भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 25/134-138 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला [एवं वर्त्तमानानां साधकानां] भक्त्या (साधन-भक्त्या) सञ्जातया (लब्धया प्रेमलक्षणाया भक्त्या) अघौघहरं (पापपुञ्जं हरति विनाशयति यः तं) हरिं स्मरन्तः मिथः (परस्परं) स्मारयन्तः (सङ्कीर्त्तयन्तः) च [ते भक्ताः] उत्पुलाकां (रोमाञ्चितं) तनुं बिभ्रति (धरन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 134 ॥ श्रीमद्भागवत (11/2/40)में— एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः। हसत्यथो रोदिति रौति गायत्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ 135 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णसेवा-व्रतधारी पुरुष अवशचित्त होकर अर्थात् अब उसका चित्त उसके वशमें नहीं है, प्रियतम श्रीकृष्णके नामकीर्त्तनमें राग उत्पन्न होनेके कारण शिथिल-हृदय हो जाता है। वह लोक-व्यवहारकी अपेक्षासे रहित होकर उन्मत्तकी भाँति कभी हँसता, कभी रोता, कभी चीत्कार करता और कभी गान-नृत्य करता है ॥ 135 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 7/94 संख्या देखें ॥ 135 ॥ अतएव ब्रह्मसूत्र और ब्रह्मसूत्र-भाष्य भागवत— एक ही अर्थके प्रतिपादक :- अतएव भागवत—सूत्रेर् ‘अर्थरूप’। निज-कृत सूत्रेर निज-‘भाष्य’-स्वरूप ॥ 136 ॥ अनुवाद—इसलिये भागवत वेदान्त-सूत्रका ‘अर्थ’- रूप है। श्रीव्यासदेवने वेदान्त-सूत्रकी रचना की और उसीके भाष्य-स्वरूप भागवतकी भी रचना की ॥ 136 ॥ श्रीमद्भागवत—(1) ब्रह्मसूत्रका भाष्य, (2) महाभारतके अर्थका तात्पर्य, (3) गायत्रीभाष्य और (4) वेदके अर्थका विस्तार :- गरुणपुराण-वाक्य— अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां भारतार्थ-विनिर्णयः। गायत्रीभाष्यरूपोऽसौ वेदार्थपरिवृंहितः। ग्रन्थोऽष्टादशसाहस्रः श्रीमद्भागवताभिधः ॥ 137 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 137 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह श्रीमद्भागवत—ब्रह्मसूत्रका अर्थ, महाभारतका तात्पर्य-निर्णय, गायत्रीका भाष्यरूप और समस्त वेदोंके तात्पर्यके द्वारा सम्वर्द्धित है। यह श्रीमद्भागवत-ग्रन्थ अठारह हजार श्लोकोंवाला है ॥ 137 ॥ अनुभाष्य— अयं (भागवताभिधः ग्रन्थः) ब्रह्मसूत्राणां (उत्तर-मीमांसाख्य- वेदान्तसूत्राणाम्) अर्थः (भाष्यत्वेन अभिधेयरूपः) भारतार्थविनिर्णयः (महाभारतस्य अर्थानां निर्णयः यस्मिन् सः) असौ (महाग्रन्थः) गायत्रीभाष्यरूपः (वेदमातुः ब्रह्मगायत्र्याः तात्पर्यप्रकाशकः) वेदार्थ-परिवृंहितः (वेदार्थैः संवर्द्धितः) च अष्टादशसाहस्रः (अष्टादशसहस्रैः श्लोकैः परिनिर्मितः) श्रीमद्भागवताभिधः (श्रीमद्भागवत-नामा) ग्रन्थः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। पाठान्तरमें एक अधिक श्लोक उद्धृत हुआ है— “पुराणानां सामरूपः साक्षाद्भगवतोदितः। द्वादशस्कन्धयुक्तोऽयं शतविच्छेदसंयुतः॥” अर्थात् “श्रीमद्भागवत नामक यह ग्रन्थ साक्षात् भगवान्के द्वारा कहा गया है। यह ग्रन्थ पुराणोंके मध्य सामवेदके समान है। इस ग्रन्थमें बारह स्कन्ध हैं और तीन सौ पैंतीस अध्याय हैं॥”137 ॥ “भारतादि स्मृत्याैतिह्यार्थ-विनिर्णय” :- श्रीमद्भागवत (1/3/42) में— सर्व-वेदेतिहासानां सारं सारं समुद्धृतम् ॥ 138 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 138 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीवेदव्यासने समस्त वेदों और इतिहाससे सङ्कलित सारस्वरूप (श्रीमद्भागवतका अपने पुत्र श्रीशुकदेवको अध्ययन कराया) ॥ 138 ॥ अनुभाष्य— सर्ववेदेतिहासानां (सकल-निगमैतिह्यानां) समुद्धृतं (संगृहीतं, सङ्कलितः) सारं सारं (सर्वोत्कृष्टभागस्वरूपं, श्रीमद्भागवतं स्वसुतं ग्राहयामासेति पूर्वेणान्वयः)। 498

पचीसवाँ अध्याय 25/138-142 ] श्लोक-भावानुवाद—समस्त निगम-इतिहाससे उनके सार अर्थात् सर्वोत्कृष्ट भाग-स्वरूप श्रीमद्भागवतका अपने पुत्र श्रीशुकदेवको अध्ययन कराया था, इसका श्लोकके प्रथम चरणके साथ अन्वय करें ॥ 138 ॥ “ब्रह्मसूत्रका अर्थ” :- श्रीमद्भागवत (12/13/15) में— सर्ववेदान्तसारं हि श्रीमद्भागवतमिष्यते। तद्रसामृततृप्तस्य नान्यत्र स्याद्रतिः क्वचित् ॥ 139 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 139 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमद्भागवतको वेदान्तका सार कहा जाता है, भागवतके रसामृतसे तृप्त व्यक्तिकी अन्य किसी शास्त्रमें रति नहीं होती ॥ 139 ॥ अनुभाष्य—महाभागवत श्रीसूत शौनकादि ऋषियोंसे श्रीमद्भागवतका वर्णन समाप्त करके अठारह महापुराणोंके श्लोकोंकी संख्याका निर्देश करके उपसंहारमें श्रीमद्भागवतकी महिमाका वर्णन कर रहे हैं,— सर्ववेदान्तसारं (सकलोपनिषद्ब्रह्मसूत्राणाम् उत्कृष्टभागः) हि श्रीभागवतम् इष्यते (अभिधीयते) यतः तद्रसामृत-तृप्तस्य (तस्य भागवतस्य रस एव अमृतं तेन तृप्तस्य जनस्य) अन्यत्र (शास्त्रादौ भागवतेतर-जनादिषु वा) क्वचित् (कदाचिदपि) रतिः न स्यात् (न सम्भवेत्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 139 ॥ “गायत्री-भाष्यरूप” :- गायत्रीर अर्थे एइ ग्रन्थ-आरम्भन। “सत्यं परं”—सम्बन्ध, “धीमहि”—साधने प्रयोजन ॥ 140 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 140 ॥ अनुभाष्य—इस श्रीमद्भागवत ग्रन्थके प्रारम्भिक श्लोकमें ही गायत्रीका अर्थ है। परम सत्य ही 'सम्बन्ध', ध्यानचेष्टा अथवा साधनभक्तिका अनुष्ठान ही 'अभिधेय' और प्राप्त-फल ध्यान अथवा प्रेमभक्ति ही अभिधेयका प्राप्य 'प्रयोजन' फल है ॥ 140 ॥ श्रीमद्भागवत (1/1/1-2)— जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतः्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत् सूरयः। तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥ 141 ॥ अनुवाद—इस विश्वका जन्म, स्थिति और लय जिससे होता है, ऐसा कहनेसे जो तत्त्व निश्चित हुआ है, अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा विचार करनेपर जो समस्त अर्थ अथवा कार्यमें एकमात्र परम 'ज्ञ-तत्त्व' अर्थात् 'स्वरूपतत्त्व' कहलाकर स्थिर होते हैं; जो दृश्यमान जगत्में एकमात्र स्वराट् अर्थात् स्वतन्त्र राजा हैं; जिन्होंने आदिकवि ब्रह्माको अन्तर्यामीके रूपमें ब्रह्मतत्त्वकी शिक्षा दी है; जिनके विषयमें समस्त बुद्धिमान पण्डितोंमें बारम्बार मोह उत्पन्न होता है; जिनसे अग्नि, जल और मिट्टी आदि भूतोंका विनिमय अर्थात् पृथक् रूपमें सत्ता है; जिनसे तीन प्रकारकी सृष्टि अर्थात् चिद्-उदयरूप सृष्टि, जीव-प्रकाट्यरूप सृष्टि और मायिक-ब्रह्माण्डरूप सृष्टि—सत्यरूपमें वर्तमान है; स्वरूपशक्तिके द्वारा नित्य-कपट-शून्य परमसत्य-तत्त्वरूप उन श्रीकृष्णका हम ध्यान करते हैं ॥ 141 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/265 संख्या देखें ॥ 141 ॥ धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्। श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किंवापरैरीश्वरः सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥ 142 ॥ अनुवाद—यह श्रीमद्भागवत ग्रन्थ सर्वप्रथम महामुनि श्रीनारायणके द्वारा चतुःश्लोकी (अर्थात् चार श्लोकों)के रूपमें निर्मित है। इसमें निर्मत्सर अर्थात् सब जीवोंके प्रति दयालु व्यक्तियोंके लिये धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष तक कैतवसे शून्य अर्थात् छलरहित परमधर्मकी व्याख्या हुई है। यह धर्म जीवके त्रितापका नाश करनेवाला, शिवद अर्थात् मङ्गल प्रदान करनेवाला और । 499

