श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1962, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 25/264-269 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सहजिया दलके कई व्यक्ति अपनी-अपनी उच्छृङ्खल प्राकृत-वृत्तिके साँचेमें ढालकर अर्थात् अपनी वृत्तिके अनुसार ही श्रीगौराङ्गको भी कोई राजनैतिक-नेता अथवा कोई शक्तिके उपासक अथवा कोई अवैध नागरीका लम्पट माननेकी धारणा रखते हैं। गोलोककी नित्यलीला ही प्रकटकालमें प्रपञ्चमें उदित होती है। महाप्रभुकी प्रकटलीलामें उस समय श्रीरूपादि श्रीगौरलीलाके पार्षदवर्गमेंसे किसीने भी उस लीलामें गौरनागर-लीलाको नहीं देखा अथवा समझा, इसलिये तथाकथित गौरनागर-लीला निश्चय ही चैतन्यलीला नहीं है। श्रीरुपानुग वैष्णव-गुरुके चरणचिह्नोंका अनुसरण करके श्रीगौरभक्ति करना ही कर्त्तव्य है। कल्पनाके सरोवरमें अवगाहन करके 'नवगोरार दल' बनाकर कोई भी फल नहीं मिलेगा। 'चैतन्यलीला'-अक्षय सरोवर है; श्रीकृष्णभक्ति- सिद्धान्त-समूह-उस सरोवरके कमलके वन हैं; प्रेमरस-कुमुदवन है; और भक्तोंका मन-भँवरोंका समूह है॥ 264-266॥ श्रीकृष्णलीलाका वैचित्र्य-समूह ही भक्तोंका जीवन :- नाना-भावेर भक्तजन, हंस-चक्रवाकगण, याते बसि' करेन विहार। कृष्णकेलि-मृणाल, याहा पाइ सर्वकाल, भक्त-हंस करये आहार ॥ 267 ॥ अनुवाद— अनेक भावोंके हंस, चक्रवाकादि रूपी भक्तगण इस (श्रीचैतन्यलीलारूपी) अक्षय सरोवरमें सदैव विहार करते हैं। इस सरोवरमें श्रीकृष्णलीलारूपी मृणाल (कमलनाल) सदा उपलब्ध है और भक्तरूपी हंस सदैव उस कमलनालका आहार करते हैं॥ 267॥ अनुभाष्य— श्रीकृष्णकेलिरूपी कमलनाल ही भक्त रूपी हंसका 'आहार' है। नित्यसम्भोगरस-विग्रह श्रीकृष्णचन्द्रकी लीलाएँ श्रीकृष्णसे अभिन्न-तनु नित्यविप्रलम्भरसविग्रह श्रीगौरसुन्दरके आश्रित नित्यसेवक भक्तोंकी आहार योग्य वस्तु है॥ 267॥ वैसे आस्वादनसे ही प्रेमोल्लासकी वृद्धि :- सेइ सरोवरे गिया, हंस-चक्रवाक हञा, सदा ताँहा करह विलास। खण्डिबे सकल दुःख, पाइबा परम सुख, अनायासे हबे प्रेमोल्लास ॥ 268 ॥ अनुवाद— हे श्रीगौरभक्तों! आप भी हंस, चक्रवाक बनकर उस सरोवरमें जाकर सदैव वहीं विलास करो। इससे आपके समस्त दुःख दूर हो जायेंगे और आपको परम सुखकी प्राप्ति होगी और अनायास ही प्रेमोल्लास उत्पन्न होगा ॥ 268 ॥ अनुभाष्य— हे श्रीगौरभक्तों, श्रीचैतन्यलीलाके सरोवरमें अवगाहन करके नित्यकाल श्रीगौरपदाश्रित हंस-चक्रवाकके रूपमें श्रीकृष्णका भजन करते-करते श्रीगौर-उपासनारूपी सरोवरमें विलास करो। ऐसा करनेपर नदीया-नागरीकी भाँति श्रीगौराङ्गको कोई भोग्य-जड़वस्तुके रूपमें कल्पना करके श्रीकृष्णसे इतर सेवारूपी 'दुःख'से बच जाओगे और श्रीकृष्णसेवारूपी परमसुखको प्राप्त करके (तुम) श्रीकृष्णप्रेमके उल्लासमें मत्त हो जाओगे ॥ 268 ॥ शुद्धभक्तोंके द्वारा विश्ववासियोंमें श्रीगौरकृष्णलीलामृतका वितरण :- एइ अमृत अनुक्षण, साधु-महान्त-मेघगण, विश्वोद्याने करे वरीषण। ताते फले अमृत-फल, भक्त खाय निरन्तर, तार प्रेमे जीये जगजन ॥ 269 ॥ अनुवाद— साधु-महान्त पुरुष ही मेघ बनकर विश्वरूपी उद्यानमें इस लीलारूपी अमृतका निरन्तर वर्षण करते हैं। उस वर्षणके फलस्वरूप प्रेमरूपी अमृत-फल फलता है। भक्तगण उसको निरन्तर खाते हैं और जगत्वासी उन भक्तोंके उच्छिष्टको खाकर सुखपूर्वक जीवित रहते हैं॥ 269 ॥ अनुभाष्य— श्रीगौरपदाश्रित साधु-महान्त ही मेघसमूह हैं। वे सदैव जगत्रूपी उद्यानमें श्रीकृष्णलीलामृतका 516 |