भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1928, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1928

[ 25/36-38 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला निर्विशेषवादियोंका 'मायाधीश' भगवद्-विग्रहको 'मायिक' समझनेके कारण उनकी नरकमें गति :- श्रीमद्भागवत (3/9/4) में- तद्वा इदं भुवनमङ्गल मङ्गलाय ध्याने स्म नो दर्शितं त उपासकानाम्। तस्मै नमो भगवतेऽनुविधेम तुभ्यं योऽनादृतो नरकभाग्भिरसत्प्रसङ्गैः ॥ 37 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 36-37 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे परम, आपके इस आनन्दमात्र, अद्वयज्ञान और मायातीत तेजःस्वरूप, -जिस स्वरूपको मैं अब देख रहा हूँ, इससे श्रेष्ठ स्वरूप और कोई नहीं है। हे आत्मन्, विश्वसृजनकारी होनेपर भी विश्वसे पृथक् भूतेन्द्रियोंके कारणस्वरूप आपका यह जो रूप देख रहा हूँ, मैं इसके ही शरणागत हो रहा हूँ। हे भुवनमङ्गल, हमारे मङ्गलके लिये हमारी उपासनाके योग्य आपका यह स्वरूप, -जिसे आपने ध्यानमें दिखलाया है, उसी भगवद्-स्वरूपको-हम नमस्कार करते हैं और उसीकी सेवा करते हैं। असत् प्रसङ्गसे दूषित नरकगामी व्यक्ति इस नित्यमूर्तिका आदर नहीं करते॥ 36-37 ॥ अनुभाष्य-गर्भोदकशायीकी नाभिसे ब्रह्माके उत्पन्न होनेपर भी उन पुरुषको नहीं जान पानेके कारण, वे जलमें प्रविष्ट होकर तपस्याके द्वारा भगवान्‌का स्तव करते-करते निम्नलिखित दो श्लोकोंमें उनके निर्विशेष रूपकी अपेक्षा सविशेष चिद्विलाससमय सच्चिदानन्द विग्रहके श्रेष्ठ होनेका वर्णन कर रहे हैं,- हे परम (परमेश), अविद्धवर्चः (अविद्धं प्रकृत्या अनाक्रान्तं वर्चः तेजः यस्य तत् मायातीत-स्वरूपत्वात् अनावृत-प्रकाशम् अतः) अविकल्पं (न विद्यते विचित्रः कल्पः सृष्टिः यत्र तम् अद्वयज्ञानम्) आनन्दमात्रम् (आनन्दं निर्विशेषचिद्रूपं ब्रह्म मात्रा अंशः यस्य तं) यत् भवतः (तव) स्वरूपं (पूर्णभगवद्रूपं) तत् अतः (रूपात्) परं (भिन्नं) न पश्यामि। हे आत्मन् (परमात्मन्), विश्वसृजं (विश्वसृष्टि-कर्त्तारम्) एकम् (अद्वितीयम्) अविश्वं (नश्वरात् विश्वस्मात् अन्यत् भिन्नम् अक्षयत्वात्) भूतेन्द्रियात्मकं (भूतानाम् इन्द्रियाणां च आत्मकं कारणम्) ते (तव) अदः (अप्राकृतं) रूपम् उपाश्रितः अस्मि (शरणं यामि)। हे भुवनमङ्गल (जीवैककल्याणनिलय,) तत् वै (तदेव इदं रूपम्) उपासकानां नः (अस्माकं) मङ्गलाय ध्याने ते (त्वया) दर्शितं स्म। असत्प्रसङ्गैः (श्रौतमार्ग विरोधि-निर्विशेष-ब्रह्म-विचारपर- कुतर्कनिष्ठैः अज्ञानकल्पितवाक्यैः) नरकभाग्भिः (नरकगामिभिः केश्चित् नास्तिकैः) यः (पुरुषः त्वं) न आदृतः (नैव स्वीकृतः), तस्मै भगवते तुभ्यं नमः अनुविधेम (वयम् अनुवृत्त्या नमस्करवाम)। श्लोक-भावानुवाद-हे परमेश! देश, काल आदिके आवरणसे रहित आपका प्रकाशमय, अद्वयज्ञान, आनन्दमात्र निर्विशेष ब्रह्मस्वरूप जो आपका अंश है, उसे मैं आपके पूर्ण भगवद्रूपसे भिन्न नहीं देख रहा हूँ। हे आत्मन्! इसलिये विश्वकी सृष्टि करनेवाले, अद्वितीय, अतः विश्वसे भिन्न एवं जीवों और उनकी इन्द्रियोंके कारणस्वरूप आपके इस अप्राकृत सविशेष रूपका ही मैं आश्रय लेता हूँ। हे भुवनमङ्गल! हम आपके इस रूपके उपासक हैं। आपने हमारे कल्याणके लिये ही ध्यानयोगमें उस रूपको दिखलाया है। श्रौतमार्ग-विरोधी निर्विशेष ब्रह्म-विचारपरक कुतार्किक व्यक्ति आपके इस स्वरूपको सच्चिदानन्दमय विग्रह न मानकर मायामय कहकर अनादर करते हैं और नरकमें पतित होते हैं। मैं षडैश्वर्ययुक्त आपको पुनः-पुनः नमस्कार करता हूँ॥ 37 ॥ अप्राकृत श्रीकृष्णकी नराकृतिको देखकर ही पाखण्डियोंकी प्राकृत मर्त्यबुद्धि :- श्रीमद्भगवद्गीता (9/11)में- अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तः सर्वभूतमहेश्वरम् ॥ 38 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 38 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मैं जब मनुष्यके आकारमें प्रकाशित होता हूँ, तब मूढ़लोग मेरी अवज्ञा करते हैं अर्थात् वे मेरी नित्य चिन्मयदेहको मायाश्रित मानकर 482 ।