[ 25/142-144 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

वास्तव-वस्तुके तत्त्व-ज्ञानको प्रदान करनेवाला है। इसको श्रवण करनेके इच्छुक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार ईश्वरको अपने हृदयमें अवरुद्ध करनेमें समर्थ होते हैं। इसलिये श्रीमद्भागवतके अतिरिक्त अन्य किसी शास्त्रकी क्या आवश्यकता है? ॥ 142 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/91 संख्या देखें ॥ 142 ॥ 'कृष्णभक्ति-रसस्वरूप' श्रीभागवत। ताते वेदशास्त्र हैते परम महत्त्व ॥ 143 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 143 ॥ अनुभाष्य-श्रीभागवत-श्रीकृष्णभक्तिरस-स्वरूप है। भगवद्-वाणीमय वेदशास्त्र-वृक्षके समान हैं, श्रीमद्भागवत- उसी वृक्षका पूर्णरूपसे पका हुआ फल है, इसलिये तारतम्यके विचारसे वेदकी अपेक्षा परम-उन्नत है ॥ 143 ॥ “वेदार्थपरिवृंहित”-वेदका परिपक्व फल :- श्रीमद्भागवत (1/1/3)में- निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुक्तम्। पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥ 144 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 144 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यह भागवत-शास्त्र वेदरूपी कल्पवृक्षका पूर्णरूपसे पका हुआ फल और श्रीशुकदेवके मुखके अमृतसे संयुक्त है, हे रसिकजनों, रसतत्त्वमें परमालय अर्थात् निमग्न-भाव जब तक न हो, तब तक इस जगत्में (अप्राकृत) भावुकरूपमें भागवतका आस्वादन करो, निमग्न होनेपर भी इस परम रसका पुनः पुनः नित्य ही पान करते रहना॥ 144 ॥ अनुभाष्य-श्रीमद्भागवतके प्रथम स्कन्धके प्रथम अध्यायके तृतीय श्लोकमें आशीर्वाद रूप मङ्गलाचरण- अहो (हे) रसिकाः (भगवत्सेवारसविदः,) भावुकाः (रसविशेषभावनचतुराः,) शुकमुखात् (व्यासशिष्यप्रशिष्यादि- पारम्पर्यक्रमेण) भुवि (पृथिव्यां) गलितम् (अखण्डमेव अवतीर्णं, स्वेच्छया पतितं, न तु बलात् पतितं परिपक्वत्वात्) अमृत- द्रवसंयुक्तम् (अमृतं परमानन्दः स एव द्रवः रसः तेन संयुक्तं विशिष्टं) निगमकल्पतरोः (वेदरूपकल्पवृक्षस्य) रसं (त्वगष्ट्यादि- कठिन-हेयांश-रहितं केवलं रसरूपं) फलं भागवतं आ-लयं (मोक्षानन्दामभिव्याप्य) मुहुः पिबतः (परमादरेण सेवेध्वम्)। श्लोक-भावानुवाद-हे रसिकजनों (भगवत्-सेवारसको जाननेवालों), भावुकजनों (रसपानमें विशेष चतुर लोगों) व्यासशिष्यप्रशिष्यादि परम्पराके क्रमसे पृथ्वीपर पूर्ण पक जानेपर स्वतः ही अखण्डरूपमें अवतीर्ण परमानन्दरससे संयुक्त वेदरूपकल्पवृक्षका (छिलका, गुठली आदि कठिन हेयांशसे रहित केवल) रसरूप फल श्रीमद्भागवतका आ-लय (मोक्षानन्द तक) पुनः पुनः परम आदरसे सेवन करो ॥ 144 ॥ अमृतानुकणिका-वेद-उपनिषद् आदि जितनी भी श्रुतियाँ हैं, उन्हें निगम कहते हैं। श्रुतियाँ, स्मृतियाँ आदि ये सब निगम और आगम हैं। ये वृक्ष हैं, उपनिषद् आदि इनकी शाखाएँ हैं। गोपालतापनी आदि इनके पत्ते हैं। भागवतकी उपमा निगम-आगम आदि रूप वृक्षके फलसे दी गयी है और दशम स्कन्ध पका हुआ फल है, जिसमें गुठली नहीं है, रेशे भी नहीं हैं जो दाँतोंमें फँस जाते हैं और छिलका भी नहीं है। उसमें फेंकने योग्य कोई वस्तु नहीं है। गोलोक वृन्दावनमें श्रीकृष्णके चरणकमलरूपी वृक्षकी शाखाओंपर प्रेमकी लता फैली है और वहाँसे यह वृक्षकी शाखाओंपर फल पकता है और नीचे इस माया-जगत्में गिरता है। इतनी दूर गिरनेपर भी फलके फटने और रसके बिखरनेकी सम्भावना नहीं है, क्योंकि वह हमारी गुरु-परम्पराके माध्यमसे नीचे आ रहा है। जब गिरा तो सर्वप्रथम ब्रह्माजीने उसे अपने हाथोंमें ले लिया, उनके द्वारा छोड़नेपर वह फल क्रमशः नारदजी, व्यासजीके द्वारा गुरु-परम्पराके माध्यमसे हमारे गुरुजीके पास आया। यह फल कच्चा नहीं है, अपितु सूर्यकी किरणोंसे तपकर एकदम पीला हो गया है, परिपक्व हो गया है और सुगन्धसे भरपूर हो गया है। श्रीकृष्ण ही सूर्यके

500 |

पचीसवाँ अध्याय 25/144-145 ] समान हैं और उनकी विरहके तापसे ही यह पका हुआ यह मधुर सुगन्धित केवल रस ही रस है। 'पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः'-साधारण लोगोंके लिये इसका अर्थ है कि 'हे रसिकों ! हे भावुक लोगों ! इस जगत्में आप आलय तक इसका पान करो। आलयका अर्थ देहावसान होता है अर्थात् इस जगत्में देहत्याग तक इसका निरन्तर पान करो।' परन्तु रसिक और भावुक लोगोंके लिये श्रीकृष्ण ही अखिल रसामृतसिन्धु हैं और व्रजमें गोपियाँ इस रसका सबसे अधिक पान करती हैं। उनके उच्छिष्टको यशोदा मैया, नन्दबाबा वात्सल्य रसमें पान करते हैं और उनके उच्छिष्टको श्रीदाम-सुबलादि सख्यरसमें पान करते हैं। उनसे जो बच जाता है, उसे रक्तक-पत्रक आदि सब लोग दास्यरसमें पान करते हैं। व्रजवासियोंके आनुगत्यमें भजन करते-करते अभी जो रागानुगा भक्त हैं, उनको यहाँ भावुक कहा गया है, क्योंकि वे भावावस्था तकके हो सकते हैं। और रसिक वे हैं जिनकी वस्तु सिद्धि हो गयी है और नारदादि वे लोग यदा-कदा ही इस संसारमें भ्रमण करते हैं। किन्तु यदि शुद्धभक्त लोग हरिकथाको कहते हैं, तो उसे श्रवण करनेके लिये हनुमानजी, शङ्करजी, ब्रह्माजी, नारदजी अथवा शुकदेव गोस्वामी आदिका वेश बदलकर आनेकी सम्भावना होती है। औरोंकी तो बात ही क्या है, जब शुद्धभक्तोंके द्वारा श्रीराधा-कृष्णकी कथाएँ होती है, तो स्वयं श्रीराधा और श्रीकृष्णचन्द्र भी आये बिना नहीं रह सकते। बिल्वमङ्गल आदि जिनमें अभी भाव उत्पन्न हुआ वे भावुक भक्त हो सकते हैं। विमुक्तप्रग्रह वृत्तिसे यदि विचार किया जाय, तो रसिक और भावुक एक भी कहे जा सकते हैं, जो भगवान्के लीलारूपी रसका पान करने वाले दुर्लभ महात्मा हैं। ये लोग कब तक पान करेंगे? हरिकथा सुनते-सुनते आँखोंसे अश्रुओंके बरसनेपर भी सुनेंगे, गला रुद्ध हो जाने तक भी सुनेंगे, शरीरमें पुलक-रोमाञ्च हो जाने तक भी सुनेंगे, किन्तु 'आलयम्' अर्थात् मूर्च्छावस्था आनेपर तो गिर जायेंगे, तब ये सुन नहीं पायेंगे। इसलिये अद्वैतवादी लोग यह अर्थ करते हैं कि जब तक शरीरमें चेतना रहे, तब तक इस दिव्य भगवद्रसका निरन्तर बार-बार पान करते रहो। अर्थात् जब तक ब्रह्ममें लय नहीं हो जाते, तब तक इस ग्रन्थका पाठ करो। उसके बाद तो जैसे जलकी बूँद सागरमें समाकर सागर बन जाती है, वैसे ही जीव भी ब्रह्ममें समाकर ब्रह्म हो जायेगा। परन्तु, यह सब सत्य नहीं है। एक व्यक्ति रसिक है और वह रसका पान करके रसका आस्वादन करता है। यदि रसिक न रहे, केवल रस ही रहे, तो रसका आस्वादन कौन करेगा ? इसलिये ब्रह्म और जीव एक हो जायेंगे, यह अर्थ ग्रहण नहीं किया जा सकता। रसकी स्थिति सम्पूर्ण है- श्रीकृष्ण परम रसिक हैं और श्रीमती राधिका परम रसिका हैं तथा दोनोंका परस्पर प्रेम और उनकी प्रेममयी लीला ही वह रस है। भावुक और रसिक भक्त लोग उस रसका छक-छककर आलय तक पान करते हैं। - “श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज" ॥ 144 ॥ भागवतमें जड़सुलभ तृप्ति नहीं :- श्रीमद्भागवत (1/1/19) में- वयन्तु न वितृप्याम उत्तमश्लोकविक्रमे। यच्छृ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - हम उत्तमश्लोक श्रीकृष्णके विक्रमके विषयमें जितना सुन रहे हैं, उतनी ही हमारी तृष्णा वर्द्धित हो रही है, तृष्णाकी शान्तिरूपी तृप्ति नहीं हो रही हैं; क्योंकि, रसज्ञ श्रोताओंमें श्रीकृष्णकथामें पद-पदपर स्वाद उदित होता है ॥ 145 ॥ अनुभाष्य-नैमिषारण्यमें शौनकादि ऋषि महाभागवत श्रील सूत गोस्वामीको आगे रखकर श्रीहरिकी लीलाओं और अवतारोंकी कथाओंका वर्णन करनेका अनुरोध करते हुए अपनी निरन्तर वर्द्धित होनेवाली श्रवणकी पिपासाका वर्णन कर रहे हैं, - । 501

[ 25/145-152 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला यत् (यद्विक्रमं) शृण्वतां (श्रवणकारिणां) रसज्ञानां (रसिकानां) पदे पदे (प्रतिक्षणं) स्वादु स्वादु (स्वादुतोऽपि स्वादु भवतीति शेषः, तस्मिन्) उत्तमःश्लोकविक्रमे (उत् उद्गच्छति तमः यस्मात् स उत्तमः, तथाभूतः श्लोकः यशः यस्मिन् तस्य कृष्णस्य विक्रमे गुणवीर्यकथादौ) वयं तु (अन्ये तु तृप्यन्तु नाम) न वितृप्यामः (विशेषेण न तृप्यामः—अलमिति न मन्यामहे इत्यर्थः) । श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ भागवतमें ही श्रुतिका तात्पर्य निहित :- अतएव भागवत करह विचार। इहा हैते पाबे सूत्र-श्रुतिर अर्थ-सार ॥ 146 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 146 ॥ अनुभाष्य—भागवतका विचार करनेसे ब्रह्मसूत्र और उपनिषदोंका वास्तविक सार-अर्थ जान पाओगे। भागवतका विचार नहीं करके जो वेदान्त पढ़ना अथवा उपनिषद्का अर्थ जानना चाहता है, वह अवश्य ही असार-अर्थकी उपलब्धि करेगा ॥ 146 ॥ निरन्तर कीर्तन करनेका आदेश, नामाभाससे मुक्ति :- निरन्तर कर कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन। हेलाय 'मुक्ति' पाबे, पाबे प्रेमधन ॥ 147 ॥ अनुवाद—इसलिये आप लोग निरन्तर कृष्णनाम- सङ्कीर्त्तन कीजिये। इससे आपको अनायास ही 'मुक्ति'की प्राप्ति होगी और प्रेमधन पानेके अधिकारी भी बनोगे ॥ 147 ॥ श्रीमद्भगवद्गीता (18/54)में— ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ 148 ॥ अनुवाद—गीतामें कहा गया है,—अभेद ब्रह्मवादरूपी ज्ञानचर्चाके द्वारा स्वयं प्रसन्नात्माका शोक और कामनारहित होनेपर तथा सभी जीवोंमें समभावयुक्त ब्रह्मता प्राप्त करनेके बाद उसे मेरी पराभक्ति प्राप्त होती है। तात्पर्य यह है कि पहले कर्ममिश्रा-भक्तिका उल्लेख हुआ था, उसकी अपेक्षा ज्ञानमिश्रा भक्ति श्रेष्ठ है ॥ 148 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/65 संख्या देखें ॥ 148 ॥ श्रीमद्भागवत (10/87/21) श्लोकमें श्रीधर-उद्धृत सर्वज्ञ भाष्यकारकी व्याख्या और नृसिंह तापनी (2/5/16)में— मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते ॥ 149 ॥ अनुवाद—मुक्तगण भी लीलासे आकर्षित होकर विग्रह स्थापित करके भगवान्का भजन करते हैं ॥ 149 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 24/107 संख्या देखें ॥ 149 ॥ श्रीमद्भागवत (2/1/9)में— परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्ये उत्तमःश्लोकलीलया। गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ 150 ॥ अनुवाद—हे राजर्षे ! निर्गुण ब्रह्ममें प्रतिष्ठित होनेपर भी श्रीकृष्णलीलाके प्रति आकर्षित होकर मैंने श्रीमद्भागवतका पाठ किया था ॥ 150 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 24/46 संख्या देखें ॥ 150 ॥ श्रीमद्भागवत (3/15/43)में— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः। अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ 151 ॥ अनुवाद—उन कमल-नेत्र-भगवान्के पदकमलकी पराग-मिश्रित तुलसीकी मधुरगन्धयुक्त वायुने सनकादि चार कुमारोंकी नासिकाके छिद्रके माध्यमसे अन्दर जाकर निर्विशेष-ब्रह्मपरायण उनके चित्त और देहमें क्षोभ उत्पन्न कर दिया था ॥ 151 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 17/142 संख्या देखें ॥ 151 ॥ श्रीमद्भागवत (1/7/10)में— आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥ 152 ॥ अनुवाद—आत्मामें ही जिनकी रति है, ऐसे 502 ।

