श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1941, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपचीसवाँ अध्याय 25/122-126 ] पञ्चभूत यैछे भूतेर भितरे-बाहिरे। भक्तगणे स्फुरि आमि बाहिरे-अन्तरे ॥ 123 ॥ अनुवाद—मुझमें जो ‘प्रीति’ है, वही प्रेम है और वही जीवका चरम 'प्रयोजन' है। व्यवहारिक उदाहरणके द्वारा प्रेमके स्वरूप लक्षणका वर्णन करूँगा। पञ्चभूत (भूमि-जलादि) जैसे जीवोंके भीतर और बाहर व्याप्त हैं, उसी प्रकार मैं भी भक्तोंके हृदयमें तथा उनके सामने बाहर स्फुरित होता हूँ॥ 122-123 ॥ अनुभाष्य—जिस प्रकार प्राणियोंके भीतरमें और बाहरमें पञ्चभूत हैं, उसी प्रकार मैं भक्तोंके भीतरमें और बाहरमें स्फूर्तिके द्वारा प्राप्त होता हूँ। भक्त स्वयंको भगवान्की प्रीति-सेवाका उपकरण-विग्रह समझते हैं और भक्तिके अतिरिक्त अन्य वस्तुओंको भी भगवद्-प्रीतिसेवाका उपकरण मात्र ही समझते हैं॥ 123 ॥ चतुःश्लोकीका तृतीय श्लोक :— श्रीमद्भागवत (2/9/34)में— यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु। प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ 124 ॥ अनुवाद—जिस प्रकार समस्त महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) बृहद् और क्षुद्र (ब्रह्मासे एक चींटीतक) सभी जीवोंके भीतर प्रविष्ट (संलग्न) होकर भी अप्रविष्ट रूपमें (बाहर) स्वतन्त्र विद्यमान होते हैं, उसी प्रकार मैं भूतमय (भौतिक) जगत्में सभी जीवोंमें सत्त्वाश्रयरूप परमात्माके रूपमें प्रविष्ट होनेपर भी पृथक् भगवत् स्वरूपमें नित्य विराजमान होता हूँ और भक्तोंका एकमात्र प्रेमास्पद (प्रेमका विषय) हूँ। तात्पर्य यह है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, ये सभी महाभूत पाँच रूपोंमें होकर जैसे इस स्थूल-जगत्को प्रकाश करते हुए उसके उपकरण रूपमें उसके भीतर रहनेपर भी महाभूत अवस्थामें स्वतन्त्र हैं, इसी प्रकार चिन्मय परमेश्वर अपनी जड़शक्ति और जीवशक्तिके द्वारा जगत्की सृष्टि करके एकांशमें जगत्में सर्वव्यापी होकर रहनेपर भी युगपत् अर्थात् एक ही समयमें अपने चिद्धाममें पूर्ण चिन्मय-विग्रहरूपमें भी नित्य विराजमान रहते हैं। और चित्-विग्रहके किरण-परमाणुस्वरूप जीव शुद्ध-प्रेममार्गमें उनके विमल-प्रेमका आस्वादन करते हैं—यही रहस्य है॥ 124 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 1/55 संख्या देखें॥ 124 ॥ भगवान् भक्तके प्रेमपाशमें आबद्ध :— भक्त आमा बान्धियाछे हृदय-कमले। याँहा नेत्र पड़े ताँहा देखये आमारे ॥ 125 ॥ अनुवाद—भक्तोंने मुझे अपने हृदय-कमलमें बाँधकर रखा हुआ है और उनके नेत्र जहाँ भी पड़ते हैं, वे वहींपर मुझे ही देखते हैं॥ 125 ॥ श्रीमद्भागवत (11/2/55)में— विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा- द्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाशः। प्रणयरसनया धृताङ्घ्रिपद्मः स भवति भागवतप्रधान उक्तः ॥ 126 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 126 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उदासीन होकर भी पुकारे जानेपर सर्वपाप-विनाशक जिसके हृदयका परित्याग नहीं करते, प्रणयकी रस्सीके द्वारा उनके चरणकमल जिसके हृदयमें आबद्ध हैं, वही 'भागवत-प्रधान' है॥ 126 ॥ अनुभाष्य—विदेहराज निमिके द्वारा तीन प्रकारके भक्तों अथवा भागवतोंके लक्षण, आचरण और तारतम्यके विषयमें जिज्ञासा करनेपर, उसके उत्तरमें नवयोगेन्द्रोंमेंसे एक हवि-ऋषिने कहा,— अवशाभिहितः (अवशेन कीर्त्तितः) अपि अघौघनाशः (अघौघम् अपराधपुञ्जं नाशयति यः सः) हरिः (एव) साक्षात् यस्य हृदयं न विसृजति (मुञ्चति), प्रणयरसनया (प्रेमरज्जुना) धृताङ्घ्रिपद्मः (धृतम् अन्तर्बद्धम् अङ्घ्रिपद्मं चरणकमलं येन सः) सः भागवतप्रधानः (इति) उक्तः भवति। । 495