श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1932, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 25/60-70 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-मार्गमें ही उन ब्राह्मणकी महाप्रभुसे भेंट हुई और उन्होंने महाप्रभुको प्रकाशानन्द सरस्वतीकी सभामें हुई सब बातें कह सुनायी। उसे सुनकर महाप्रभु प्रसन्न होकर मन्द-मन्द मुस्कुराने लगे॥60॥ श्रीबिन्दुमाधवके दर्शनसे महाप्रभुका आवेश और नृत्य :- माधव-सौन्दर्य देखि' आविष्ट हइला। अङ्गनेते आसि' प्रेमे नाचिते लागिला॥61॥ चारों भक्तोंका सङ्कीर्त्तन :- शेखर, परमानन्द, तपन, सनातन। चारिजन मिलि' करे नाम-सङ्कीर्त्तन॥62॥ नाम सङ्कीर्त्तन :- “हरि हरये नमः कृष्ण यादवाय नमः। गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन॥”63॥ चारों ओरसे असंख्य लोगोंके द्वारा हरिध्वनि :- चौदिकेते लक्ष लोक बोले 'हरि' 'हरि'। उठिल मङ्गलध्वनि स्वर्ग-मर्त्य भरि'॥64॥ अनुवाद-महाप्रभु बिन्दुमाधवके सौन्दर्यको देखकर प्रेमाविष्ट हो गये और मन्दिरके आँगनमें आकर प्रेमावेशमें नृत्य करने लगे। श्रीचन्द्रशेखर, श्रीपरमानन्द कीर्त्तनीया, श्रीतपन मिश्र, और श्रीसनातन गोस्वामी-चारों मिलकर नाम-सङ्कीर्त्तन करने लगे, - "कृष्ण, यादव, माधव, गोपाल, गोविन्द, राम, मधुसूदनादि जिनके ये सब नाम हैं, उन हरिको मैं नमस्कार करता हूँ।" चारों ओरसे लाखों लोग 'हरि' 'हरि' बोलने लगे। उस मङ्गलध्वनिसे पूरा ब्रह्माण्ड भर गया॥61-64॥ शिष्योंके साथ प्रकाशानन्दका वहाँ आगमन :- निकटे हरिध्वनि शुनि' प्रकाशानन्द। देखिते कौतुके आइला लञा शिष्यवृन्द॥65॥ अनुवाद-निकटसे ही आ रही हरिध्वनिको सुनकर श्रीप्रकाशानन्द सरस्वती भी अपने शिष्योंको साथ लेकर उस स्थानपर कौतूहलवशतः आ पहुँचे॥65॥ महाप्रभुके नृत्य और प्रेम-माधुर्यके दर्शनसे उनका भी कीर्त्तन :- देखिया प्रभुर नृत्य, प्रेम, देहेर माधुरी। शिष्यगण-सङ्गे सेइ बोले 'हरि' 'हरि'॥66॥ अनुवाद-महाप्रभुके नृत्य, उनके प्रेम और उनकी देहकी माधुरीको देखकर श्रीप्रकाशानन्द सरस्वती भी अपने शिष्यों सहित 'हरि' 'हरि' बोलकर कीर्त्तन करने लगे॥66॥ भाव-दर्शनसे काशीवासियोंको विस्मय :- हर्ष, दैन्य, चापल्यादि 'सञ्चारी' विकार। देखि' काशीवासी लोकेर हैल चमत्कार॥67॥ अनुवाद-महाप्रभुमें हर्ष, दैन्य, चापल्यादि 'सञ्चारी' विकारोंको देखकर काशीवासी लोग आश्चर्यचकित हो गये॥67॥ लोगोंकी भीड़ और संन्यासियोंके दर्शनसे महाप्रभुके द्वारा अपने भाव-नृत्यका सम्वरण :- लोकसंघट्ट देखि' प्रभुर 'बाह्य' यबे हैल। संन्यासीर गण देखि' नृत्य सम्वरिल॥68॥ अनुवाद-लोगोंकी भीड़को देखकर जब महाप्रभुमें 'बाह्य' आवेश आया, तब वहाँ उपस्थित संन्यासियोंको देखकर उन्होंने नृत्य करना बन्द कर दिया॥68॥ महाप्रभु और प्रकाशानन्द, दोनोंके द्वारा परस्परकी वन्दना :- प्रकाशानन्देर प्रभु वन्दिला चरण। प्रकाशानन्द आसि' ताँर धरिल चरण॥69॥ अनुवाद-दैन्यताकी मूर्ति महाप्रभुने श्रीप्रकाशानन्दके चरणोंकी वन्दना की। परन्तु श्रीप्रकाशानन्दने आकर उनके चरणोंको पकड़ लिया॥69॥ महाप्रभुके द्वारा दैन्य-ज्ञापन :- प्रभु कहे, - "तुमि जगद्गुरु पूज्यतम। आमि तोमार ना हइ 'शिष्येर शिष्य' सम॥70॥ 486 ।