पचीसवाँ अध्याय 25/152-163 ] वासना-ग्रन्थियोंसे शून्य सभी मुनि भी बृहत्कर्मा श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करते हैं; क्योंकि जगत्के चित्तहारी श्रीहरिका ऐसा ही एक गुण है॥"152॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 6/186 संख्या देखें॥152॥ महाराष्ट्र अर्थोंकी व्याख्याकी क्षमताकी प्रशंसा :- हेनकाले सेइ महाराष्ट्र सभाते कहिल सेइ श्लोक-विवरण॥153॥ “एइ श्लोकेर अर्थ प्रभु 'एकषष्टि' प्रकार। करियाछेन, याहा शुनि' लोके चमत्कार॥"154॥ अनुवाद-उसी समय उन महाराष्ट्र सभामें 'आत्मारामः' श्लोकके विषयमें एक आश्चर्यजनक बातका उद्घाटन किया। उन्होंने कहा, - "महाप्रभुने इस श्लोकके 'इकसठ' प्रकारके अर्थ किये हैं।" यह सुनकर सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये॥153-154॥ सभीके आग्रह करनेपर महाप्रभुके द्वारा इकसठ प्रकारके अर्थोंकी व्याख्या :- तबे सब लोक शुनि' आग्रह करिल। 'एकषष्टि' अर्थ प्रभु विवरि' कहिल॥155॥ महाप्रभुके पाण्डित्यसे सभीको विस्मय और उनको परमेश्वर श्रीकृष्णरूपमें निर्धारण :- शुनिया लोकेर बड़ चमत्कार हैल। चैतन्यगोसाञि—"श्रीकृष्ण', निर्धारिल॥156॥ अनुवाद-सब लोग महाप्रभुसे उन इकसठ अर्थोंको सुनानेका आग्रह करने लगे। तब महाप्रभुने 'इकसठ' प्रकारके अर्थोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया। इसे सुनकर लोग बहुत आश्चर्यचकित हुए और उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि श्रीचैतन्य-गोसाईं स्वयं श्रीकृष्ण ही हैं॥155-156॥ महाप्रभुका घरमें लौटना :- एत कहि' उठिया चलिला गौरहरि। नमस्कार करे लोक हरिध्वनि करि'॥157॥ अनुवाद-इतना कहकर श्रीगौरहरि उठकर चल दिये। सभी लोगोंने हरिध्वनि करते हुए उन्हें प्रणाम किया॥157॥ काशीमें कीर्तनकी बाढ़ :- सब काशीवासी करे नामसङ्कीर्त्तन। प्रेमे हासे, काँदे, गाय, करये नर्त्तन॥158॥ महाप्रभुके द्वारा काशीका उद्धार :- संन्यासी पण्डित करे भागवत विचार। वाराणसीपुर प्रभु करिला निस्तार॥159॥ अनुवाद-तबसे समस्त काशीवासी प्रेमसे नाम- सङ्कीर्तन करने लगे। प्रेममें डूबकर कभी वे हँसते, कभी रोते, कभी गाते और कभी नृत्य करते। सभी मायावादी संन्यासी और पण्डितगण वेदान्तके स्थानपर भागवतपर विचार करने लगे। इस प्रकार महाप्रभुने वाराणसीका उद्धार कर दिया॥158-159॥ महाप्रभुके आगमनसे काशी श्रीकृष्ण-कोलाहलसे मुखरित :- निज-लोक लञा प्रभु आइला वासाघर। वाराणसी हैल द्वितीय नदीया-नगर॥160॥ अनुवाद-अपने भक्तोंको लेकर महाप्रभु अपने वासस्थानपर लौट आये। सर्वत्र श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तनके कारण वाराणसी दूसरी नदिया-नगरी बन गयी॥160॥ मायावादग्रस्त श्रीकृष्णनामप्रेमविमुख; भक्तोंके आग्रहसे थोड़ीसी श्रद्धाके बलसे महाप्रभुके द्वारा ब्रह्माके लिये भी दुर्लभ अक्षय नामप्रेम-भण्डारका काशीवासियोंके अधिकारका विचार किये बिना वितरण :- निजगण लञा प्रभु कहे हास्य करि'। “काशीते आमि आइलाङ बेचिते भावकालि॥161॥ काशीते ग्राहक नाहि, वस्तु ना बिकाय। पुनरपि देशे बहि' लओया नाहि याय॥162॥ आमि बोझा बहिमु, तोमा-सबार दुःख हैल। तोमा-सबार इच्छाय विनामूल्ये बिकाइल॥"163॥ । 503

[ 25/161-172 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-महाप्रभु अपने भक्तोंसे परिहास करते हुए कहने लगे,–"मैं काशीमें अपने भावकालिको (भावुक स्वभावको) बेचनेके लिये आया था। काशीमें कोई ग्राहक नहीं होनेके कारण मेरी वस्तु बिक नहीं रही थी। उसे ढोकर अपने देशमें वापिस ले जाना भी सम्भव नहीं था। यह सोचकर कि मैं पुनः बोझा ढोकर ले जाऊँगा, आप सबको बहुत दुःख हुआ, इसलिये मैंने आप सबकी इच्छासे उस वस्तुको बिना मूल्यके ही बाँट दिया॥"161-163 ॥ काशीको प्रेमकी बाढ़में डुबो देनेवाले महाप्रभुकी स्तुति :- सबे कहे,–"लोक तारिते तोमार अवतार। 'पूर्व' 'दक्षिण' 'पश्चिम' करिला निस्तार ॥ 164 ॥ 'एक' वाराणसी छिल तोमाते विमुख। ताहा निस्तारिया कैला आमा-सबार सुख॥"165 ॥ अनुवाद-सभी भक्त कहने लगे,–"पतित जीवोंका उद्धार करनेके लिये ही आपका अवतार हुआ है। आपने 'पूर्व', 'दक्षिण' और 'पश्चिम' भारतके सभी पतितोंका उद्धार कर दिया है। एकमात्र वाराणसीके लोग ही आपसे विमुख थे, उनका उद्धार करके आपने हम सबको बहुत सुख प्रदान किया है॥" 164-165॥ प्रतिदिन असंख्य लोगोंका समागम :- वाराणसी-ग्रामे यदि कोलाहल हैल। शुनि' ग्रामी देशी लोक आसिते लागिल ॥ 166 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके द्वारा वाराणसीके संन्यासियोंके उद्धारकी बात चारों ओर फैल गयी। इस बातको सुनकर आस-पासके ग्रामवासी तथा नगरवासी, सभी लोग महाप्रभुके दर्शनोंके लिये आने लगे ॥ 166 ॥ लक्ष कोटि लोक आइसे, नाहिक गणन। सङ्कीर्णस्थाने प्रभुर ना पाय दरशन ॥ 167 ॥ अनुवाद-लाखों-करोड़ों लोग महाप्रभुके दर्शनके लिये आने लगे। जितने लोग आये, उनकी गणना नहीं की जा सकती। किन्तु महाप्रभुका वासस्थान छोटासा था, इसलिये सभीको उनके दर्शन प्राप्त नहीं होते थे॥ 167 ॥ विश्वेश्वर दर्शनके लिये जाते समय असंख्य तृष्णार्त्त लोगोंको महाप्रभुके दर्शनकी प्राप्ति :- प्रभु यबे स्नाने यान, विश्वेश्वर-दरशने। दुइदिके लोक करे प्रभु-विलोकने ॥ 168 ॥ सभीके द्वारा हरिबोलकी ध्वनि :- बाहु तुलि' प्रभु कहे-बल 'कृष्ण' 'हरि'। दण्डवत् करे लोके हरिध्वनि करि' ॥ 169 ॥ अनुवाद-महाप्रभु जब गङ्गामें स्नान करने जाते और विश्वेश्वरके दर्शनके लिये जाते, तब लोग उनके दोनों ओर कतार बनाकर खड़े होकर उनके दर्शन करते। तब महाप्रभु अपनी भुजाओंको उठाकर सभीको 'कृष्ण' 'हरि' बोलनेके लिये कहते और लोग हरिध्वनि करते हुए उन्हें दण्डवत् प्रणाम करते ॥ 168-169 ॥ काशीमें पाँच दिन रहकर महाप्रभुकी पुरी यात्रा :- एइमत दिन पञ्च लोक निस्तारिया। आर दिन चलिला प्रभु उद्विग्न हञा ॥ 170 ॥ अनुवाद-इस प्रकार पाँच दिनों तक लोगोंका उद्धार किया। तब अगले दिन महाप्रभु वहाँसे जानेके लिये उत्कण्ठित हो गये ॥ 170 ॥ पाँच भक्तोंके द्वारा महाप्रभुका अनुसरण :- रात्रे उठि' प्रभु यदि करिला गमन। पाछे लाग् लइला तबे भक्त पञ्च जन ॥ 171 ॥ पाँच भक्तोंके नाम :- तपन मिश्र, रघुनाथ, महाराष्ट्र चन्द्रशेखर, कीर्त्तनीया-परमानन्द, - पञ्च जन ॥ 172 ॥ 504 |

पचीसवाँ अध्याय 25/171-181 ] अनुवाद—रात्रिके समय उठकर जब महाप्रभु जाने लगे, तब श्रीतपन मिश्र, श्रीरघुनाथ भट्ट, महाराष्ट्र ब्राह्मण, श्रीचन्द्रशेखर वैद्य और कीर्तनीया परमानन्द—ये पाँच भक्त भी उनके पीछे-पीछे चलने लगे॥ 171-172 ॥ सभीकी ही महाप्रभुके पीछे-पीछे पुरी जानेकी इच्छा होनेपर भी महाप्रभुके द्वारा उन्हें विदायी देना :— सबे चाहे प्रभु-सङ्गे नीलाचल याइते। सबारे विदाय दिला प्रभु यत्न-सहिते ॥ 173 ॥ अकेले झारिखण्डके मार्गसे पुरी जानेकी इच्छा :— "याँर इच्छा, पाछे आइस आमारे देखिते। एबे आमि एका यामु झारिखण्ड-पथे॥" 174 ॥ अनुवाद—सभी महाप्रभुके साथ नीलाचल जाना चाहते थे, किन्तु महाप्रभुने बड़े प्रेमसे उन्हें समझाकर विदायी देते हुए कहा, —"जिनकी इच्छा हो, वे बादमें मुझसे मिलनेके लिये पुरी आ जाँय। अभी तो मैं अकेला ही झारिखण्डके पथसे जाऊँगा॥" 173-174 ॥ श्रीसनातनको वृन्दावनमें श्रीरूप-अनुपमके पास भेजना :— सनातने कहिला, —"तुमि याह' वृन्दावन। तोमार दुइ भाइ तथा करियाछे गमन ॥ 175 ॥ करुणासे विगलित स्वरसे भक्तवत्सल भगवान्‌का अपने वृन्दावन-यात्री भक्तोंके सुख-विधानके लिये श्रीसनातनको आदेश :— काँथा-करङ्गिया मोर काङ्गाल भक्तगण। वृन्दावने आइले ताँदेर करिह पालन॥" 176 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीसे कहा, — "तुम वृन्दावन जाओ। तुम्हारे दोनों भाई रूप और अनुपम भी वहीं गये हैं। वृन्दावन जानेवाले मेरे अधिकांश भक्त कंगाल (गरीब) होते हैं, उनके पास तो केवल काँथा (फटे-पुराने कपड़ोंसे बने कम्बल) और करोंया (जलके पात्र) होता है। वे जब वृन्दावन आयेंगे, तब तुम उन सबको रहनेका स्थान देना और उनका पालन करना॥" 175-176 ॥ सभीको आलिङ्गन करके निरपेक्ष महाप्रभुकी यात्रा, भक्तोंका मूर्च्छित होना :— एत बलि' चलिला प्रभु सबा आलिङ्गिया। सबेइ पड़िला तथा मूर्च्छित हञा ॥ 177 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु सबका आलिङ्गन करके वहाँसे चल पड़े। सभी भक्त मूर्च्छित होकर वहीं गिर पड़े॥ 177 ॥ इन पाँच भक्तोंका काशीमें आगमन, श्रीसनातनकी वृन्दावन यात्रा :— कतक्षणे उठि' सबे दुःखे घरे आइला। सनातन-गोसाञि वृन्दावनरे चलिला ॥ 178 ॥ अनुवाद—कुछ समयके बाद जब उनकी मूर्च्छा दूर हुई, तब वे सभी भक्त दुःखी होकर घर लौट आये। श्रीसनातन गोस्वामी वृन्दावनकी ओर चल दिये॥ 178 ॥ श्रीरूप-गोस्वामीके साथ श्रीसुबुद्धि रायका मिलन :— एथा रूप-गोसाञि यबे मथुरा आइला। ध्रुवघाटे ताँरे सुबुद्धिराय मिलिला ॥ 179 ॥ अनुवाद—इधर जब श्रीरूप गोस्वामी मथुरा पहुँचे, तब वहाँ ध्रुवघाटपर उन्हें श्रीसुबुद्धिराय मिले॥ 179 ॥ पूर्वे यबे सुबुद्धि-राय छिला गौड़े 'अधिकारी'। हुसेन-खाँ 'सैयद' करे ताहार चाकरी ॥ 180 ॥ अनुवाद—पहले जब श्रीसुबुद्धिराय गौड़देशके अधिकारी थे, तब हुसेन-खाँ 'सैयद' उनका दास था॥ 180 ॥ दीघि खोदाइते तारे 'मुन्सीफ' कैला। छिद्र पाञा राय तारे चाबुक मारिला ॥ 181 ॥ अनुवाद—श्रीसुबुद्धिरायने हुसेन-खाँ सैयदको तालाब खुदवानेके कार्यका दायित्व सौंपा। उस कार्यमें कुछ त्रुटि देखनेपर श्रीसुबुद्धिरायने उसे चाबुकसे मारा॥ 181 ॥ । 505

