श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1964, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 25/272-276 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—श्रीकृष्णलीला और श्रीगौरलीलाको परस्पर भिन्न समझकर कुतर्कके आधारपर अपवित्र कर्कश घूमनेवाली वायुके द्वारा चलायमान होकर श्रीकृष्णभजन छोड़कर श्रीगौरभजन करने अथवा श्रीगौरसेवाको छोड़कर श्रीकृष्णसेवा करनेपर, मूढ़-जीवका सर्वनाश होता है॥ 272 ॥ पञ्चतत्त्वको और श्रोताओंको प्रणाम :— श्रीचैतन्य, नित्यानन्द, श्रीअद्वैत, भक्तवृन्द, आर यत श्रोता भक्तगण। तोमा-सबार श्रीचरण, करि शिरे भूषण, याहा हैते अभीष्ट-पूरण ॥ 273 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य, समस्त गौरभक्तवृन्द और जितने श्रोता भक्तवृन्द हैं, मैं आप सबके श्रीचरणकमलोंको अपने सिरका विभूषण बनाता हूँ, उसीसे ही मेरी अभीष्ट-पूर्ति होगी॥ 273 ॥ अभीष्ट आराध्यको प्रणाम :— श्रीरूप-सनातन- रघुनाथ-जीव-चरण, शिरे धरि,—यार करि आश। कृष्णलीलामृतान्वित, चैतन्यचरितामृत, कहे किछु दीन कृष्णदास ॥ 274 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी, श्रीरघुनाथदास गोस्वामी और श्रीजीव गोस्वामीके श्रीचरणकमलोंको सिरपर धारण करके उनकी कृपाकी मैं सदैव आशा करता हूँ। मैं, कृष्णदास, श्रीकृष्णलीलासे युक्त श्रीचैतन्यचरितामृतका दीनतापूर्वक कुछ वर्णन करनेका प्रयास कर रहा हूँ॥ 274 ॥ श्रीमन्मदनगोपाल-गोविन्ददेव-तुष्टये। चैतन्यार्पितमस्त्वेतच्चैतन्यचरितामृतम्॥ 275 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 275 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमदनगोपाल और श्रीगोविन्द- देवकी तुष्टिके लिये यह चैतन्यचरितामृत ग्रन्थ श्रीकृष्ण- चैतन्य महाप्रभुको समर्पित हो॥ 275 ॥ अनुभाष्य— श्रीमन्मदनगोपाल-गोविन्ददेव-तुष्टये (श्रीमन्मदनगोपालः गोविन्ददेवः च तयोः तुष्टये प्रीत्यै) एतत् चैतन्यचरितामृतं चैतन्यार्पितमस्तु (श्रीकृष्णचैतन्याय समर्पयामि)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 275 ॥ अभक्तोंकी निन्दा-प्रशंसाके प्रति निरपेक्ष ग्रन्थकारका भक्तोंके सुखसे ही स्वयंको कृतार्थ मानना :— तदिदमतिरहस्यं गौरलीलामृतं यत् खलु समुदय-लोकैर्नादृतं तैरलभ्यम्। क्षतिरियमिह का मे स्वादितं यत् समन्तात् सहृदय-सुमनोभिर्मोदमेषां तनोति ॥ 276 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे काशीवासि-वैष्णवकरणं पुनर्नीलाचल-गमनञ्च पञ्चविंशः परिच्छेदः। इति मध्यलीला समाप्ता अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 276 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह अति रहस्यमय श्रीगौर- लीलामृत भक्तोंका प्राणधन होनेपर भी अनधिकारी लोग निश्चय ही इसका आदर नहीं करेंगे, इसमें मेरी कोई हानि नहीं है, परन्तु यह लीलामृत जिन सब सहृदय साधुओंके द्वारा सम्पूर्णरूपसे आस्वादित होगा, यह ग्रन्थ उन महात्माओंके आनन्दका विस्तार करे॥ 276 ॥ पचीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें काशीवासियोंका वैष्णवकरण और पुनः नीलाचल-गमन नामक पचीसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। अनुभाष्य— अतिरहस्यं (परमगोपनीयं) तत् गौरलीलामृतम् (इदं ग्रन्थरत्नं) खलु (निश्चितं) समुदयलोकैः (असद्भिरनधिकारिभिः सर्वैः) न 518