श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1961, कुल 2549 में से
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पचीसवाँ अध्याय [25/258-266 ] भागवतके तत्त्वोंका वर्णन किया और कभी उन्होंने भक्तोंमें शक्ति सञ्चरित करके उनके मुखसे स्वयं उसका श्रवण किया ॥ 258-260 ॥ अनुपम भक्तवत्सल, अद्वितीय और अहैतुकी कृपाके सागर :- श्रीचैतन्यसम आर कृपालु, वदान्य। भक्तवत्सल ना देखि त्रिजगते अन्य ॥ 261 ॥ अनुवाद—तीनों लोकोंमें मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुके समान कोई कृपालु, वदान्य और भक्तवत्सलको नहीं देखता हूँ॥ 261 ॥ अन्धविश्वास छोड़कर वास्तव-वस्तुमें दृढ़-विश्वासके फलस्वरूप ही परतत्त्व श्रीचैतन्य-कृष्णकी प्राप्ति :- श्रद्धा करि' एइ लीला शुन, भक्तगण। इहार प्रसादे पाइबा चैतन्य-चरण ॥ 262 ॥ इहार प्रसादे पाइबा कृष्णतत्त्वसार। सर्वशास्त्र-सिद्धान्तेर इँहा पाइबा पार ॥ 263 ॥ अनुवाद—हे भक्तों! श्रद्धापूर्वक इन लीलाओंका श्रवण करो, इनकी कृपासे आपको श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति होगी। इन लीलाओंको श्रद्धापूर्वक श्रवण करनेसे आप श्रीकृष्णतत्त्व-सारको समझ सकोगे। श्रीकृष्णतत्त्व-सारको समझनेपर सभी शास्त्र-सिद्धान्तोंका स्वतः ही पूर्ण ज्ञान हो जाता है ॥ 262-263 ॥ श्रीकृष्णलीला और श्रीचैतन्यलीला-अभिन्न अमृतकी नदी, वह केवलमात्र शुद्धचित्त भक्तके द्वारा ही आस्वाद्य :- कृष्णलीला अमृत-सार, तार शत शत धार, दशदिके बहे याहा हैते। से चैतन्यलीला हय, सरोवर अक्षय, मनोहंस चराह' ताहाते ॥ 264 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-लीलाएँ अमृतका सार हैं। इनकी सैकड़ों धाराएँ दसों दिशाओंमें बहती हैं। श्रीकृष्ण- लीलाओंसे अभिन्न श्रीचैतन्य-लीलाएँ अक्षय सरोवर हैं, हे भक्तों! अपने मनरूपी हंसको उसमें विहार कराओ॥ 264 ॥ ग्रन्थकारकी दीनतापूर्वक प्रार्थना :- भक्तगण, शुन मोर दैन्य-वचन। तोमा-सबार पदधूलि, अङ्गे विभूषण करि', किछु मुञि करों निवेदन ॥ 265 ॥ ध्रु. ॥ अनुवाद—हे भक्तों! आप मेरी विनती सुनो। आप सबके चरणकमलोंकी धूलिको अपने अङ्गोंका विभूषण बनाकर मैं कुछ निवेदन कर रहा हूँ॥ 265 ॥ भक्तिसिद्धान्तसमूह और श्रीकृष्णप्रेमरसके आस्वादनके लिये भक्तोंसे अनुरोध :- कृष्णभक्तिसिद्धान्तगण, याते प्रफुल्ल पद्मवन, तार मधु करि' आस्वादन। प्रेमरस-कुमुदवने, प्रफुल्लित रात्रि-दिने, ताते चराओ मनोभृङ्गगण ॥ 266 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णभक्तिसिद्धान्त-समूह प्रफुल्लित कमलोंके वन सदृश्य है, कृपा करके आप उन कमलोंके मकरन्दका आस्वादन कीजिये। इस सरोवरमें प्रेमरसरूपी कुमुदवन रात-दिन प्रफुल्लित हो रहा है, हे भक्तों! उसमें अपने मनरूपी भ्रमरको विहार कराओ॥ 266 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णलीला ही 'अमृत-सार वस्तु' है; उसके अतिरिक्त, —सब कुछ ही 'असार' है। श्रीकृष्णलीलामृत सारकी सैकड़ों-सैकड़ों धाराएँ श्रीकृष्णलीलामृतसे दसों दिशाओंमें प्रवाहित होती हैं। श्रीकृष्णलीलामृत-सार ही श्रीचैतन्यलीला है। श्रीचैतन्यलीलाको श्रीकृष्णलीलासे पृथक् मानकर वर्तमान कालमें नयी-नयी कल्पनाओंके प्रभावसे उत्पन्न “नदीया और गौरनागरी लीला” आदि नये मतवादोंकी सृष्टि करनेकी चेष्टा चल रही है। थियसफिस्ट दलके कई लोग और अन्यान्य भक्ति-विरोधी प्राकृत बाउल और । 515