श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पचीसवाँ अध्याय 25/239-249 ] श्रीगोपालके विग्रहकी स्थापना और श्रीगोपीनाथके खीर- चोरी करनेका प्रसङ्ग वर्णित हुआ है॥ 239 ॥ पञ्चमे—साक्षिगोपाल-चरित्र वर्णन। नित्यानन्द कहे, प्रभु करेन आस्वादन ॥ 240 ॥ अनुवाद—पाँचवें अध्यायमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा साक्षी गोपालके चरित्रका वर्णन और महाप्रभुके द्वारा उसके आस्वादनका वर्णन हुआ है॥ 240 ॥ षष्ठे—सार्वभौमेर करिला उद्धार। सप्तमे—तीर्थयात्रा, वासुदेव-निस्तार ॥ 241 ॥ अनुवाद—छठे अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके उद्धारका वर्णन हुआ है। सातवें अध्यायमें महाप्रभुकी तीर्थयात्रा और उनके द्वारा श्रीवासुदेव-विप्रके उद्धारका वर्णन हुआ है॥ 241 ॥ अष्टमे—रामानन्द-संवाद विस्तार। आपने शुनिला 'सर्व-सिद्धान्तेर सार' ॥ 242 ॥ अनुवाद—आठवें अध्यायमें श्रीराम force/रामानन्द-संवादका वर्णन हुआ है। स्वयं महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायके मुखसे सभी सिद्धान्तोंके सारका श्रवण किया॥ 242 ॥ नवमे—कहिलुँ दक्षिण-तीर्थ-भ्रमण। दशमे—कहिलुँ सर्व वैष्णव-मिलन ॥ 243 ॥ अनुवाद—नौवें अध्यायमें मैंने महाप्रभुके द्वारा किये गये दक्षिण भारतके तीर्थोंके भ्रमणका वर्णन किया है। दसवें अध्यायमें महाप्रभुके साथ सभी वैष्णवोंके मिलनका वर्णन हुआ है॥ 243 ॥ एकादशे—श्रीमन्दिरे 'बेड़ा-सङ्कीर्त्तन'। द्वादशे—गुण्डिचा-मन्दिर-मार्जन-क्षालन ॥ 244 ॥ अनुवाद—ग्यारहवें अध्यायमें श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें हुए 'बेड़ा-सङ्कीर्त्तन'का (परिक्रमा करते हुए कीर्त्तनका) वर्णन हुआ है। बारहवें अध्यायमें गुण्डिचा-मन्दिरकी सफाई-धुलाईका वर्णन हुआ है॥ 244 ॥ त्रयोदशे—रथ-आगे प्रभुर नर्त्तन। चतुर्दशे—'हेरापञ्चमी'-यात्रा-दरशन ॥ 245 ॥ तार मध्ये व्रजदेवीर् भावेर श्रवण। स्वरूप कहिला, प्रभु कैला आस्वादन ॥ 246 ॥ अनुवाद—तेरहवें अध्यायमें रथके आगे महाप्रभुके द्वारा किये गये नृत्यका वर्णन हुआ है। चौदहवें अध्यायमें 'हेरा-पञ्चमी' यात्राके दर्शनका वर्णन हुआ है और महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरसे व्रजदेवियोंके भावोंको सुनकर उसका आस्वादन किया॥ 245-246 ॥ पञ्चदशे—भक्तेर गुण आपने कहिल। सार्वभौम-घरे भिक्षा, अमोघ तारिल ॥ 247 ॥ अनुवाद—पन्द्रहवें अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा अपने भक्तोंके गुणोंका वर्णन, उनके द्वारा श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घरपर भिक्षा करने और अमोघके उद्धारका भी वर्णन हुआ है॥ 247 ॥ षोडशे—वृन्दावन-यात्रा गौड़देशे-पथे। पुनः नीलाचले आइला, नाटशाला हैते ॥ 248 ॥ अनुवाद—सोलहवें अध्यायमें महाप्रभुकी गौड़देश (बङ्गाल)से होते हुए वृन्दावनके लिये जानेका वर्णन है। किन्तु वे वृन्दावन न जाकर कानाइ-नाटशालासे ही नीलाचल लौट आये॥ 248 ॥ सप्तदशे—वनपथे मथुरा-गमन। अष्टादशे—वृन्दावन-विहार-वर्णन ॥ 249 ॥ अनुवाद—सत्रहवें अध्यायमें महाप्रभुके झारिखण्डके वनके मार्गसे मथुरा जानेका और अठारहवें अध्यायमें महाप्रभुके वृन्दावन-विहारका वर्णन हुआ है॥ 249 ॥ । 513
[ 25/250-260 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ऊनविंशे-मथुरा हैते प्रयाग-गमन। तार मध्ये श्रीरूपेरे शक्ति-सञ्चारण ॥ 250 ॥ अनुवाद-उन्नीसवें अध्यायमें महाप्रभुके मथुरासे प्रयाग लौटनेका वर्णन हुआ है। उसी अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा श्रीरूप गोस्वामीमें शक्ति-सञ्चार करनेका वर्णन भी है॥ 250 ॥ विंशति परिच्छेदे-सनातनरे मिलन। तार मध्ये भगवानरे स्वरूप-वर्णन ॥ 251 ॥ अनुवाद-बीसवें अध्यायमें महाप्रभुके साथ श्रीसनातन गोस्वामीके मिलनका वर्णन हुआ है। उसी अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा भगवान्के स्वरूपका वर्णन भी लिखा है॥ 251 ॥ एकविंशे-कृष्णैश्वर्य-माधुर्य-वर्णन। द्वाविंशे-द्विविध साधनभक्तिर विवरण ॥ 252 ॥ अनुवाद-इक्कीसवें अध्यायमें श्रीकृष्णके ऐश्वर्य और माधुर्यका वर्णन और बाइसवें अध्यायमें दो प्रकारकी साधनभक्तिका विवरण दिया गया है ॥ 252 ॥ त्रयोविंशे-प्रेमभक्तिरसेर कथन। चतुर्विंशे-'आत्मारामा'-श्लोकार्थ-वर्णन ॥ 253 ॥ अनुवाद-तेइसवें अध्यायमें प्रेमभक्तिरसका वर्णन और चौबीसवें अध्यायमें 'आत्मारामा:' श्लोकके अर्थोंका वर्णन हुआ है॥ 253 ॥ पञ्चविंशे-काशीवासीरे वैष्णवकरण। काशी हैते पुनः नीलाचले आगमन ॥ 254 ॥ अनुवाद-पचीसवें अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा काशीवासियोंको वैष्णव बनाने और महाप्रभुके काशीसे पुनः नीलाचल आनेका वर्णन हुआ है॥ 254 ॥ पञ्चविंशति परिच्छेदे एइ कैलुँ अनुवाद। याहार श्रवणे हय ग्रन्थार्थ-आस्वाद ॥ 255 ॥ अनुवाद-पचीसवें अध्यायमें मैंने सम्पूर्ण मध्यलीलाका क्रमशः पुनः संक्षेपमें वर्णन किया है, जिसके श्रवणसे सम्पूर्ण ग्रन्थके तात्पर्यको जाना जा सकता है ॥ 255 ॥ संक्षेपमें मध्यलीला वर्णित :- संक्षेपे कहिलुँ एइ मध्यलीलार सार। कोटिग्रन्थे वर्णन ना याय इहार विस्तार ॥ 256 ॥ अनुवाद-इस प्रकार मैंने संक्षेपमें मध्यलीलाके सारका वर्णन किया है, विस्तारसे तो इसका करोड़ों ग्रन्थोंमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 256 ॥ जीवोंके उद्धारके लिये महाप्रभुका सम्पूर्ण भारत-भ्रमण और स्वयं आचरण करके प्रचार :- जीव निस्तारिते प्रभु भ्रामला देशे-देशे। आपने आस्वादि' भक्ति करिला प्रकाशे ॥ 257 ॥ अनुवाद-जीवोंका उद्धार करनेके लिये महाप्रभुने देश-देशमें भ्रमण किया। स्वयं भक्तिका आस्वादन करते हुए उन्होंने भक्तिका प्रचार किया ॥ 257 ॥ महाप्रभुके द्वारा प्रचारित विषय-समूह :- कृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व, प्रेमतत्त्व आर। भावतत्त्व, रसतत्त्व, लीलातत्त्व-सार ॥ 258 ॥ श्रीभागवत-तत्त्वरस करिला प्रचारे। कृष्णतुल्य भागवत, जानाइला संसारे ॥ 259 ॥ कभी तो श्रोतारूपमें, और कभी वक्तारूपमें शुद्धभक्तिका प्रचार :- भक्त लागि' विस्तारिला आपन-वदने। काँहा भक्त-मुखे कहाइ शुनिला आपने ॥ 260 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीकृष्ण-तत्त्व, भक्तितत्त्व, प्रेमतत्त्व, भावतत्त्व, रसतत्त्व, लीलातत्त्व-सार और श्रीभागवतके तत्त्व एवं रसका प्रचार किया। उन्होंने संसारमें इस बातको प्रकाशित किया कि श्रीमद्भागवत और श्रीकृष्ण अभिन्न हैं, श्रीभागवत श्रीकृष्णका वाङ्मय अवतार है। कभी तो महाप्रभुने भक्तोंके लिये स्वयं अपने मुखसे 514 |
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पचीसवाँ अध्याय [25/258-266 ] भागवतके तत्त्वोंका वर्णन किया और कभी उन्होंने भक्तोंमें शक्ति सञ्चरित करके उनके मुखसे स्वयं उसका श्रवण किया ॥ 258-260 ॥ अनुपम भक्तवत्सल, अद्वितीय और अहैतुकी कृपाके सागर :- श्रीचैतन्यसम आर कृपालु, वदान्य। भक्तवत्सल ना देखि त्रिजगते अन्य ॥ 261 ॥ अनुवाद—तीनों लोकोंमें मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुके समान कोई कृपालु, वदान्य और भक्तवत्सलको नहीं देखता हूँ॥ 261 ॥ अन्धविश्वास छोड़कर वास्तव-वस्तुमें दृढ़-विश्वासके फलस्वरूप ही परतत्त्व श्रीचैतन्य-कृष्णकी प्राप्ति :- श्रद्धा करि' एइ लीला शुन, भक्तगण। इहार प्रसादे पाइबा चैतन्य-चरण ॥ 262 ॥ इहार प्रसादे पाइबा कृष्णतत्त्वसार। सर्वशास्त्र-सिद्धान्तेर इँहा पाइबा पार ॥ 263 ॥ अनुवाद—हे भक्तों! श्रद्धापूर्वक इन लीलाओंका श्रवण करो, इनकी कृपासे आपको श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति होगी। इन लीलाओंको श्रद्धापूर्वक श्रवण करनेसे आप श्रीकृष्णतत्त्व-सारको समझ सकोगे। श्रीकृष्णतत्त्व-सारको समझनेपर सभी शास्त्र-सिद्धान्तोंका स्वतः ही पूर्ण ज्ञान हो जाता है ॥ 262-263 ॥ श्रीकृष्णलीला और श्रीचैतन्यलीला-अभिन्न अमृतकी नदी, वह केवलमात्र शुद्धचित्त भक्तके द्वारा ही आस्वाद्य :- कृष्णलीला अमृत-सार, तार शत शत धार, दशदिके बहे याहा हैते। से चैतन्यलीला हय, सरोवर अक्षय, मनोहंस चराह' ताहाते ॥ 264 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-लीलाएँ अमृतका सार हैं। इनकी सैकड़ों धाराएँ दसों दिशाओंमें बहती हैं। श्रीकृष्ण- लीलाओंसे अभिन्न श्रीचैतन्य-लीलाएँ अक्षय सरोवर हैं, हे भक्तों! अपने मनरूपी हंसको उसमें विहार कराओ॥ 264 ॥ ग्रन्थकारकी दीनतापूर्वक प्रार्थना :- भक्तगण, शुन मोर दैन्य-वचन। तोमा-सबार पदधूलि, अङ्गे विभूषण करि', किछु मुञि करों निवेदन ॥ 265 ॥ ध्रु. ॥ अनुवाद—हे भक्तों! आप मेरी विनती सुनो। आप सबके चरणकमलोंकी धूलिको अपने अङ्गोंका विभूषण बनाकर मैं कुछ निवेदन कर रहा हूँ॥ 265 ॥ भक्तिसिद्धान्तसमूह और श्रीकृष्णप्रेमरसके आस्वादनके लिये भक्तोंसे अनुरोध :- कृष्णभक्तिसिद्धान्तगण, याते प्रफुल्ल पद्मवन, तार मधु करि' आस्वादन। प्रेमरस-कुमुदवने, प्रफुल्लित रात्रि-दिने, ताते चराओ मनोभृङ्गगण ॥ 266 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णभक्तिसिद्धान्त-समूह प्रफुल्लित कमलोंके वन सदृश्य है, कृपा करके आप उन कमलोंके मकरन्दका आस्वादन कीजिये। इस सरोवरमें प्रेमरसरूपी कुमुदवन रात-दिन प्रफुल्लित हो रहा है, हे भक्तों! उसमें अपने मनरूपी भ्रमरको विहार कराओ॥ 266 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णलीला ही 'अमृत-सार वस्तु' है; उसके अतिरिक्त, —सब कुछ ही 'असार' है। श्रीकृष्णलीलामृत सारकी सैकड़ों-सैकड़ों धाराएँ श्रीकृष्णलीलामृतसे दसों दिशाओंमें प्रवाहित होती हैं। श्रीकृष्णलीलामृत-सार ही श्रीचैतन्यलीला है। श्रीचैतन्यलीलाको श्रीकृष्णलीलासे पृथक् मानकर वर्तमान कालमें नयी-नयी कल्पनाओंके प्रभावसे उत्पन्न “नदीया और गौरनागरी लीला” आदि नये मतवादोंकी सृष्टि करनेकी चेष्टा चल रही है। थियसफिस्ट दलके कई लोग और अन्यान्य भक्ति-विरोधी प्राकृत बाउल और । 515
[ 25/264-269 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सहजिया दलके कई व्यक्ति अपनी-अपनी उच्छृङ्खल प्राकृत-वृत्तिके साँचेमें ढालकर अर्थात् अपनी वृत्तिके अनुसार ही श्रीगौराङ्गको भी कोई राजनैतिक-नेता अथवा कोई शक्तिके उपासक अथवा कोई अवैध नागरीका लम्पट माननेकी धारणा रखते हैं। गोलोककी नित्यलीला ही प्रकटकालमें प्रपञ्चमें उदित होती है। महाप्रभुकी प्रकटलीलामें उस समय श्रीरूपादि श्रीगौरलीलाके पार्षदवर्गमेंसे किसीने भी उस लीलामें गौरनागर-लीलाको नहीं देखा अथवा समझा, इसलिये तथाकथित गौरनागर-लीला निश्चय ही चैतन्यलीला नहीं है। श्रीरुपानुग वैष्णव-गुरुके चरणचिह्नोंका अनुसरण करके श्रीगौरभक्ति करना ही कर्त्तव्य है। कल्पनाके सरोवरमें अवगाहन करके 'नवगोरार दल' बनाकर कोई भी फल नहीं मिलेगा। 'चैतन्यलीला'-अक्षय सरोवर है; श्रीकृष्णभक्ति- सिद्धान्त-समूह-उस सरोवरके कमलके वन हैं; प्रेमरस-कुमुदवन है; और भक्तोंका मन-भँवरोंका समूह है॥ 264-266॥ श्रीकृष्णलीलाका वैचित्र्य-समूह ही भक्तोंका जीवन :- नाना-भावेर भक्तजन, हंस-चक्रवाकगण, याते बसि' करेन विहार। कृष्णकेलि-मृणाल, याहा पाइ सर्वकाल, भक्त-हंस करये आहार ॥ 267 ॥ अनुवाद— अनेक भावोंके हंस, चक्रवाकादि रूपी भक्तगण इस (श्रीचैतन्यलीलारूपी) अक्षय सरोवरमें सदैव विहार करते हैं। इस सरोवरमें श्रीकृष्णलीलारूपी मृणाल (कमलनाल) सदा उपलब्ध है और भक्तरूपी हंस सदैव उस कमलनालका आहार करते हैं॥ 267॥ अनुभाष्य— श्रीकृष्णकेलिरूपी कमलनाल ही भक्त रूपी हंसका 'आहार' है। नित्यसम्भोगरस-विग्रह श्रीकृष्णचन्द्रकी लीलाएँ श्रीकृष्णसे अभिन्न-तनु नित्यविप्रलम्भरसविग्रह श्रीगौरसुन्दरके आश्रित नित्यसेवक भक्तोंकी आहार योग्य वस्तु है॥ 267॥ वैसे आस्वादनसे ही प्रेमोल्लासकी वृद्धि :- सेइ सरोवरे गिया, हंस-चक्रवाक हञा, सदा ताँहा करह विलास। खण्डिबे सकल दुःख, पाइबा परम सुख, अनायासे हबे प्रेमोल्लास ॥ 268 ॥ अनुवाद— हे श्रीगौरभक्तों! आप भी हंस, चक्रवाक बनकर उस सरोवरमें जाकर सदैव वहीं विलास करो। इससे आपके समस्त दुःख दूर हो जायेंगे और आपको परम सुखकी प्राप्ति होगी और अनायास ही प्रेमोल्लास उत्पन्न होगा ॥ 268 ॥ अनुभाष्य— हे श्रीगौरभक्तों, श्रीचैतन्यलीलाके सरोवरमें अवगाहन करके नित्यकाल श्रीगौरपदाश्रित हंस-चक्रवाकके रूपमें श्रीकृष्णका भजन करते-करते श्रीगौर-उपासनारूपी सरोवरमें विलास करो। ऐसा करनेपर नदीया-नागरीकी भाँति श्रीगौराङ्गको कोई भोग्य-जड़वस्तुके रूपमें कल्पना करके श्रीकृष्णसे इतर सेवारूपी 'दुःख'से बच जाओगे और श्रीकृष्णसेवारूपी परमसुखको प्राप्त करके (तुम) श्रीकृष्णप्रेमके उल्लासमें मत्त हो जाओगे ॥ 268 ॥ शुद्धभक्तोंके द्वारा विश्ववासियोंमें श्रीगौरकृष्णलीलामृतका वितरण :- एइ अमृत अनुक्षण, साधु-महान्त-मेघगण, विश्वोद्याने करे वरीषण। ताते फले अमृत-फल, भक्त खाय निरन्तर, तार प्रेमे जीये जगजन ॥ 269 ॥ अनुवाद— साधु-महान्त पुरुष ही मेघ बनकर विश्वरूपी उद्यानमें इस लीलारूपी अमृतका निरन्तर वर्षण करते हैं। उस वर्षणके फलस्वरूप प्रेमरूपी अमृत-फल फलता है। भक्तगण उसको निरन्तर खाते हैं और जगत्वासी उन भक्तोंके उच्छिष्टको खाकर सुखपूर्वक जीवित रहते हैं॥ 269 ॥ अनुभाष्य— श्रीगौरपदाश्रित साधु-महान्त ही मेघसमूह हैं। वे सदैव जगत्रूपी उद्यानमें श्रीकृष्णलीलामृतका 516 |
पचीसवाँ अध्याय 25/269–272 ] वर्षण करते हैं। इस जलधाराके सींचनेके प्रभावसे प्रेमामृत-फलके फलनेपर भक्तगण उसे निरन्तर खाते हैं और उनके प्रेमसे विश्ववासी जीवन धारण करते हैं॥ 269 ॥ श्रीगौरलीला—घने दूधका पूर (सागर), उसमें श्रीकृष्णलीला—सुकर्पूर, श्रौत-पन्थामें हरि-गुरु-वैष्णवकी कृपासे उसके आस्वादनकी सम्भावना :— चैतन्यलीला—अमृतपूर, कृष्णलीला—सुकर्पूर, दुहे मिलि' हय सुमाधुर्य। साधु-गुरु-प्रसादे, ताहा येइ आस्वादे, सेइ जाने माधुर्य-प्राचुर्य ॥ 270 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्यलीला उस प्रेमामृतके सागर सदृश है और श्रीकृष्णलीला-सुकर्पूरके समान है। दोनों लीलाएँ मिलनेपर अत्यधिक मधुर और आस्वादनीय हो जाती हैं। साधु-गुरुकी कृपासे ही जो कोई उसका आस्वादन करता है, वही माधुर्यकी चरमसीमाको जान पाता है॥ 270 ॥ अनुभाष्य—चैतन्यलीलामृत—उस प्रेमामृतके 'सागर'के समान है और श्रीकृष्णलीला—सुकर्पूर-तुल्य है; इन दोनों लीलामृतका एक साथ मिलना ही सुमाधुर्य है। श्रीकृष्णलीला-माधुर्य श्रीचैतन्यलीलामृतके सहयोगसे पुष्ट होकर सुमाधुर्यमय हो गया है। श्रीगौर-विरोधी असुरदल श्रीगौरलीला अथवा श्रीगौर-मन्त्रको स्वीकार नहीं करता, इसलिये उनके द्वारा श्रीकृष्णलीला-माधुर्यका आस्वादन करना सम्भव नहीं है। दूसरी ओर, श्रीकृष्णविरोधी दैत्यदल श्रीकृष्णलीलामृतसे उदासीन होकर नदीया-नागरीके अनुगत नागरी-अभिमानसे विप्रलम्भरसविग्रह श्रीराधाकृष्ण-अभिन्न-तनु श्रीगौरको श्रीकृष्णसे अलग करके अर्थात् सम्भोगरसविग्रह मानकर श्रीगौरलीलाके वैचित्र्यके माधुर्यका समूल विनाश करते हैं। श्रीरूपानुग-साधु-गुरु-कृपाके द्वारा अर्थात् श्रीरूपानुगत्यमें श्रीगौरलीलामृत और श्रीकृष्णलीलामृतको परस्पर 'अभिन्न' जाननेपर दोनों लीलाओंके एक साथ सम्मिलनसे ही केवल प्रचुर माधुर्यका आस्वादन होता है। श्रीरूपानुग व्यक्ति केवलमात्र इसीपर ही दृढ़भावसे विश्वास करते हैं॥ 270 ॥ ये दोनों लीलामृत ही भक्तोंका आहार, इसके अतिरिक्त अन्नग्रहण करनेपर भी भक्त-जीवनकी अपुष्टि :— ये लीला-अमृत बिने, खाय यदि अन्नपाने, तबे भक्तेर दुर्बल जीवन। यार एकबिन्दु-पाने, उत्फुल्लित तनुमने, हासे, गाय, करये नर्त्तन ॥ 271 ॥ अनुवाद—इस लीलामृतके बिना भक्त अन्नादि खानेपर भी वास्तवमें दुर्बल रहता है। परन्तु इस लीलामृतकी एक बिन्दुका पान करनेसे ही वह तन- मनसे अत्यन्त प्रफुल्लित होकर हँसता, गाता और नृत्य करता है॥ 271 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मनुष्य अन्न खानेसे पुष्ट होता है। बहिर्मुख व्यक्तियोंकी भाँति अन्न खानेपर भी यदि भक्तगण श्रीकृष्णलीलासे युक्त श्रीचैतन्यलीलामृतका पान नहीं करते हैं, तो वे भी बहिर्मुख व्यक्तियोंकी भाँति (परमार्थ-पथके लिये) दुर्बल हो जाते हैं॥ 271 ॥ अनुभाष्य—पाठान्तरे—'खाय यदि अनुपाने।'॥ 271 ॥ तर्कपन्याससे यह अमृत दुर्लभ :— ए अमृत कर पान, यार सम नाहि आन, चित्ते करि' सुदृढ़ विश्वास। ना पड़' कुतर्क-गर्त्ते, अमेध्य-कर्कश-आवर्त्ते, याते पड़िले हय सर्वनाश ॥ 272 ॥ अनुवाद—हे भक्तों! चित्तमें ऐसा सुदृढ़ विश्वास रखकर कि इसके समान अन्य कुछ भी नहीं है, इस अमृतका पान करो। साथ ही इस बातसे बहुत सावधान रहना कि कहीं कुतर्करूपी गड्ढे अथवा अपवित्र दुर्गन्धयुक्त कठोर बवण्डरमें मत उलझ जाओ, उसमें फँसनेसे सर्वनाश हो जाता है॥ 272 ॥ । 517
