श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1942, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 25/126-131 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 126 ॥ श्रीमद्भागवत (11/2/45)में— सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥ 127 ॥ अनुवाद—जो उत्तम भागवत होते हैं, वे सभी प्राणियोंमें आत्माके भी आत्मरूप भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रको ही देखते हैं और आत्माके आत्मस्वरूप श्रीकृष्णमें समस्त जीवोंको देख पाते हैं ॥ 127 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/274 संख्या देखें ॥ 127 ॥ चिन्मय आश्रयको सर्वत्र श्रीकृष्ण सम्बन्धि-चिन्मय-वस्तुका दर्शन :— श्रीमद्भागवत (10/30/4)में— गायन्त्य उच्चैरमुमेव संहता विचिक्युरुन्मत्तकवद् वनाद् वनम्। पप्रच्छुराकाशवदन्तरं बहि- र्भूतेषु सन्तं पुरुषं वनस्पतीन् ॥ 128 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 128 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एक साथ मिलकर गोपियाँ श्रीकृष्णके गुणोंका उच्च-स्वरसे गान करते-करते उन्मत्तकी भाँति श्रीकृष्णको एक वनसे अन्य वनमें ढूँढ़ने लगीं और आकाशकी भाँति बाहर और अन्तरमें स्थित उन परमपुरुष श्रीकृष्णके विषयमें वनस्पतियोंसे पूछने लगीं ॥ 128 ॥ अनुभाष्य—रासस्थलीसे श्रीकृष्णके अचानक श्रीराधाके साथ अन्तर्धान होनेपर श्रीकृष्णमें समर्पित चित्तवाली कृष्णमयी गोपियाँ श्रीकृष्णकी विविध चेष्टाओंका अनुकरण करते हुए विरहमें सन्तप्त होकर इधर-उधर श्रीकृष्णको ढूँढ़ने लगीं, श्रीशुकदेव परीक्षितसे उसका वर्णन रहे हैं,— संहताः (अन्योन्यं सम्मिलिताः सत्यः) उच्चैः गायन्त्यः वनाद् वनं (वनान्तरम्) अमुं (कृष्णम्) एव उन्मत्तकवत् विचिक्युः (अमृगयन्); आकाशवत् (महाभूतवत्) भूतेषु (प्राणिषु) बहिः अन्तरं (मध्ये) सन्तं (वर्त्तमानं) पुरुषं (प्रेमविवर्त्तवशात् सर्वत्र कृष्णस्फूर्त्तयः सत्यः) वनस्पतीन् (चेतन-मयान् दृष्ट्वा) पप्रच्छुः (जिज्ञासयामासुः) । श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 128 ॥ भागवतमें सर्वत्र सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजन-तत्त्व वर्णित :— अतएव भागवते एइ 'तिन' कय। सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजन-मय ॥ 129 ॥ अनुवाद—इसलिये भागवतमें सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन—इन तीन तत्त्वोंकी ही सर्वत्र आलोचना हुई है ॥ 129 ॥ सम्बन्ध-द्योतक श्लोकका दृष्टान्त :— श्रीमद्भागवत (1/2/11) में— वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ 130 ॥ अनुवाद—तत्त्वको जाननेवाले विज्ञगण अद्वयज्ञानको तत्त्व कहते हैं। उसी अद्वयज्ञानकी प्रथम प्रतीति ब्रह्म, द्वितीय प्रतीति परमात्मा और तृतीय प्रतीति भगवान् हैं ॥ 130 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/11 संख्या देखें ॥ 130 ॥ भागवतमें सर्वत्र अभिधेय 'कृष्णभक्ति' वर्णित :— एइ—'सम्बन्ध', शुन 'अभिधेय'–भक्ति। भागवते प्रति-श्लोके व्यापे यार स्थिति ॥ 131 ॥ अनुवाद—यह जीवका भगवान्से 'सम्बन्ध' है, अब आप 'अभिधेय'-भक्तिके विषयमें सुनिये। भागवतका प्रत्येक श्लोक अभिधेय-भक्तिको ही बतलाता है ॥ 131 ॥ अनुभाष्य—यहाँपर पाठान्तरमें और भी दो श्लोक उद्धृत हुए हैं—(1) भाः (3/5/23)— “भगवानेक आसेदमग्र आत्मात्मनां विभुः। आत्मेच्छानुगतावात्मा नानामत्युपलक्षणः ॥” अर्थात् “सृष्टिसे पहले यह विश्व भगवान्के साथ एक था; जीवोंके अर्थ-स्वरूप और वैकुण्ठादि अनेक 496 ।