[ 25/181-189 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य- 'मुन्सीफ'-'इन्साफ' शब्दसे 'मुन्सीफ' शब्दकी उत्पत्ति हुई है; जो जिस विषयको समझ लेता है, उसे 'मुन्सीफ' कहते हैं। 'छिद्र पाञा'-दोष देखकर॥ 181॥ पाछे यबे हुसेन-खाँ गौड़े 'राजा' हइल। सुबुद्धि-रायेर तिँहो बहु बाड़ाइल ॥ 182 ॥ अनुवाद-बादमें जब हुसेन-खाँ सैयद गौड़देशका 'राजा' बना, तब उसने श्रीसुबुद्धिरायके द्वारा पूर्व किये गये उपकारोंके लिये उनकी सम्पत्तिमें बहुत वृद्धि की॥ 182॥ तार स्त्री तार अङ्गे देखे मारणेर चिह्ने। सुबुद्धि-रायरे मारिते कहे राजा-स्थाने ॥ 183 ॥ अनुवाद-हुसेन-खाँकी पत्नीने जब उनके शरीरपर चाबुक मारनेके निशानको देखा, तो उसने हुसेन-खाँसे श्रीसुबुद्धिरायको जानसे मारनेके लिये कहा॥ 183॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'तार स्त्री'-हुसेन-शाहकी बेगम; 'मारणेर चिह्ने'-श्रीसुबुद्धि-रायने जो चाबुक मारे थे, उसके चिह्न॥ 183॥ राजा कहे, - "आमार पोष्टा राय हय 'पिता'। ताहारे मारिमु आमि, - भाल নহে कथा॥" 184॥ स्त्री कहे, - जाति लह', यदि प्राणे ना मारिबे। राजा कहे,-जाति निले इँहो नाहि जीवे॥ 185॥ स्त्री मरिते चाहे, राजा सङ्कटे पड़िल। करौँ यार पानि तार मुखे देओयाइल ॥ 186 ॥ अनुवाद-राजा हुसेन-खाँने कहा,-"श्रीसुबुद्धिराय मेरा पालन-पोषण करनेवाले होनेके कारण मेरे पिताके समान है। मैं उन्हें मारूँ,-यह तो कोई अच्छी बात नहीं है।" अन्तमें बेगमने कहा, - 'यदि तुम सुबुद्धिरायको प्राणोंसे नहीं मारना चाहते हो, तो फिर तुम उसे जातिसे भ्रष्ट कर दो।' राजाने कहा, - 'यदि मैं उनको जातिसे भ्रष्ट कर दूँगा, तो वे जीवित नहीं रहेंगे।' बेगमने कहा कि यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो मैं मर जाऊँगी। उसकी बात सुनकर राजा धर्म-सङ्कटमें फँस गया। अन्तमें उसने जलपात्रके जलको जिसे मुसलमानने स्पर्श किया था, श्रीसुबुद्धिरायके मुखमें बलपूर्वक डलवा दिया॥ 184-186॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'करौँ यार पानि'-जिस पात्रमें मुसलमानोंका जल रहता है, उसे 'करौँया' कहते हैं। उस 'करौँया'से मुसलमानके द्वारा स्पर्श किया गया जल श्रीसुबुद्धिरायके मुखमें दिया गया था॥ 186॥ श्रीसुबुद्धि-रायका अकेले काशीमें आगमन :- तबे सुबुद्धि-राय सेइ 'छद्म' पाञा। वाराणसी आइला, सब विषय छाड़िया॥ 187॥ अनुवाद-तब श्रीसुबुद्धि-राय इस सुयोगको प्राप्त करके सब विषयोंको छोड़कर वाराणसी आ गये॥ 187॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'छद्म'-छल। श्रीसुबुद्धिरायकी पहलेसे ही विषय-त्यागकी इच्छा थी; जातिनाशके छलसे उन्होंने परिवारादि सम्बन्धियोंका त्याग कर दिया॥ 187॥ स्मार्त्त पण्डितोंसे प्रायश्चितके विषयमें पूछनेपर अनेक लोगोंके द्वारा अनेक विधान :- प्रायश्चित्त पुछिला तिँहो पण्डितेर गणे। ताँरा कहे, - तप्त-घृत खाञा छाड़' प्राणे॥ 188॥ अनुवाद-श्रीसुबुद्धिरायने वाराणसीके पण्डितोंसे इसका प्रायश्चित पूछा। तब उन पण्डितोंने कहा, - गर्म घी पीकर तुम अपने प्राण त्याग दो॥ 188॥ श्रीसुबुद्धि-रायको प्रायश्चितकी व्यवस्थाओंके प्रति सन्देह :- केह कहे, - एइ নহে, अल्प दोष हय। शुनिया रहिला राय करिया संशय ॥ 189 ॥ 506 ।

पचीसवाँ अध्याय 25/189-194 ] अनुवाद-किसी अन्य पण्डितने कहा, - ऐसा मत करो, प्राण देनेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह तो छोटा सा दोष है। श्रीसुबुद्धिरायको पण्डितोंके अलग- अलग विचारोंके कारण प्रायश्चितके विषयमें संशय हो गया, इसलिये उन्होंने कुछ भी नहीं किया ॥ 189 ॥ महाप्रभुके काशी आनेपर, सम्पूर्ण वृत्तान्तका वर्णन करके प्रायश्चितकी व्यवस्थाकी जिज्ञासा :- तबे यदि महाप्रभु वाराणसी आइला। ताँरे मिलि' राय आपन-वृत्तान्त कहिला ॥ 190 ॥ अनुवाद-फिर जब महाप्रभु वाराणसीमें आये, तब श्रीसुबुद्धिरायने उनसे मिलकर उन्हें अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया ॥ 190 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभु मथुरा जानेसे पूर्व जब वाराणसी आये थे, उस समय श्रीसुबुद्धिरायके साथ उनका मिलन हुआ था ॥ 190 ॥ महाप्रभुके द्वारा सबसे उत्तम व्यवस्था और श्रीसुबुद्धि रायको शिक्षा :- प्रभु कहे, - "इँहा हैते याह' वृन्दावन। निरन्तर कर कृष्णनामसङ्कीर्त्तन ॥ 191 ॥ नामाभास और शुद्धनामके फलका भेद :- एक 'नामाभासे' तोमार पाप-दोष याबे। आर 'नाम' लइते कृष्णचरण पाइबे ॥ 192 ॥ आर कृष्णनाम लैते कृष्णस्थाने स्थिति। महापातकेर हय एइ प्रायश्चित्ति ॥”193 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीसुबुद्धिरायसे कहा, - "तुम यहाँसे वृन्दावन चले जाओ और निरन्तर श्रीकृष्णनाम-सङ्कीर्तन करो। नाम करते हुए जब एक 'नामाभास' भी हो जायेगा, तब उसके प्रभावसे ही तुम्हारे पापका दोष चला जायेगा। और नाम करते हुए जब तुम्हारा शुद्धनाम होगा, तब तुम श्रीकृष्णके श्रीचरणोंको प्राप्त करोगे। श्रीकृष्णके श्रीचरणोंमें स्थान प्राप्त करनेपर फिर कोई पाप-अपराध नहीं होता और नित्य सिद्धदेहसे निरन्तर शुद्धनाम ही होता है। महापापी तकके लिये भी यही प्रायश्चित है॥"191-193 ॥ अमृतानुक्रमणिका-विष्णुपुराण (2/6/36-40) में पापोंके प्रायश्चितके विषयमें कहा है- “यावन्तो जन्तवः स्वर्गे तावन्तो नरकौकसः। पापकृद्याति नरकं प्रायश्चित्तपराङ्मुखः ॥ 36 ॥ पापानामनुरूपाणि प्रायश्चित्तानि यद्यथा। तथा तथैव संस्मृत्य प्रोक्तानि परमर्षिभिः ॥ 37 ॥ पापे गुरूणि गुरूणि स्वल्पान्यल्पे च तद्विदः। प्रायश्चित्तानि मैत्रेय जगुः स्वायम्भुवादयः ॥ 38 ॥ प्रायश्चित्तान्यशेषाणि तपःकर्म्मात्मकानि वै। यानि तेषामशेषाणां कृष्णानुस्मरणं परम्॥ 39 ॥ कृते पापेऽनुतापो वै यस्य पुंसः प्रजायते। प्रायश्चित्तं तु तस्यैकं हरिसंस्मरणं परम् ॥” 40 ॥ अर्थात् "जितने जीव स्वर्गमें हैं उतने ही नरकमें हैं, जो पापी पुरुष (अपने पापका) प्रायश्चित नहीं करते वे ही नरकमें जाते हैं। भिन्न-भिन्न पापोंके अनुरूप जो-जो प्रायश्चित हैं उन्हीं-उन्हींको महर्षियोंने वेदार्थका स्मरण करके बतलाया है। हे मैत्रेय ! स्वायम्भुवमनु आदि स्मृतिकारोंने महान् पापोंके लिये महान् और अल्प पापोंके लिये अल्प प्रायश्चित्तोंकी व्यवस्था की है। किन्तु जितने भी तपस्यात्मक और कर्मात्मक प्रायश्चित हैं उन सबमें श्रीकृष्णस्मरण सर्वश्रेष्ठ है। जिस पुरुषके चित्तमें पाप-कर्मके बाद पश्चाताप होता है उसके लिये ही प्रायश्चित्तोंका विधान है, बिना पश्चातापके प्रायश्चितसे पापोंका क्षय नहीं होता। किन्तु यह हरिस्मरण तो एकमात्र स्वयं ही परम प्रायश्चित है॥"191-193 ॥ अयोध्याके मार्गसे श्रीरायका नैमिषारण्यमें जाना और कुछ दिन वहाँ वास :- पाञा आज्ञा राय वृन्दावनरे चलिला। प्रयाग, अयोध्या दिया नैमिषारण्ये आइला ॥ 194 ॥ । 507

