभुके पास उनको निमन्त्रण देने आ गये॥ 11 ॥ श्रीचन्द्रशेखर और श्रीतपनमिश्रका भी एक साथ महाप्रभुसे एक ही निवेदन :— हेनकाले निन्दा शुनि' शेखर, तपन। दुःख पाञा प्रभु-पदे कैला निवेदन॥ 12 ॥ अनुवाद—मायावादियोंके मुखसे महाप्रभुकी निन्दा सुनकर श्रीचन्द्रशेखर और श्रीतपनमिश्र भी उसी समय महाप्रभुके निकट आकर उनके श्रीचरणोंमें दुःखित 478 ।

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (transcription) दिया गया है:

पचीसवाँ अध्याय 25/12-20 ] होकर (मायावादियोंपर कृपा करनेका) निवेदन करने लगे॥ 12 ॥ भक्तोंकी इच्छाको पूर्ण करनेके लिये महाप्रभुकी कृपा-अभिलाषा :- भक्त-दुःख देखि' प्रभु मनेते चिन्तिल। संन्यासीर मन फिराइते मन हइल ॥ 13 ॥ अनुवाद-भक्तोंके दुःखको देखकर महाप्रभुने मन-ही-मन मायावादी संन्यासियोंके मनको परिवर्तित करनेका निर्णय किया ॥ 13 ॥ महाराष्ट्र हेनकाले विप्र आसि' करिल निमन्त्रण। अनेक दैन्यादि करि' धरिया चरण ॥ 14 ॥ अनुवाद-उसी समय महाराष्ट्र महाप्रभुके श्रीचरण पकड़कर बड़ी दीनतापूर्वक उनको निमन्त्रण दिया ॥ 14 ॥ महाप्रभुके द्वारा निमन्त्रण स्वीकार :- तबे महाप्रभु ताँर निमन्त्रण मानिला। आर दिन मध्याह्न करि' ताँर घरे गेला ॥ 15 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने उन ब्राह्मणके निमन्त्रणको स्वीकार कर लिया और अगले दिन दोपहरका स्नान और अन्यान्य नित्यकृत्यादि करके उन ब्राह्मणके घरपर गये॥ 15 ॥ मायावादी संन्यासियोंका उद्धार-पहले आदिलीलाके सातवें अध्यायमें वर्णित :- ताँहा यैछे कैला प्रभु संन्यासी-निस्तार। पञ्चतत्त्वाख्याने ताहा करियाछि विस्तार ॥ 16 ॥ अनुवाद-वहाँपर जाकर महाप्रभुने जिस प्रकार उन संन्यासियोंका उद्धार किया, उसका मैंने पञ्चतत्त्वके प्रसङ्ग (आदिलीला सातवें अध्यायमें) पहले ही विस्तृत रूपसे वर्णन किया है ॥ 16 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला सातवें अध्यायमें पञ्चतत्त्वकी व्याख्याके प्रसङ्गमें यह लीला विस्तृत रूपसे वर्णित हुई है॥ 16॥ पुनरुक्ति भय :- ग्रन्थ बाड़े, पुनरुक्ति हय त' कथन। ताँहा ये ना लिखिलुँ, ताहा करिये लिखन ॥ 17 ॥ अनुवाद-पुनः उसका वर्णन करनेसे ग्रन्थका कलेवर बढ़ जायेगा। वहाँपर मैंने जिस प्रसङ्गका वर्णन नहीं किया, अब केवल उसीके विषयमें ही लिखूँगा ॥ 17 ॥ मायावादियोंकी कृपाप्राप्तिके दिनसे बहुतसे तार्किकोंका महाप्रभुके साथ तर्क करनेके लिये आना :- ये-दिवस प्रभु संन्यासीरे कृपा कैल। से-दिवस हैते ग्रामे कोलाहल हैल ॥ 18 ॥ लोकेर संघट्ट आइसे प्रभुरे देखिते। नाना शास्त्रे पण्डित आइसे शास्त्र विचारिते ॥ 19 ॥ अनुवाद-जिस दिन महाप्रभुने मायावादी संन्यासियोंपर कृपा की, उसी दिनसे सम्पूर्ण वाराणसीमें सर्वत्र इसकी चर्चा होने लगी। महाप्रभुके दर्शनके लिये लोगोंकी भीड़ आने लगी। अनेकानेक शास्त्रोंको जाननेवाले पण्डित भी महाप्रभुसे शास्त्रोंपर विचार करनेके लिये आने लगे॥ 18-19 ॥ शुद्धभक्तिसिद्धान्तपूर्ण अकाट्य-युक्तिके बलसे महाप्रभुके द्वारा सभीके कुतर्कका खण्डन :- सर्वशास्त्र खण्डि' प्रभु 'भक्ति' करे सार। सयुक्तिक वाक्ये मन फिराय सबार ॥ 20 ॥ अनुवाद-शास्त्रोंकी भुक्ति-मुक्ति आदिकी प्रधानता दिखानेवाले सभी विचारोंका खण्डन करके महाप्रभु 'भक्ति'को ही सभी शास्त्रोंके सारके रूपमें स्थापित करते। अत्यन्त सुन्दर युक्तियोंके द्वारा वे सभीके मनका परिवर्तन कर देते ॥ 20 ॥ । 479

[ 25/21-30 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सभीको महाप्रभुकी शिक्षाकी प्राप्ति और हरि-सङ्कीर्तन :- उपदेश लञा करे कृष्ण-सङ्कीर्त्तन। सर्वलोक हासे, गाय, करये नर्त्तन ॥ 21 ॥ अनुवाद—महाप्रभुसे श्रीकृष्णनामका उपदेश पाकर सभी श्रीकृष्णनाम-सङ्कीर्तन करने लगे। नामके प्रभावसे और महाप्रभुकी कृपासे सभी हँसने, गाने और नृत्य करने लगे॥ 21 ॥ संन्यासियोंके द्वारा मायावाद छोड़कर श्रीकृष्णकी कथाका आलाप करते हुए इष्टगोष्ठी :- प्रभुरे प्रणत हैल संन्यासीर गण। आत्ममध्ये गोष्ठी करे छाड़ि' अध्ययन ॥ 22 ॥ अनुवाद—सभी मायावादी संन्यासी महाप्रभुके शरणागत हो गये। आगे अनुभाष्य देखें ॥ 22 ॥ अनुभाष्य—संन्यासी अपने-अपने वेदान्त-पठनको परित्याग करके अपनी गोष्ठीमें मिलकर महाप्रभुके द्वारा प्रदर्शित भक्तिपथके सम्बन्धमें आलाप करनेमें प्रवृत्त हुए॥ 22 ॥ प्रकाशानन्द सरस्वतीके किसी एक शिष्यके द्वारा सभामें चर्चा करते हुए महाप्रभुको 'नारायण' मानकर उनके द्वारा की गयी वेदान्तकी चिद्-विलास व्याख्याकी स्तुति और शङ्करके मायावादकी व्याख्याकी निन्दा :- प्रकाशानन्देर शिष्य एक ताँहार समान। सभामध्ये कहे प्रभुर करिया सम्मान ॥ 23 ॥ “श्रीकृष्णचैतन्य हय 'साक्षात् नारायण' । 