[ 25/272-276 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—श्रीकृष्णलीला और श्रीगौरलीलाको परस्पर भिन्न समझकर कुतर्कके आधारपर अपवित्र कर्कश घूमनेवाली वायुके द्वारा चलायमान होकर श्रीकृष्णभजन छोड़कर श्रीगौरभजन करने अथवा श्रीगौरसेवाको छोड़कर श्रीकृष्णसेवा करनेपर, मूढ़-जीवका सर्वनाश होता है॥ 272 ॥ पञ्चतत्त्वको और श्रोताओंको प्रणाम :— श्रीचैतन्य, नित्यानन्द, श्रीअद्वैत, भक्तवृन्द, आर यत श्रोता भक्तगण। तोमा-सबार श्रीचरण, करि शिरे भूषण, याहा हैते अभीष्ट-पूरण ॥ 273 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य, समस्त गौरभक्तवृन्द और जितने श्रोता भक्तवृन्द हैं, मैं आप सबके श्रीचरणकमलोंको अपने सिरका विभूषण बनाता हूँ, उसीसे ही मेरी अभीष्ट-पूर्ति होगी॥ 273 ॥ अभीष्ट आराध्यको प्रणाम :— श्रीरूप-सनातन- रघुनाथ-जीव-चरण, शिरे धरि,—यार करि आश। कृष्णलीलामृतान्वित, चैतन्यचरितामृत, कहे किछु दीन कृष्णदास ॥ 274 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी, श्रीरघुनाथदास गोस्वामी और श्रीजीव गोस्वामीके श्रीचरणकमलोंको सिरपर धारण करके उनकी कृपाकी मैं सदैव आशा करता हूँ। मैं, कृष्णदास, श्रीकृष्णलीलासे युक्त श्रीचैतन्यचरितामृतका दीनतापूर्वक कुछ वर्णन करनेका प्रयास कर रहा हूँ॥ 274 ॥ श्रीमन्मदनगोपाल-गोविन्ददेव-तुष्टये। चैतन्यार्पितमस्त्वेतच्चैतन्यचरितामृतम्॥ 275 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 275 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमदनगोपाल और श्रीगोविन्द- देवकी तुष्टिके लिये यह चैतन्यचरितामृत ग्रन्थ श्रीकृष्ण- चैतन्य महाप्रभुको समर्पित हो॥ 275 ॥ अनुभाष्य— श्रीमन्मदनगोपाल-गोविन्ददेव-तुष्टये (श्रीमन्मदनगोपालः गोविन्ददेवः च तयोः तुष्टये प्रीत्यै) एतत् चैतन्यचरितामृतं चैतन्यार्पितमस्तु (श्रीकृष्णचैतन्याय समर्पयामि)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 275 ॥ अभक्तोंकी निन्दा-प्रशंसाके प्रति निरपेक्ष ग्रन्थकारका भक्तोंके सुखसे ही स्वयंको कृतार्थ मानना :— तदिदमतिरहस्यं गौरलीलामृतं यत् खलु समुदय-लोकैर्नादृतं तैरलभ्यम्। क्षतिरियमिह का मे स्वादितं यत् समन्तात् सहृदय-सुमनोभिर्मोदमेषां तनोति ॥ 276 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे काशीवासि-वैष्णवकरणं पुनर्नीलाचल-गमनञ्च पञ्चविंशः परिच्छेदः। इति मध्यलीला समाप्ता अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 276 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह अति रहस्यमय श्रीगौर- लीलामृत भक्तोंका प्राणधन होनेपर भी अनधिकारी लोग निश्चय ही इसका आदर नहीं करेंगे, इसमें मेरी कोई हानि नहीं है, परन्तु यह लीलामृत जिन सब सहृदय साधुओंके द्वारा सम्पूर्णरूपसे आस्वादित होगा, यह ग्रन्थ उन महात्माओंके आनन्दका विस्तार करे॥ 276 ॥ पचीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें काशीवासियोंका वैष्णवकरण और पुनः नीलाचल-गमन नामक पचीसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। अनुभाष्य— अतिरहस्यं (परमगोपनीयं) तत् गौरलीलामृतम् (इदं ग्रन्थरत्नं) खलु (निश्चितं) समुदयलोकैः (असद्भिरनधिकारिभिः सर्वैः) न 518
पचीसवाँ अध्याय 25/276 ] आदृतं, यतः [इदं] तैः (असद्भिः) अलभ्यं (लब्धुमशक्यम्); श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 276 ॥ इह (अत्र) मे (मम) इयं का क्षतिः (हानिः)?- यत् (यत्र) पचीसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। सहृदयसुमनोभिः (निष्कपटैः सुधीभिः ऐकान्तिकचित्तैः) समन्तात् (सर्वतः) स्वादितं (सत्) एषां (सुमनसां) मोदं तनोति मध्यलीला समाप्त (विस्तारयति)। । 519
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 520 ।
श्लोक सूची
[वर्णक्रमानुसार प्रथम और तृतीय चरण]
| अ | ||
|---|---|---|
| अ | अन्यथा विश्वमोहोऽपि 17/216 | अहं त्वां सर्वपापेभ्यो 22/91 |
| अक्रूरस्त्वभिवन्दने 22/132 | अन्ये च संस्कृतात्मानो 20/173 | अहं वेद्मि शुको वेत्ति 24/314 |
| अक्ष्णोः फलं त्वादृश 20/61 | अन्वय–व्यतिरेकाभ्यां 25/121 | अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः 24/183 |
| अगजगदोकसामखिल 15/180 | अन्वीय भूतेषु विलक्षणस्य 20/262 | अहमिह नन्दं वन्दे 19/96 |
| अगत्येकगतिं नत्वा 21/1 | अपरिकलितपूर्वः 20/182 | अहमेवासमेवाग्रे 24/72, 25/111 |
| अङ्गीकुर्वन् स्फुटां चक्रे 15/1 | अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो 19/143 | अहैतुक्यव्यवहिता या 19/172 |
| अचिरादेव सर्वार्थः 20/106, 24/164 | अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं 20/116 | अहो धन्योऽसि देवर्षे 24/272 |
| अजनि च यन्मयं 19/143 | अपि सम्भावना–प्रश्न 24/64 | अहो बकी यं स्तन– 22/95 |
| अजातशत्रवः शान्ताः 22/78 | अप्राणस्यैव देहस्य मण्डनं 19/75 | अहो बत श्वपचोऽतो 19/72 |
| अजानता महिमानं तवेदं 19/199 | अप्राप्तातीत–नष्टार्था 24/175 | अहो महात्मन् 24/120 |
| अटति यद्भवानहि काननं 21/124 | अवजानन्ति मां मूढा 25/38 | आ |
| अत आत्यन्तिकं क्षेमं 22/82 | अवतारावलीबीजं हतारि 23/77 | आकर्ण्य वेणुरणितं 17/36 |
| अतः श्रीकृष्णनामादि न 17/136 | अवतारा ह्यसंख्येया 20/249 | आकृतिः कृतचेतसां 15/110 |
| अतुल्यमधुरप्रेम–मण्डित 23/78 | अवरुह्य गिरेः कृष्णो 18/25 | आततत्वाच्च 24/68, 74 |
| अथ पञ्चगुणा ये स्युरंशेन 23/74 | अविचिन्त्यमहाशक्तिः 23/76 | आत्मनिक्षेप–कार्पण्ये 22/97 |
| अथ वृन्दावनेश्वर्य्याः कीर्त्यन्ते 23/82 | अविद्या–कर्मसंज्ञान्या 20/112, 24/303 | आत्मा देहमनोब्रह्म 24/12 |
| अथोच्यन्ते गुणाः पञ्च 23/76 | अभयं सर्वदा तस्मै 22/34 | आत्मानञ्च तदालोकाद् 18/1 |
| अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः 23/101 | अमृतं शाश्वतं 21/51, 21/88 | आत्मावास्यामिदं विश्वं 25/99 |
| अध्यात्ममहदाख्यानं नित्यं 24/112 | अयं नेता सुरम्याङ्गः 23/66 | आत्मारामगणाकर्षीत्यमी 23/77 |
| अनन्यममता विष्णौ ममता 23/8 | अयमहमपि हन्त प्रेक्ष्य 20/182 | आत्मारामतया मे वृथा 24/123 |
| अनपेक्षः शुचिर्दक्ष 23/104 | अर्च्ययामेव हरये पूजां 22/71 | आत्मारामश्च 17/140, 24/5, 25/152 |
| अनादिरादिर्गोविन्दः 20/154, 21/35 | अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां 25/137 | आत्मारामेति पद्यार्कस्य 24/1 |
| अनारुरुक्षवे शैलं स्वस्मै 18/25 | अश्वत्थवृक्षाश्च वटवृक्षाश्च 24/294 | आदौ श्रद्धा ततः साधु 23/14 |
| अनिकेतः स्थिरमतिः 23/107 | असमानोर्ध्वरूपश्री 23/79 | आद्योऽवतारः पुरुषः 20/267 |
| अन्तर्गतः स्वविवरेण 17/142, 24/45, 24/110, 25/151 | असर्वव्यञ्जकः पूर्णतरः 20/398 | आधत्त वीर्यं साऽसूत 20/274 |
| अन्तर्वाणिभिरप्यस्य मुद्रा 23/36 | अस्पन्दनं गतिमतां पुलक 24/201 | आनुकूल्यस्य सङ्कल्पः 22/97 |
| अन्तर्भक्तिरसेन पूर्णसरसो 24/343 | अस्माभिर्यदनुष्ठेयं 15/269 | आपामरं यो विततार 23/1 |