[ 25/194-203 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—महाप्रभुकी आज्ञा प्राप्त करके श्रीसुबुद्धिराय वृन्दावनकी ओर चल दिये। वे प्रयाग और अयोध्यासे होते हुए नैमिषारण्य आ पहुँचे ॥ 194 ॥ इसी बीच महाप्रभुका वृन्दावनसे लौटकर पुनः प्रयागमें आगमन :- कतक दिवस राय नैमिषारण्ये रहिला। प्रभु वृन्दावन हैते प्रयाग आइला ॥ 195 ॥ अनुवाद—कुछ दिनों तक श्रीसुबुद्धिराय नैमिषारण्यमें ही रहे। इसी बीच महाप्रभु वृन्दावनमें कुछ समय रहकर वहाँसे प्रयाग चले गये ॥ 195 ॥ मथुरामें महाप्रभुका दर्शन नहीं पाकर श्रीरायको दुःख :- मथुरा आसिया राय प्रभुवार्त्ता पाइल। प्रभुर लाग् ना पाञा मने बड़ दुःख हैल ॥ 196 ॥ अनुवाद—मथुरामें आकर श्रीसुबुद्धिरायको महाप्रभुकी यात्राका संवाद मिला। मथुरामें महाप्रभुके दर्शन नहीं होनेसे उनको मनमें बहुत दुःख हुआ ॥ 196 ॥ रायका वैराग्य और दैन्य-आचरण :- शुष्ककाष्ठ आनि' राय बेचे मथुराते। पाँच छय पयसा हय एक एक बोझाते ॥ 197 ॥ आपने रहे एक पयसार चाना चाबाञा। आर पयसा बाणिया-स्थाने राखेन धरिया ॥ 198 ॥ दुःखी वैष्णव देखि' ताँरे करान भोजन। गौड़ीया आइले दधि, भात, तैल-मर्द्दन ॥ 199 ॥ अनुवाद—श्रीसुबुद्धिराय जङ्गलमें सूखी लकड़ियाँ एकत्रित करके लाकर मथुरामें बेचने लगे। एक गट्ठर लकड़ी बेचनेपर उन्हें पाँच-छः पैसे मिल जाते थे। श्रीसुबुद्धिराय स्वयं तो एक पैसेका चना खाकर जीवन यापन करते और बचे हुए पैसे वे बनियेके पास जमा कर देते। वे किसी दुःखी वैष्णवको देखकर उसे भोजन कराते थे। बङ्गालसे आये किसी भक्तको देखकर उसे दही, चावल तथा शरीरपर लगानेके लिये तेल ले देते ॥ 197-199 ॥ उन्हें लेकर श्रीरूपका वृन्दावनमें द्वादश वनोंके दर्शन कराना :- रूप-गोसाञि आसि' ताँरे बहु प्रीति कैला। आपनसङ्गे लञा 'द्वादश वन' देखाइला ॥ 200 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीके वृन्दावन आनेपर श्रीसुबुद्धिरायने उनसे बहुत प्रीति की और उन्हें अपने साथ ले जाकर द्वादश वनोंका दर्शन कराया ॥ 200 ॥ श्रीरूपका श्रीसनातनको ढूँढ़नेके उद्देश्यसे वृन्दावनसे प्रयागमें आगमन :- मासमात्र रूपगोसाञि रहिला वृन्दावने। शीघ्र चलि' आइला सनातनानुसन्धाने ॥ 201 ॥ गङ्गातीर-पथे प्रभु प्रयागरे आइला। ताहा शुनि' दुइभाइ से पथे चलिला ॥ 202 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी केवल एक मास तक मथुरा और वृन्दावनमें रहे। वहाँसे श्रीसनातन गोस्वामीको ढूँढ़नेके लिये चल पड़े। जब उन्होंने सुना कि महाप्रभु गङ्गाके तटवाले मार्गसे प्रयाग गये थे, तब श्रीरूप गोस्वामी और श्रीअनुपम—दोनों भाई भी उसी मार्गपर चल दिये ॥ 201-202 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'ताहा शुनि'—रूप गोस्वामीने मथुरामें सुना कि पहले महाप्रभु गङ्गाके तटके मार्गसे मथुरा आये थे, अब उस मार्गको देखनेके उत्साहसे वे अनुपमके साथ उस मार्गसे आये ॥ 202 ॥ इसी बीच श्रीसनातनका प्रयागसे मथुरामें आगमन :- एथा सनातन गोसाञि प्रयागे आसिया। मथुरा आइला सनातन राजपथे दिया ॥ 203 ॥ अनुवाद—इधर श्रीसनातन गोस्वामी वाराणसीसे चलकर प्रयाग आये। तब महाप्रभुके निर्देशानुसार वे प्रयागसे राजमार्गपर चलते हुए मथुरा आये ॥ 203 ॥ 508 |

पचीसवाँ अध्याय 25/204-211 ] मथुरामें रायके साथ मिलन और रूप-अनुपमके वृत्तान्तका श्रवण :- मथुराते सुबुद्धिराय ताहारे मिलिला। रूप-अनुपम-कथा सकलि कहिला ॥ 204 ॥ अनुवाद—मथुरामें जब श्रीसनातन गोस्वामीकी श्रीसुबुद्धिरायसे भेंट हुई, तब श्रीसुबुद्धिरायने उन्होंने श्रीरूप गोस्वामी तथा श्रीअनुपमके विषयमें बतलाया॥ 204 ॥ तीनों भाइयोंके नहीं मिलनेका कारण :- गङ्गापथे दुइभाइ, राजपथे सनातन। अतएव ताँहा सने ना हैल मिलन ॥ 205 ॥ अनुवाद—(श्रीरूप गोस्वामी और श्रीअनुपम) ये दोनों भाई तो गङ्गाके तटवाले मार्गसे मथुरासे प्रयाग गये और श्रीसनातन गोस्वामी राजमार्गसे प्रयागसे मथुरा आये, इसलिये उनकी आपसमें भेंट नहीं हुई ॥ 205 ॥ श्रीसनातनके प्रति रायका पूर्व-आश्रमोचित व्यवहार, श्रीसनातनकी उसके प्रति अप्रीति अथवा उदासीनता :- सुबुद्धि-राय बहु स्नेह करे सनातने। व्यवहार-स्नेह सनातन नाहि माने ॥ 206 ॥ अनुवाद—श्रीसुबुद्धि राय श्रीसनातन गोस्वामीसे बहुत स्नेह करते थे, किन्तु श्रीसनातन गोस्वामीको वैसा सांसारिक-स्नेह अच्छा नहीं लगा ॥ 206 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'व्यवहार-स्नेह'—संसार-सम्बन्धी स्नेह ॥ 206 ॥ श्रीकृष्णको ढूँढ़नेवाले महावैरागी श्रीसनातन प्रभु :- महा-विरक्त सनातन भ्रमेन वने वने। प्रतिवृक्षे, प्रतिकुञ्जे रहे रात्रि-दिने ॥ 207 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी परम विरक्त थे। वे श्रीकृष्णको ढूँढ़ते हुए वन-वनमें भ्रमण करते थे। वे एक-एक वृक्ष और एक-एक कुञ्जमें एक रात और एक दिन रहते थे ॥ 207 ॥ श्रीसनातनके द्वारा साम्प्रदायिक आचार्य-कार्यका सम्पादन :- मथुरा-माहात्म्य-शास्त्र संग्रह करिया। लुप्ततीर्थ प्रकट कैला वनेते भ्रमि या ॥ 208 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने मथुराके माहात्म्यका वर्णन करनेवाले ग्रन्थोंका संग्रह किया। उन ग्रन्थोंके आधारपर उन्होंने वन-वनमें भ्रमण करके लुप्ततीर्थोंका उद्धार किया ॥ 208 ॥ श्रीसनातनका वृन्दावनमें और श्रीरूप और श्रीअनुपमका काशीमें अवस्थान :- एइमत सनातन वृन्दावनेते रहिला। रूप-गोसाञि दुइभाइ काशीते आइला ॥ 209 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीसनातन गोस्वामी वृन्दावनमें रह गये और श्रीरूप गोस्वामी और श्रीअनुपम—दोनों भाई काशीमें पहुँच गये ॥ 209 ॥ काशीमें तीन भक्तोंके साथ उनका मिलन :- महाराष्ट्र तिनजन सह रूप करिला मिलन ॥ 210 ॥ अनुवाद—वहाँ श्रीरूप गोस्वामीने महाराष्ट्र श्रीचन्द्रशेखर और श्रीतपनमिश्र—इन तीनोंसे भेंट की॥ 210 ॥ छोटे भाईके साथ श्रीरूपका भी श्रीशेखरके गृहमें रहना और श्रीतपनमिश्रके घर भिक्षा :- शेखरेर घरे वासा, मिश्र-घरे भिक्षा। मिश्रमुखे सुने, सनातने प्रभुर 'शिक्षा' ॥ 211 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी श्रीअनुपमके साथ श्रीचन्द्रशेखरके घरपर रहे और वे भिक्षा (भोजन) श्रीतपनमिश्रके घरपर ग्रहण करते। इस प्रकार उन्होंने श्रीतपनमिश्रके मुखसे महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातन गोस्वामीको दी गयी 'शिक्षा'को श्रवण किया ॥ 211 ॥ । 509

[ 25/212–220 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला काशीमें महाप्रभुके द्वारा दी गयी सनातन-शिक्षा और मायावादी संन्यासियोंके उद्धारके वृत्तान्तको सुनकर आनन्द :- काशीते प्रभुर चरित्र शुनि' तिनेर मुखे। संन्यासीरे कृपा शुनि' पाइला बड़ सुखे ॥ 212 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने महाराष्ट्र श्रीचन्द्रशेखर और श्रीतपनमिश्र—इन तीनोंके मुखसे काशीमें महाप्रभुके चरित्रको सुना। और जब उन्होंने मायावादी संन्यासियोंके प्रति महाप्रभुकी कृपाके विषयमें सुना, तो वे बहुत आनन्दित हुए॥ 212 ॥ महाप्रभुके प्रति लोगोंके आनुगत्य-भावोंको देखकर और कीर्त्तनके श्रवणसे श्रीरूपको सुखकी प्राप्ति :- महाप्रभुर उपर लोकेर प्रणति देखिया। सुखी हैला लोकमुखे कीर्त्तन शुनिया॥ 213 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके प्रति लोगोंकी शरणागति देखकर और उनके मुखसे महाप्रभुकी महिमाको सुनकर श्रीरूप गोस्वामी बहुत प्रसन्न हुए॥ 213 ॥ दस दिन काशीमें रहनेके बाद श्रीरूपादिको गौड़-यात्रा :- दिन दश राहि' रूप गौड़े यात्रा कैल। सनातन-रूपेर एइ चरित्र कहिल ॥ 214 ॥ अनुवाद—दस दिन तक वाराणसीमें रहनेके बाद श्रीरूप गोस्वामीने गौड़देशकी ओर यात्रा की। यहाँ तक मैंने श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरूप गोस्वामीके विषयमें बतलाया॥ 214 ॥ साथी बलभद्रके साथ महाप्रभुकी श्रीकृष्णको ढूँढ़नेकी चेष्टा करते-करते पहलेकी भाँति झारिखण्डके मार्गसे पुरीकी यात्रा :- एथा महाप्रभु यदि नीलाद्रि चलिला। निर्जन वनपथे याइते महासुख पाइला॥ 215 ॥ सुखे चलि' आइसे प्रभु बलभद्र-सङ्गे। पूर्ववत् मृगादि-सङ्गे कैला नानारङ्गे॥ 216 ॥ अनुवाद—इधर जब महाप्रभु नीलाद्रिकी (जगन्नाथपुरीकी) ओर जा रहे थे, तब निर्जन वनके पथपर चलते हुए उन्हें बहुत सुख हुआ। आनन्दसे महाप्रभु श्रीबलभद्र भट्टाचार्यके साथ चलते जा रहे थे और झारिखण्डके वनमें पहलेकी भाँति उन्होंने पशुओंके साथ अनेक प्रकारकी लीलाएँ कीं॥ 215-216 ॥ आठारनालामें आकर बलभद्रके द्वारा पुरीमें स्थित भक्तोंका आह्वान :- आठारनालाते आसि' भट्टाचार्य ब्राह्मणे। पाठाञा बोलाइला निज-भक्तगणे॥ 217 ॥ अनुवाद—आठारनाला पहुँचकर महाप्रभुने श्रीबलभद्र भट्टाचार्यको आगे भेजकर अपने भक्तोंको बुलवाया॥ 217 ॥ महाप्रभुके आगमनके विषयमें सुनकर भक्तोंको मृत-सञ्जीवनी-मन्त्रकी प्राप्ति :- शुनिया भक्तकेर गण येन पुनरपि जीला। देहे प्राण आइल, येन इन्द्रिय उठिला॥ 218 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके आनेका संवाद सुनकर भक्त मानो पुनः जीवित हो गये हों, उनकी देहमें प्राणोंका सञ्चार हो गया और उनकी इन्द्रियोंमें शक्ति आ गयी॥ 218 ॥ नरेन्द्र-सरोवरके निकट आकर सभीके द्वारा महाप्रभुका दर्शन :- आनन्दे विह्वल भक्तगण धाञा आइला। नरेन्द्रे आसिया सबे प्रभुरे मिलिला॥ 219 ॥ अनुवाद—आनन्दमें विह्वल होकर भक्त दौड़ते हुए आये और नरेन्द्र सरोवरपर आकर सभी महाप्रभुसे मिले॥ 219 ॥ भक्तों और महाप्रभुका परस्परके प्रति यथायोग्य प्रणाम और आलिङ्गनादि :- पुरी, भारतीर प्रभु वन्दिलेन चरण। दोंहे महाप्रभुरे कैला प्रेम-आलिङ्गन॥ 220 ॥ 510 ।

