श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1943, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपचीसवाँ अध्याय 25/131-134 ] वैभवके उपलक्षणसे युक्त होकर उस समय सृष्टि आदिकी इच्छा उन्हींमें लीन थी और वही भगवान् ही अद्वयतत्त्वके रूपमें विराजित थे।” (2) भाः (1/3/28)— “एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयं। इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे॥” अर्थात् “राम-नृसिंहादि, पुरुषावतारके अंश या कला (अंशके अंश) हैं, किन्तु श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। दैत्योंके द्वारा पीड़ित लोगोंकी प्रत्येक युगमें ये (अवतार) रक्षा करते हैं।” भागवतके प्रत्येक श्लोकमें ही अभिधेय साधन-भक्तिकी कथा है॥131॥ अभिधेय-द्योतक श्लोकका दृष्टान्त :— श्रीमद्भागवत (11/14/21) में— भक्त्याहमेकया ग्राह्यः श्रद्धयात्मा प्रियः सताम्। भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात्॥132॥ अनुवाद—साधुओंका प्रिय मैं, अनन्य श्रद्धासे उत्पन्न भक्तिके द्वारा ही प्राप्त होता हूँ। भक्ति ही मुझमें निष्ठा रखनेवाले चण्डालका भी जन्मदोषसे उद्धार करती है॥132॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 20/138 संख्या देखें। यहाँ पाठान्तरमें और भी दो श्लोक अधिक उद्धृत हुए हैं, ऐसा देखा जाता है—(1) भाः 11/14/20— “न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव। न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता॥” अर्थात् “हे उद्धव! मेरे प्रति की गयी प्रबल भक्ति जिस प्रकार मुझे वशीभूत कर सकती है, अष्टाङ्ग-योग, अभेद-ब्रह्मवादरूप सांख्यज्ञान, ब्राह्मणोंका स्वशाखा- अध्ययनरूप स्वाध्याय, सब प्रकारकी तपस्या और त्यागरूप संन्यासादिके द्वारा मुझे वैसा वशीभूत नहीं किया जा सकता है।” (2) भाः 11/2/37— “भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यादीशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः। तन्माययातो बुध आभजेत्तं भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा॥” अर्थात् “श्रीकृष्णसे इतर (अन्य) जो माया है, उसमें अभिनिविष्ट जीवमें 'भय' उपस्थित होता है और उन ईश्वरसे बहिर्मुख होनेके कारण मायाजनित विपरीत स्मृति होती है; इसी कारण पण्डित व्यक्ति गुरुको 'देवता' और 'आत्म'-स्वरूप मानकर अनन्य-भक्तिके साथ उन परमेश्वरका भजन करेंगे॥”132॥ प्रयोजन श्रीकृष्णप्रेमके ‘बाह्य’ लक्षण :— एबे शुन, प्रेम, येइ—मूल 'प्रयोजन'। पुलकाश्रु-नृत्य-गीत—याहार लक्षण॥133॥ अनुवाद—अब आप प्रेमके विषयमें सुनिये, जो मूल 'प्रयोजन' है। पुलक-अश्रु-नृत्य एवं गीत जिसके लक्षण हैं॥133॥ प्रयोजन श्रीकृष्णप्रेम-द्योतक श्लोकका दृष्टान्त :— श्रीमद्भागवत (11/3/31) में— स्मरन्तः स्मारयन्तश्च मिथोऽघौघहरं हरिम्। भक्त्या संजातया भक्त्या बिभ्रत्युत्पुलकां तनुम्॥134॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥134॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पापोंका हरण करनेवाले श्रीहरिको परस्पर स्मरण करते-करते और स्मरण कराते-कराते उन्होंने साधनभक्तिसे भली-भाँति उत्पन्न प्रेम-भक्तिके द्वारा उत्पुलकित देह धारण की॥134॥ अनुभाष्य—श्रीवसुदेवसे श्रीनारद भागवतधर्मके विषयमें बतलाते हुए विदेहराज निमि और नवयोगेन्द्रके संवादका वर्णन कर रहे हैं। 'देहात्मबुद्धिवाला अज्ञानी व्यक्ति किस प्रकार सहज ही मायाको जय कर सकता है?'—निमिके इस प्रश्नके उत्तरमें नवयोगेन्द्रोंमेंसे एक प्रबुद्ध-ऋषि बद्धजीवोंके गुरुपादाश्रय करके निरपराध कीर्त्तनाख्य-भक्तिका साधन करते-करते अनर्थ-निवृत्तिके बाद साध्य भावभक्ति प्राप्त करनेकी अवस्थाका वर्णन कर रहे हैं,— । 497