भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1931, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1931

पचीसवाँ अध्याय 25/46–60 ] कणादादिने न्याय और वैशेषिक-शास्त्रोंमें परमाणुको ही विश्वका कारण कहा है। (4) उसी प्रकार अष्टावक्रादि मायावादियोंने निर्विशेष-ब्रह्मको ही जगत्का कारण कहकर दिखलाया है। (5) पतञ्जलि आदि राजयोगियोंने अपने योगशास्त्रमें कहे गये कल्पनामय ईश्वरको 'स्वरूप-तत्त्व' कहकर स्थापित किया है। इन सभी मतवाद परायण आचार्योंने वेदसिद्ध स्वयं भगवान्‌को परित्याग करके उनके खण्डरूपमें (खण्ड-प्रतीतिमय) एक-एक 'मत'को स्थापित किया है। षड्दर्शनके छः मतोंकी उत्तमरूपसे आलोचना करके उनके मतोंका खण्डन करके श्रीव्यासदेवने भगवत्-प्रतिपादक सभी वेदसूत्रोंका अवलम्बन करके वेदान्तसूत्रकी रचना की है। वेदान्त-मतमें, ब्रह्म—सच्चिदानन्द-स्वरूप साकार हैं। निर्विशेषवादी ब्रह्मको 'निर्गुण' और विशेष-स्थानपर भगवान्‌को 'सगुण' (त्रिगुणमय) कहकर प्रतिपादित करते हैं। वास्तवमें तत्त्ववस्तु केवल निर्गुण अथवा त्रिगुणातीत नहीं है, परन्तु वे—अनन्तचिद्गुणोंके आधार 'सगुण' विग्रह हैं। मतवादियोंके मतानुसार परम-कारण ईश्वरको (विष्णुको) प्राप्त नहीं किया जा सकता अर्थात् कोई भी सर्वेश्वरेश्वर सर्वकारण-कारण विष्णुको नहीं मानता, (अपितु सभीने दूसरे-दूसरे मतोंका खण्डन करके अपने-अपने मतको स्थापित करनेका प्रयास किया है)। इसलिये महाजन जो कहते हैं, उसे ही 'सत्य' कहकर जानना होगा॥ 46–55॥ महाभारतके वनपर्व (313/117)में— तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नासावृषिर्यस्य मतं न भिन्नम्। धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः॥ 56॥ अनुवाद—तर्क सहजरूपमें ही प्रतिष्ठा-शून्य होता है, सभी श्रुतियाँ भी भिन्न-भिन्न हैं, जिसका मत भिन्न न हो, वह 'ऋषि' ही नहीं हो सकता; इसलिये धर्मतत्त्व गूढ़रूपसे ढका हुआ है अर्थात् शास्त्रादि पढ़कर धर्मतत्त्वको जानना कठिन है। इसलिये जिन्हें साधुओंने 'महाजन' कहकर निर्णय किया है, वे जिस मार्गको 'शास्त्र-मार्ग' कहते हैं, उसी मार्गपर ही अन्य सभी व्यक्तियोंका चलना उचित है॥ 56॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 17/186 संख्या देखें॥ 56॥ चैतन्यसिद्धान्त-वाणी ही अनुसरणके योग्य :— श्रीकृष्णचैतन्य-वाणी—अमृतेर धार। तिँहो ये कहये वस्तु, सेइ 'तत्त्व'-सार॥" 57॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी वाणी अमृतकी धाराके समान है। उन्होंने जिसे परमतत्त्व कहकर स्थापित किया है, वही सभी तत्त्वोंका सार है॥" 57॥ महाराष्ट्र [ब्राह्मणका शुभ संवाद] देनेके लिये जाना :— ए सब वृत्तान्त शुनि' महाराष्ट्र प्रभुरे कहिते सुखे करिला गमन॥ 58॥ अनुवाद—यह सब वृत्तान्त सुनकर महाराष्ट्र ब्राह्मण बड़े आनन्दित होकर महाप्रभुको यह शुभ-संवाद सुनानेके लिये गये॥ 58॥ काशीमें दैनिक नियमके अनुसार पञ्चनदमें स्नानके बाद महाप्रभुका श्रीबिन्दुमाधवके दर्शनके लिये जाना :— हेनकाले महाप्रभु पञ्चनदे स्नान करि'। देखिते चलियाछेन 'बिन्दुमाधव हरि'॥ 59॥ अनुवाद—उसी समय महाप्रभु पञ्चनदमें स्नान करनेके बाद 'बिन्दुमाधव हरि'के दर्शन करनेके लिये जा रहे थे॥ 59॥ महाराष्ट्र [ब्राह्मणकी बात] सुनकर महाप्रभुकी प्रसन्नता :— पथे सेइ विप्र सब वृत्तान्त कहिल। शुनि' महाप्रभु सुखे ईषत् हासिल॥ 60॥ । 485