श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1926, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 25/21-30 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सभीको महाप्रभुकी शिक्षाकी प्राप्ति और हरि-सङ्कीर्तन :- उपदेश लञा करे कृष्ण-सङ्कीर्त्तन। सर्वलोक हासे, गाय, करये नर्त्तन ॥ 21 ॥ अनुवाद—महाप्रभुसे श्रीकृष्णनामका उपदेश पाकर सभी श्रीकृष्णनाम-सङ्कीर्तन करने लगे। नामके प्रभावसे और महाप्रभुकी कृपासे सभी हँसने, गाने और नृत्य करने लगे॥ 21 ॥ संन्यासियोंके द्वारा मायावाद छोड़कर श्रीकृष्णकी कथाका आलाप करते हुए इष्टगोष्ठी :- प्रभुरे प्रणत हैल संन्यासीर गण। आत्ममध्ये गोष्ठी करे छाड़ि' अध्ययन ॥ 22 ॥ अनुवाद—सभी मायावादी संन्यासी महाप्रभुके शरणागत हो गये। आगे अनुभाष्य देखें ॥ 22 ॥ अनुभाष्य—संन्यासी अपने-अपने वेदान्त-पठनको परित्याग करके अपनी गोष्ठीमें मिलकर महाप्रभुके द्वारा प्रदर्शित भक्तिपथके सम्बन्धमें आलाप करनेमें प्रवृत्त हुए॥ 22 ॥ प्रकाशानन्द सरस्वतीके किसी एक शिष्यके द्वारा सभामें चर्चा करते हुए महाप्रभुको 'नारायण' मानकर उनके द्वारा की गयी वेदान्तकी चिद्-विलास व्याख्याकी स्तुति और शङ्करके मायावादकी व्याख्याकी निन्दा :- प्रकाशानन्देर शिष्य एक ताँहार समान। सभामध्ये कहे प्रभुर करिया सम्मान ॥ 23 ॥ “श्रीकृष्णचैतन्य हय 'साक्षात् नारायण' । 'व्याससूत्रेर्' अर्थ करेन अति मनोरम ॥ 24 ॥ उपनिषदेर करेन मुख्यार्थ व्याख्यान। शुनिय़ा पण्डित-लोकेर जुड़ाय़ मन-काण ॥ 25 ॥ सूत्र-उपनिषदेर मुख्यार्थ छाड़िय़ा। आचार्य 'कल्पना' करे आग्रह करिया ॥ 26 ॥ आचार्य-कल्पित अर्थ ये पण्डित शुने। मुखे 'हय' 'हय' करे, हृदय ना माने ॥ 27 ॥ अनुवाद—प्रकाशानन्द सरस्वतीके एक शिष्य जो ज्ञानमें उन्हींके ही समान थे, वे सभामें महाप्रभुका सम्मान करते हुए कहने लगे, — “श्रीकृष्णचैतन्य 'साक्षात् श्रीमन्नारायण' हैं और वे 'व्याससूत्रका' (वेदान्त-सूत्रका) अत्यन्त सुन्दर और हृदयग्राही अर्थ करते हैं। वे उपनिषदोंके मुख्य अर्थकी व्याख्या करते हैं, जिसे सुनकर पण्डितोंके भी मन और कान तृप्त हो जाते हैं। व्याससूत्र और उपनिषदोंके मुख्य अर्थको छोड़कर श्रीशङ्कराचार्यका आग्रह उनके अपने कल्पित-मतकी स्थापनाके लिये ही था। श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा कल्पित अर्थोंको जो पण्डित श्रवण करते हैं, वे श्रीशङ्कराचार्यका सम्मान करनेके लिये मुखसे 'हाँ' 'हाँ' तो कहते हैं, किन्तु उनका हृदय उन्हें स्वीकार नहीं करता ॥ 23-27 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आचार्य'—शङ्कराचार्य ॥ 26 ॥ ज्ञानमार्गमें फल्गु-वैराग्यसे मायापर विजय असम्भव :- श्रीकृष्णचैतन्य-वाक्य दृढ़ सत्य मानि। कलिक़ाले संन्यासे 'संसार' नाहि जिनि ॥ 28 ॥ महाप्रभुकी 'हरेर्नाम' श्लोकके अर्थकी व्याख्याकी प्रशंसा :- हरेर्नाम-श्लोकेर येइ करिला व्याख्यान। सेइ सत्य सुखदार्थ परम प्रमाण ॥ 29 ॥ भक्ति ही मुक्तिदात्री और नामाभास ही मुक्तिप्रद :- भक्ति बिना मुक्ति नहे, भागवते कय। कलिक़ाले नामाभासे सुखे मुक्ति हय ॥ 30 ॥ अनुवाद—मैं श्रीकृष्णचैतन्यके वचनोंको परम सत्य मानता हूँ। कलिकालमें केवल संन्यासके द्वारा संसारसे उद्धार प्राप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने हरेर्नाम-श्लोककी जो व्याख्या की है, वही सत्य और परम प्रमाण है जिसे सुनकर सुख प्राप्त होता है। श्रीमद्भागवतमें कहा गया है कि भक्तिके बिना केवल ज्ञानसे मुक्तिकी प्राप्ति नहीं हो सकती। कलियुगमें तो नामाभाससे ही अनायास मुक्तिकी प्राप्ति हो जाती है॥ 28-30 ॥ 480 |