श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1959, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपचीसवाँ अध्याय 25/239-249 ] श्रीगोपालके विग्रहकी स्थापना और श्रीगोपीनाथके खीर- चोरी करनेका प्रसङ्ग वर्णित हुआ है॥ 239 ॥ पञ्चमे—साक्षिगोपाल-चरित्र वर्णन। नित्यानन्द कहे, प्रभु करेन आस्वादन ॥ 240 ॥ अनुवाद—पाँचवें अध्यायमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा साक्षी गोपालके चरित्रका वर्णन और महाप्रभुके द्वारा उसके आस्वादनका वर्णन हुआ है॥ 240 ॥ षष्ठे—सार्वभौमेर करिला उद्धार। सप्तमे—तीर्थयात्रा, वासुदेव-निस्तार ॥ 241 ॥ अनुवाद—छठे अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके उद्धारका वर्णन हुआ है। सातवें अध्यायमें महाप्रभुकी तीर्थयात्रा और उनके द्वारा श्रीवासुदेव-विप्रके उद्धारका वर्णन हुआ है॥ 241 ॥ अष्टमे—रामानन्द-संवाद विस्तार। आपने शुनिला 'सर्व-सिद्धान्तेर सार' ॥ 242 ॥ अनुवाद—आठवें अध्यायमें श्रीराम force/रामानन्द-संवादका वर्णन हुआ है। स्वयं महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायके मुखसे सभी सिद्धान्तोंके सारका श्रवण किया॥ 242 ॥ नवमे—कहिलुँ दक्षिण-तीर्थ-भ्रमण। दशमे—कहिलुँ सर्व वैष्णव-मिलन ॥ 243 ॥ अनुवाद—नौवें अध्यायमें मैंने महाप्रभुके द्वारा किये गये दक्षिण भारतके तीर्थोंके भ्रमणका वर्णन किया है। दसवें अध्यायमें महाप्रभुके साथ सभी वैष्णवोंके मिलनका वर्णन हुआ है॥ 243 ॥ एकादशे—श्रीमन्दिरे 'बेड़ा-सङ्कीर्त्तन'। द्वादशे—गुण्डिचा-मन्दिर-मार्जन-क्षालन ॥ 244 ॥ अनुवाद—ग्यारहवें अध्यायमें श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें हुए 'बेड़ा-सङ्कीर्त्तन'का (परिक्रमा करते हुए कीर्त्तनका) वर्णन हुआ है। बारहवें अध्यायमें गुण्डिचा-मन्दिरकी सफाई-धुलाईका वर्णन हुआ है॥ 244 ॥ त्रयोदशे—रथ-आगे प्रभुर नर्त्तन। चतुर्दशे—'हेरापञ्चमी'-यात्रा-दरशन ॥ 245 ॥ तार मध्ये व्रजदेवीर् भावेर श्रवण। स्वरूप कहिला, प्रभु कैला आस्वादन ॥ 246 ॥ अनुवाद—तेरहवें अध्यायमें रथके आगे महाप्रभुके द्वारा किये गये नृत्यका वर्णन हुआ है। चौदहवें अध्यायमें 'हेरा-पञ्चमी' यात्राके दर्शनका वर्णन हुआ है और महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरसे व्रजदेवियोंके भावोंको सुनकर उसका आस्वादन किया॥ 245-246 ॥ पञ्चदशे—भक्तेर गुण आपने कहिल। सार्वभौम-घरे भिक्षा, अमोघ तारिल ॥ 247 ॥ अनुवाद—पन्द्रहवें अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा अपने भक्तोंके गुणोंका वर्णन, उनके द्वारा श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घरपर भिक्षा करने और अमोघके उद्धारका भी वर्णन हुआ है॥ 247 ॥ षोडशे—वृन्दावन-यात्रा गौड़देशे-पथे। पुनः नीलाचले आइला, नाटशाला हैते ॥ 248 ॥ अनुवाद—सोलहवें अध्यायमें महाप्रभुकी गौड़देश (बङ्गाल)से होते हुए वृन्दावनके लिये जानेका वर्णन है। किन्तु वे वृन्दावन न जाकर कानाइ-नाटशालासे ही नीलाचल लौट आये॥ 248 ॥ सप्तदशे—वनपथे मथुरा-गमन। अष्टादशे—वृन्दावन-विहार-वर्णन ॥ 249 ॥ अनुवाद—सत्रहवें अध्यायमें महाप्रभुके झारिखण्डके वनके मार्गसे मथुरा जानेका और अठारहवें अध्यायमें महाप्रभुके वृन्दावन-विहारका वर्णन हुआ है॥ 249 ॥ । 513