श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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पचीसवाँ अध्याय [ 25/99-104 ]
आवास्यं सत्ता-चैतन्याभ्यां व्याप्तं) तेन (हेतुना) त्यक्तेन (सेवाकामाय भगवदर्पणेन, यद्वा,) तेन (ईश्वरेण) त्यक्तेन (किञ्चित् त्यक्तं दत्तं यद्धनं तेनैव भगवत्त्यक्तोच्छिष्टत्वेनेत्यर्थः) भुञ्जीथाः (गृहाण, स्वीकुर्वित्यर्थः); कस्यचित् (जड़भोक्तृबुद्ध्या आसक्तस्य जनस्य सम्बन्धे) धनं (भगवदितर-माया-दर्शनार्थ प्राकृत-विषयभोगादिकं) मा गृधः (नैवाकाङ्क्षीः;-तथा च श्रुतिः “ईशावास्यमिदम्” इति यथा श्लोकमेव)। श्लोक-भावानुवाद—इस लोकमें बद्धजीवके भोगके लिये मायाशक्ति-परिणत इन्द्रियसुखकर वस्तुएँ (प्रेमाञ्जनसे युक्त भक्तिनेत्रोंके द्वारा जिनका अप्राकृत दर्शन होता है, उन) भगवान्की सत्ता और चैतन्यके द्वारा व्याप्त हैं, इसलिये वे भगवत्सेवा हेतु ही भगवान्के द्वारा प्रदान की गयी हैं, इस भावसे उन्हें स्वीकार करना चाहिये। जड़भोगबुद्धिसे अन्य किसीके प्राकृत विषयभोगोंकी आकाङ्क्षा मत करो (श्रुतिमें कहे गये मन्त्र “ईशावास्यमिदम्”के अनुरूप यह भागवतका श्लोक है)॥ 99॥ आदि चतुःश्लोकी-भागवतमें सम्बन्ध- अभिधेय-प्रयोजन निरूपित :- भागवतेर सम्बन्ध, अभिधेय, प्रयोजन। चतुःश्लोकीते प्रकट तार करियाछे लक्षण॥ 100॥ अनुवाद—श्रीमद्भागवतमें आलोचित सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन-तत्त्वके लक्षण चतुःश्लोकीमें ही व्यक्त किये गये हैं॥ 100॥ श्रीकृष्णके द्वारा ब्रह्माको चतुःश्लोकीमें वर्णित तीन तत्त्वोंकी संक्षेपमें व्याख्या- विषयबोधरूपी भगवत्-स्वरूप-निर्धारण ही केवल चिन्मात्रमय ‘ज्ञान’, आश्रयकी चिद्-विलासानुभवरूपी भगवद्स्फूर्ति ही ‘विज्ञान’, रहस्य अथवा प्रेम ही ‘प्रयोजन’, तदङ्ग (उसका अङ्ग) साधनभक्ति ही ‘अभिधेय’ :- ‘आमि’-‘सम्बन्ध’-तत्त्व, आमार ज्ञान-विज्ञान। आमा पाइते साधन-भक्ति ‘अभिधेय’-नाम॥ 101॥ साधनेर फल-‘प्रेम’ मूल-प्रयोजन। सेइ प्रेमे पाय जीव आमार ‘सेवन’॥ 102॥
अनुवाद—श्रीकृष्णने कहा,-मैं ही सभी सम्बन्धोंका मूल केन्द्र हूँ और मेरा ज्ञान-विज्ञान ही ‘सम्बन्ध’-तत्त्व है। मुझे प्राप्त करनेके लिये जो साधन-भक्ति की जाती है, उसका नाम ‘अभिधेय’ है। साधनका फल ‘प्रेम’ है, वही मूल-प्रयोजन है और उसी प्रेमसे ही जीव मेरी ‘सेवा’को प्राप्त करता है॥ 101-102॥ छय श्लोकोंमेंसे चतुःश्लोकीके अतिरिक्त इस श्लोकमें सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनका वर्णन; ज्ञान और विज्ञान ही ‘सम्बन्ध’, रहस्य ही ‘प्रयोजन’, उसका अङ्ग ही ‘अभिधेय’ :- श्रीमद्भागवत (2/9/30)में- ज्ञानं मे परमगुह्यं यद्विज्ञान-समन्वितम्। सरहस्यं तदङ्गञ्च गृहाण गदितं मया॥ 103॥ अनुवाद—श्रीभगवान्ने ब्रह्माजीसे कहा,-“हे ब्रह्मन्! मेरे स्वरूपकी उपलब्धिरूप विज्ञान और रहस्यमयी प्रेमाभक्तिके साथ शब्द-शास्त्रोंका प्रतिपाद्य मेरा अत्यन्त गोपनीय ज्ञान तथा उस प्रेमाभक्तिके अङ्ग-साधनभक्तिको मैं बतला रहा हूँ, तुम इसे ग्रहण करो॥ 103॥ अनुभाष्य—आदिलीला 1/51 संख्या देखें॥ 103॥ अवरोह-पन्थामें भगवद्-कृपाके प्रभावसे तत्त्वकी स्फूर्ति :- एइ ‘तिन’ तत्त्व आमि कहिनु तोमारे। ‘जीव’ तुमि एइ तिन नारिबे जानिबारे॥ 104॥ अनुवाद—सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन-इन तीन तत्त्वोंके विषयमें मैं तुम्हें बतलाऊँगा। हे ब्रह्मा, तुम ‘जीव’ हो, अपने प्रयाससे तुम इन्हें नहीं जान सकते॥ 104॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘जीव’ तुमि’-हे ब्रह्मन्, तुम ‘जीव’ हो, मेरी कृपाके बिना तुम परम गुह्य ज्ञानको नहीं जान पाओगे॥ 104॥ अनुभाष्य—‘एइ तिन’-सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन॥ 104॥
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