श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1933, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपचीसवाँ अध्याय 25/70-76 ] श्रेष्ठ हञा केने कर हीनेर वन्दन। यदि अपराधिनः भवन्ति, तदा जीवन्मुक्ताः अपि पुनः आमार सर्वनाश हय, तुमि ब्रह्म-सम ॥ 71 ॥ संसारवासनां (भोगवासनामूलम् अनर्थ) यान्ति (लभन्ते)। यद्यपि तोमार सब ब्रह्म-सम भासे। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 74 ॥ लोकशिक्षा लागि' ऐछे करिते ना आइसे ॥ "72 ॥ भगवान्के चरण-स्पर्शसे अपराध-मोचन :- श्रीमद्भागवत (10/34/9)— अनुवाद-महाप्रभुने स्वयंको एक भक्तके रूपमें स वै भगवतः श्रीमत्पादस्पर्शहताशुभः। प्रदर्शित करते हुए श्रीप्रकाशानन्द सरस्वतीसे कहा, - "आप भेजे सर्पवपुर्हित्वा रूपं विद्याधरार्चितम् ॥ "75 ॥ परम पूजनीय जगद्गुरु हैं और मैं आपके शिष्यके शिष्यके समान भी नहीं हूँ। आप श्रेष्ठ होकर क्यों मुझ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 75 ॥ जैसे अधमकी वन्दना कर रहे हैं? आपके द्वारा ऐसा अमृतप्रवाह भाष्य-उस साँपने श्रीकृष्णके चरणके करनेसे तो मेरी भक्तिकी हानि होनेसे मेरा सर्वनाश हो स्पर्शसे अशुभ-रहित होकर सर्प-शरीर परित्याग करके जायेगा, क्योंकि आप तो ब्रह्मके समान हैं। यद्यपि विद्याधरोंके द्वारा अर्चित पूर्वरूपको प्राप्त किया ॥ "75 ॥ आपको सभी ब्रह्मके समान प्रतीत होते हैं, तथापि आप लोक-शिक्षाके लिये ही सही, ऐसा मत कीजिये ॥" 70-72 ॥ अनुभाष्य-व्रजमें एक बार देवयात्रा अनुष्ठान-क्रियामें गोपराज श्रीनन्दने बन्धु-बान्धवों सहित सरस्वती नदीके महाप्रभुके चरणस्पर्शसे प्रकाशानन्दके द्वारा अपराधसे मुक्त तटपर उपस्थित होकर व्रत धारण करके स्वयं वनमें होनेके विषयमें बतलाना :- शयन किया था, उसी समय अङ्गिरस-ऋषियोंके उपहासके तँहो कहे, - "तोमार निन्दा पूर्वे ये करिल। फलसे उनके अभिशापसे सर्प-योनिको प्राप्त सुदर्शन-नामक तोमार चरण-स्पर्शे, सब क्षय गेल ॥ 73 ॥ गन्धर्वने श्रीनन्दपर आक्रमण किया, श्रीनन्दके कातर होकर पुकारनेसे श्रीकृष्णने आकर उस सर्पपर चरणके अनुवाद-श्रीप्रकाशानन्द सरस्वतीने कहा, - "मैंने पहले द्वारा प्रहार किया और इस प्रकार श्रीनन्दकी सर्पके द्वारा आपकी जो निन्दा की थी, आपके चरणोंका स्पर्श ग्रास बनाये जानेसे रक्षा की। श्रीकृष्णके चरणके करनेसे मेरा वह अपराध अब दूर हो गया है ॥ 73 ॥ स्पर्शके फलसे सर्पका जो अशुभ दूर हुआ था, उसका ही श्रीशुकदेव परीक्षितको वर्णन कर रहे हैं,- मुक्तगणोंकी भी भगवद्-अपराधके फलसे बन्धनदशा :- वासना-भाष्यमें उद्धृत परिशिष्ट-वचन- सः (सर्पः) वै भगवतः (कृष्णस्य) श्रीमत्पादस्पर्शहताशुभः जीवन्मुक्ता अपि पुनर्यान्ति संसारवासनाम्। (श्रीमन्तः पादस्य स्पर्शेन हतम् अशुभम्-अङ्गिरसां विरूपदर्शनात् यद्यचिन्त्यमहाशक्तौ भगवत्यपराधिनः ॥ 74 ॥ तान् उपहसनेन तेभ्यः शापरूपं यस्य तथाभूतः सन्) सर्पवपुः (सर्पयोनिमित्यर्थः) हित्वा (परित्यज्य) विद्याधरार्चितं (विद्याधरैषु अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 74 ॥ अर्चितं पूजितं) रूपं भेजे (प्राप)। अमृतप्रवाह भाष्य-जीवन्मुक्त लोग भी यदि अचिन्त्य श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 75 ॥ महाशक्तिशाली भगवान्के प्रति अपराध करते हैं, तो वे पुनः संसार-वासनामें पतित हो जाते हैं ॥ 74 ॥ स्वयं भगवान् होनेपर भी लोकशिक्षाके लिये महाप्रभुका जगद्गुरु आचार्यके रूपमें स्वयंको दीन जीव मानना :- अनुभाष्य- प्रभु कहे, - "'विष्णु' 'विष्णु', आमि क्षुद्र जीव हीन। अचिन्त्यमहाशक्तौ (अप्राकृत-चिच्छक्तिमति) भगवति (अधोक्षजे) जीवे विष्णु मानि-एइ अपराध-चिह्न ॥ 76 ॥ । 487