श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1935, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपचीसवाँ अध्याय 25/85-95 ] सभीका वहाँपर बैठना और प्रकाशानन्दकी महाप्रभुके मुखसे शङ्करके मायावादकी समालोचना और ब्रह्मसूत्रके वास्तविक तात्पर्यके श्रवणकी इच्छा :— एत बलि' प्रभुरे लञा तथा बसिल। प्रभुरे प्रकाशानन्द पुछिते लागिल ॥ ८५ ॥ “मायावादे करिला यत दोषेर आख्यान। सबे एइ जानि' आचार्येर कल्पित व्याख्यान ॥ ८६ ॥ सूत्रेर करिला तुमि मुख्यार्थ-विवरण। ताहा शुनि' सबार हैल चमत्कार मन ॥ ८७ ॥ तुमि त' ईश्वर, तोमार आछे सर्वशक्ति। संक्षेपरूपे कह तुमि, शुनिते हय मति ॥”८८ ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीप्रकाशानन्द सरस्वती महाप्रभुको लेकर वहीं बिन्दुमाधव मन्दिरमें बैठ गये और वे महाप्रभुसे पूछने लगे,—“आपने मायावाद-भाष्यमें जो जो दोष दिखलाये हैं, उन्हें सुनकर हम सब यह समझ गये कि श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा की गयी व्याख्या उनकी मनोकल्पना है [उसे हम लोग मुखसे तो मानते थे, किन्तु हृदयसे स्वीकार नहीं कर पाते थे]। आपने सूत्रोंके मुख्य अर्थके द्वारा जो व्याख्या की है, वह अति आश्चर्यजनक है और हम उसे हृदयसे स्वीकार कर पा रहे हैं। आप तो ईश्वर हैं, सर्वशक्तिमान् हैं, इसलिये आप व्यास-सूत्रके वास्तविक अर्थ बतलानेमें समर्थ हैं। अब आप वेदान्तसूत्रोंका अर्थ संक्षेपमें बतलाइये, उसे सुननेकी हमारी अभिलाषा है॥”८५-८८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘संक्षेपरूपे कह'—प्रत्येक सूत्रका मुख्य-अर्थ, जो आपने कहा था, उसे मैंने सुना है। अब मैं वेदान्तके मुख्य तात्पर्यको संक्षेपमें सुननेकी इच्छा करता हूँ॥८८॥ श्रौतपन्थी महाप्रभुका दैन्यवशतः स्वयंको शिष्यरूपी दीन जीव मानकर व्यास-गुरु-पूजा :— प्रभु कहे,—“आमि 'जीव', अति तुच्छ-ज्ञान! व्याससूत्रेरे गम्भीर अर्थ, व्यास-भगवान् ॥ ८९ ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं एक साधारण 'जीव' हूँ, इसलिये मुझमें ज्ञान भी बहुत कम है। किन्तु व्याससूत्रका अर्थ तो बहुत गम्भीर है, क्योंकि व्यासदेव तो भगवान् हैं॥८९॥ जीवोंके हितके लिये व्यासदेव स्वयं सूत्रकार होनेपर भी भाष्यकार, उसीमें वास्तविक तात्पर्यके बोधको स्वीकार करना :— ताँर सूत्रेर अर्थ कोन जीव नाहि जाने। अतएव आपने सूत्रार्थ करियाछे व्याख्याने ॥ ९० ॥ येइ सूत्रकर्त्ता, से यदि करये व्याख्यान। तबे सूत्रेर मूल अर्थ लोकेर हय ज्ञान ॥ ९१ ॥ अनुवाद—श्रीव्यासदेवके द्वारा रचित सूत्रोंका अर्थ कोई भी जीव नहीं जान सकता है, इसलिये उन्होंने स्वयं ही सूत्रोंके अर्थकी व्याख्या की है। यदि सूत्रकी रचना करनेवाला स्वयं ही अपने द्वारा रचित सूत्रकी व्याख्या करे, तभी सूत्रके मुख्य अर्थको लोग जान सकते हैं॥९०-९१॥ वेदरूपी वृक्षका बीज—प्रणव, माता (अङ्कुर)—गायत्री, फल—चतुःश्लोकी भागवत :— प्रणवेर येइ अर्थ, गायत्रीते सेइ हय। सेइ अर्थ चतुःश्लोकीते विवरिया कय ॥ ९२ ॥ ब्रह्म-सम्प्रदायमें आम्नाय-परम्परामें भागवत-कीर्तन-वर्णन :— ब्रह्मारे ईश्वर चतुःश्लोकी ये कहिला। ब्रह्मा नारदे सेइ उपदेश कैला ॥ ९३ ॥ नारद सेइ अर्थ व्यासेरे कहिला। शुनि' वेदव्यास मने विचार करिला ॥ ९४ ॥ ब्रह्मसूत्रके भाष्यस्वरूप चतुःश्लोकीका विस्तार अथवा भागवतकी रचनाका सङ्कल्प :— 'एइ अर्थ—आमार सूत्रेर व्याख्यानुरूप। 'भागवत' करिब सूत्रेर भाष्यस्वरूप ॥' ९५ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥९२-९५॥ । 489