श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1963, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपचीसवाँ अध्याय 25/269–272 ] वर्षण करते हैं। इस जलधाराके सींचनेके प्रभावसे प्रेमामृत-फलके फलनेपर भक्तगण उसे निरन्तर खाते हैं और उनके प्रेमसे विश्ववासी जीवन धारण करते हैं॥ 269 ॥ श्रीगौरलीला—घने दूधका पूर (सागर), उसमें श्रीकृष्णलीला—सुकर्पूर, श्रौत-पन्थामें हरि-गुरु-वैष्णवकी कृपासे उसके आस्वादनकी सम्भावना :— चैतन्यलीला—अमृतपूर, कृष्णलीला—सुकर्पूर, दुहे मिलि' हय सुमाधुर्य। साधु-गुरु-प्रसादे, ताहा येइ आस्वादे, सेइ जाने माधुर्य-प्राचुर्य ॥ 270 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्यलीला उस प्रेमामृतके सागर सदृश है और श्रीकृष्णलीला-सुकर्पूरके समान है। दोनों लीलाएँ मिलनेपर अत्यधिक मधुर और आस्वादनीय हो जाती हैं। साधु-गुरुकी कृपासे ही जो कोई उसका आस्वादन करता है, वही माधुर्यकी चरमसीमाको जान पाता है॥ 270 ॥ अनुभाष्य—चैतन्यलीलामृत—उस प्रेमामृतके 'सागर'के समान है और श्रीकृष्णलीला—सुकर्पूर-तुल्य है; इन दोनों लीलामृतका एक साथ मिलना ही सुमाधुर्य है। श्रीकृष्णलीला-माधुर्य श्रीचैतन्यलीलामृतके सहयोगसे पुष्ट होकर सुमाधुर्यमय हो गया है। श्रीगौर-विरोधी असुरदल श्रीगौरलीला अथवा श्रीगौर-मन्त्रको स्वीकार नहीं करता, इसलिये उनके द्वारा श्रीकृष्णलीला-माधुर्यका आस्वादन करना सम्भव नहीं है। दूसरी ओर, श्रीकृष्णविरोधी दैत्यदल श्रीकृष्णलीलामृतसे उदासीन होकर नदीया-नागरीके अनुगत नागरी-अभिमानसे विप्रलम्भरसविग्रह श्रीराधाकृष्ण-अभिन्न-तनु श्रीगौरको श्रीकृष्णसे अलग करके अर्थात् सम्भोगरसविग्रह मानकर श्रीगौरलीलाके वैचित्र्यके माधुर्यका समूल विनाश करते हैं। श्रीरूपानुग-साधु-गुरु-कृपाके द्वारा अर्थात् श्रीरूपानुगत्यमें श्रीगौरलीलामृत और श्रीकृष्णलीलामृतको परस्पर 'अभिन्न' जाननेपर दोनों लीलाओंके एक साथ सम्मिलनसे ही केवल प्रचुर माधुर्यका आस्वादन होता है। श्रीरूपानुग व्यक्ति केवलमात्र इसीपर ही दृढ़भावसे विश्वास करते हैं॥ 270 ॥ ये दोनों लीलामृत ही भक्तोंका आहार, इसके अतिरिक्त अन्नग्रहण करनेपर भी भक्त-जीवनकी अपुष्टि :— ये लीला-अमृत बिने, खाय यदि अन्नपाने, तबे भक्तेर दुर्बल जीवन। यार एकबिन्दु-पाने, उत्फुल्लित तनुमने, हासे, गाय, करये नर्त्तन ॥ 271 ॥ अनुवाद—इस लीलामृतके बिना भक्त अन्नादि खानेपर भी वास्तवमें दुर्बल रहता है। परन्तु इस लीलामृतकी एक बिन्दुका पान करनेसे ही वह तन- मनसे अत्यन्त प्रफुल्लित होकर हँसता, गाता और नृत्य करता है॥ 271 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मनुष्य अन्न खानेसे पुष्ट होता है। बहिर्मुख व्यक्तियोंकी भाँति अन्न खानेपर भी यदि भक्तगण श्रीकृष्णलीलासे युक्त श्रीचैतन्यलीलामृतका पान नहीं करते हैं, तो वे भी बहिर्मुख व्यक्तियोंकी भाँति (परमार्थ-पथके लिये) दुर्बल हो जाते हैं॥ 271 ॥ अनुभाष्य—पाठान्तरे—'खाय यदि अनुपाने।'॥ 271 ॥ तर्कपन्याससे यह अमृत दुर्लभ :— ए अमृत कर पान, यार सम नाहि आन, चित्ते करि' सुदृढ़ विश्वास। ना पड़' कुतर्क-गर्त्ते, अमेध्य-कर्कश-आवर्त्ते, याते पड़िले हय सर्वनाश ॥ 272 ॥ अनुवाद—हे भक्तों! चित्तमें ऐसा सुदृढ़ विश्वास रखकर कि इसके समान अन्य कुछ भी नहीं है, इस अमृतका पान करो। साथ ही इस बातसे बहुत सावधान रहना कि कहीं कुतर्करूपी गड्ढे अथवा अपवित्र दुर्गन्धयुक्त कठोर बवण्डरमें मत उलझ जाओ, उसमें फँसनेसे सर्वनाश हो जाता है॥ 272 ॥ । 517