श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1927, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपचीसवाँ अध्याय 25/31-36 ] श्रीमद्भागवत (10/14/4) में :- श्रेयःसृतिं भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये। तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद् यथा स्थूलतुषावघातिनाम् ॥ 31 ॥ अनुवाद-हे विभो ! आपमें भक्ति ही कल्याणका पथ है, उसे परित्याग करके जो सब व्यक्ति केवल ज्ञान प्राप्तिके लिये अर्थात् 'मैं ब्रह्म' हूँ, इसको ही स्थिर रूपमें जाननेके लिये अनेक प्रकारके कष्ट स्वीकार करते हैं, खाली भूसीको पीसनेवालोंको जिस प्रकार चावल नहीं मिलते, उसी प्रकार, उन्हें अन्तमें क्लेशमात्र ही प्राप्त होता है ॥ 31 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/22 संख्या देखें ॥ 31 ॥ श्रीमद्भागवत (10/2/32) में :- येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय- स्तभावादविशुद्धबुद्धयः । आरुह्य कृच्छ्रं पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥ 32 ॥ अनुवाद-हे कमलनयन, जो 'मैं विमुक्त हो गया हूँ', ऐसा कहकर अभिमान करते हैं, वे आपमें भक्तिरहित होनेके कारण अशुद्ध बुद्धिवाले हैं। वे बहुत कष्ट करके मायासे अतीत परमपद ब्रह्म तक आरोहण करके भी भगवद्भक्तिके अनादरके कारण अधःपतित होते हैं ॥ 32 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/30 संख्या देखें ॥ 32 ॥ ब्रह्म-शब्दका वास्तविक अर्थ :- 'ब्रह्म'-शब्दे कहे 'षडैश्वर्यपूर्ण भगवान्'। ताँरे 'निर्विशेष' स्थापि, 'पूर्णता' हय हान ॥ 33 ॥ अनुवाद-'ब्रह्म'-शब्दका मुख्य अर्थ षडैश्वर्यपूर्ण स्वयं भगवान् होता है। उनको 'निर्विशेष' कहनेसे उनकी 'पूर्णता'में हानि होती है अर्थात् यह उनकी अपूर्ण व्याख्या है ॥ 33 ॥ अनुभाष्य-भगवान्को 'निर्विशेष' कहकर स्थापित करनेसे उनके अप्राकृत सविशेषरूपके अभावसे उनकी पूर्णशक्तिमत्तामें हानि होती है। निर्विशेष होना-एक शक्तिका अपूर्ण परिचय मात्र है ॥ 33 ॥ श्रुति और पुराणमें अवरोह-पथसे अप्राकृत-चिद्विलासका दर्शन, तर्कमूलक आरोहपथसे मायातीत चिद्विलासको मायिक जड़विलास समझना ही पाखण्ड या महाअपराध :- श्रुति-पुराण कहे,-कृष्णेर चिच्छक्ति-विलास। ताहा नाहि मानि' पण्डित करे उपहास ॥ 34 ॥ चिदानन्द कृष्णविग्रहे 'मायिक' करि' मानि। एइ बड़ 'पाप',-सत्य चैतन्येर वाणी ॥ 35 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 34-35 ॥ अनुभाष्य-सभी वेदशास्त्र और पुराण श्रीकृष्णके चिच्छक्ति-विलासको परमनित्य कहकर स्थापित करते हैं। अपने भोगमय जड़ीय-पाण्डित्यके अभिमानवशतः पण्डिताभिमानी ज्ञानी लोग 'चिच्छक्तिके विलास नहीं हो सकते और वह मायाशक्तिमें-से ही एक हैं',-ऐसे असत् ज्ञानसे भ्रान्त होकर श्रीकृष्णका उपहास करते हैं। निर्विशेषवादी सच्चिदानन्द श्रीकृष्णविग्रहको माया- कल्पित और मायासे निर्मित ईश्वरविग्रह मानकर भगवान्के नित्य सविशेषत्वको नहीं समझ पाते। उनकी दाम्भिकता (घमण्ड) अथवा नास्तिकता ही बहुत बड़ा अपराध है। श्रीमन्महाप्रभुके वचनानुसार सविशेष सच्चिदानन्द श्रीकृष्ण विग्रह-नित्य-सत्य-चिद्-विलासमय है, यही वास्तविक सत्य है ॥ 34-35 ॥ निर्विशेष-रूपकी अपेक्षा चिद्विलासमय रूपका श्रेष्ठत्व :- श्रीमद्भागवत (3/9/3) में- नातः परं परम यद्भवतः स्वरूप- मानन्दमात्रमविकल्पमविद्धवर्चः। पश्यामि विश्वसृजमेकमविश्वमात्मन् भूतेन्द्रियात्मकमदस्त उपाश्रितोऽस्मि ॥ 36 ॥ । 481