| अस्मिन् सुखघनमूर्त्तौ 24/123 | आपाययति गोविन्दपाद 24/209 |
। 521
[ आयु-क्षति ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
| आयुः श्रियं यशो धर्मं 25/82 | उरुक्रमे एव भक्तिमेव 24/300 | कालवृत्त्यात्ममायायां 20/275 |
| आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म 24/153 | ऋ | कालेन वृन्दावनकेलि 19/119, 24/345 |
| आरुह्य कृच्छ्रे 24/126, 136, 25/32 | ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत 25/117 | कालेन येर्वा विमिताः 21/11 |
| आरुह्य ये द्रुमभुजान् 24/170 | ऋद्धा सिद्धिव्रज-विजयिता 19/165 | का स्त्र्यङ्ग ते कलपदामृत 24/52 |
| आर्त्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी 24/89 | ए | किं विधत्ते किमाचष्टे 20/147 |
| आलिलिङ्ग परिघायत 24/344 | एकदेशस्थितस्याग्नेर्ज्योत्स्ना 20/110 | किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुक्कशा 24/173 |
| आशाबन्धः समुत्कण्ठा नाम 23/18 | एकन्तुः महतः स्रष्टृ | कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्त 20/342 |
| आसक्तिस्तद्गुणाख्याने 23/19 | एतावदेव जिज्ञास्यं 25/121 | कीर्त्त्यमानं यशो यस्य 24/93 |
| आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य 20/331 | एतावान् सर्ववेदार्थः 20/148 | कुटिलकुन्तलं श्रीमुखञ्च 21/124 |
| इ | एतेऽलिनस्तव यशोऽखिल 24/171 | कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वर 22/19 |
| इति मत्वा भजन्ते मां 24/183 | एते चांशकलाः पुंसः कृष्ण 20/156 | कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा 23/61 |
| इतीदृक्स्वलीलाभिरानन्द 19/229 | एते न ह्यद्भूता व्याध 22/143, 24/267 | कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्ति 17/140, 24/5, 25/152 |
| इत्यसाधारणं प्रोक्तं गोविन्द 23/80 | एतौ हि विश्वस्य 20/262 | कृतसंवन्दनौ पुत्रौ सस्वजाते 19/197 |
| इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो 20/147 | एवं गुणाश्रतुर्भेदाः 23/80 | कृतिसाध्या भवेत् साध्य 22/102 |
| इत्यादयोऽनुभावाः स्युर्जातभाव 23/19 | एवंव्रतः स्वप्रियनाम 23/37, 25/135 | कृते यद्ध्यायतो विष्णुं 20/343 |
| इन्द्रारिव्याकुलं लोकं 20/156 | एवमुक्तः प्रियामाह स्कन्धं 19/208 | कृपामृतेनाभिषिषेच 19/119, 24/345 |
| इष्टे स्वारसिकी रागः 22/146 | क | कृष्णं स्मरन् जनश्चास्य 22/156 |
| इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो 22/57 | कः पण्डितस्त्वदपरं शरणं 22/93 | कृष्णप्रियावलीमुख्या 23/86 |
| ई | कदाहं यमुनातीरे नामानि 23/33 | कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं 20/340 |
| ईश्वरः परमः कृष्णः 20/154, 21/35 | कम्प्रति कथयितुमीशे सम्प्रति 19/98 | कृष्णमेनंमवेहि त्वमात्मानं 20/162 |
| ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु 22/70 | करुणानिकुरम्बकोमले 21/45 | कृष्णस्य पूर्णतमता 20/399 |
| उ | करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु 22/133 | कृष्णस्वरूपमाधुर्यैश्वर्य 20/97 |
| उक्तार्थानामप्रयोगः 24/293 | कर्मण्यस्मिन्ननाश्वासे 24/209 | कृष्णादिभिर्विभावाद्यैः 23/93 |
| उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव 15/237 | कर्माणि निर्दहति किन्तु 15/170 | कृष्णाय कृष्णचैतन्याम्ने 19/53 |
| उत्सृज्यैतानथ यदुपते 22/16 | कलावप्यतिगूढेयं भक्तियेन 22/1 | कृष्णे स्वधामोपगते 24/316 |
| उत्तुङ्गं यदुपुरसङ्गमाय 24/115 | कलिं सभाजयन्त्यार्या 20/345 | केचित् स्वेद्धान्तर्हृदयावकाशे 24/150 |
| उदरमुपासते य 24/160, 207 | कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति 20/342 | केशाग्रशतभागस्य 19/140 |
| उद्गीर्णाद्भुत-माधुरी- 20/181 | कलौ नष्टदृशामेषः 24/316 | को वेत्ति भूमन् भगवन् 21/9 |
| उद्वाष्पः पुण्डरीकाक्ष 23/33 | कस्यान्सुभावोऽस्य न देव 24/51 | क्रमः शक्तौ परिपाट्यां 24/24 |
| उपगीयमानमाहात्म्यं हरिं 19/203 | काचं विचिन्वन्नपि 22/42, 24/213 | क्रीडाकन्दुकतां येन नीतो 18/38 |
| उवाह भगवान् कृष्णः 19/205 | कामश्च दास्ये न तु 22/135 | क्व वा कथं वा कति 21/9 |
| कामादीनां कति न 22/16 | क्षतिरियमिह का मे 25/276 |
522 |
श्लोक सूची क्षान्ति-तर्को ] क्षान्तिरव्यर्थकालत्वं 23/18 | चतुर्भुजं कअरथाङ्गशङ्ख 24/150 | तं सनातनमुपागतमक्षणोदृष्टि 24/344 क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव 25/39 | चत्वारो जज्ञिरे वर्णा 22/27, 108 | तज्जोषणादाश्वपवर्ग 22/83, 23/16 क्षीरं यथा दधि विकार 20/310 | चत्वारो वासुदेवाद्या नारायण 20/242 | तत्कर्णिकारं तद्धाम तदनन्तांश 20/258 क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः 24/304 | चस्कम्भ यः स्वरंहसास्खलता 24/21 | तत्तत्कथा-रतश्चासौ कुर्याद्वासं 22/156 क्षेमं न विन्दन्ति बिना 22/20 | चान्वाचये समाहारेऽन्योऽन्यार्थे 24/63 | तत्तद्देवावगच्छ त्वं मम 20/373 ख | चारु-सौभाग्यरेखाढ्या 23/83 | तत्तद्भावादिमाधुर्य्ये श्रुते 22/151 ख इव रजांसि वान्ति 21/15 | चित्रं बतौतदेकेन वपुषा 20/170 | तत् किं करोमि विरलं 23/29 ग | चिराद्दत्तं निज-गुप्तवित्तं 23/1 | तत्पादाम्बुजसर्वस्वैः 23/95 | चीराणि किं पथि न सन्ति 23/109 | तत्स्थानमाश्रितस्तन्वा मोदते 22/98 गच्छन् वृन्दावनं गौरो 17/1 | चेतः केलि-कुतूहलोत्तरलितं 20/181 | तत उद्गादनन्त तव 24/160, 207 गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः 19/209 | चैतन्यार्पितमस्तु 25/275 | ततश्चान्तर्दधे कृष्णः सा 19/208 गा गोपकैरनुवनं नयतोख्दार 24/201 | ज | ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात् 23/14 गायत्रीभाष्यरूपोऽसौ 25/137 | जगत्तमो जहाराव्यात् स 24/1 | ततो गत्वा वनोद्देशं दृप्ता 19/207 गायन् गुणान् दशशतानन 21/13 | जगद्धिताय सोऽप्यत्र 20/162 | तत्त्वं सनातनार्येशः 20/97 गायन्त्य उच्चैरमुमेव संहता 25/128 | जगृहे पौरुषं रूपं 20/266 | तथाऽविदांसिनः कूल्याः सरसः 20/249 गुणात्मनस्तेऽपि गुणान् 21/11 | जन्माद्यस्य यतः 20/357, 25/141 | तथा मद्भिक्षया भक्तिरुद्धवैनांसि 24/57 गुणालिसम्पत् कविता च 17/212 | जय जय जह्याजामजित 15/180 | तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते 25/107 गुर्वीर्पातगुरुस्नेहा सखीप्रणयिता 23/86 | जयति व्रजराजनन्दने न 21/45 | तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानो 22/100 गृहीतचेता राजर्षे 24/46, 25/150 | जहौ युवैव मलवदुत्तमः 23/24 | तदिदमतिरहस्यं गौरलीला 25/276 गृहेषु द्व्यष्टसाहस्रं स्त्रिय 20/170 | जानन्त एव जानन्तु 21/27, 83 | तदीयेतितशेषु भक्तैर्जितत्वं 19/229 गोकुलप्रेमवसतिर्जगच्छ् | जिह्वाफलं त्वादृश-कीर्त्तनं 20/61 | तद्वा इदं भुवनमङ्गल 25/37 गोपति-तनयाकुञ्जे गोपवधूट्टी 19/98 | जीवः सूक्ष्मस्वरूपोऽयं 19/140 | तद्विद्यादात्मनो मायां 25/117 गोपीकोलूखले दाम्ना बबन्ध 19/204 | जीवनीभूत-गोविन्दपादभक्ति 23/91 | तद्ब्रह्म निष्कलमनन्तं 20/160 गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य 21/112 | जीवन्मुक्ता अपि पुनर्यान्ति 25/74 | तद्भावलिप्सुना कार्या 22/154 गोलोकनाम्नि निजधाम्नि तले 21/49 | जीवभूतां महाबाहो ययेदं 20/116 | तद्रसामृततृप्तस्य नान्यत्र 25/139 गौड़ेन्द्रस्य सभा-विभूषणमणिः 24/343 | जीवष्वेते वसन्तोऽपि बिन्दु 23/73 | तन्निष्ठा दुर्घटा बुद्धेरेतां 19/211 गौड़ोद्यानं गौरमेघः सिञ्चन् 16/1 | ज्ञानं मे परमगुह्यं यद्विज्ञान 25/103 | तन्मयी या भवेद्भक्तिः 22/146 ग्रन्थोऽष्टादशसाहस्रः 25/137 | ज्ञानशक्त्यादिकलया यत्राविष्टो 20/371 | तन्माययातो बुध 20/119, 24/132 ग्रन्थो धनेऽथ सन्दर्भे 24/18 | ज्ञानिनाञ्चात्मभूतानां यथा 24/82 | तपस्विनो दानपरा यशस्विनो 22/20 घ | त | तव मधुरस्वरकण्ठी गायति 23/30 घ्राणश्च तत्पादसरोजसौरभे 22/134 | त आवेशा निगद्यन्ते जीवा 20/371 | तवास्मीति वदन् वाचा तथैव 22/98 च | तं मत्वात्मजमव्यक्तं 19/204 | तया तिरोहितत्वाच्च शक्तिः 20/115 चतुर्विधा भजन्ते मां 24/89 | तं मोपयातं प्रतियन्तु विप्रा 23/21 | तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो 17/186, 25/56 । 523
