श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1919, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय 24/339-344 ] 'वैष्णव'-आचारके विषयमें बतलाना। कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य आदि 'स्मार्त्त' व्यवहारके विषयमें भी लिखना ॥ 339 ॥ श्रीसनातनको आशीर्वाद :- एइ त' संक्षेपे कहिलुँ दिग्दर्शन। यबे तुमि लिखिबा, कृष्ण कराबे स्फुरण ॥ "340 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने संक्षेपमें वैष्णव-स्मृतिकी विषय-वस्तुका दिग्दर्शन कराया है। जब तुम इसे लिखोगे, तब श्रीकृष्ण तुम्हें सब कुछ स्फुरित करायेंगे ॥ "340 ॥ महाप्रभुके मुखसे श्रीसनातन-शिक्षा अथवा श्रीसनातनके प्रति महाप्रभुके कृपा-प्रसादके श्रवणसे अनर्थ-निवृत्ति और आत्म-प्रसादका उदय :- एइ त' कहिलु प्रभुर सनातने प्रसाद। याहार श्रवणे चित्तेर खण्डे अवसाद ॥ 341 ॥ अनुवाद—(ग्रन्थकार कह रहे हैं) इस प्रकार मैंने श्रीसनातन गोस्वामीके ऊपर महाप्रभुकी कृपाका वर्णन किया है। इसके श्रवणसे चित्तके समस्त अनर्थ दूर हो जाते हैं ॥ 341 ॥ चैतन्यचन्द्रोदय-नाटकमें वर्णित :- निज-ग्रन्थे कर्णपूर विस्तार करिया। सनातने प्रभुर प्रसाद राखियाछे लिखिया ॥ 342 ॥ अनुवाद—श्रीकविकर्णपूरने स्वरचित श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकमें श्रीसनातन गोस्वामीके ऊपर महाप्रभुकी कृपाके विषयमें विस्तारपूर्वक लिखा है ॥ 342 ॥ उपमाके द्वारा श्रीसनातनकी महिमाका वर्णन :- श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (9/34-35)-श्लोकमें प्रतापरुद्रके प्रति वार्त्ताहारि-वाक्य— गौड़ेन्द्रस्य सभा-विभूषणमणिस्त्यक्त्वा य ऋद्धां श्रियं रूपस्याग्रज एष एव तरुणीं वैराग्यलक्ष्मीं दधे। अन्तर्भक्तिरसेन पूर्णसरसो बाह्येऽवधूताकृतिः शैवालैः पिहितं महा-सर इव प्रीतिप्रदस्तद्विदाम् ॥ 343 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 343 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गौड़के राजा हुसेनशाह बादशाहकी सभामें विभूषणमणिस্বরূপ श्रीरूप गोस्वामीके बड़े भाई इन श्रीसनातनने समृद्ध-राजश्रीका परित्याग करके नवीनवैराग्य-लक्ष्मीको धारण किया था। अन्तःकरणमें भक्तिरससे पूर्णरस, बाहरमें अवधूतका रूप, काईके द्वारा आच्छादित महासरोवरकी भाँति वे श्रीसनातन भक्तितत्त्वके पण्डितोंको प्रीति प्रदान करनेवाले थे ॥ 343 ॥ अनुभाष्य— गौड़ेन्द्रस्य (गोड़ेश्वरस्य) सभाविभूषणमणिः (सभायां विभूषणे अलङ्करणे मणिः इव) यः ऋद्धां (समृद्धां) श्रियं (राजसम्पदं) त्यक्त्वा (परित्यज्य) तरुणीं (नवीनां) वैराग्यलक्ष्मीं (वैराग्यसम्पत्तिं) दधे (आश्रितवान्); शैवालैः पिहितम् (आच्छादितं) महासरः (गभीर-सरोवरम्) इव अन्तः (हृदये) भक्तिरसेन (कृष्ण-प्रेमरसेन) पूर्णसरसः (रसितः) बाह्ये (बहिः) अवधूताकृतिः (अवधूतस्य परमहंसस्य इव आकृतिः यस्य सः) रूपस्य अग्रजः सः एषः (सनातनः) एव तद्विदां (भक्तितत्त्वाभिज्ञानां तत्त्वकोविदानां विदुषां देशिकानां) प्रीतिप्रदः (प्रेमभाक्) अभूत्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 343 ॥ तं सनातनमुपागतमक्ष्णोर्दृष्टि- मात्रमतिमात्रदयार्द्रः। आलिलिङ्ग परिधायत-दोर्भ्यां सानुकम्पमथ चम्पकगौरः॥ 344 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 344 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसनातनके आनेपर, उन्हें देखते-ही चम्पकवर्ण श्रीगौरसुन्दरने अत्यन्त दयासे आर्द्र होकर दोनों हाथ फैलाकर कृपा प्रकाश करते हुए उनका आलिङ्गन किया ॥ 344 ॥ चौबीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य— अतिमात्रदयार्द्रः (निरतिशयया दयया आर्द्रः) चम्पकगौरः (चम्पक-कुसुमवत् पीतवर्णः) अक्ष्णोः (नयनयोः) दृष्टिमात्रं (दर्शनमात्रेण) उपागतं (हीनवेशेन समायातं) तं सनातनं । 473