पचीसवाँ अध्याय 25/220-229 ] अनुवाद - श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारती उनके गुरुके गुरु-भ्राता थे, इसलिये महाप्रभुने उनके चरणकमलोंकी वन्दना की। उन दोनोंने महाप्रभुका प्रेमपूर्वक आलिङ्गन किया ॥ 220 ॥ दामोदर-स्वरूप, पण्डित गदाधर। जगदानन्द, काशीश्वर, गोविन्द, वक्रेश्वर ॥ 221 ॥ काशी-मिश्र, प्रद्युम्न-मिश्र, पण्डित-दामोदर। हरिदास ठाकुर, आर पण्डित-शङ्कर ॥ 222 ॥ भक्त और भगवान्‌के मिलनसे दोनोंमें ही प्रेमका आवेश :- आर सब भक्त प्रभुर चरणे पड़िला। सबा आलिङ्गिया प्रभु प्रेमाविष्ट हैला ॥ 223 ॥ अनुवाद - श्रीस्वरूप-दामोदर गोस्वामी, श्रीगदाधर-पण्डित, श्रीजगदानन्द-पण्डित, श्रीकाशीश्वर-पण्डित, श्रीगोविन्द, श्रीवक्रेश्वर-पण्डित, श्रीकाशी-मिश्र, श्रीप्रद्युम्न-मिश्र, श्रीदामोदर-पण्डित, श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीशङ्कर-पण्डित तथा अन्य सब भक्त महाप्रभुके श्रीचरणोंमें पड़ गये, उन सब भक्तोंको आलिङ्गन करके महाप्रभु प्रेममें आविष्ट हो गये ॥ 221-223 ॥ सभीको साथ लेकर महाप्रभुके द्वारा श्रीजगन्नाथ-दर्शन :- आनन्द-समुद्रे भासे सब भक्तगणे। सबा लञा चले प्रभु जगन्नाथ-दरशने ॥ 224 ॥ अनुवाद-सभी भक्त आनन्दके समुद्रमें डूब गये। महाप्रभु उन सब भक्तोंको अपने साथ लेकर श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये चल पड़े ॥ 224 ॥ महाप्रभुका प्रेमावेश और नृत्यगीत :- जगन्नाथ देखि' प्रभु प्रेमाविष्ट हैला। भक्तसङ्गे बहुक्षण नृत्य-गीत कैला ॥ 225 ॥ अनुवाद - श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करके महाप्रभु प्रेमाविष्ट हो गये। बहुत देर तक वे भक्तोंके साथ नृत्य और कीर्तन करते रहे ॥ 225 ॥ श्रीजगन्नाथकी प्रसादी-मालाकी प्राप्ति, पड़िछाओंके द्वारा प्रणाम :- जगन्नाथ-सेवक आनि' माला-प्रसाद दिला। तुलसी पड़िछा आसि' चरण वन्दिला ॥ 226 ॥ अनुवाद- श्रीजगन्नाथके सेवकोंने आकर महाप्रभुको प्रसादी माला पहनायी। तुलसी-पड़िछाने आकर उनके श्रीचरणोंकी वन्दना की ॥ 226 ॥ चारों ओर महाप्रभुके आगमनके संवादका विस्तार, कटकसे श्रीराय और श्रीभट्टाचार्यके द्वारा आकर महाप्रभुका दर्शन :- 'महाप्रभु आइला'-ग्रामे कोलाहल हैल। सार्वभौम, रामानन्द, वाणीनाथ मिलिल ॥ 227 ॥ अनुवाद-'महाप्रभु जगन्नाथपुरी लौट आये हैं'-सर्वत्र यह बात फैल गयी। कटकसे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य, श्रीरामानन्द राय और श्रीद्विज-वाणीनाथने आकर महाप्रभुसे भेंट की ॥ 227 ॥ महाप्रभुका काशीमिश्रके गृहमें वास और सार्वभौमका निमन्त्रण :- सबा सङ्गे लञा प्रभु मिश्र-वासा आइला। सार्वभौम-पण्डित गोसाञिरे निमन्त्रण कैला ॥ 228 ॥ भक्तोंके साथ प्रसादके सेवनकी इच्छाके लिये प्रसाद लानेका आदेश :- प्रभु कहे,-"महाप्रसाद आन' एइ स्थाने। सबा-सङ्गे इँहा आजि करिमु भोजने ॥ " 229 ॥ अनुवाद-महाप्रभु सभीको अपने साथ लेकर श्रीकाशीमिश्रके घरपर आ गये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और श्रीगदाधर पण्डितने महाप्रभुको भोजनके लिये निमन्त्रण दिया। महाप्रभुने उनके निमन्त्रणको स्वीकार करके उन दोनोंसे कहा, - "महाप्रसाद यहाँपर ही ले आइये। आज मैं सबके साथ बैठकर यहींपर ही भोजन करूँगा ॥ " 228-229 ॥ | 511

[ 25/230-239 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भक्तोंके साथ महाप्रभुके द्वारा महाप्रसादका सम्मान :- तबे दुँहे जगन्नाथप्रसाद आनिला। सबा-सङ्गे महाप्रभु भोजन करिला ॥ 230 ॥ अनुवाद-तब वे दोनों श्रीजगन्नाथके प्रसादको लेकर आये और महाप्रभुने सबके साथ बैठकर भोजन किया ॥ 230 ॥ वृन्दावनसे पुरी-आगमनकी यात्रा वर्णित :- एइ त' कहिलुँ, - प्रभु देखि' वृन्दावन। पुनः करिलेन यैछे नीलाद्रि-गमन ॥ 231 ॥ अनुवाद-इस प्रकार मैंने (कविराज गोस्वामीने) महाप्रभुके वृन्दावनके दर्शन और पुनः वृन्दावनसे पुरी आगमनके विषयमें बतलाया है ॥ 231 ॥ श्रवण करनेवालोंको चिद्-वृत्तिकी स्फूर्त्ति और श्रीकृष्ण प्राप्ति :- इहा येइ श्रद्धा करि' करये श्रवण। अचिरात् पाय सेइ चैतन्य-चरण ॥ 232 ॥ अनुवाद-जो कोई भी महाप्रभुकी लीलाओंको श्रद्धापूर्वक श्रवण करता है, उसे बहुत शीघ्र ही श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है ॥ 232 ॥ मध्यलीलाका दिग्दर्शन और चौबीस वर्षोंमेंसे छः वर्ष भारतमें नामप्रेमके प्रचारके उद्देश्यसे भ्रमण :- मध्यलीलार करिलुँ एइ दिग्दर्शन। छय वत्सर कैला यैछे गमनागमन ॥ 233 ॥ अनुवाद-छः वर्षों तक महाप्रभुने जिस प्रकार नीलाचलसे भारतवर्षके विभिन्न स्थानोंमें आना-जाना किया, मैंने मध्यलीलामें उसका केवल दिग्दर्शनमात्र कराया है ॥ 233 ॥ बाकीके अठारह वर्ष पुरीमें भक्तोंके साथ कीर्तन-उल्लास :- शेष अष्टादश वत्सर नीलाचले वास। भक्तगण-सङ्गे करे कीर्त्तन-विलास ॥ 234 ॥ अनुवाद-अन्तिम अठारह वर्षों तक महाप्रभुने नीलाचलमें ही वास किया। वहाँपर उन्होंने भक्तोंके साथ कीर्तन-विलास किया ॥ 234 ॥ भागवतमें श्रीव्यासकी रीतिका अनुसरण करते हुए संक्षेपमें मध्यलीलाके अध्यायोंका वर्णन करते हुए पुनः चर्चा :- मध्यलीलार क्रम एबे करि अनुवाद। अनुवाद कैले हय कथार आस्वाद ॥ 235 ॥ अनुवाद-अब मैं मध्यलीलाके अध्यायोंमें वर्णित विषयोंका क्रमसे पुनः वर्णन करूँगा। पुनः उल्लेख करनेसे उन विषयोंका आस्वादन होता है ॥ 235 ॥ प्रथम परिच्छेदे-शेषलीलार सूत्रगण। तथि-मध्ये कोन भागेर विस्तार वर्णन ॥ 236 ॥ अनुवाद-पहले अध्यायमें शेषलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन किया है और उसीमें ही किसी-किसी भागका विस्तारपूर्वक भी वर्णन किया है ॥ 236 ॥ द्वितीय परिच्छेदे-प्रभुर प्रलाप-वर्णन। तथि-मध्ये नाना-भावेर दिगदरशन ॥ 237 ॥ अनुवाद-दूसरे अध्यायमें महाप्रभुके प्रलापका वर्णन हुआ है। उसके बीचमें महाप्रभुमें प्रकाशित अनेक-भावोंका दिग्दर्शन भी कराया है ॥ 237 ॥ तृतीय परिच्छेदे-प्रभुर कहिलुँ संन्यास। आचार्येर घरे यैछे करिला विलास ॥ 238 ॥ अनुवाद-तीसरे अध्यायमें महाप्रभुके संन्यासका वर्णन किया गया है और श्रीअद्वैताचार्यके घरपर महाप्रभुके विलासका वर्णन है ॥ 238 ॥ चतुर्थे-माधवपुरीर चरित्र-आस्वादन। गोपाल-स्थापन, क्षीरचुरिर वर्णन ॥ 239 ॥ अनुवाद-चौथे अध्यायमें महाप्रभु और भक्तोंके द्वारा श्रीमाधवेन्द्रपुरीके चरित्रका आस्वादन, उनके द्वारा 512 |

