भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1936, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1936

[ 25/92-99 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य—प्रणव ही सभी वेदोंका 'महावाक्य' है। उस प्रणवमें जो अर्थ है, वही गायत्रीमें है और वही अर्थ श्रीमद्भागवतमें चतुःश्लोकीके 'अहमेवासमेवाग्रे' इस श्लोकसे चौथे श्लोक तकमें विवृत हुआ है। भगवान्‌से ब्रह्मा, ब्रह्मासे नारद, नारदसे श्रीव्यास,—इस प्रकार सम्प्रदाय-परम्परासे सभी वेदोंका ज्ञान और उनका तात्पर्य श्रीमद्भागवतमें आया है। श्रीमद्भागवत ही 'ब्रह्म सूत्रका भाष्य'-स्वरूप है॥92-95॥ वेद और उपनिषदोंके सारका भली-भाँति उद्धार :- चारिवेद-उपनिषदे यत किछु हय। तार अर्थ लञा व्यास करिला सञ्चय॥96॥ अनुवाद—श्रीव्यासदेवने चारों वेदों और उपनिषदोंके समस्त तात्पर्यको संग्रह करके उसे सूत्ररूपमें वेदान्त-सूत्रमें दिया है॥96॥ सूत्रके मूल-स्वरूप श्रुति मन्त्रसमूह ही भागवतमें श्लोकोंके आकारमें निबद्ध :- येइ सूत्रे येइ ऋक्-विषय-वचन। भागवते सेइ ऋक् श्लोके निबन्धन॥97॥ अनुवाद—वेदान्तसूत्रमें वेदोंके मन्त्रोंका उद्देश्य वर्णित है। श्रीमद्भागवतमें वेदमन्त्रोंका वही उद्देश्य अठारह हजार श्लोकोंके रूपमें वर्णित हुआ है॥97॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'ऋक्'—वेदमन्त्र; 'विषयवचन'- उद्देश्य। श्रीमद्भागवतमें वे ही 'ऋक्' श्लोकके रूपमें निबद्ध हुए हैं॥97॥ उपनिषदोंके मन्त्रोंके अर्थ ही भागवतके श्लोकोंमें व्यक्त :- अतएव ब्रह्मसूत्रेरे भाष्य—श्रीभागवत। भागवत-श्लोक, उपनिषत् कहे 'एक' मत॥98॥ अनुवाद—इसलिये ब्रह्मसूत्रके भाष्य श्रीमद्भागवतके श्लोकों और उपनिषदोंके मन्त्रोंका एक ही तात्पर्य है॥98॥ दृष्टान्त; सब कुछ ही विष्णुमय है, उसके अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं है, भोक्ताकी बुद्धिका त्यागकर युक्त-वैराग्यके साथ सभी विषय विष्णुसे सम्बन्धित अथवा विष्णुके भोगके रूपमें सेव्य :- श्रीमद्भागवत (8/1/10)में- आत्मावास्यामिदं विश्वं यत् किञ्चिज्जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यचिद्धनम्॥99॥ अनुवाद—यह संसार और इसमें रहनेवाले सभी स्थावर-जङ्गम प्राणी ईश्वरकी सत्ता और चेतनाके द्वारा व्याप्त हैं। इसलिये ईश्वरके द्वारा प्रदत्त समस्त विषयोंका उपभोग करो, किन्तु किसी अन्यके धनकी आकाङ्क्षा न करो॥99॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो कुछ भी इस जगत्‌में देख रहे हो, वह सब कुछ ही अर्थात् यह विश्व ही आत्माके द्वारा व्याप्त है। हे जीवों, वे आत्मा ही तुम्हारे नियन्ता और पालन करनेवाले हैं, जो कुछ द्रव्य तुम्हें प्राप्त हुए हैं, उन्हें उनके द्वारा कृपापूर्वक दिये गये द्रव्य समझकर जगत्‌के समस्त द्रव्योंका भोग करो, अन्योंका धन हरण मत करना। तात्पर्य यह है कि जिस ब्रह्मसूत्रका ईशोपनिषदके “ईशावास्यमिदं जगत्”-मन्त्र अर्थात् श्रुतिमन्त्र उद्देश्य है, श्रीमद्भागवतमें वही ऋक् (मन्त्र) “आत्मावास्यमिदं” कहकर श्लोकके रूपमें निबद्ध हुआ है। इस प्रकार समस्त सूत्रोंके ही समस्त ऋक्-वचन भागवतके श्लोकोंमें निबद्ध हैं॥99॥ अनुभाष्य—परीक्षितके द्वारा स्वायम्भुव-मनुकी वंशावलीका श्रवण करके अन्यान्य मनुओंके विषय और मन्वन्तरावतारोंके क्रिया-कलापकी जिज्ञासा करने पर, श्रीशुक सर्वप्रथम मनुकी उक्ति बतला रहे हैं,— जगत्यां (लोके) यत् किञ्चित् जगत् (बद्धजीवभोग्यं मायाशक्ति- परिणतम् इन्द्रियसुखकरं, तत्) इदं विश्वं (सर्वम्) आत्मावास्यं (प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन अप्राकृतदर्शनेन आत्मना भगवता 490 ।