[ तल्लभ्यते-नारायण श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला तल्लभ्यते दुःखवदन्यतः सुखं 24/163 तस्माद्भारत सर्वात्मा भगवान् 22/107 तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो 22/142 तस्मै देयं ततो ग्राह्यं 20/58 तस्मै नमस्ते सर्वात्मन् 24/67 तस्मै नमो भगवतेऽनुविधेम 25/37 तस्य हरेः पदकमलं वन्दे 19/134 तस्याः पारे परव्योम 21/51, 88 तस्याः सुदुःखभय-शोक 19/201 तस्यारविन्दनयनस्य 17/142, 24/45, 24/110, 25/151 तस्यैव हेतोः प्रयतेत 24/163 तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु 25/39 तावत् कर्माणि कुर्वीत 22/61 तावद्भक्तिसुखस्यात्र 19/176 तितिक्षवः कारुणिकाः 22/78 तितिक्षा दुःखसंमर्षो 19/212 तीव्रेण भक्तियोगेन 22/36, 24/85, 24/191 तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तः 20/57 तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं 22/55 तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो 23/107 तृतीयं सर्वभूतस्थं तानि 20/251 तेजोवारिमृदां यथा 20/357, 25/141 ते ते प्रभावानिचया विहिताश्च 21/49 तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा 25/99 तेनाटवीमटसि तद्व्यथते 18/65 तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुराया 19/72 ते वै विदन्त्यतितरन्ति 24/184 तेषां सततयुक्तानां 24/167, 186 तेषामसौ क्लेशल 22/22, 24/135, 25/31 तेष्वशान्तेषु मूढ़ेषु 22/86 तैस्तैरतुल्यातिशयैः 20/353 त्रय्या चोपनिषद्भिश्च 19/203 त्रिजगन्मानसार्कर्षि-मुरली 23/79 त्रैलोक्यसौभगमिदञ्च निरीक्ष्य 24/52 त्वं पासि नस्त्रिभुवनञ्च 20/299 त्वच्छैशवं त्रिभुवनाद्भुतं 23/29 त्वत्साक्षात्कारणाह्लाद 24/37 त्वयोपभुक्तस्रग्गन्ध 15/237 द दक्षिणो विनयी हीमान् 23/70 दत्ताभयश्च भुजदण्डयुगं 24/48 ददामि बुद्धियोगं तं 24/167, 186 दशमे दशमं लक्ष्यमाश्रिताश्रय 20/151 दीपाच्चिरेव हि दशान्तरं 20/316 दीयमानं न गृह्णन्ति बिना 19/173 दुरूहाद्भुतवीर्येऽस्मिन् श्रद्धा 22/129 दृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं 21/112 देवकी वसुदेवश्च विज्ञाय 19/197 देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां 22/137 देवी कृष्णमयी प्रोक्ता 23/64 देशकाल-सुपात्रज्ञः शास्त्रचक्षुः 23/68 देहश्च विक्लवधियः सहसैव 19/201 दैवात् क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां 20/274 दैवी ह्येषा गुणमयी 20/121, 22/23, 24/133 द्युपतय एव ते न 21/15 द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि 20/267 द्वापरे परिचर्यायां कलौ 20/343 द्वापरे भगवान् श्यामः 20/335 द्विजोपसृष्टः कुहकस्तक्षको 23/21 ध धन्यस्यायं नवप्रेमा 23/36 धन्यः स्म मूढ़मतयोपि 17/36 धन्येयमद्य धरणी तृण 24/200 धर्मः प्रोज्झित-कैतव 24/95, 25/142 धर्मस्य तत्त्वं निहितं 17/186, 25/56 धर्मी किशोर एवात्र नित्य 20/378 धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद् 16/145 धृतिः स्यात् पूर्णता-ज्ञानं 24/175 ध्यायन् कृते यजन् यज्ञै 20/344 न न कर्हिचिन्मत्पराः 22/158 न च्छन्दसा नैव जलाग्नि 22/52 न ज्ञानं न च वैराग्यं 22/142 न तथास्य भवेन्मोहो 22/87 न तद्भक्तेषु चान्येषु स 22/71 नद्योऽद्रयः खगमृगाः 24/200 न निर्विण्णो नातिसक्तो 22/50 न पारयेऽहं चलितुं नय 19/207 न प्रेमा श्रवणादिभक्तिरपि 23/27 न भजन्त्यवजानन्ति 22/28 नमस्ते वासुदेवाय नमः 20/336 न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः 19/50 नमो महावदान्याय कृष्णप्रेम 19/53 न यत्र माया किमुतापरे 20/270 न शौरिचिन्ताविमुख 22/88 न साधयति मां योगो 20/137 न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो 20/137 नातः परं परम यद्भवतः 25/36 नात्र शास्त्रं न युक्तिञ्च 22/151 नान्तं विदाम्यहममी 21/13 नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्य 17/133 नामसङ्कीर्त्तनं श्रीमन्मथुराण्डले 22/128 नायं सुखापो भगवान् देहिनां 24/82 नायकानां शिरोरत्नं कृष्णस्तु 23/63 नारायण-कलाः शान्ता 24/118 524 ।
श्लोक सूची [नारायण-महता] | नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन 19/215 | प्रकाशिताखिलगुणः स्मृतः 20/398 | भक्त्या भागवतं ग्राह्यं 24/314 | | नारीगण-मनोहारी सर्वाराध्यः 23/71 | प्रणयरसनया धृताङ्घ्रि 25/126 | भक्त्या संजातया भक्त्या 25/134 | | निगमकल्पतरोर्गलितं 25/144 | प्रतापी कीर्त्तिमान् रक्त 23/71 | भक्त्याहमेकया 20/138, 25/132 | | निजानुरूपे प्रभुरेकरूपे 19/121 | प्रद्युम्नायानिरुद्धाय तुभ्यं 20/336 | भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां 22/55 | | नित्यसिद्धस्य भावस्य 22/102 | प्रधान-परमव्योम्नोरन्तरे 21/50 | भगवद्भक्तिहीनस्य जातिः 19/75 | | नित्योत्सवं न तत्पुष्टैर्ऋषिभिः 21/123 | प्रवर्त्तते यत्र रजस्तम 20/270 | भवद्विधा भागवतास्तीर्थ 20/57 | | निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः 24/130 | प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा 25/124 | भवन्ति तपतां श्रेष्ठ 20/113 | | निर्निश्चये निष्क्रमार्थं 24/18 | प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां 22/63 | भवापवर्गो भ्रमतो यदा 22/46, 81 | | निर्ममो निरहङ्कारः 23/101 | प्रायो अमी मुनिगणा 24/171 | भयं द्वितीयाभिनिवेशतः 20/119, 24/132 | | नीचोऽपि यत्प्रसादात् 20/1 | प्रायो बताम्ब मुनयो विहगा 24/170 | भयानकः स वीभत्स 19/186 | | नीचोऽप्युत्पुलको लेभे 24/272 | प्रियस्वरूपे दयितस्वरूपे 19/121 | भर्त्तुर्मिथः सुयशसः 24/83 | | नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः 24/177 | प्रेम-मैत्री-कृपोपेक्षा यः 22/70 | भागो जीवः स विज्ञेय 19/141 | | नैवोपयन्त्यपचितिं 22/48 | प्रेमान्तरङ्गभूतानि 23/91 | भावः स एव सान्द्रात्मा 23/7 | | नैषां मतिस्तावदुरुक्रम 22/53, 25/83 | प्रेमालापैर्दृढतरपरिष्वङ्गरङ्गैः 19/120 | भास्वान् यथाश्मशकलेषु 20/304 | | नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाव-वर्जितं 22/19 | प्रेमास्मिन् बत राधिकेव 18/12 | भिक्षामटन्नरिपुरे श्वपाकमपि 23/26 | | नो दीक्षां न च सत्क्रियां 15/110 | प्रेमोन्मत्तान् सहोनृत्यन् 17/1 | भूतानि भगवत्यात्म 22/69, 25/127 | | | प्रौढानन्दश्चमत्कार 23/93 | भेजे सर्पवपुर्हित्वा रूपं 25/75 | | प | ब | म | | पतिश्च पतितं त्यजेत् 15/265 | | | | पतिपुत्रसुहृद्भ्रातृ 22/159 | बलिं हरद्भिश्चिरलोकपालैः 21/33 | मत्कथाश्रवणादौ वा 22/61 | | पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवान 19/209 | बालाग्रशतभागस्य शतधा 19/141 | मत्स्याश्व-कच्छप-नृसिंह 20/299 | | पप्रच्छुराकाशवदन्तरं 25/128 | बृहत्त्वाद्बृंहणत्वाच्च 24/67 | मद्गुण श्रुतिमात्रेण मयि 19/171 | | परं भावमजानन्तः 25/38 | ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा 24/127, 25/148 | मधुगन्धि-मृदुस्मितमेतदहो 21/136, 23/32 | | परस्य ब्रह्मणः शक्तिः 20/110 | ब्रह्मा भवोऽहमपि यस्य 20/306 | | | परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य 24/46, 25/150 | ब्रह्मा य एष जगदण्ड 20/304 | मधुरं मधुरं वपुरस्य 21/136, 23/32 | | परिपूर्णतया भान्ति तत्रैव 23/73 | ब्रह्मेति परमात्मेति 20/158, 24/70, 24/77, 25/130 | मधुरेयं नववयाः 23/82 | | पश्चादहं यदेतच्च 24/72, 25/111 | | मनसो वपुषो वाचो 21/27, 83 | | पश्यामि विश्वसृजमेकम् 25/36 | ब्रूहि योगेश्वरे कृष्णे 24/315 | मनोगतिरविच्छिन्ना यथा 19/171 | | पादौ हरेः क्षेत्रपदानुसर्पणे 2/135 | भ | मन्मना भव मद्भक्तो 22/58 | | पिबत भागवतं रसमालयं 25/144 | भक्ताः स्रवन्नेत्रजलाः 23/23 | मन्ये तदर्पित-मनः 20/59 | | पुराणाद्या ये वा सहज 22/6 | भक्तानां हृदि राजन्ती 23/92 | मय्यार्पितमनोबुद्धियों 23/102 | | पुरुषेणात्मभूतेन वीर्यमाधत्त 20/275 | भक्तिः पुनाति 20/138, 25/132 | मर्त्यो यदा त्यक्तसमस्त 22/100 | | पूर्णः शुद्धो नित्यमुक्तो 17/133 | भक्तिनिर्धूत-दोषाणां 23/90 | महत्सेवां द्वारमाहुर्विमुक्ते 22/79 | | पूर्णता पूर्णतरता द्वारका 20/399 | भक्तिरित्युच्यते भीष्म 23/8 | महता हि प्रयत्नेन 15/269 | । 525