पचीसवाँ अध्याय 25/239-249 ] श्रीगोपालके विग्रहकी स्थापना और श्रीगोपीनाथके खीर- चोरी करनेका प्रसङ्ग वर्णित हुआ है॥ 239 ॥ पञ्चमे—साक्षिगोपाल-चरित्र वर्णन। नित्यानन्द कहे, प्रभु करेन आस्वादन ॥ 240 ॥ अनुवाद—पाँचवें अध्यायमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा साक्षी गोपालके चरित्रका वर्णन और महाप्रभुके द्वारा उसके आस्वादनका वर्णन हुआ है॥ 240 ॥ षष्ठे—सार्वभौमेर करिला उद्धार। सप्तमे—तीर्थयात्रा, वासुदेव-निस्तार ॥ 241 ॥ अनुवाद—छठे अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके उद्धारका वर्णन हुआ है। सातवें अध्यायमें महाप्रभुकी तीर्थयात्रा और उनके द्वारा श्रीवासुदेव-विप्रके उद्धारका वर्णन हुआ है॥ 241 ॥ अष्टमे—रामानन्द-संवाद विस्तार। आपने शुनिला 'सर्व-सिद्धान्तेर सार' ॥ 242 ॥ अनुवाद—आठवें अध्यायमें श्रीराम force/रामानन्द-संवादका वर्णन हुआ है। स्वयं महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायके मुखसे सभी सिद्धान्तोंके सारका श्रवण किया॥ 242 ॥ नवमे—कहिलुँ दक्षिण-तीर्थ-भ्रमण। दशमे—कहिलुँ सर्व वैष्णव-मिलन ॥ 243 ॥ अनुवाद—नौवें अध्यायमें मैंने महाप्रभुके द्वारा किये गये दक्षिण भारतके तीर्थोंके भ्रमणका वर्णन किया है। दसवें अध्यायमें महाप्रभुके साथ सभी वैष्णवोंके मिलनका वर्णन हुआ है॥ 243 ॥ एकादशे—श्रीमन्दिरे 'बेड़ा-सङ्कीर्त्तन'। द्वादशे—गुण्डिचा-मन्दिर-मार्जन-क्षालन ॥ 244 ॥ अनुवाद—ग्यारहवें अध्यायमें श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें हुए 'बेड़ा-सङ्कीर्त्तन'का (परिक्रमा करते हुए कीर्त्तनका) वर्णन हुआ है। बारहवें अध्यायमें गुण्डिचा-मन्दिरकी सफाई-धुलाईका वर्णन हुआ है॥ 244 ॥ त्रयोदशे—रथ-आगे प्रभुर नर्त्तन। चतुर्दशे—'हेरापञ्चमी'-यात्रा-दरशन ॥ 245 ॥ तार मध्ये व्रजदेवीर् भावेर श्रवण। स्वरूप कहिला, प्रभु कैला आस्वादन ॥ 246 ॥ अनुवाद—तेरहवें अध्यायमें रथके आगे महाप्रभुके द्वारा किये गये नृत्यका वर्णन हुआ है। चौदहवें अध्यायमें 'हेरा-पञ्चमी' यात्राके दर्शनका वर्णन हुआ है और महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरसे व्रजदेवियोंके भावोंको सुनकर उसका आस्वादन किया॥ 245-246 ॥ पञ्चदशे—भक्तेर गुण आपने कहिल। सार्वभौम-घरे भिक्षा, अमोघ तारिल ॥ 247 ॥ अनुवाद—पन्द्रहवें अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा अपने भक्तोंके गुणोंका वर्णन, उनके द्वारा श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घरपर भिक्षा करने और अमोघके उद्धारका भी वर्णन हुआ है॥ 247 ॥ षोडशे—वृन्दावन-यात्रा गौड़देशे-पथे। पुनः नीलाचले आइला, नाटशाला हैते ॥ 248 ॥ अनुवाद—सोलहवें अध्यायमें महाप्रभुकी गौड़देश (बङ्गाल)से होते हुए वृन्दावनके लिये जानेका वर्णन है। किन्तु वे वृन्दावन न जाकर कानाइ-नाटशालासे ही नीलाचल लौट आये॥ 248 ॥ सप्तदशे—वनपथे मथुरा-गमन। अष्टादशे—वृन्दावन-विहार-वर्णन ॥ 249 ॥ अनुवाद—सत्रहवें अध्यायमें महाप्रभुके झारिखण्डके वनके मार्गसे मथुरा जानेका और अठारहवें अध्यायमें महाप्रभुके वृन्दावन-विहारका वर्णन हुआ है॥ 249 ॥ । 513

[ 25/250-260 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ऊनविंशे-मथुरा हैते प्रयाग-गमन। तार मध्ये श्रीरूपेरे शक्ति-सञ्चारण ॥ 250 ॥ अनुवाद-उन्नीसवें अध्यायमें महाप्रभुके मथुरासे प्रयाग लौटनेका वर्णन हुआ है। उसी अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा श्रीरूप गोस्वामीमें शक्ति-सञ्चार करनेका वर्णन भी है॥ 250 ॥ विंशति परिच्छेदे-सनातनरे मिलन। तार मध्ये भगवानरे स्वरूप-वर्णन ॥ 251 ॥ अनुवाद-बीसवें अध्यायमें महाप्रभुके साथ श्रीसनातन गोस्वामीके मिलनका वर्णन हुआ है। उसी अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा भगवान्‌के स्वरूपका वर्णन भी लिखा है॥ 251 ॥ एकविंशे-कृष्णैश्वर्य-माधुर्य-वर्णन। द्वाविंशे-द्विविध साधनभक्तिर विवरण ॥ 252 ॥ अनुवाद-इक्कीसवें अध्यायमें श्रीकृष्णके ऐश्वर्य और माधुर्यका वर्णन और बाइसवें अध्यायमें दो प्रकारकी साधनभक्तिका विवरण दिया गया है ॥ 252 ॥ त्रयोविंशे-प्रेमभक्तिरसेर कथन। चतुर्विंशे-'आत्मारामा'-श्लोकार्थ-वर्णन ॥ 253 ॥ अनुवाद-तेइसवें अध्यायमें प्रेमभक्तिरसका वर्णन और चौबीसवें अध्यायमें 'आत्मारामा:' श्लोकके अर्थोंका वर्णन हुआ है॥ 253 ॥ पञ्चविंशे-काशीवासीरे वैष्णवकरण। काशी हैते पुनः नीलाचले आगमन ॥ 254 ॥ अनुवाद-पचीसवें अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा काशीवासियोंको वैष्णव बनाने और महाप्रभुके काशीसे पुनः नीलाचल आनेका वर्णन हुआ है॥ 254 ॥ पञ्चविंशति परिच्छेदे एइ कैलुँ अनुवाद। याहार श्रवणे हय ग्रन्थार्थ-आस्वाद ॥ 255 ॥ अनुवाद-पचीसवें अध्यायमें मैंने सम्पूर्ण मध्यलीलाका क्रमशः पुनः संक्षेपमें वर्णन किया है, जिसके श्रवणसे सम्पूर्ण ग्रन्थके तात्पर्यको जाना जा सकता है ॥ 255 ॥ संक्षेपमें मध्यलीला वर्णित :- संक्षेपे कहिलुँ एइ मध्यलीलार सार। कोटिग्रन्थे वर्णन ना याय इहार विस्तार ॥ 256 ॥ अनुवाद-इस प्रकार मैंने संक्षेपमें मध्यलीलाके सारका वर्णन किया है, विस्तारसे तो इसका करोड़ों ग्रन्थोंमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 256 ॥ जीवोंके उद्धारके लिये महाप्रभुका सम्पूर्ण भारत-भ्रमण और स्वयं आचरण करके प्रचार :- जीव निस्तारिते प्रभु भ्रामला देशे-देशे। आपने आस्वादि' भक्ति करिला प्रकाशे ॥ 257 ॥ अनुवाद-जीवोंका उद्धार करनेके लिये महाप्रभुने देश-देशमें भ्रमण किया। स्वयं भक्तिका आस्वादन करते हुए उन्होंने भक्तिका प्रचार किया ॥ 257 ॥ महाप्रभुके द्वारा प्रचारित विषय-समूह :- कृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व, प्रेमतत्त्व आर। भावतत्त्व, रसतत्त्व, लीलातत्त्व-सार ॥ 258 ॥ श्रीभागवत-तत्त्वरस करिला प्रचारे। कृष्णतुल्य भागवत, जानाइला संसारे ॥ 259 ॥ कभी तो श्रोतारूपमें, और कभी वक्तारूपमें शुद्धभक्तिका प्रचार :- भक्त लागि' विस्तारिला आपन-वदने। काँहा भक्त-मुखे कहाइ शुनिला आपने ॥ 260 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीकृष्ण-तत्त्व, भक्तितत्त्व, प्रेमतत्त्व, भावतत्त्व, रसतत्त्व, लीलातत्त्व-सार और श्रीभागवतके तत्त्व एवं रसका प्रचार किया। उन्होंने संसारमें इस बातको प्रकाशित किया कि श्रीमद्भागवत और श्रीकृष्ण अभिन्न हैं, श्रीभागवत श्रीकृष्णका वाङ्मय अवतार है। कभी तो महाप्रभुने भक्तोंके लिये स्वयं अपने मुखसे 514 |

Here is the complete transcription of the text from the image:

पचीसवाँ अध्याय [25/258-266 ] भागवतके तत्त्वोंका वर्णन किया और कभी उन्होंने भक्तोंमें शक्ति सञ्चरित करके उनके मुखसे स्वयं उसका श्रवण किया ॥ 258-260 ॥ अनुपम भक्तवत्सल, अद्वितीय और अहैतुकी कृपाके सागर :- श्रीचैतन्यसम आर कृपालु, वदान्य। भक्तवत्सल ना देखि त्रिजगते अन्य ॥ 261 ॥ अनुवाद—तीनों लोकोंमें मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुके समान कोई कृपालु, वदान्य और भक्तवत्सलको नहीं देखता हूँ॥ 261 ॥ अन्धविश्वास छोड़कर वास्तव-वस्तुमें दृढ़-विश्वासके फलस्वरूप ही परतत्त्व श्रीचैतन्य-कृष्णकी प्राप्ति :- श्रद्धा करि' एइ लीला शुन, भक्तगण। इहार प्रसादे पाइबा चैतन्य-चरण ॥ 262 ॥ इहार प्रसादे पाइबा कृष्णतत्त्वसार। सर्वशास्त्र-सिद्धान्तेर इँहा पाइबा पार ॥ 263 ॥ अनुवाद—हे भक्तों! श्रद्धापूर्वक इन लीलाओंका श्रवण करो, इनकी कृपासे आपको श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति होगी। इन लीलाओंको श्रद्धापूर्वक श्रवण करनेसे आप श्रीकृष्णतत्त्व-सारको समझ सकोगे। श्रीकृष्णतत्त्व-सारको समझनेपर सभी शास्त्र-सिद्धान्तोंका स्वतः ही पूर्ण ज्ञान हो जाता है ॥ 262-263 ॥ श्रीकृष्णलीला और श्रीचैतन्यलीला-अभिन्न अमृतकी नदी, वह केवलमात्र शुद्धचित्त भक्तके द्वारा ही आस्वाद्य :- कृष्णलीला अमृत-सार, तार शत शत धार, दशदिके बहे याहा हैते। से चैतन्यलीला हय, सरोवर अक्षय, मनोहंस चराह' ताहाते ॥ 264 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-लीलाएँ अमृतका सार हैं। इनकी सैकड़ों धाराएँ दसों दिशाओंमें बहती हैं। श्रीकृष्ण- लीलाओंसे अभिन्न श्रीचैतन्य-लीलाएँ अक्षय सरोवर हैं, हे भक्तों! अपने मनरूपी हंसको उसमें विहार कराओ॥ 264 ॥ ग्रन्थकारकी दीनतापूर्वक प्रार्थना :- भक्तगण, शुन मोर दैन्य-वचन। तोमा-सबार पदधूलि, अङ्गे विभूषण करि', किछु मुञि करों निवेदन ॥ 265 ॥ ध्रु. ॥ अनुवाद—हे भक्तों! आप मेरी विनती सुनो। आप सबके चरणकमलोंकी धूलिको अपने अङ्गोंका विभूषण बनाकर मैं कुछ निवेदन कर रहा हूँ॥ 265 ॥ भक्तिसिद्धान्तसमूह और श्रीकृष्णप्रेमरसके आस्वादनके लिये भक्तोंसे अनुरोध :- कृष्णभक्तिसिद्धान्तगण, याते प्रफुल्ल पद्मवन, तार मधु करि' आस्वादन। प्रेमरस-कुमुदवने, प्रफुल्लित रात्रि-दिने, ताते चराओ मनोभृङ्गगण ॥ 266 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णभक्तिसिद्धान्त-समूह प्रफुल्लित कमलोंके वन सदृश्य है, कृपा करके आप उन कमलोंके मकरन्दका आस्वादन कीजिये। इस सरोवरमें प्रेमरसरूपी कुमुदवन रात-दिन प्रफुल्लित हो रहा है, हे भक्तों! उसमें अपने मनरूपी भ्रमरको विहार कराओ॥ 266 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णलीला ही 'अमृत-सार वस्तु' है; उसके अतिरिक्त, —सब कुछ ही 'असार' है। श्रीकृष्णलीलामृत सारकी सैकड़ों-सैकड़ों धाराएँ श्रीकृष्णलीलामृतसे दसों दिशाओंमें प्रवाहित होती हैं। श्रीकृष्णलीलामृत-सार ही श्रीचैतन्यलीला है। श्रीचैतन्यलीलाको श्रीकृष्णलीलासे पृथक् मानकर वर्तमान कालमें नयी-नयी कल्पनाओंके प्रभावसे उत्पन्न “नदीया और गौरनागरी लीला” आदि नये मतवादोंकी सृष्टि करनेकी चेष्टा चल रही है। थियसफिस्ट दलके कई लोग और अन्यान्य भक्ति-विरोधी प्राकृत बाउल और । 515

