श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1920, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 24/344-350 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला परिघायतदोर्भ्यां (परिघाय्याम् इव आयताभ्यां दीर्घाभ्यां दोर्भ्यां भुजाभ्यां) सानुकम्पम् (अनुकम्पा यथा स्यात्तथा कृपयेत्यर्थः) आलिलिङ्ग। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 344 ॥ श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (9/38)में- कालेन वृन्दावनकेलि-वार्त्ता लुप्तेति तां ख्यापयितुं विशिष्य। कृपामृतेनाभिषिषेच देवस्तत्रैव रूपञ्च सनातनञ्च ॥ 345 ॥ अनुवाद-कालके प्रभावसे वृन्दावनकी रसक्रीड़ाओंकी कथा लुप्त हो गयी थी, उन कथाओंका विशेषरूपसे विस्तार करनेके लिये श्रीगौराङ्गदेवने कृपारूपी अमृतके द्वारा वहाँपर श्रीरूप एवं श्रीसनातनको अभिषिक्त किया था॥ 345 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 19/119 संख्या देखें॥ 345 ॥ चौबीसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। श्रीसनातन-शिक्षाके अनुशीलनके फलस्वरूप अनर्थसे मुक्ति और सम्बन्ध-ज्ञान, अभिधेय एवं प्रयोजनकी प्राप्ति :- एइ त' कहिलुँ सनातने प्रभुर प्रसाद। याहार श्रवणे चित्तेर खण्डे अवसाद ॥ 346 ॥ कृष्णेर स्वरूपगणेर सकल हय 'ज्ञान'। विधि-राग-मार्गे 'साधनभक्ति'र विधान ॥ 347 ॥ 'कृष्णप्रेम', 'भक्तिरस', 'भक्तिर सिद्धान्त'। इहार श्रवणे भक्त जानेन सब अन्त ॥ 348 ॥ अनुवाद-(ग्रन्थकार श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी कह रहे हैं)-इस प्रकार मैंने महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातन गोस्वामीके ऊपर की गयी कृपाका वर्णन किया है, जिसके श्रवणसे चित्तके समस्त अनर्थ दूर हो जाते हैं। इसके श्रवणसे श्रीकृष्णके समस्त स्वरूपोंका ज्ञान होता है एवं वैधी और रागमार्गकी साधनभक्तिकी विधिका ज्ञान होता है। इसके श्रवणसे भक्त 'श्रीकृष्णप्रेम', 'भक्तिरस' और 'भक्तिके सिद्धान्तों' आदिको पूर्णरूपसे जान जाता है॥ 346-348 ॥ श्रीनिताइ-गौर-अद्वैतके ऐकान्तिक भक्तोंमें ही श्रीकृष्णप्रेमधनको प्राप्त करनेकी योग्यता :- श्रीचैतन्य-नित्यानन्द-अद्वैत-चरण। याँर प्राणधन, सेइ-पाय सेइ धन ॥ 349 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्य प्रभुके श्रीचरण ही जिसके प्राणधन हैं, वही इस धनको (उपरोक्त वर्णित ज्ञानको) प्राप्त कर सकता है॥ 349 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 350 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे आत्मारामश्चेति-श्लोक- व्याख्यायां सनातनानुग्रहो नाम चतुर्विंशः परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 350 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें आत्मारामश्चेति-श्लोककी व्याख्या और श्रीसनातनपर अनुग्रह नामक चौबीसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। 474 ।