'व्याससूत्रेर्' अर्थ करेन अति मनोरम ॥ 24 ॥ उपनिषदेर करेन मुख्यार्थ व्याख्यान। शुनिय़ा पण्डित-लोकेर जुड़ाय़ मन-काण ॥ 25 ॥ सूत्र-उपनिषदेर मुख्यार्थ छाड़िय़ा। आचार्य 'कल्पना' करे आग्रह करिया ॥ 26 ॥ आचार्य-कल्पित अर्थ ये पण्डित शुने। मुखे 'हय' 'हय' करे, हृदय ना माने ॥ 27 ॥ अनुवाद—प्रकाशानन्द सरस्वतीके एक शिष्य जो ज्ञानमें उन्हींके ही समान थे, वे सभामें महाप्रभुका सम्मान करते हुए कहने लगे, — “श्रीकृष्णचैतन्य 'साक्षात् श्रीमन्नारायण' हैं और वे 'व्याससूत्रका' (वेदान्त-सूत्रका) अत्यन्त सुन्दर और हृदयग्राही अर्थ करते हैं। वे उपनिषदोंके मुख्य अर्थकी व्याख्या करते हैं, जिसे सुनकर पण्डितोंके भी मन और कान तृप्त हो जाते हैं। व्याससूत्र और उपनिषदोंके मुख्य अर्थको छोड़कर श्रीशङ्कराचार्यका आग्रह उनके अपने कल्पित-मतकी स्थापनाके लिये ही था। श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा कल्पित अर्थोंको जो पण्डित श्रवण करते हैं, वे श्रीशङ्कराचार्यका सम्मान करनेके लिये मुखसे 'हाँ' 'हाँ' तो कहते हैं, किन्तु उनका हृदय उन्हें स्वीकार नहीं करता ॥ 23-27 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आचार्य'—शङ्कराचार्य ॥ 26 ॥ ज्ञानमार्गमें फल्गु-वैराग्यसे मायापर विजय असम्भव :- श्रीकृष्णचैतन्य-वाक्य दृढ़ सत्य मानि। कलिक़ाले संन्यासे 'संसार' नाहि जिनि ॥ 28 ॥ महाप्रभुकी 'हरेर्नाम' श्लोकके अर्थकी व्याख्याकी प्रशंसा :- हरेर्नाम-श्लोकेर येइ करिला व्याख्यान। सेइ सत्य सुखदार्थ परम प्रमाण ॥ 29 ॥ भक्ति ही मुक्तिदात्री और नामाभास ही मुक्तिप्रद :- भक्ति बिना मुक्ति नहे, भागवते कय। कलिक़ाले नामाभासे सुखे मुक्ति हय ॥ 30 ॥ अनुवाद—मैं श्रीकृष्णचैतन्यके वचनोंको परम सत्य मानता हूँ। कलिकालमें केवल संन्यासके द्वारा संसारसे उद्धार प्राप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने हरेर्नाम-श्लोककी जो व्याख्या की है, वही सत्य और परम प्रमाण है जिसे सुनकर सुख प्राप्त होता है। श्रीमद्भागवतमें कहा गया है कि भक्तिके बिना केवल ज्ञानसे मुक्तिकी प्राप्ति नहीं हो सकती। कलियुगमें तो नामाभाससे ही अनायास मुक्तिकी प्राप्ति हो जाती है॥ 28-30 ॥ 480 |

पचीसवाँ अध्याय 25/31-36 ] श्रीमद्भागवत (10/14/4) में :- श्रेयःसृतिं भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये। तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद् यथा स्थूलतुषावघातिनाम् ॥ 31 ॥ अनुवाद-हे विभो ! आपमें भक्ति ही कल्याणका पथ है, उसे परित्याग करके जो सब व्यक्ति केवल ज्ञान प्राप्तिके लिये अर्थात् 'मैं ब्रह्म' हूँ, इसको ही स्थिर रूपमें जाननेके लिये अनेक प्रकारके कष्ट स्वीकार करते हैं, खाली भूसीको पीसनेवालोंको जिस प्रकार चावल नहीं मिलते, उसी प्रकार, उन्हें अन्तमें क्लेशमात्र ही प्राप्त होता है ॥ 31 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/22 संख्या देखें ॥ 31 ॥ श्रीमद्भागवत (10/2/32) में :- येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय- स्तभावादविशुद्धबुद्धयः । आरुह्य कृच्छ्रं पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥ 32 ॥ अनुवाद-हे कमलनयन, जो 'मैं विमुक्त हो गया हूँ', ऐसा कहकर अभिमान करते हैं, वे आपमें भक्तिरहित होनेके कारण अशुद्ध बुद्धिवाले हैं। वे बहुत कष्ट करके मायासे अतीत परमपद ब्रह्म तक आरोहण करके भी भगवद्भक्तिके अनादरके कारण अधःपतित होते हैं ॥ 32 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/30 संख्या देखें ॥ 32 ॥ ब्रह्म-शब्दका वास्तविक अर्थ :- 'ब्रह्म'-शब्दे कहे 'षडैश्वर्यपूर्ण भगवान्'। ताँरे 'निर्विशेष' स्थापि, 'पूर्णता' हय हान ॥ 33 ॥ अनुवाद-'ब्रह्म'-शब्दका मुख्य अर्थ षडैश्वर्यपूर्ण स्वयं भगवान् होता है। उनको 'निर्विशेष' कहनेसे उनकी 'पूर्णता'में हानि होती है अर्थात् यह उनकी अपूर्ण व्याख्या है ॥ 33 ॥ अनुभाष्य-भगवान्‌को 'निर्विशेष' कहकर स्थापित करनेसे उनके अप्राकृत सविशेषरूपके अभावसे उनकी पूर्णशक्तिमत्तामें हानि होती है। निर्विशेष होना-एक शक्तिका अपूर्ण परिचय मात्र है ॥ 33 ॥ श्रुति और पुराणमें अवरोह-पथसे अप्राकृत-चिद्विलासका दर्शन, तर्कमूलक आरोहपथसे मायातीत चिद्विलासको मायिक जड़विलास समझना ही पाखण्ड या महाअपराध :- श्रुति-पुराण कहे,-कृष्णेर चिच्छक्ति-विलास। ताहा नाहि मानि' पण्डित करे उपहास ॥ 34 ॥ चिदानन्द कृष्णविग्रहे 'मायिक' करि' मानि। एइ बड़ 'पाप',-सत्य चैतन्येर वाणी ॥ 35 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 34-35 ॥ अनुभाष्य-सभी वेदशास्त्र और पुराण श्रीकृष्णके चिच्छक्ति-विलासको परमनित्य कहकर स्थापित करते हैं। अपने भोगमय जड़ीय-पाण्डित्यके अभिमानवशतः पण्डिताभिमानी ज्ञानी लोग 'चिच्छक्तिके विलास नहीं हो सकते और वह मायाशक्तिमें-से ही एक हैं',-ऐसे असत् ज्ञानसे भ्रान्त होकर श्रीकृष्णका उपहास करते हैं। निर्विशेषवादी सच्चिदानन्द श्रीकृष्णविग्रहको माया- कल्पित और मायासे निर्मित ईश्वरविग्रह मानकर भगवान्‌के नित्य सविशेषत्वको नहीं समझ पाते। उनकी दाम्भिकता (घमण्ड) अथवा नास्तिकता ही बहुत बड़ा अपराध है। श्रीमन्महाप्रभुके वचनानुसार सविशेष सच्चिदानन्द श्रीकृष्ण विग्रह-नित्य-सत्य-चिद्-विलासमय है, यही वास्तविक सत्य है ॥ 34-35 ॥ निर्विशेष-रूपकी अपेक्षा चिद्विलासमय रूपका श्रेष्ठत्व :- श्रीमद्भागवत (3/9/3) में- नातः परं परम यद्भवतः स्वरूप- मानन्दमात्रमविकल्पमविद्धवर्चः। पश्यामि विश्वसृजमेकमविश्वमात्मन् भूतेन्द्रियात्मकमदस्त उपाश्रितोऽस्मि ॥ 36 ॥ । 481

[ 25/36-38 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला निर्विशेषवादियोंका 'मायाधीश' भगवद्-विग्रहको 'मायिक' समझनेके कारण उनकी नरकमें गति :- श्रीमद्भागवत (3/9/4) में- तद्वा इदं भुवनमङ्गल मङ्गलाय ध्याने स्म नो दर्शितं त उपासकानाम्। तस्मै नमो भगवतेऽनुविधेम तुभ्यं योऽनादृतो नरकभाग्भिरसत्प्रसङ्गैः ॥ 37 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 36-37 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे परम, आपके इस आनन्दमात्र, अद्वयज्ञान और मायातीत तेजःस्वरूप, -जिस स्वरूपको मैं अब देख रहा हूँ, इससे श्रेष्ठ स्वरूप और कोई नहीं है। हे आत्मन्, विश्वसृजनकारी होनेपर भी विश्वसे पृथक् भूतेन्द्रियोंके कारणस्वरूप आपका यह जो रूप देख रहा हूँ, मैं इसके ही शरणागत हो रहा हूँ। हे भुवनमङ्गल, हमारे मङ्गलके लिये हमारी उपासनाके योग्य आपका यह स्वरूप, -जिसे आपने ध्यानमें दिखलाया है, उसी भगवद्-स्वरूपको-हम नमस्कार करते हैं और उसीकी सेवा करते हैं। असत् प्रसङ्गसे दूषित नरकगामी व्यक्ति इस नित्यमूर्तिका आदर नहीं करते॥ 36-37 ॥ अनुभाष्य-गर्भोदकशायीकी नाभिसे ब्रह्माके उत्पन्न होनेपर भी उन पुरुषको नहीं जान पानेके कारण, वे जलमें प्रविष्ट होकर तपस्याके द्वारा भगवान्‌का स्तव करते-करते निम्नलिखित दो श्लोकोंमें उनके निर्विशेष रूपकी अपेक्षा सविशेष चिद्विलाससमय सच्चिदानन्द विग्रहके श्रेष्ठ होनेका वर्णन कर रहे हैं,- हे परम (परमेश), अविद्धवर्चः (अविद्धं प्रकृत्या अनाक्रान्तं वर्चः तेजः यस्य तत् मायातीत-स्वरूपत्वात् अनावृत-प्रकाशम् अतः) अविकल्पं (न विद्यते विचित्रः कल्पः सृष्टिः यत्र तम् अद्वयज्ञानम्) आनन्दमात्रम् (आनन्दं निर्विशेषचिद्रूपं ब्रह्म मात्रा अंशः यस्य तं) यत् भवतः (तव) स्वरूपं (पूर्णभगवद्रूपं) तत् अतः (रूपात्) परं (भिन्नं) न पश्यामि। हे आत्मन् (परमात्मन्), विश्वसृजं (विश्वसृष्टि-कर्त्तारम्) एकम् (अद्वितीयम्) अविश्वं (नश्वरात् विश्वस्मात् अन्यत् भिन्नम् अक्षयत्वात्) भूतेन्द्रियात्मकं (भूतानाम् इन्द्रियाणां च आत्मकं कारणम्) ते (तव) अदः (अप्राकृतं) रूपम् उपाश्रितः अस्मि (शरणं यामि)। हे भुवनमङ्गल (जीवैककल्याणनिलय,) तत् वै (तदेव इदं रूपम्) उपासकानां नः (अस्माकं) मङ्गलाय ध्याने ते (त्वया) दर्शितं स्म। असत्प्रसङ्गैः (श्रौतमार्ग विरोधि-निर्विशेष-ब्रह्म-विचारपर- कुतर्कनिष्ठैः अज्ञानकल्पितवाक्यैः) नरकभाग्भिः (नरकगामिभिः केश्चित् नास्तिकैः) यः (पुरुषः त्वं) न आदृतः (नैव स्वीकृतः), तस्मै भगवते तुभ्यं नमः अनुविधेम (वयम् अनुवृत्त्या नमस्करवाम)। श्लोक-भावानुवाद-हे परमेश! देश, काल आदिके आवरणसे रहित आपका प्रकाशमय, अद्वयज्ञान, आनन्दमात्र निर्विशेष ब्रह्मस्वरूप जो आपका अंश है, उसे मैं आपके पूर्ण भगवद्रूपसे भिन्न नहीं देख रहा हूँ। हे आत्मन्! इसलिये विश्वकी सृष्टि करनेवाले, अद्वितीय, अतः विश्वसे भिन्न एवं जीवों और उनकी इन्द्रियोंके कारणस्वरूप आपके इस अप्राकृत सविशेष रूपका ही मैं आश्रय लेता हूँ। हे भुवनमङ्गल! हम आपके इस रूपके उपासक हैं। आपने हमारे कल्याणके लिये ही ध्यानयोगमें उस रूपको दिखलाया है। श्रौतमार्ग-विरोधी निर्विशेष ब्रह्म-विचारपरक कुतार्किक व्यक्ति आपके इस स्वरूपको सच्चिदानन्दमय विग्रह न मानकर मायामय कहकर अनादर करते हैं और नरकमें पतित होते हैं। मैं षडैश्वर्ययुक्त आपको पुनः-पुनः नमस्कार करता हूँ॥ 37 ॥ अप्राकृत श्रीकृष्णकी नराकृतिको देखकर ही पाखण्डियोंकी प्राकृत मर्त्यबुद्धि :- श्रीमद्भगवद्गीता (9/11)में- अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तः सर्वभूतमहेश्वरम् ॥ 38 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 38 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मैं जब मनुष्यके आकारमें प्रकाशित होता हूँ, तब मूढ़लोग मेरी अवज्ञा करते हैं अर्थात् वे मेरी नित्य चिन्मयदेहको मायाश्रित मानकर 482 ।