[ महान्त-वयन्तु श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
| महान्तस्ते समचित्ताः 22/79 | यत्र स्वल्पोऽपि 22/129, 24/189 | येऽन्ये च पापाः 24/173, 203 | | महीयसां पादरजो 22/53, 25/83 | यथाग्निः सुसमृद्धार्च्चिः 24/57 | येषामहं प्रिय आत्मा 22/158 | | मां विधत्तेऽभिधत्ते मां 20/148 | यथा तरोर्मूलनिषेचनेन 22/63 | योऽज्ञानमत्तं भुवनं 19/54 | | मा द्राक्षीः क्षीणपुण्यान् 22/89 | यथा महान्ति भूतानि 25/124 | योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं 22/48 | | मानं तनोति सह-गोगणयोः 18/34 | यथा राधा प्रिया विष्णो 18/8 | योगारूढ़स्य तस्यैव शमः 24/153 | | मामेव ये प्रपद्यन्ते 20/121, 22/23, 24/133 | यद्यद्विभूतिमत् सत्त्वं 20/373 | यो दुस्त्यजान् दारसुतान् 23/24 | | | यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो 17/178 | यो न हृष्यति न द्वेष्टि 23/105 | | मामेवैष्यसि सत्यं ते 22/58 | यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ 20/344 | योषित्सङ्गाद्यथा पुंसो 22/87 | | मायामात्रमनूद्यान्ते प्रतिषिध्य 20/148 | यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न 24/154 | | | मुकुन्दलिङ्गालयदर्शने 22/134 | यदृच्छया मत्कथादौ जात 22/50 | र | | मुक्ता अपि लीलया 24/107, 138, 25/149 | यद्यचिन्त्यमहाशक्तौ 25/74 | रक्षिष्यतीति विश्वासो गोप्तृत्वे 22/97 | | | यद्यद्भुतक्रमपरायण-शील 24/184 | रतिरानन्दरूपैव नीयमाना 23/92 | | मुक्तानामपि सिद्धानां 19/150, 25/81 | यद्वाञ्छया श्रीर्ललना 24/51 | रहूगणैतत्तपसा न याति 22/52 | | मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं 24/130 | यन्नामधेयश्रवणानुकीर्त्तनात् 16/186, 18/125 | रागात्मिकामनुसृता या सा 22/150 | | मुखबाहूरूपादेभ्यः 22/27, 108 | | राधा-सङ्गे यदा भाति 17/216 | | मुमुक्षवो घोररूपान् हित्वा 24/118 | यन्मर्त्त्यलीलोपयिकं 21/100 | रामश्च रामश्च रामश्च रामा 24/145 | | मूकं करोति वाचालं पङ्गुं 17/80 | यस्ताद्गगेव हि च 20/316 | रुचिरस्तेजसा युक्तो बलीयान् 23/66 | | मैवं ममाधमस्यापि 22/44 | यस्तु नारायणं देवं 18/116 | रुद्धा गुहाः किमजितोऽवति 23/109 | | य | यस्त्विन्द्रगोपमथवेन्द्रमहो 15/170 | रूपं दृशां दृशिमतां 24/49 | | य एषां पुरुषं साक्षात् 22/28 | यस्मान्नोद्विजते लोको 23/103 | रोदनबिन्दुमकरन्दस्यन्दि 23/30 | | यः प्रागेव प्रियगुणगणैः 19/120 | यस्य प्रभा प्रभवतो 20/160 | | | यः शम्भुतामपि तथा 20/310 | यस्याङ्घ्रिपङ्कजरजोऽखिल 20/306 | ल | | यच्च व्रजन्त्यनिमिषामृष 24/83 | यस्यान्नं मकरकुण्डल 21/123 | लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य 19/172 | | यच्छ्र | यस्यावतारा ज्ञायन्ते 20/353 | लज्जाशीला सुमर्र्यादा धैर्य 23/84 | | यज्ञैः सङ्कीर्त्तन-प्रायैर्यजन्ति 20/340 | यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना 22/73 | लीला-प्रेम्णा प्रियाधिक्यं 23/80 | | यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द 17/80 | यस्यैक-निश्वसित 20/281, 21/41 | लेभे गतिं धातृचितां 22/95 | | यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं 18/65 | यावत् प्रेम्णां मधुरिपु 19/165 | व | | यत्पादसेवाभिरुचिस्तपस्विना 24/211 | यावानहं यथाभावो 25/107 | वंशीधारी जगन्नारी-चित्तहारी 17/214 | | यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु 20/113 | येऽन्येऽरविन्दाक्ष 22/30, 24/126, 136, 25/32 | वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं 20/158 | | यत्नान्तरे तथा 24/63 | | वदान्यो धार्मिकः शूरः 23/69 | | यत्र नित्यतया सर्वे विराजन्ते 23/63 | ये तु धर्मामृतमिदं यथोक्तं 23/108 | वन्देऽनन्ताद्भुतैश्वर्यं श्रीचैतन्य 20/1 | | यत्र नैसर्गदुर्वैराः सहासन् 17/39 | ये ध्यायन्ति सदोद्युक्ताः 22/159 | वन्दे श्रीकृष्णचैतन्यदेवं तं 22/1 | | यत्र सङ्कीर्त्तनेनैव 20/345 | येनातिव्रज्य त्रिगुणं 19/174 | वयः कैशोरकं ध्येयमाद्य 19/106 | | | | वयन्तु न वितृप्याम उत्तम 25/145 |
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श्लोक सूची वयमिव-स यत् ] वयमिव सखि कच्चिद्गाढ 23/61 वयसो विविधत्वेऽपि 20/378 वरं हुतवहज्वाला- 22/88 वरीयानीश्वरश्चेति गुणास्तस्याः 23/72 वाग्भिः स्तुवन्तो मनसा 23/23 वावदूकः सुपाण्डित्यो 23/67 वामस्तामरसाक्षस्य भुजदण्डः 18/38 विकर्म यच्चोत्पतितं 22/140 विदग्धश्चतुरो दक्षः कृतज्ञः 23/68 विनीता करुणापूर्णा 23/84 विप्राद्द्विषड्गुणयुतादरविन्द 20/59 विविधाद्भुतभाषावित् 23/67 विभूतिर्मायिकी सर्वा 21/56 विमोहिता विकत्थन्ते मम 22/32 विराजन्तीमभिव्यक्तां 22/150 विलज्जमानया यस्य 22/32 विश्वं पुरुषरूपेण 20/318, 21/37 विष्टभ्याहमिदं 20/163, 374 विष्णुर्महान् स 20/281, 21/41 विष्णुशक्तिः परा 20/112, 24/303 विष्णोर्नु वीर्यगणनां 24/21 विष्णोस्तु त्रीणि रूपाणि 20/251 विसृजति हृदयं न 25/126 विस्मापनं स्वस्य च 21/100 विहारी गोपनारीभिः 17/214 वीक्ष्यालकावृतमुखं तव 24/48 वृन्दावनीयां रसकेलिवार्त्तां 19/1 वृषभं भद्रसेनश्च प्रलम्बो 19/205 वेदाङ्गस्वेदजनितैस्तोयैः 21/50 वैकारिकस्तैजसश्च तामस 20/312 वैष्णवीकृत्य संन्यासिमुखान् 25/1 व्यतनुत कृपया यस्तत्त्व 17/138 व्यामोहाय चराचरस्य जगतस्ते 20/145 श शक्तयः सर्वभावानाम् 20/113 शठेन केनापि वयं हठेन 24/128 शमो दमो भगश्चेति 22/85 शमो मन्निष्ठता बुद्धेरिति 19/211 शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम 19/212 शिवः शक्तियुक्तः शश्वत् 20/312 शीतोष्णसुखदुःखेषु 23/106 शीलं सर्वजनानुरञ्जनम् 17/210 शुक्लो रक्तस्तथा पीत 20/331 शुचिः सद्भाक्तिदीप्ताग्निः 19/74 शुद्धसत्त्वविशेषात्मा प्रेम 23/5 शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् 23/105 श्याममेव परं रूपं पुरी 19/106 श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्ते 23/108 श्रद्धा विशेषतः प्रीतिः 22/128 श्रीकृष्णाख्यं परं धाम 20/151 श्रीचैतन्यं लिखाम्यस्य 21/1 श्रीवत्सादिभिरङ्कैश्च 20/335 श्रीविष्णोः श्रवणे परीक्षित् 22/132 श्रीभागवतरक्तानां 23/90 श्रीमद्भागवतार्थानामास्वादे 22/127 श्रीमद्भागवते महामुनि 24/95, 25/142 श्रीमन्मदनगोपाल-गोविन्द 25/275 श्रीराधिकायाः प्रियता स्वरूपता 17/212 श्रीराधेव हरेस्तदीय-सरसी 18/12 श्रुतिमपरे स्मृतिमितरे भारतमन्ये 19/96 श्रुतिर्माता पृष्टा दिशति 22/6 श्रुत्वा गुणान् भुवनसुन्दर 24/49 श्रेयःसृतिं भक्तिमुदस्य 22/22, 24/135 25/31 श्रेष्ठमध्यादिभिः शब्दैर्नाट्ये 20/397 श्रोतव्यः कीर्त्तितव्यश्च 22/107 श्वपाकोऽपि बुधैः श्लाघ्यो 19/74 श्वादोऽपि सद्यः 16/186, 18/125 स स एव