भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1944, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1944

[ 25/134-138 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला [एवं वर्त्तमानानां साधकानां] भक्त्या (साधन-भक्त्या) सञ्जातया (लब्धया प्रेमलक्षणाया भक्त्या) अघौघहरं (पापपुञ्जं हरति विनाशयति यः तं) हरिं स्मरन्तः मिथः (परस्परं) स्मारयन्तः (सङ्कीर्त्तयन्तः) च [ते भक्ताः] उत्पुलाकां (रोमाञ्चितं) तनुं बिभ्रति (धरन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 134 ॥ श्रीमद्भागवत (11/2/40)में— एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः। हसत्यथो रोदिति रौति गायत्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ 135 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णसेवा-व्रतधारी पुरुष अवशचित्त होकर अर्थात् अब उसका चित्त उसके वशमें नहीं है, प्रियतम श्रीकृष्णके नामकीर्त्तनमें राग उत्पन्न होनेके कारण शिथिल-हृदय हो जाता है। वह लोक-व्यवहारकी अपेक्षासे रहित होकर उन्मत्तकी भाँति कभी हँसता, कभी रोता, कभी चीत्कार करता और कभी गान-नृत्य करता है ॥ 135 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 7/94 संख्या देखें ॥ 135 ॥ अतएव ब्रह्मसूत्र और ब्रह्मसूत्र-भाष्य भागवत— एक ही अर्थके प्रतिपादक :- अतएव भागवत—सूत्रेर् ‘अर्थरूप’। निज-कृत सूत्रेर निज-‘भाष्य’-स्वरूप ॥ 136 ॥ अनुवाद—इसलिये भागवत वेदान्त-सूत्रका ‘अर्थ’- रूप है। श्रीव्यासदेवने वेदान्त-सूत्रकी रचना की और उसीके भाष्य-स्वरूप भागवतकी भी रचना की ॥ 136 ॥ श्रीमद्भागवत—(1) ब्रह्मसूत्रका भाष्य, (2) महाभारतके अर्थका तात्पर्य, (3) गायत्रीभाष्य और (4) वेदके अर्थका विस्तार :- गरुणपुराण-वाक्य— अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां भारतार्थ-विनिर्णयः। गायत्रीभाष्यरूपोऽसौ वेदार्थपरिवृंहितः। ग्रन्थोऽष्टादशसाहस्रः श्रीमद्भागवताभिधः ॥ 137 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 137 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह श्रीमद्भागवत—ब्रह्मसूत्रका अर्थ, महाभारतका तात्पर्य-निर्णय, गायत्रीका भाष्यरूप और समस्त वेदोंके तात्पर्यके द्वारा सम्वर्द्धित है। यह श्रीमद्भागवत-ग्रन्थ अठारह हजार श्लोकोंवाला है ॥ 137 ॥ अनुभाष्य— अयं (भागवताभिधः ग्रन्थः) ब्रह्मसूत्राणां (उत्तर-मीमांसाख्य- वेदान्तसूत्राणाम्) अर्थः (भाष्यत्वेन अभिधेयरूपः) भारतार्थविनिर्णयः (महाभारतस्य अर्थानां निर्णयः यस्मिन् सः) असौ (महाग्रन्थः) गायत्रीभाष्यरूपः (वेदमातुः ब्रह्मगायत्र्याः तात्पर्यप्रकाशकः) वेदार्थ-परिवृंहितः (वेदार्थैः संवर्द्धितः) च अष्टादशसाहस्रः (अष्टादशसहस्रैः श्लोकैः परिनिर्मितः) श्रीमद्भागवताभिधः (श्रीमद्भागवत-नामा) ग्रन्थः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। पाठान्तरमें एक अधिक श्लोक उद्धृत हुआ है— “पुराणानां सामरूपः साक्षाद्भगवतोदितः। द्वादशस्कन्धयुक्तोऽयं शतविच्छेदसंयुतः॥” अर्थात् “श्रीमद्भागवत नामक यह ग्रन्थ साक्षात् भगवान्के द्वारा कहा गया है। यह ग्रन्थ पुराणोंके मध्य सामवेदके समान है। इस ग्रन्थमें बारह स्कन्ध हैं और तीन सौ पैंतीस अध्याय हैं॥”137 ॥ “भारतादि स्मृत्याैतिह्यार्थ-विनिर्णय” :- श्रीमद्भागवत (1/3/42) में— सर्व-वेदेतिहासानां सारं सारं समुद्धृतम् ॥ 138 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 138 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीवेदव्यासने समस्त वेदों और इतिहाससे सङ्कलित सारस्वरूप (श्रीमद्भागवतका अपने पुत्र श्रीशुकदेवको अध्ययन कराया) ॥ 138 ॥ अनुभाष्य— सर्ववेदेतिहासानां (सकल-निगमैतिह्यानां) समुद्धृतं (संगृहीतं, सङ्कलितः) सारं सारं (सर्वोत्कृष्टभागस्वरूपं, श्रीमद्भागवतं स्वसुतं ग्राहयामासेति पूर्वेणान्वयः)। 498

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 1944, कुल 2549 में से · BharatKosha