अवज्ञा करते हैं। क्योंकि, वे सभी प्राणियोंके महेश्वर- स्वरूप श्रीकृष्णमूर्तिके सर्वोत्तम चिन्मय स्वभावको नहीं जानते हैं॥ 38 ॥ बार-बार गिराता हूँ (मैं उनके भीषण अपराधोंका उस प्रकार फल प्रदान करता हूँ-यह अर्थ है।)॥39॥ अनुभाष्य- सर्वभूतमहेश्वरं (सर्वप्राणिनामधीश्वरं मम) परं भावम् (अप्राकृत-रसविग्रह-तत्त्वम्) अजानन्तः मूढाः (अक्षजज्ञानमुग्धाः) मानुषीं (भक्तेच्छावशात् भक्ताह्लादन-निमित्तात् मनुष्याकारां) तनुं (शुद्धसत्त्वमयीमपि) आश्रितं (धृतं) माम् (अवतीर्णम्) अवजानन्ति (अवमन्यन्ते) । श्लोक-भावानुवाद-सब प्राणियोंके अधीश्वर मेरे परम भाव अर्थात् अप्राकृत रसविग्रह-तत्त्वको प्राकृत-इन्द्रियोंके ज्ञानसे मुग्ध मूढ़ लोग नहीं जानते हैं। भक्तोंकी इच्छाके वशीभूत होकर उनको आनन्द प्रदान करनेके लिये मनुष्यरूपमें (शुद्धसत्त्वमय) शरीर धारण करके अवतीर्ण होनेपर वे मेरी अवज्ञा करते हैं॥ 38 ॥ गुरुकी अवज्ञा अथवा गुरुसे विरोधके कारण तर्कपन्थामें श्रौतपन्थाके शक्ति-परिणामको अस्वीकार करनेके कारण विवर्त्तवाद :- सूत्रेर परिणामवाद, ताहा ना मानिया। 'विवर्त्तवाद' स्थापे, 'व्यास भ्रान्त' बलिया ॥ 40 ॥ विवर्त्तवादके आश्रयमें लक्षणा-वृत्तिसे वेदान्त-उपनिषद्के कल्पित अर्थके द्वारा असुर-पाखण्ड-मोहन :- एइ त' कल्पित अर्थ मने नाहि भाय। शास्त्र छाड़ि' कुकल्पना पाषण्डे बुझाय ॥ 41 ॥ परमार्थ भगवत्-कृपाको छोड़कर बाँझ वितण्डका आश्रय :- परमार्थ-विचार गेल, करि मात्र 'वाद'। काँहा मुक्ति पाब, काँहा कृष्णेर प्रसाद ॥ 42 ॥ पाषण्डियोंकी गति :- श्रीमद्भगवद्गीता (16/19)में- तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ 39 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 39 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरी श्रीमूर्तिके विद्वेषी क्रूर नराधमोंको मैं इस संसारमें आसुरी आदि योनियोंमें बार-बार डालता हूँ॥ 39 ॥ अनुभाष्य- [मां] द्विषतः (द्वेषपरायणान्) क्रूरान् (हिंस्रान्) अशुभान् (निषिद्धाचाररतान्) नराधमान् तान् (जनान्) एव संसारेषु (जन्ममृत्युमार्गेषु) आसुरीषु योनिषु (हिंसालोभसमन्वितासु तिर्यक्-पक्षादि-योनिषु) अजस्रं (पुनः पुनः) अहं क्षिपामि (तेषां भीषणापराधानां तादृशमेव फलं ददामीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-मुझसे द्वेष करनेवाले, क्रूर, निषिद्ध-आचारमें रत नराधमोंको मैं इस जन्म-मृत्युरूपी संसारमें हिंसा-लोभ स्वभाववाली पक्षी-पशु आदि योनियोंमें अनुवाद-वेदान्तसूत्रके शक्ति-परिणामवादको स्वीकार नहीं करके श्रीशङ्कराचार्यने व्यासदेवको भ्रान्त कहकर विवर्त्तवादकी स्थापना की। शास्त्रोंके सहज अर्थोंको छोड़कर उन्होंने अपने विचारोंके द्वारा शास्त्रोंके कल्पित अर्थ किये जो विचारशील व्यक्तियोंको आकर्षित नहीं करते। उन्होंने ऐसा केवल पाखण्डियोंको आकर्षित करनेके लिये किया। कैसे परमार्थ लाभ होगा, निरपेक्ष रूपसे इसका विचार नहीं करके केवल अपने सम्प्रदायके मतको स्थापित करनेके लिये उन्होंने वाद-विवाद करके दूसरोंके मतोंका ही खण्डन करनेकी चेष्टा की। मायावादी और पाखण्डी लोगोंको कैसे मुक्ति और श्रीकृष्णकी कृपा प्राप्त हो, इस बातपर उन्होंने विचार नहीं किया ॥ 40-42 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 7/121-126 संख्या देखें ॥ 40 ॥ शाङ्करभाष्य-मेघके द्वारा वेदान्तरूपी सूर्यको ढकना :- व्याससूत्रे अर्थ आचार्य करियाछे आच्छादन। एइ हय सत्य श्रीकृष्णचैतन्य-वचन ॥ 43 ॥ । 483

[ 25/43-55 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीचैतन्य-मत ही 'सार'; अद्वैत-मत सम्पूर्णतः असार :- चैतन्य-गोसाञि येइ कहे, सेइ मत सार। आर यत मत, सेइ सब छारखार॥"44॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्यका वचन कि श्रीशङ्कराचार्यने व्यास-सूत्रोंके अर्थोंको आच्छादित किया है, सत्य ही है। श्रीचैतन्य गोसाईं जो कुछ कहते हैं, वही सभी मतोंका सार है। उसके अतिरिक्त अन्य जितने भी मत हैं, वे सब सारहीन हैं॥"43-44॥ श्रीगौरभक्त प्रकाशानन्दकी उक्ति; उद्धारके बाद उनके 'प्रबोधानन्द' नामकी प्राप्तिके प्रमाणका अभाव :- एत कहि' सेइ करे कृष्णसङ्कीर्त्तन। शुनि' प्रकाशानन्द किछु कहेन वचन॥45॥ अनुवाद—इतना कहकर प्रकाशानन्द सरस्वतीका वह शिष्य श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन करने लगा, जिसे सुनकर प्रकाशानन्द सरस्वती कहने लगे॥45॥ 'केवलाद्वैतवाद'को स्थापित करनेके उद्देश्यसे शङ्करका सात्वत शास्त्रोंके खण्डन करनेकी चेष्टासे 'प्रच्छन्न-नास्तिकता' अथवा भगवद्-अविश्वास :- “आचार्येर आग्रह—'अद्वैतवाद' स्थापिते। ताते सूत्रेर व्याख्या करे अन्य रीते॥