धैर्यमाप्नोति 24/178 स एव भक्तियोगाख्य 19/174 संसारतापानखिलानवाप्नोत्यत्र 20/114 संसारेऽस्मिन् क्षणाद्धोऽपि 22/82 सकृदेव प्रपन्नो यस्तवास्मीति 22/34 सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं 19/199 सङ्गं न कुर्याच्छोच्येषु 22/86 सङ्गीतप्रसराभिज्ञा रम्यवाक् 23/83 सञ्चार्य रूपे व्यतनोत् पुनः 19/1 सजातीयाशये स्निग्धे 22/127 सत्सङ्गमाख्येन सुखावहेन 24/120 सत्सङ्गमो यदि तदैव 22/46, 81 सत्सङ्गान्मुक्त-दुःसङ्गो 24/93 सतां प्रसङ्गान्मम 22/83, 23/16 सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो 24/98, 193 सत्यं शौचं दया मौनं 22/85 सदा स्वरूपसंप्राप्तः सर्वज्ञो 23/74 सद्धर्मस्यावबोधाय 20/106, 24/164 सद्यः क्षिणोत्यन्वहमैधती 24/211 सनातनं सुसंस्कृत्य प्रभुः 25/1 सन्तुष्टः सततं योगी 23/102 स वै भगवतः श्रीमत्पाद 25/75 स वै मनः कृष्णपदारविन्दयो 22/133 समः शत्रौ च मित्रे च 23/106 समः सर्वेषु भूतेषु 24/127, 25/148 समत्वेनैव वीक्षेत 18/116, 25/78 समुद्रा इव पश्चात् 23/72 सम्भूतं षोड़शकलमादौ 20/266 सम्यक्मसृणितस्वान्तो 23/7 स यत्प्रमाणं कुरुते 17/178 527
[ सरसि-ह्लादिन्या श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सरसि सारसहंसविहङ्गाः 24/172 | सिद्धान्ते पुनरेक एव 20/145 | स्वाविद्या-संवृतो जीवः 18/114 सरहस्यं तदङ्गञ्च गृहाण 25/103 | सुखानि गोषदायन्ते 24/37 | ह सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे 22/57 | सुखी भक्तसुहृत् प्रेमवश्यः 23/70 | सर्वगोपीषु सैवैका 18/8 | सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा 19/150, 25/81 | हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यो 18/34 सर्वथैव दुरूहॊऽयमभक्तैः 23/95 | सुविलासा महाभाव 23/85 | हन्ति श्रेयांसि सर्वाणि 15/270 स सर्वदृगुपद्रष्टा तं 20/313 | सूक्ष्माणामप्यहं जीवः 19/142 | हयग्रीवो वराहश्च ब्रह्मा 20/242 सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं 22/91 | सृजामि तन्नियुक्तोऽहं 20/318, 21/37 | हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा 22/73 सर्ववेदान्तसारं हि 25/139 | सेवा साधकरूपेण 22/154 | हरिः पूर्णतमः पूर्णतरः 20/397 सर्व-वेदेतिहासानां सारं 25/138 | सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ 17/136 | हरिणा चाश्वदेयेति द्विधा 24/166 सर्वभूतेषु भूपाल तारतम्येन 20/115 | सौन्दर्य ललनालिधैर्यदलनं 17/210 | हरिभक्तौ प्रवृत्ता ये 22/143, 24/267 सर्वभूतेषु यः पश्येत् 22/69, 25/127 | स्थानाभिलाषी तपसि 22/42, 24/213 | हरिमुपासत ते यतचित्ता 24/172 सर्वलक्ष्मीमयी सर्वकान्तिः 23/64 | स्थिरो दान्तः क्षमाशीलो 23/69 | हरिर्हि निर्गुणः साक्षात् 20/313 सर्वसङ्कल्पसंन्यासी 24/154 | स्मरन्तः स्मारयन्तश्च 25/134 | हरि हरये नमः कृष्ण 25/63 सर्वात्मना यः शरणं 22/137 | स्मर्त्तव्य सततं विष्णुर्विस्मर्त्तव्यो 22/110 | हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् 24/112 सर्वाद्भुतचमत्कार-लीला 23/78 | स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञामृत 16/145 | हरौ रतिं वहन्नेषो नरेन्द्राणां 23/26 सर्वान् ददाति सुहृदः 22/93 | स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य 22/140 | हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः 23/103 सर्वारम्भपरित्यागी यो 23/104 | स्वप्रेमसम्पत्सुधयाद्भुतेहं 19/54 | हसत्यथो रोदिति रौति 23/37, 25/135 सर्वे विधिनिषेधाः 22/110 | स्ववशाखिलसिद्धिः स्यात् 23/75 | हास्योऽद्भुतस्तथा वीरः 19/186 सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं 19/170 | स्वयं विधत्ते भजताम् 22/40, 24/98, | हित्वा गोपीः कामयाना 19/206 स सर्वदृगुपद्रष्टा तं 20/313 | 24/193 | हीनार्थाधिकसाधके त्वयि 23/27 सहस्रपत्रं कमलं गोकुल 20/258 | स्वरितजितः कर्त्तृभिप्राये 24/26 | हृदि यस्य प्रेरणया 19/134 साधकानामयं प्रेम्णः 23/15 | स्वरूपाणामेकशेष 24/145, 293 | हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं 19/170 साधनौघैरनासङ्गैरलभ्या 24/166 | स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि 19/215 | हृषीकेशे हृषीकाणि यस्य 24/178 सार्वभौमगृहे भुञ्जन् 15/1 | स्वसुखनिभृतचेताः 17/138 | ह्रियमाणः कालनद्या 22/44 सालोक्यसार्टिसारूप्य 19/173 | स्वां काष्ठामधुनोपेते 24/315 | ह्लादिन्या संविदाश्लिष्टः 18/114 528 |
प्रयोजनीय अंशकी पद्य-सूची [वर्णक्रमानुसार प्रथम और द्वितीय चरण]
अ 'अद्वैत-ब्रह्मवाद' सेइ करिल 18/187 अन्य-वाञ्छा, अन्य-पूजा 19/168 अधम-काकेरे कैला गरुड़ 17/79 अन्यावतार शास्त्रद्वारा 20/350
अकरणे दोष, कैले भक्तिर 24/337 अधम यवनकुले केने 16/181 अपराध नाहि तब, लओ 15/285 अकाम, मोक्षकाम, सर्वकाम 24/84 अधिरूढ़-महाभाव-दुइ 23/54 अपराध-हस्तीर यैछे ना हय 19/157
अकिञ्चन हञा लय 22/90 अनन्त अवतार कृष्णेर 20/248 'अवज्ञा'ते नाम लय, शुनि' 17/127 अचिरात् कृष्ण तोमाय 16/239 अनन्त ऐश्वर्य कृष्णेर 15/175 अवतार नाहि कहे 20/352
अचिरात् पाइबारे चैतन्य 19/5 अनन्त कृष्णेर गुण, चौषष्टि 23/65 अवतार हय कृष्णेर 20/245 अजागलस्तन-न्याय अन्य 24/88 अनन्त गुण श्रीराधिकारे 23/81 अवैष्णव-सङ्ग-त्याग 22/115
अज्ञाने वा हय यदि 22/139 अनन्त-वैकुण्ठ-परव्योम 21/7 अभिधेय-नाम-'भक्ति' 20/125 अतएव आकर्षय आत्मारामे 17/139 अनन्तशक्ति-मध्ये कृष्णेर 20/252 'अभिधेय बलि' तारे 20/139
अतएव आपने सूत्रार्थ 25/90 अनन्त स्वरूप कृष्णेर 20/402 अमृत छाड़ि' विष मागे 22/38 अतएव कृष्णेर 'नाम', 17/134 अनर्गल प्रेमभक्ति करिह 15/42 अम्बरीषादि भक्तेर 'बहु' 22/131
अतएव ब्रह्मसूत्रेर भाष्य 25/98 अनर्थनिवृत्ति हैले भक्ति 23/11 अरिष्टे राधाकुण्ड-वार्त्ता 18/4 अतएव 'भक्ति'-कृष्णप्राप्त्ये 20/139 अनिकेत दुँहे, वने यत 19/127 अर्थाभिज्ञता, स्वरूपशक्त्ये 20/359
अतएव भागवत-सूत्रेर 25/136 अनिवेदित-त्याग, वैष्णव 24/333 अलक्षिते रहिं तोमार 15/44 अतएव भागवत करह 25/146 अनिरुद्धेर विलास-हरि 20/206 अलातचक्रप्राय सेइ लीला 20/391
अतएव मधुर-रसेर हय 19/231 अनिरुद्धेर मूर्त्ति-हृषीकेश 20/197 अलात-चक्रेर प्राय लगुड़ 15/25 अतएव माया तारे देय 20/117 अनुपम मल्लिक, ताँर नाम 19/36 अलौकिक 'प्रकृति' तोमार 18/120
अतएव याँर मुखे एक 15/111 'अनुभाव'-स्मित, नृत्य 23/47 अलौकिक लीला करे 16/201 अतएव 'शान्त' कृष्णभक्त 19/213 अनुषङ्ग-फले करे संसारेर 15/109 अलौकिक-लीला प्रभुर 18/225
अतएव शुद्धभक्तिर कहिये 19/166 'अन्तःपुर'-गोलोक 21/43 अलौकिक शक्ति-गुणे 24/39 अतएव सख्य-रसेर 19/223, 19/224 अन्तरे निष्ठा कर, बाह्ये 16/239 अलौकिक शक्ति तोमार 8/124
अतएव सब शास्त्र करये 25/47 अन्तरे सुख माने तैहो 15/65 अल्प-स्वल्प मूल्य पाइले 17/145 अतएव हरि भजे बुद्धिमान् 24/88 अन्न खाबे, पीठे बसिते 15/235 अष्टप्रहर कृष्णभजन, चारि 19/130
अति क्षुद्र जीव मुञि 20/349 अन्न, पीठ,—समान 15/235 असत्सङ्गत्याग, —एइ वैष्णव 22/84 अति क्षुद्र, ताते तोमार 21/84 अन्यकामी यदि करे कृष्णेर 22/37 'असत्ये सत्य भ्रम' 18/98
अद्यापिह ताँहार सेवा 17/168 अन्य त्यजि' भजे, ताते 22/94 असमर्थ नहे, कृष्ण 15/168 अद्वयज्ञान-तत्त्व, व्रजे 20/152 अन्यदेव, अन्यशास्त्र निन्दा ना 22/116 अस्त्रधृति-भेद-नाम 20/221
`` अद्वितीय-ज्ञान, याँहा बिना 24/69 अन्य-देशे प्रेम उछले 17/228 अस्त्रभेदे नाम-भेद 20/191
