श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1938, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 25/105-113 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला नामरूपगुणलीलामय भगवान् केवल 'निर्विशेष' नहीं :- यैछे आमार 'स्वरूप', यैछे आमार 'स्थिति'। यैछे आमार गुण, कर्म, षडैश्वर्य-शक्ति ॥ 105 ॥ आमार कृपाय एइ सब स्फुरुक तोमारे।' एत बलि' तिन तत्त्व कहिला ताँहारे ॥ 106 ॥ अनुवाद-जैसा मेरा 'स्वरूप' है, जैसी मेरी स्थिति है, जैसे मेरे गुण, कर्म और षडैश्वर्यमयी शक्ति है, मेरी कृपासे ये सब तुम्हारे हृदयमें स्फुरित हों।' यह कहकर भगवान् ब्रह्माको तीनों तत्त्वोंकी शिक्षा प्रदान करने लगे ॥ 105-106 ॥ छः श्लोकोंमें चतुःश्लोकीके अतिरिक्त इस श्लोकमें कृपारूपी आशीर्वाद-वर्षण :- श्रीमद्भागवत (2/9/31)- यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः। तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ॥ 107 ॥ अनुवाद-मेरा स्वरूप, मेरा लक्षण, मेरा रूप, मेरे गुण और मेरी लीलाएँ जिस प्रकार हैं, उन सबका तत्त्वविज्ञान मेरी कृपासे तुम्हें प्राप्त हो ॥ 107 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/52 संख्या देखें ॥ 107 ॥ चतुःश्लोकीकी व्याख्या आरम्भ; उसमेंसे प्रथम श्लोकमें सम्बन्ध-तत्त्व अहं-शब्दसे कहे गये स्वरूपशक्तिमान् नित्य-सत्य-सनातन-विग्रह श्रीकृष्णके 'ज्ञान'का लक्षण :- 'सृष्टिर पूर्वे षडैश्वर्यपूर्ण आमि त' हइये। 'प्रपञ्च', 'प्रकृति', 'पुरुष' आमातेइ लये ॥ 108 ॥ सृष्टि करि' तार मध्ये आमि त' बसिये। प्रपञ्च ये देख सब, सेह आमि हइये ॥ 109 ॥ प्रलये अवशिष्ट आमि 'पूर्ण' हइये। प्राकृत प्रपञ्च पाय आमातेइ लये ॥ '110 ॥ अनुवाद-श्रीभगवान्ने ब्रह्मासे कहा,-'सृष्टिसे पहले षडैश्वर्यपूर्ण केवल मैं ही था, प्रपञ्च, प्रकृति और जीव मुझमें ही लय थे। सृष्टि करनेके बाद मैं उसमें प्रवेश कर जाता हूँ। प्रपञ्चमें तुम जो कुछ भी देखते हो, वह सब मेरी ही शक्तिका विस्तार है। प्रलय होनेपर भी अन्तमें मैं 'पूर्ण' ही रहता हूँ और सृष्ट प्राकृत प्रपञ्च मुझमें ही लय हो जाता है॥'108-110॥ चतुःश्लोकीका प्रथम श्लोक :- श्रीमद्भागवत (2/9/32)में- अहमेवासमेवाग्रे नान्यत् यत् सदसत्परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ 111 ॥ अनुवाद-इस जगत्की सृष्टिके पूर्व केवल मैं ही था। सत्, असत् और अनिर्वचनीय निर्विशेष ब्रह्म तक कुछ भी मुझसे पृथक् रूपसे नहीं था। सृष्टि होनेके बाद इस सम्पूर्ण-स्वरूपमें मैं ही हूँ और सृष्टिकी प्रलय होनेके बाद भी एकमात्र मैं ही अवशिष्ट रहूँगा ॥ 111 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/53 संख्या देखें॥ 111 ॥ श्लोकका तात्पर्य-श्रीकृष्णका सच्चिदानन्द विग्रह होना :- “अहमेव”-श्लोके 'अहम्'-तिनबार। पूर्णैश्वर्ये-विग्रहेर स्थितिर निर्धार ॥ 112 ॥ अनुवाद-“अहमेव”-श्लोकमें 'अहम्' शब्द तीन बार आया है जो पूर्णैश्वर्य-विग्रहकी स्थितिको निर्धारित करता है॥ 112 ॥ अनुभाष्य-'अहमेव' श्लोकमें तीन बार 'अहम्' शब्द है। प्रथम चरणमें 'अहमेव'-पदमें, तृतीय-चरणमें 'पश्चादहं'-पदमें और चतुर्थ-चरणमें 'सोऽस्म्यहं'-पदमें 'अहं'-शब्द विद्यमान है; इसके द्वारा भगवान्का व्यक्तिगत विग्रह निर्धारित हुआ-वे केवल निर्विशेष नहीं हैं॥ 112 ॥ निराकारवादियोंका खण्डन :- ये 'विग्रह' नाहि माने, 'निराकार' माने। तारे तिरस्करिवारे करिला निर्धारणे ॥ 113 ॥ अनुवाद-जो 'विग्रह'को नहीं मानता, निराकारको ही मानता है, उसके भ्रमको दूर करनेके लिये ही भगवान्ने तीन बार 'अहम्' शब्दका प्रयोग किया है॥ 113 ॥ 492