[ 25/264-269 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सहजिया दलके कई व्यक्ति अपनी-अपनी उच्छृङ्खल प्राकृत-वृत्तिके साँचेमें ढालकर अर्थात् अपनी वृत्तिके अनुसार ही श्रीगौराङ्गको भी कोई राजनैतिक-नेता अथवा कोई शक्तिके उपासक अथवा कोई अवैध नागरीका लम्पट माननेकी धारणा रखते हैं। गोलोककी नित्यलीला ही प्रकटकालमें प्रपञ्चमें उदित होती है। महाप्रभुकी प्रकटलीलामें उस समय श्रीरूपादि श्रीगौरलीलाके पार्षदवर्गमेंसे किसीने भी उस लीलामें गौरनागर-लीलाको नहीं देखा अथवा समझा, इसलिये तथाकथित गौरनागर-लीला निश्चय ही चैतन्यलीला नहीं है। श्रीरुपानुग वैष्णव-गुरुके चरणचिह्नोंका अनुसरण करके श्रीगौरभक्ति करना ही कर्त्तव्य है। कल्पनाके सरोवरमें अवगाहन करके 'नवगोरार दल' बनाकर कोई भी फल नहीं मिलेगा। 'चैतन्यलीला'-अक्षय सरोवर है; श्रीकृष्णभक्ति- सिद्धान्त-समूह-उस सरोवरके कमलके वन हैं; प्रेमरस-कुमुदवन है; और भक्तोंका मन-भँवरोंका समूह है॥ 264-266॥ श्रीकृष्णलीलाका वैचित्र्य-समूह ही भक्तोंका जीवन :- नाना-भावेर भक्तजन, हंस-चक्रवाकगण, याते बसि' करेन विहार। कृष्णकेलि-मृणाल, याहा पाइ सर्वकाल, भक्त-हंस करये आहार ॥ 267 ॥ अनुवाद— अनेक भावोंके हंस, चक्रवाकादि रूपी भक्तगण इस (श्रीचैतन्यलीलारूपी) अक्षय सरोवरमें सदैव विहार करते हैं। इस सरोवरमें श्रीकृष्णलीलारूपी मृणाल (कमलनाल) सदा उपलब्ध है और भक्तरूपी हंस सदैव उस कमलनालका आहार करते हैं॥ 267॥ अनुभाष्य— श्रीकृष्णकेलिरूपी कमलनाल ही भक्त रूपी हंसका 'आहार' है। नित्यसम्भोगरस-विग्रह श्रीकृष्णचन्द्रकी लीलाएँ श्रीकृष्णसे अभिन्न-तनु नित्यविप्रलम्भरसविग्रह श्रीगौरसुन्दरके आश्रित नित्यसेवक भक्तोंकी आहार योग्य वस्तु है॥ 267॥ वैसे आस्वादनसे ही प्रेमोल्लासकी वृद्धि :- सेइ सरोवरे गिया, हंस-चक्रवाक हञा, सदा ताँहा करह विलास। खण्डिबे सकल दुःख, पाइबा परम सुख, अनायासे हबे प्रेमोल्लास ॥ 268 ॥ अनुवाद— हे श्रीगौरभक्तों! आप भी हंस, चक्रवाक बनकर उस सरोवरमें जाकर सदैव वहीं विलास करो। इससे आपके समस्त दुःख दूर हो जायेंगे और आपको परम सुखकी प्राप्ति होगी और अनायास ही प्रेमोल्लास उत्पन्न होगा ॥ 268 ॥ अनुभाष्य— हे श्रीगौरभक्तों, श्रीचैतन्यलीलाके सरोवरमें अवगाहन करके नित्यकाल श्रीगौरपदाश्रित हंस-चक्रवाकके रूपमें श्रीकृष्णका भजन करते-करते श्रीगौर-उपासनारूपी सरोवरमें विलास करो। ऐसा करनेपर नदीया-नागरीकी भाँति श्रीगौराङ्गको कोई भोग्य-जड़वस्तुके रूपमें कल्पना करके श्रीकृष्णसे इतर सेवारूपी 'दुःख'से बच जाओगे और श्रीकृष्णसेवारूपी परमसुखको प्राप्त करके (तुम) श्रीकृष्णप्रेमके उल्लासमें मत्त हो जाओगे ॥ 268 ॥ शुद्धभक्तोंके द्वारा विश्ववासियोंमें श्रीगौरकृष्णलीलामृतका वितरण :- एइ अमृत अनुक्षण, साधु-महान्त-मेघगण, विश्वोद्याने करे वरीषण। ताते फले अमृत-फल, भक्त खाय निरन्तर, तार प्रेमे जीये जगजन ॥ 269 ॥ अनुवाद— साधु-महान्त पुरुष ही मेघ बनकर विश्वरूपी उद्यानमें इस लीलारूपी अमृतका निरन्तर वर्षण करते हैं। उस वर्षणके फलस्वरूप प्रेमरूपी अमृत-फल फलता है। भक्तगण उसको निरन्तर खाते हैं और जगत्वासी उन भक्तोंके उच्छिष्टको खाकर सुखपूर्वक जीवित रहते हैं॥ 269 ॥ अनुभाष्य— श्रीगौरपदाश्रित साधु-महान्त ही मेघसमूह हैं। वे सदैव जगत्रूपी उद्यानमें श्रीकृष्णलीलामृतका 516 |

पचीसवाँ अध्याय 25/269–272 ] वर्षण करते हैं। इस जलधाराके सींचनेके प्रभावसे प्रेमामृत-फलके फलनेपर भक्तगण उसे निरन्तर खाते हैं और उनके प्रेमसे विश्ववासी जीवन धारण करते हैं॥ 269 ॥ श्रीगौरलीला—घने दूधका पूर (सागर), उसमें श्रीकृष्णलीला—सुकर्पूर, श्रौत-पन्थामें हरि-गुरु-वैष्णवकी कृपासे उसके आस्वादनकी सम्भावना :— चैतन्यलीला—अमृतपूर, कृष्णलीला—सुकर्पूर, दुहे मिलि' हय सुमाधुर्य। साधु-गुरु-प्रसादे, ताहा येइ आस्वादे, सेइ जाने माधुर्य-प्राचुर्य ॥ 270 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्यलीला उस प्रेमामृतके सागर सदृश है और श्रीकृष्णलीला-सुकर्पूरके समान है। दोनों लीलाएँ मिलनेपर अत्यधिक मधुर और आस्वादनीय हो जाती हैं। साधु-गुरुकी कृपासे ही जो कोई उसका आस्वादन करता है, वही माधुर्यकी चरमसीमाको जान पाता है॥ 270 ॥ अनुभाष्य—चैतन्यलीलामृत—उस प्रेमामृतके 'सागर'के समान है और श्रीकृष्णलीला—सुकर्पूर-तुल्य है; इन दोनों लीलामृतका एक साथ मिलना ही सुमाधुर्य है। श्रीकृष्णलीला-माधुर्य श्रीचैतन्यलीलामृतके सहयोगसे पुष्ट होकर सुमाधुर्यमय हो गया है। श्रीगौर-विरोधी असुरदल श्रीगौरलीला अथवा श्रीगौर-मन्त्रको स्वीकार नहीं करता, इसलिये उनके द्वारा श्रीकृष्णलीला-माधुर्यका आस्वादन करना सम्भव नहीं है। दूसरी ओर, श्रीकृष्णविरोधी दैत्यदल श्रीकृष्णलीलामृतसे उदासीन होकर नदीया-नागरीके अनुगत नागरी-अभिमानसे विप्रलम्भरसविग्रह श्रीराधाकृष्ण-अभिन्न-तनु श्रीगौरको श्रीकृष्णसे अलग करके अर्थात् सम्भोगरसविग्रह मानकर श्रीगौरलीलाके वैचित्र्यके माधुर्यका समूल विनाश करते हैं। श्रीरूपानुग-साधु-गुरु-कृपाके द्वारा अर्थात् श्रीरूपानुगत्यमें श्रीगौरलीलामृत और श्रीकृष्णलीलामृतको परस्पर 'अभिन्न' जाननेपर दोनों लीलाओंके एक साथ सम्मिलनसे ही केवल प्रचुर माधुर्यका आस्वादन होता है। श्रीरूपानुग व्यक्ति केवलमात्र इसीपर ही दृढ़भावसे विश्वास करते हैं॥ 270 ॥ ये दोनों लीलामृत ही भक्तोंका आहार, इसके अतिरिक्त अन्नग्रहण करनेपर भी भक्त-जीवनकी अपुष्टि :— ये लीला-अमृत बिने, खाय यदि अन्नपाने, तबे भक्तेर दुर्बल जीवन। यार एकबिन्दु-पाने, उत्फुल्लित तनुमने, हासे, गाय, करये नर्त्तन ॥ 271 ॥ अनुवाद—इस लीलामृतके बिना भक्त अन्नादि खानेपर भी वास्तवमें दुर्बल रहता है। परन्तु इस लीलामृतकी एक बिन्दुका पान करनेसे ही वह तन- मनसे अत्यन्त प्रफुल्लित होकर हँसता, गाता और नृत्य करता है॥ 271 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मनुष्य अन्न खानेसे पुष्ट होता है। बहिर्मुख व्यक्तियोंकी भाँति अन्न खानेपर भी यदि भक्तगण श्रीकृष्णलीलासे युक्त श्रीचैतन्यलीलामृतका पान नहीं करते हैं, तो वे भी बहिर्मुख व्यक्तियोंकी भाँति (परमार्थ-पथके लिये) दुर्बल हो जाते हैं॥ 271 ॥ अनुभाष्य—पाठान्तरे—'खाय यदि अनुपाने।'॥ 271 ॥ तर्कपन्याससे यह अमृत दुर्लभ :— ए अमृत कर पान, यार सम नाहि आन, चित्ते करि' सुदृढ़ विश्वास। ना पड़' कुतर्क-गर्त्ते, अमेध्य-कर्कश-आवर्त्ते, याते पड़िले हय सर्वनाश ॥ 272 ॥ अनुवाद—हे भक्तों! चित्तमें ऐसा सुदृढ़ विश्वास रखकर कि इसके समान अन्य कुछ भी नहीं है, इस अमृतका पान करो। साथ ही इस बातसे बहुत सावधान रहना कि कहीं कुतर्करूपी गड्ढे अथवा अपवित्र दुर्गन्धयुक्त कठोर बवण्डरमें मत उलझ जाओ, उसमें फँसनेसे सर्वनाश हो जाता है॥ 272 ॥ । 517