46॥ 'भगवत्ता' मानिते 'अद्वैत' ना याय स्थापन। अतएव सब शास्त्र करये खण्डन॥47॥ कुतर्कपर आधारित मतवादका फल :- येइ ग्रन्थकर्त्ता चाहे स्व-मत स्थापिते। शास्त्रेर सहज अर्थ नहे ताँहा हैते॥48॥ छः प्रकारके दार्शनिकोंके विभिन्न मतवाद और वैदिक मत :- 'मीमांसक' कहे,—'ईश्वर हय कर्मेर अङ्ग।' 'सांख्य' कहे,—'जगतेर प्रकृति कारण॥'49॥ 'न्याय' कहे,—'परमाणु हैते विश्व हय।' 'मायावादी'—निर्विशेष-ब्रह्मे 'हेतु' कय॥50॥ 'पातञ्जल' कहे,—'ईश्वर हय स्वरूप-आख्यान।' वेदमते कहे ताँरे—'स्वयं भगवान्'॥51॥ श्रीव्यासके द्वारा ब्रह्मसूत्रमें सभी मतवादोंका खण्डन :- छयेर छय मत व्यास कैला आवर्त्तन। सेइ सब सूत्र लञा 'वेदान्त'-वर्णन॥52॥ 'वेदान्त'के मतानुसार ब्रह्म—चिद्विलास सविशेष अथवा सच्चिदानन्दमय विग्रह :- 'वेदान्त'-मते,—ब्रह्म 'साकार' निरूपण। 'निर्गुण'—व्यतिरेके, तिँहो हय त' 'सगुण'॥53॥ दूसरोंके मतका खण्डन करके अपने-अपने मतवादको स्थापित करनेकी चेष्टा :- परम कारण ईश्वरे केह नाहि माने। स्व-स्व-मत स्थापे परमतेर खण्डने॥54॥ अनिश्चयतापर आधारित मनोधर्मी तर्कपन्थी षड्दर्शनको छोड़कर श्रौतपन्थी महाजन अथवा शुद्धभक्त ही आश्रय ग्रहण करने योग्य :- ताते छय दर्शन हैते 'तत्त्व' नाहि जानि। 'महाजन' येइ कहे, सेइ 'सत्य' मानि॥55॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥46-55॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अन्य संन्यासियोंके भक्ति-सापेक्ष वचनोंको श्रवण करके प्रकाशानन्द सरस्वती कह रहे हैं,—“अद्वैतवाद-स्थापनमें अत्यन्त आग्रहके कारण श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा ब्रह्मसूत्रकी अन्य प्रकारकी व्याख्या की गयी है। भगवत्ता माननेपर 'अद्वैतवाद' नहीं रहता। इसलिये आचार्यने भगवद्-तत्त्वको प्रतिपादित करनेवाले अन्य सभी शास्त्रोंके खण्डनकी चेष्टा की है। अपने मतको स्थापित करनेके लिये शास्त्रोंके सहज अर्थका परित्याग करना ही 'मतवाद'का नियम है। देखो (1) जैमिनी आदि मीमांसकोंने वेदोंका मुख्य तात्पर्य जो भक्ति है, उसे त्याग करके ईश्वरको 'कर्मका अङ्ग' बना दिया है। (2) कपिलादि निरीश्वर सांख्यकारोंने वास्तविक वेदार्थका परित्याग करके प्रकृतिको जगत्का कारण कहकर निर्देश किया है। (3) गौतम और 484

पचीसवाँ अध्याय 25/46–60 ] कणादादिने न्याय और वैशेषिक-शास्त्रोंमें परमाणुको ही विश्वका कारण कहा है। (4) उसी प्रकार अष्टावक्रादि मायावादियोंने निर्विशेष-ब्रह्मको ही जगत्का कारण कहकर दिखलाया है। (5) पतञ्जलि आदि राजयोगियोंने अपने योगशास्त्रमें कहे गये कल्पनामय ईश्वरको 'स्वरूप-तत्त्व' कहकर स्थापित किया है। इन सभी मतवाद परायण आचार्योंने वेदसिद्ध स्वयं भगवान्‌को परित्याग करके उनके खण्डरूपमें (खण्ड-प्रतीतिमय) एक-एक 'मत'को स्थापित किया है। षड्दर्शनके छः मतोंकी उत्तमरूपसे आलोचना करके उनके मतोंका खण्डन करके श्रीव्यासदेवने भगवत्-प्रतिपादक सभी वेदसूत्रोंका अवलम्बन करके वेदान्तसूत्रकी रचना की है। वेदान्त-मतमें, ब्रह्म—सच्चिदानन्द-स्वरूप साकार हैं। निर्विशेषवादी ब्रह्मको 'निर्गुण' और विशेष-स्थानपर भगवान्‌को 'सगुण' (त्रिगुणमय) कहकर प्रतिपादित करते हैं। वास्तवमें तत्त्ववस्तु केवल निर्गुण अथवा त्रिगुणातीत नहीं है, परन्तु वे—अनन्तचिद्गुणोंके आधार 'सगुण' विग्रह हैं। मतवादियोंके मतानुसार परम-कारण ईश्वरको (विष्णुको) प्राप्त नहीं किया जा सकता अर्थात् कोई भी सर्वेश्वरेश्वर सर्वकारण-कारण विष्णुको नहीं मानता, (अपितु सभीने दूसरे-दूसरे मतोंका खण्डन करके अपने-अपने मतको स्थापित करनेका प्रयास किया है)। इसलिये महाजन जो कहते हैं, उसे ही 'सत्य' कहकर जानना होगा॥ 46–55॥ महाभारतके वनपर्व (313/117)में— तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नासावृषिर्यस्य मतं न भिन्नम्। धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः॥ 56॥ अनुवाद—तर्क सहजरूपमें ही प्रतिष्ठा-शून्य होता है, सभी श्रुतियाँ भी भिन्न-भिन्न हैं, जिसका मत भिन्न न हो, वह 'ऋषि' ही नहीं हो सकता; इसलिये धर्मतत्त्व गूढ़रूपसे ढका हुआ है अर्थात् शास्त्रादि पढ़कर धर्मतत्त्वको जानना कठिन है। इसलिये जिन्हें साधुओंने 'महाजन' कहकर निर्णय किया है, वे जिस मार्गको 'शास्त्र-मार्ग' कहते हैं, उसी मार्गपर ही अन्य सभी व्यक्तियोंका चलना उचित है॥ 56॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 17/186 संख्या देखें॥ 56॥ चैतन्यसिद्धान्त-वाणी ही अनुसरणके योग्य :— श्रीकृष्णचैतन्य-वाणी—अमृतेर धार। तिँहो ये कहये वस्तु, सेइ 'तत्त्व'-सार॥" 57॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी वाणी अमृतकी धाराके समान है। उन्होंने जिसे परमतत्त्व कहकर स्थापित किया है, वही सभी तत्त्वोंका सार है॥" 57॥ महाराष्ट्र [ब्राह्मणका शुभ संवाद] देनेके लिये जाना :— ए सब वृत्तान्त शुनि' महाराष्ट्र प्रभुरे कहिते सुखे करिला गमन॥ 58॥ अनुवाद—यह सब वृत्तान्त सुनकर महाराष्ट्र ब्राह्मण बड़े आनन्दित होकर महाप्रभुको यह शुभ-संवाद सुनानेके लिये गये॥ 58॥ काशीमें दैनिक नियमके अनुसार पञ्चनदमें स्नानके बाद महाप्रभुका श्रीबिन्दुमाधवके दर्शनके लिये जाना :— हेनकाले महाप्रभु पञ्चनदे स्नान करि'। देखिते चलियाछेन 'बिन्दुमाधव हरि'॥ 59॥ अनुवाद—उसी समय महाप्रभु पञ्चनदमें स्नान करनेके बाद 'बिन्दुमाधव हरि'के दर्शन करनेके लिये जा रहे थे॥ 59॥ महाराष्ट्र [ब्राह्मणकी बात] सुनकर महाप्रभुकी प्रसन्नता :— पथे सेइ विप्र सब वृत्तान्त कहिल। शुनि' महाप्रभु सुखे ईषत् हासिल॥ 60॥ । 485

[ 25/60-70 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-मार्गमें ही उन ब्राह्मणकी महाप्रभुसे भेंट हुई और उन्होंने महाप्रभुको प्रकाशानन्द सरस्वतीकी सभामें हुई सब बातें कह सुनायी। उसे सुनकर महाप्रभु प्रसन्न होकर मन्द-मन्द मुस्कुराने लगे॥60॥ श्रीबिन्दुमाधवके दर्शनसे महाप्रभुका आवेश और नृत्य :- माधव-सौन्दर्य देखि' आविष्ट हइला। अङ्गनेते आसि' प्रेमे नाचिते लागिला॥61॥ चारों भक्तोंका सङ्कीर्त्तन :- शेखर, परमानन्द, तपन, सनातन। चारिजन मिलि' करे नाम-सङ्कीर्त्तन॥62॥ नाम सङ्कीर्त्तन :- “हरि हरये नमः कृष्ण यादवाय नमः। गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन॥”63॥ चारों ओरसे असंख्य लोगोंके द्वारा हरिध्वनि :- चौदिकेते लक्ष लोक बोले 'हरि' 'हरि'। उठिल मङ्गलध्वनि स्वर्ग-मर्त्य भरि'॥64॥ अनुवाद-महाप्रभु बिन्दुमाधवके सौन्दर्यको देखकर प्रेमाविष्ट हो गये और मन्दिरके आँगनमें आकर प्रेमावेशमें नृत्य करने लगे। श्रीचन्द्रशेखर, श्रीपरमानन्द कीर्त्तनीया, श्रीतपन मिश्र, और श्रीसनातन गोस्वामी-चारों मिलकर नाम-सङ्कीर्त्तन करने लगे, - "कृष्ण, यादव, माधव, गोपाल, गोविन्द, राम, मधुसूदनादि जिनके ये सब नाम हैं, उन हरिको मैं नमस्कार करता हूँ।" चारों ओरसे लाखों लोग 'हरि' 'हरि' बोलने लगे। उस मङ्गलध्वनिसे पूरा ब्रह्माण्ड भर गया॥61-64॥ शिष्योंके साथ प्रकाशानन्दका वहाँ आगमन :- निकटे हरिध्वनि शुनि' प्रकाशानन्द। देखिते कौतुके आइला लञा शिष्यवृन्द॥65॥ अनुवाद-निकटसे ही आ रही हरिध्वनिको सुनकर श्रीप्रकाशानन्द सरस्वती भी अपने शिष्योंको साथ लेकर उस स्थानपर कौतूहलवशतः आ पहुँचे॥65॥ महाप्रभुके नृत्य और प्रेम-माधुर्यके दर्शनसे उनका भी कीर्त्तन :- देखिया प्रभुर नृत्य, प्रेम, देहेर माधुरी। शिष्यगण-सङ्गे सेइ बोले 'हरि' 'हरि'॥66॥ अनुवाद-महाप्रभुके नृत्य, उनके प्रेम और उनकी देहकी माधुरीको देखकर श्रीप्रकाशानन्द सरस्वती भी अपने शिष्यों सहित 'हरि' 'हरि' बोलकर कीर्त्तन करने लगे॥66॥ भाव-दर्शनसे काशीवासियोंको विस्मय :- हर्ष, दैन्य, चापल्यादि 'सञ्चारी' विकार। देखि' काशीवासी लोकेर हैल चमत्कार॥67॥ अनुवाद-महाप्रभुमें हर्ष, दैन्य, चापल्यादि 'सञ्चारी' विकारोंको देखकर काशीवासी लोग आश्चर्यचकित हो गये॥67॥ लोगोंकी भीड़ और संन्यासियोंके दर्शनसे महाप्रभुके द्वारा अपने भाव-नृत्यका सम्वरण :- लोकसंघट्ट देखि' प्रभुर 'बाह्य' यबे हैल। संन्यासीर गण देखि' नृत्य सम्वरिल॥68॥ अनुवाद-लोगोंकी भीड़को देखकर जब महाप्रभुमें 'बाह्य' आवेश आया, तब वहाँ उपस्थित संन्यासियोंको देखकर उन्होंने नृत्य करना बन्द कर दिया॥68॥ महाप्रभु और प्रकाशानन्द, दोनोंके द्वारा परस्परकी वन्दना :- प्रकाशानन्देर प्रभु वन्दिला चरण। प्रकाशानन्द आसि' ताँर धरिल चरण॥69॥ अनुवाद-दैन्यताकी मूर्ति महाप्रभुने श्रीप्रकाशानन्दके चरणोंकी वन्दना की। परन्तु श्रीप्रकाशानन्दने आकर उनके चरणोंको पकड़ लिया॥69॥ महाप्रभुके द्वारा दैन्य-ज्ञापन :- प्रभु कहे, - "तुमि जगद्गुरु पूज्यतम। आमि तोमार ना हइ 'शिष्येर शिष्य' सम॥70॥ 486 ।

पचीसवाँ अध्याय 25/70-76 ] श्रेष्ठ हञा केने कर हीनेर वन्दन। यदि अपराधिनः भवन्ति, तदा जीवन्मुक्ताः अपि पुनः आमार सर्वनाश हय, तुमि ब्रह्म-सम ॥ 71 ॥ संसारवासनां (भोगवासनामूलम् अनर्थ) यान्ति (लभन्ते)। यद्यपि तोमार सब ब्रह्म-सम भासे। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 74 ॥ लोकशिक्षा लागि' ऐछे करिते ना आइसे ॥ "72 ॥ भगवान्‌के चरण-स्पर्शसे अपराध-मोचन :- श्रीमद्भागवत (10/34/9)— अनुवाद-महाप्रभुने स्वयंको एक भक्तके रूपमें स वै भगवतः श्रीमत्पादस्पर्शहताशुभः। प्रदर्शित करते हुए श्रीप्रकाशानन्द सरस्वतीसे कहा, - "आप भेजे सर्पवपुर्हित्वा रूपं विद्याधरार्चितम् ॥ "75 ॥ परम पूजनीय जगद्गुरु हैं और मैं आपके शिष्यके शिष्यके समान भी नहीं हूँ। आप श्रेष्ठ होकर क्यों मुझ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 75 ॥ जैसे अधमकी वन्दना कर रहे हैं? आपके द्वारा ऐसा अमृतप्रवाह भाष्य-उस साँपने श्रीकृष्णके चरणके करनेसे तो मेरी भक्तिकी हानि होनेसे मेरा सर्वनाश हो स्पर्शसे अशुभ-रहित होकर सर्प-शरीर परित्याग करके जायेगा, क्योंकि आप तो ब्रह्मके समान हैं। यद्यपि विद्याधरोंके द्वारा अर्चित पूर्वरूपको प्राप्त किया ॥ "75 ॥ आपको सभी ब्रह्मके समान प्रतीत होते हैं, तथापि आप लोक-शिक्षाके लिये ही सही, ऐसा मत कीजिये ॥" 70-72 ॥ अनुभाष्य-व्रजमें एक बार देवयात्रा अनुष्ठान-क्रियामें गोपराज श्रीनन्दने बन्धु-बान्धवों सहित सरस्वती नदीके महाप्रभुके चरणस्पर्शसे प्रकाशानन्दके द्वारा अपराधसे मुक्त तटपर उपस्थित होकर व्रत धारण करके स्वयं वनमें होनेके विषयमें बतलाना :- शयन किया था, उसी समय अङ्गिरस-ऋषियोंके उपहासके तँहो कहे, - "तोमार निन्दा पूर्वे ये करिल। फलसे उनके अभिशापसे सर्प-योनिको प्राप्त सुदर्शन-नामक तोमार चरण-स्पर्शे, सब क्षय गेल ॥ 73 ॥ गन्धर्वने श्रीनन्दपर आक्रमण किया, श्रीनन्दके कातर होकर पुकारनेसे श्रीकृष्णने आकर उस सर्पपर चरणके अनुवाद-श्रीप्रकाशानन्द सरस्वतीने कहा, - "मैंने पहले द्वारा प्रहार किया और इस प्रकार श्रीनन्दकी सर्पके द्वारा आपकी जो निन्दा की थी, आपके चरणोंका स्पर्श ग्रास बनाये जानेसे रक्षा की। श्रीकृष्णके चरणके करनेसे मेरा वह अपराध अब दूर हो गया है ॥ 73 ॥ स्पर्शके फलसे सर्पका जो अशुभ दूर हुआ था, उसका ही श्रीशुकदेव परीक्षितको वर्णन कर रहे हैं,- मुक्तगणोंकी भी भगवद्-अपराधके फलसे बन्धनदशा :- वासना-भाष्यमें उद्धृत परिशिष्ट-वचन- सः (सर्पः) वै भगवतः (कृष्णस्य) श्रीमत्पादस्पर्शहताशुभः जीवन्मुक्ता अपि पुनर्यान्ति संसारवासनाम्। (श्रीमन्तः पादस्य स्पर्शेन हतम् अशुभम्-अङ्गिरसां विरूपदर्शनात् यद्यचिन्त्यमहाशक्तौ भगवत्यपराधिनः ॥ 74 ॥ तान् उपहसनेन तेभ्यः शापरूपं यस्य तथाभूतः सन्) सर्पवपुः (सर्पयोनिमित्यर्थः) हित्वा (परित्यज्य) विद्याधरार्चितं (विद्याधरैषु अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 74 ॥ अर्चितं पूजितं) रूपं भेजे (प्राप)। अमृतप्रवाह भाष्य-जीवन्मुक्त लोग भी यदि अचिन्त्य श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 75 ॥ महाशक्तिशाली भगवान्‌के प्रति अपराध करते हैं, तो वे पुनः संसार-वासनामें पतित हो जाते हैं ॥ 74 ॥ स्वयं भगवान् होनेपर भी लोकशिक्षाके लिये महाप्रभुका जगद्गुरु आचार्यके रूपमें स्वयंको दीन जीव मानना :- अनुभाष्य- प्रभु कहे, - "'विष्णु' 'विष्णु', आमि क्षुद्र जीव हीन। अचिन्त्यमहाशक्तौ (अप्राकृत-चिच्छक्तिमति) भगवति (अधोक्षजे) जीवे विष्णु मानि-एइ अपराध-चिह्न ॥ 76 ॥ । 487

[ 25/76-84 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पाषण्डियोंका कार्य अथवा परिचय :- जीवे 'विष्णु' बुद्धि करे—येइ ब्रह्म-रुद्र-सम। नारायणे माने, तारे 'पाषण्डीते' गणन॥ 77 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“ 'विष्णु', 'विष्णु'! मैं तो एक छोटा-सा तुच्छ जीव हूँ। जीवको विष्णु मानना अपराधका लक्षण है। साधारण जीवको 'विष्णु' माननेकी बात तो छोड़ो, जो ब्रह्मा-रुद्रको भी श्रीनारायणके समान मानता है, वह 'पाखण्डी' कहलाता है॥ 76-77॥ शास्त्र-प्रमाण :- वैष्णवतन्त्र-वाक्य और पाद्मोत्तर-खण्ड (23/12)में— यस्तु नारायणं देवं ब्रह्मरुद्रादिदैवतैः। समत्वेनैव वीक्षेत स पाषण्डी भवेद्ध्रुवम्॥ ”78॥ अनुवाद—जो ब्रह्मा-रुद्रादि देवताओंके साथ श्रीनारायणको 'समान' रूपमें देखते हैं, वे निश्चय ही 'पाखण्डी' हैं॥”78॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 18/116 संख्या देखें॥ 78॥ महाप्रभुमें प्रकाशानन्दका दृढ़ विश्वास और श्रद्धा :- प्रकाशानन्द कहे,—“तुमि साक्षात् भगवान्। तबु यदि कर ताँर 'दास'-अभिमान॥ 79 ॥ तबु पूज्य हओ तुमि आमा सबा हैते। सर्वनाश हय, एइ तोमार निन्दाते॥ 80 ॥ अनुवाद—श्रीप्रकाशानन्द सरस्वतीने कहा, —“आप साक्षात् भगवान् हैं, परन्तु आप स्वयंमें भगवान्का 'दास' होनेका अभिमान कर रहे हैं। वैसा होनेपर भी आप हम सबके पूजनीय हैं, इसलिये आपकी निन्दा करनेसे मेरी पारमार्थिक सम्पत्तिका सर्वनाश हुआ है॥ 79-80॥ श्रीमद्भागवत (6/14/5)में— मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः। सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने॥ 81 ॥ अनुवाद—हे महामुने, करोड़ों-करोड़ों मुक्तों और सिद्धोंमेंसे नारायण-परायण प्रशान्तात्मा पुरुष अत्यन्त दुर्लभ है॥ 81 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 19/150 संख्या देखें॥ 