श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1930, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 25/43-55 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीचैतन्य-मत ही 'सार'; अद्वैत-मत सम्पूर्णतः असार :- चैतन्य-गोसाञि येइ कहे, सेइ मत सार। आर यत मत, सेइ सब छारखार॥"44॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्यका वचन कि श्रीशङ्कराचार्यने व्यास-सूत्रोंके अर्थोंको आच्छादित किया है, सत्य ही है। श्रीचैतन्य गोसाईं जो कुछ कहते हैं, वही सभी मतोंका सार है। उसके अतिरिक्त अन्य जितने भी मत हैं, वे सब सारहीन हैं॥"43-44॥ श्रीगौरभक्त प्रकाशानन्दकी उक्ति; उद्धारके बाद उनके 'प्रबोधानन्द' नामकी प्राप्तिके प्रमाणका अभाव :- एत कहि' सेइ करे कृष्णसङ्कीर्त्तन। शुनि' प्रकाशानन्द किछु कहेन वचन॥45॥ अनुवाद—इतना कहकर प्रकाशानन्द सरस्वतीका वह शिष्य श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन करने लगा, जिसे सुनकर प्रकाशानन्द सरस्वती कहने लगे॥45॥ 'केवलाद्वैतवाद'को स्थापित करनेके उद्देश्यसे शङ्करका सात्वत शास्त्रोंके खण्डन करनेकी चेष्टासे 'प्रच्छन्न-नास्तिकता' अथवा भगवद्-अविश्वास :- “आचार्येर आग्रह—'अद्वैतवाद' स्थापिते। ताते सूत्रेर व्याख्या करे अन्य रीते॥46॥ 'भगवत्ता' मानिते 'अद्वैत' ना याय स्थापन। अतएव सब शास्त्र करये खण्डन॥47॥ कुतर्कपर आधारित मतवादका फल :- येइ ग्रन्थकर्त्ता चाहे स्व-मत स्थापिते। शास्त्रेर सहज अर्थ नहे ताँहा हैते॥48॥ छः प्रकारके दार्शनिकोंके विभिन्न मतवाद और वैदिक मत :- 'मीमांसक' कहे,—'ईश्वर हय कर्मेर अङ्ग।' 'सांख्य' कहे,—'जगतेर प्रकृति कारण॥'49॥ 'न्याय' कहे,—'परमाणु हैते विश्व हय।' 'मायावादी'—निर्विशेष-ब्रह्मे 'हेतु' कय॥50॥ 'पातञ्जल' कहे,—'ईश्वर हय स्वरूप-आख्यान।' वेदमते कहे ताँरे—'स्वयं भगवान्'॥51॥ श्रीव्यासके द्वारा ब्रह्मसूत्रमें सभी मतवादोंका खण्डन :- छयेर छय मत व्यास कैला आवर्त्तन। सेइ सब सूत्र लञा 'वेदान्त'-वर्णन॥52॥ 'वेदान्त'के मतानुसार ब्रह्म—चिद्विलास सविशेष अथवा सच्चिदानन्दमय विग्रह :- 'वेदान्त'-मते,—ब्रह्म 'साकार' निरूपण। 'निर्गुण'—व्यतिरेके, तिँहो हय त' 'सगुण'॥53॥ दूसरोंके मतका खण्डन करके अपने-अपने मतवादको स्थापित करनेकी चेष्टा :- परम कारण ईश्वरे केह नाहि माने। स्व-स्व-मत स्थापे परमतेर खण्डने॥54॥ अनिश्चयतापर आधारित मनोधर्मी तर्कपन्थी षड्दर्शनको छोड़कर श्रौतपन्थी महाजन अथवा शुद्धभक्त ही आश्रय ग्रहण करने योग्य :- ताते छय दर्शन हैते 'तत्त्व' नाहि जानि। 'महाजन' येइ कहे, सेइ 'सत्य' मानि॥55॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥46-55॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अन्य संन्यासियोंके भक्ति-सापेक्ष वचनोंको श्रवण करके प्रकाशानन्द सरस्वती कह रहे हैं,—“अद्वैतवाद-स्थापनमें अत्यन्त आग्रहके कारण श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा ब्रह्मसूत्रकी अन्य प्रकारकी व्याख्या की गयी है। भगवत्ता माननेपर 'अद्वैतवाद' नहीं रहता। इसलिये आचार्यने भगवद्-तत्त्वको प्रतिपादित करनेवाले अन्य सभी शास्त्रोंके खण्डनकी चेष्टा की है। अपने मतको स्थापित करनेके लिये शास्त्रोंके सहज अर्थका परित्याग करना ही 'मतवाद'का नियम है। देखो (1) जैमिनी आदि मीमांसकोंने वेदोंका मुख्य तात्पर्य जो भक्ति है, उसे त्याग करके ईश्वरको 'कर्मका अङ्ग' बना दिया है। (2) कपिलादि निरीश्वर सांख्यकारोंने वास्तविक वेदार्थका परित्याग करके प्रकृतिको जगत्का कारण कहकर निर्देश किया है। (3) गौतम और 484