भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1960, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1960

[ 25/250-260 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ऊनविंशे-मथुरा हैते प्रयाग-गमन। तार मध्ये श्रीरूपेरे शक्ति-सञ्चारण ॥ 250 ॥ अनुवाद-उन्नीसवें अध्यायमें महाप्रभुके मथुरासे प्रयाग लौटनेका वर्णन हुआ है। उसी अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा श्रीरूप गोस्वामीमें शक्ति-सञ्चार करनेका वर्णन भी है॥ 250 ॥ विंशति परिच्छेदे-सनातनरे मिलन। तार मध्ये भगवानरे स्वरूप-वर्णन ॥ 251 ॥ अनुवाद-बीसवें अध्यायमें महाप्रभुके साथ श्रीसनातन गोस्वामीके मिलनका वर्णन हुआ है। उसी अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा भगवान्‌के स्वरूपका वर्णन भी लिखा है॥ 251 ॥ एकविंशे-कृष्णैश्वर्य-माधुर्य-वर्णन। द्वाविंशे-द्विविध साधनभक्तिर विवरण ॥ 252 ॥ अनुवाद-इक्कीसवें अध्यायमें श्रीकृष्णके ऐश्वर्य और माधुर्यका वर्णन और बाइसवें अध्यायमें दो प्रकारकी साधनभक्तिका विवरण दिया गया है ॥ 252 ॥ त्रयोविंशे-प्रेमभक्तिरसेर कथन। चतुर्विंशे-'आत्मारामा'-श्लोकार्थ-वर्णन ॥ 253 ॥ अनुवाद-तेइसवें अध्यायमें प्रेमभक्तिरसका वर्णन और चौबीसवें अध्यायमें 'आत्मारामा:' श्लोकके अर्थोंका वर्णन हुआ है॥ 253 ॥ पञ्चविंशे-काशीवासीरे वैष्णवकरण। काशी हैते पुनः नीलाचले आगमन ॥ 254 ॥ अनुवाद-पचीसवें अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा काशीवासियोंको वैष्णव बनाने और महाप्रभुके काशीसे पुनः नीलाचल आनेका वर्णन हुआ है॥ 254 ॥ पञ्चविंशति परिच्छेदे एइ कैलुँ अनुवाद। याहार श्रवणे हय ग्रन्थार्थ-आस्वाद ॥ 255 ॥ अनुवाद-पचीसवें अध्यायमें मैंने सम्पूर्ण मध्यलीलाका क्रमशः पुनः संक्षेपमें वर्णन किया है, जिसके श्रवणसे सम्पूर्ण ग्रन्थके तात्पर्यको जाना जा सकता है ॥ 255 ॥ संक्षेपमें मध्यलीला वर्णित :- संक्षेपे कहिलुँ एइ मध्यलीलार सार। कोटिग्रन्थे वर्णन ना याय इहार विस्तार ॥ 256 ॥ अनुवाद-इस प्रकार मैंने संक्षेपमें मध्यलीलाके सारका वर्णन किया है, विस्तारसे तो इसका करोड़ों ग्रन्थोंमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 256 ॥ जीवोंके उद्धारके लिये महाप्रभुका सम्पूर्ण भारत-भ्रमण और स्वयं आचरण करके प्रचार :- जीव निस्तारिते प्रभु भ्रामला देशे-देशे। आपने आस्वादि' भक्ति करिला प्रकाशे ॥ 257 ॥ अनुवाद-जीवोंका उद्धार करनेके लिये महाप्रभुने देश-देशमें भ्रमण किया। स्वयं भक्तिका आस्वादन करते हुए उन्होंने भक्तिका प्रचार किया ॥ 257 ॥ महाप्रभुके द्वारा प्रचारित विषय-समूह :- कृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व, प्रेमतत्त्व आर। भावतत्त्व, रसतत्त्व, लीलातत्त्व-सार ॥ 258 ॥ श्रीभागवत-तत्त्वरस करिला प्रचारे। कृष्णतुल्य भागवत, जानाइला संसारे ॥ 259 ॥ कभी तो श्रोतारूपमें, और कभी वक्तारूपमें शुद्धभक्तिका प्रचार :- भक्त लागि' विस्तारिला आपन-वदने। काँहा भक्त-मुखे कहाइ शुनिला आपने ॥ 260 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीकृष्ण-तत्त्व, भक्तितत्त्व, प्रेमतत्त्व, भावतत्त्व, रसतत्त्व, लीलातत्त्व-सार और श्रीभागवतके तत्त्व एवं रसका प्रचार किया। उन्होंने संसारमें इस बातको प्रकाशित किया कि श्रीमद्भागवत और श्रीकृष्ण अभिन्न हैं, श्रीभागवत श्रीकृष्णका वाङ्मय अवतार है। कभी तो महाप्रभुने भक्तोंके लिये स्वयं अपने मुखसे 514 |