81 ॥ महत् अथवा वैष्णवकी निन्दासे सर्वनाश :- श्रीमद्भागवत (10/4/46)में— आयुः श्रियं यशो धर्मं लोकानाशिष एव च। हन्ति श्रेयांसि सर्वाणि पुंसो महदतिक्रमः॥ 82 ॥ अनुवाद—मनुष्यके द्वारा महान् व्यक्तिका अनादर करनेसे उसकी आयु, श्री (सम्पत्ति), यश, धर्म, लोक-परलोक और आशीर्वाद—ये सब श्रेष्ठ वस्तुएँ नाश हो जाती हैं॥ 82 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 15/270 संख्या देखें॥ 82 ॥ श्रीमद्भागवत (7/5/32)में— नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः। महीयसां पादरजोऽभिषेकं निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत्॥ 83 ॥ अनुवाद—जब तक मनुष्योंकी मति निष्किञ्चन भगवद्भक्तोंकी पदधूलिके द्वारा अभिषिक्त नहीं होती, तब तक वह अनर्थनाशक श्रीकृष्णचरणकमलोंका स्पर्श नहीं कर पाती॥ 83 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 22/53 संख्या देखें॥ 83 ॥ अहङ्कारका त्याग करके श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें प्रणामके फलसे शुद्ध भक्तिकी प्राप्ति :- एबे तोमार पादाब्जे उपजिबे भक्ति। तथि लागि' करि तोमार चरणे प्रणति॥ ”84॥ अनुवाद—अब आपके चरणकमलोंमें मेरी भक्ति उदित हो, इसी कारण मैं आपके चरणोंमें प्रणाम कर रहा हूँ॥”84॥ 488 ।

पचीसवाँ अध्याय 25/85-95 ] सभीका वहाँपर बैठना और प्रकाशानन्दकी महाप्रभुके मुखसे शङ्करके मायावादकी समालोचना और ब्रह्मसूत्रके वास्तविक तात्पर्यके श्रवणकी इच्छा :— एत बलि' प्रभुरे लञा तथा बसिल। प्रभुरे प्रकाशानन्द पुछिते लागिल ॥ ८५ ॥ “मायावादे करिला यत दोषेर आख्यान। सबे एइ जानि' आचार्येर कल्पित व्याख्यान ॥ ८६ ॥ सूत्रेर करिला तुमि मुख्यार्थ-विवरण। ताहा शुनि' सबार हैल चमत्कार मन ॥ ८७ ॥ तुमि त' ईश्वर, तोमार आछे सर्वशक्ति। संक्षेपरूपे कह तुमि, शुनिते हय मति ॥”८८ ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीप्रकाशानन्द सरस्वती महाप्रभुको लेकर वहीं बिन्दुमाधव मन्दिरमें बैठ गये और वे महाप्रभुसे पूछने लगे,—“आपने मायावाद-भाष्यमें जो जो दोष दिखलाये हैं, उन्हें सुनकर हम सब यह समझ गये कि श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा की गयी व्याख्या उनकी मनोकल्पना है [उसे हम लोग मुखसे तो मानते थे, किन्तु हृदयसे स्वीकार नहीं कर पाते थे]। आपने सूत्रोंके मुख्य अर्थके द्वारा जो व्याख्या की है, वह अति आश्चर्यजनक है और हम उसे हृदयसे स्वीकार कर पा रहे हैं। आप तो ईश्वर हैं, सर्वशक्तिमान् हैं, इसलिये आप व्यास-सूत्रके वास्तविक अर्थ बतलानेमें समर्थ हैं। अब आप वेदान्तसूत्रोंका अर्थ संक्षेपमें बतलाइये, उसे सुननेकी हमारी अभिलाषा है॥”८५-८८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘संक्षेपरूपे कह'—प्रत्येक सूत्रका मुख्य-अर्थ, जो आपने कहा था, उसे मैंने सुना है। अब मैं वेदान्तके मुख्य तात्पर्यको संक्षेपमें सुननेकी इच्छा करता हूँ॥८८॥ श्रौतपन्थी महाप्रभुका दैन्यवशतः स्वयंको शिष्यरूपी दीन जीव मानकर व्यास-गुरु-पूजा :— प्रभु कहे,—“आमि 'जीव', अति तुच्छ-ज्ञान! व्याससूत्रेरे गम्भीर अर्थ, व्यास-भगवान् ॥ ८९ ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं एक साधारण 'जीव' हूँ, इसलिये मुझमें ज्ञान भी बहुत कम है। किन्तु व्याससूत्रका अर्थ तो बहुत गम्भीर है, क्योंकि व्यासदेव तो भगवान् हैं॥८९॥ जीवोंके हितके लिये व्यासदेव स्वयं सूत्रकार होनेपर भी भाष्यकार, उसीमें वास्तविक तात्पर्यके बोधको स्वीकार करना :— ताँर सूत्रेर अर्थ कोन जीव नाहि जाने। अतएव आपने सूत्रार्थ करियाछे व्याख्याने ॥ ९० ॥ येइ सूत्रकर्त्ता, से यदि करये व्याख्यान। तबे सूत्रेर मूल अर्थ लोकेर हय ज्ञान ॥ ९१ ॥ अनुवाद—श्रीव्यासदेवके द्वारा रचित सूत्रोंका अर्थ कोई भी जीव नहीं जान सकता है, इसलिये उन्होंने स्वयं ही सूत्रोंके अर्थकी व्याख्या की है। यदि सूत्रकी रचना करनेवाला स्वयं ही अपने द्वारा रचित सूत्रकी व्याख्या करे, तभी सूत्रके मुख्य अर्थको लोग जान सकते हैं॥९०-९१॥ वेदरूपी वृक्षका बीज—प्रणव, माता (अङ्कुर)—गायत्री, फल—चतुःश्लोकी भागवत :— प्रणवेर येइ अर्थ, गायत्रीते सेइ हय। सेइ अर्थ चतुःश्लोकीते विवरिया कय ॥ ९२ ॥ ब्रह्म-सम्प्रदायमें आम्नाय-परम्परामें भागवत-कीर्तन-वर्णन :— ब्रह्मारे ईश्वर चतुःश्लोकी ये कहिला। ब्रह्मा नारदे सेइ उपदेश कैला ॥ ९३ ॥ नारद सेइ अर्थ व्यासेरे कहिला। शुनि' वेदव्यास मने विचार करिला ॥ ९४ ॥ ब्रह्मसूत्रके भाष्यस्वरूप चतुःश्लोकीका विस्तार अथवा भागवतकी रचनाका सङ्कल्प :— 'एइ अर्थ—आमार सूत्रेर व्याख्यानुरूप। 'भागवत' करिब सूत्रेर भाष्यस्वरूप ॥' ९५ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥९२-९५॥ । 489