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[ अस्वा-एइ श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अस्वास्थ्येर छद्म करि' 19/15 | आपनारे 'पालक' ज्ञान, कृष्णे 19/227 | इष्टे 'आविष्टा'—तटस्थ 22/147 अहङ्कारेर अधिष्ठाता 20/256 | आपने ईश्वर तबे अंशो 20/305 | इँहा कर गोपीनाथ 16/132 “अहमेव”—श्लोके 'अहम्' 25/112 | आपने करिल प्रभुर पाद 19/85 | इहाते दृष्टान्त—यैछे 20/127 अहिंस-यम-नियमादि 22/141 | आपने भट्ट करेन प्रभुर 19/90 | इहा नाहि जानि—केमने 20/102 आ | आवेशे तार गाये प्रभुर 17/28 | इँहा माली सेचे नित्य 19/155 आकार-वर्ण-अस्त्रभेदे 20/172 | आमाते ये 'प्रीति', सेइ 25/122 | इहार घरेर आय-व्यय 15/96 आकाशादि गुण येन 19/232 | आमा वइ जगते आर 21/65 | इहार प्रसादे पाइबा 25/263 आकाशेर 'शब्द'-गुण येन 19/216 | आमार उद्धार-हेतु तोमार 20/64 | इहार श्रवणे भक्त जानेन 24/348 आकृति, प्रकृति, स्वरूप 20/355 | आमार कृपाय एइ सब 25/106 | इहा हैते पाबे सूत्र 25/146 'आकृत्ये' तोमारे देखि' 18/118 | आमार प्राण रक्षा कर 20/32 | इँहो ना स्पर्शिह, इँहो 19/69 आ-चण्डाल आदि कृष्णभक्ति 15/41 | आमार शपथ, यदि आर 16/141 | ई आचार्य 'कल्पना' करे 25/26 | आमा सबार कृष्णभक्ति 15/116 | ईश्वरज्ञान, सम्भ्रम-गौरव 19/219 आचार्य-कल्पित अर्थ 25/27 | आमा-हेन येबा केह 24/318 | ईश्वर-स्वभाव' तोमार 18/119 आचार्य हइल सेइ, तारिल 18/122 | आमि त' बाउल, आन 21/146 | ईश्वरेर शक्त्ये सृष्टि 20/261 आजि-कालि करि' उठाय 16/10 | 'आमि—बड़ ज्ञानी'—एइ 18/203 | उ आज्ञा देह', याइ' करि 18/99 | आमि—विज्ञ, एइ मूर्खे 22/39 | उच्छृङ्खल-लोक-सङ्गे 17/121 आत्मार 'आत्मा' हन 20/161 | आमि बोझा बहिमु, तोमा 25/163 | 'उत्तम-अधिकारी' सेइ 22/65 आत्मारामेर मन हरे तुलसीर 17/141 | आमि—'सम्बन्ध'-तत्त्व 25/101 | 'उत्तम', 'मध्यम', 'कनिष्ठ' 22/64 'आत्मा'-शब्दे कहे कृष्ण 24/73 | आर कृष्णनाम लैते कृष्ण 25/193 | 'उत्तम हञा हीन करि' 16/264 'आत्मा'-शब्दे कहे 24/279 | आर तिनयुगे ध्यानादिते 20/341 | उत्तर ना आइसे मुखे 18/188 'आत्मा'-शब्दे कहे 24/302 | आर 'नाम' लइते कृष्ण 25/192 | 'उत्तरे' खुदिले आछे 20/134 'आत्मा'-शब्दे ब्रह्म 24/11 | आर यत मत, सेइ 25/44 | 'उद्घूर्णा', 'चित्रजल्प' 23/55 'आत्मा' शब्दे 'मन' 24/159 | आर सब स्वरूप—'पूर्णतर' 20/400 | उद्घूर्णा, विरह-चेष्टा 23/57 'आत्मा'-शब्दे 'बुद्धि' 24/180 | आर्त्त, अर्थार्थी,—दुइ सकाम 24/90 | उदार महती याँर सर्वोत्तमा 24/190 आदि-चतुर्व्यूह-केह 20/189 | आर्य, सरल तुमि—वृद्ध 17/165 | उपजिय़ा बाड़े लता ब्रह्माण्ड 19/153 'आद्य एव परो रसः'—कहे 19/104 | आसक्ति हैते चित्ते जन्मे 23/12 | उपदेश लञा करे कृष्ण 25/21 आद्योपान्त चैतन्यलीला 18/226 | इ | उपाड़े वा छिण्डे, तार 19/156 आध्यात्मिकादि तापत्रय तारे 22/13 | इच्छा-ज्ञान-क्रिया बिना 20/254 | उपाध्याय, श्रेष्ठ मान' 19/101 आन कथा ना सुने काण 21/144 | 'इच्छाशक्ति', 'क्रियाशक्ति' 20/252 | 'उरुक्रम'-शब्दे कहे, बड़ 24/19 आनुकूल्ये सर्वेन्द्रिये कृष्ण 19/168 | इच्छाशक्ति-प्रधान कृष्ण 20/253 | ए आनेर वैभव-सत्ता 21/120 | 'इत्थम्भूत'-शब्देर अर्थ 24/36 | ए अन्य गोविन्द—नहे 20/196 आपन-'प्रारब्धे' वसि वाराणसी 17/95 | इन्द्रगण आइला लक्ष 21/68 | एइ अमृत अनुक्षण 25/269 आपनार हिताहित किछुइ 20/100 | इष्टे 'गाढ़-तृष्णा'—रागेर 22/147 | 530 |
पद्य सूची एइ-काढ़ि ] एइ आज्ञाबले भक्तरे 22/60 | एइ 'शुद्धभक्ति'—इहा हैते 19/169 | एत सब छाड़ि' आर 22/90 एइ 'ऋण' आमि नारिब 18/153 | एइसब कृष्णभक्ति-रसे 19/180 | ए तिने सब छाड़ाय 24/99 एइ कृष्ण—व्रजे 'पूर्णतम' 20/400 | एइ सब साधनेर अति 22/18 | एबे यदि महाप्रभु शान्तिपुर 16/231 एइ घाटे अक्रूर वैकुण्ठ 18/136 | एइ सबे बिद्धा-त्याग 24/337 | ऐ एइ चारि बाटोयार धुतुरा 18/165 | 'एइ स्थाने आछे धन' 20/132 | ऐश्वर्य कहिते स्फुरिल 21/31 एइ चारि सुकृति हय 24/91 | 'एक' अङ्ग साधे, केह 22/130 | ऐश्वर्यज्ञान-प्राधान्ये 19/194 एइ चारिर सेवा हय 22/122 | 'एक' अङ्गे सिद्धि पाइल 22/131 | ऐश्वर्यज्ञाने दुँहार मने भय 19/196 एइ चारि हैते चब्बिश 20/191 | एकइ डुम्बुर-वृक्षे लागे 15/172 | ऐश्वर्य देखिले निजसम्बन्ध 19/202 एइत परम-फल 'परम 19/164 | एक एक गुण शुनि' 23/65 | ऐ एइ त' साधनभक्ति—दुइ 22/105 | एक एक गोप करे ये 21/20 | ऐछे पवित्र प्रेम-सेवा 15/84 एइ तिन धामेर हय 21/54 | एक एक वृक्षेरे तले 19/127 | ऐछे वेद-पुराण जीवे 20/129 एइ तिन लोके कृष्णेर 21/91 | एक कृष्णदेह हैते 21/23 | ऐछे मोहन-विद्या—ये 17/118 एइ तोमार वर हैते 23/118 | एक कृष्णनामे करे सर्वपाप 15/107 | ऐछे शास्त्र कहे,—कर्म 20/136 एइ दुइ 'अधम' नहे 19/71 | एक 'कृष्णलोक' हय 20/214 | क एइ दुइ गुण व्यापे सब 19/216 | एकदिन द्वारकाते कृष्ण 21/59 | कदम्बेर एक वृक्षे फुटे 15/129 एइ दुइ नाम धरे व्रजेन्द्र 20/240 | एकदिन पथे व्याघ्र करियाछे 17/28 | कदर्धिया तुमि यत मारिला 24/245 एइ दुइ लक्षणे 'वस्तु' 20/354 | एक-दुइ-तिन-चारि-क्रमे 19/232 | कभु कुञ्जे रहे, कभु 18/44 एइ दोषे माया तार 22/24 | एक 'नामाभासे' तोमार 25/192 | कभु भक्तिरसशास्त्र करये 19/131 एइ नव प्रीत्यङ्कुर याँर 23/20 | एक-'नित्यमुक्त', एक- 22/10 | कभु शस्य खाञा पुनः 15/78 एइ पञ्च-मध्ये एक 24/188 | 'एकपाद विभूति', इहार 21/87 | कभु शून्य फल राखेन 15/75 एइ बड़ 'पाप',—सत्य 25/35 | एक बन्दी छाड़े यदि 20/6 | कभु स्वर्गे उठाय, कभु 20/118 एइ वाक्ये बिकाइनु ताँर 15/100 | एक-वपु बहु रूप यैछे 20/167 | करनख-चान्देर ठाट 21/128 एइ वेश दूर कर, याह 20/69 | 'एक' वाराणसी छिल 25/165 | कराँया-मात्र हाते, काँथा 19/129 एइ भूत्रा केने मोरे 20/23 | एक 'वैधी भक्ति' 22/105 | 'कर्म', 'ज्ञान', 'योग' आगे 18/196 एइमत कर्णपूर लिखे स्थाने 19/122 | एक भुक्ति कहे, भोग 24/28 | कर्म, तप, योग, ज्ञान 21/119 एइमत दशदिन प्रयागे रहिया 19/135 | 'एक शिला' आलिङ्गिया 18/16 | कलिक़ाले नामाभासे सुखे 25/30 एइमत ब्रह्माण्ड भरि' अनन्त 19/138 | 'एकषष्टि' अर्थ एबे 24/307 | कलिक़ाले संन्यासे 'संसार' 25/28 एइमत भक्तगण रहिला चारि 16/47 | एक संन्यासी आइला 17/106 | कलिते अवतार तैछे 20/350 एइमत मधुरे सब भाव 19/233 | एकादश स्कन्धे तार 22/68 | कलियुगे कृष्णनामे सेइ 20/341 एइत' महिमा—तोमार 18/126 | एका याइब, किवा सङ्गे 16/273 | 'कल्मष' घुचिले जीव 15/276 एइ ये तोमार अनन्त 21/26 | एत बलि' झाँप दिला 18/137 | कह,—ताँहा कैछे रहे 19/125 एइ रस आस्वाद नाहि 23/94 | एत बलि' तिन तत्त्व 25/106 | काढ़िते ना पारि माथा 15/149 एइरूप रतन, भक्तगणेर 21/103 | एत बलि' फल फेले 15/84 | | 531
[ काण-कृष्ण श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला काणेर भितर वासा करे 21/144 | कुविषय-कूपे पड़ि' 20/99 | कृष्ण ताँरे शुद्ध करे 22/139 काँथा-करङ्गिया मोर 25/176 | 'कुर्व्वन्ति'-पद-एइ 24/25 | कृष्ण-तुल्य भागवत 24/312 कान्तभावे निजाङ्ग दिया 19/231 | कुलीनग्रामीरे कहे सम्मान 15/98 | कृष्णतुल्य भागवत 25/259 कान्तागणेर रति पाय 24/34 | कृपा करि' तँहो मोर 17/167 | 'कृष्ण, तोमार हड' यदि 22/33 कान्धे चड़े, कान्धे चड़ाय 19/222 | कृपा करि' यदि मोरे 20/101 | कृष्णदास कहे,-"मुञ्जि 18/85 काम-क्रोधेर दास हञा 22/14 | कृपा करि' सब तत्त्व 20/103 | "कृष्ण देखि आइला?" 18/103 कामगायत्री-मन्त्ररूप, हय 21/125 | कृपार समुद्र कृष्ण गम्भीर 20/63 | कृष्ण-'ध्यान' करे लोक 20/333 काम छाड़ि 'दास' हैते 22/41 | कृपालु, अकृतद्रोह, सत्यसार 22/75 | कृष्ण नव-जलधर 21/109 काम-त्यजि' कृष्ण भजे 22/136 | कृष्ण अंशी, तँहो अंश 20/315 | 'कृष्णनाम', 'कृष्णगुण' 17/135 कामधेनु-कोटि-पतिर 15/179 | कृष्ण आमि नाहि 20/64 | 'कृष्णनाम', 'कृष्ण स्वरूप' 17/130 काम लागि' कृष्णे भजे 22/41 | कृष्णकथा, कृष्णनाम 19/129 | कृष्णनाम दिया कैल 17/46 कामादि 'दुःसङ्ग' छाड़ि 24/92 | 'कृष्ण' कह, 'कृष्ण' कह 18/206 | कृष्णनाम निरन्तर याँहार 16/72 कायव्यूह हैले नारदेर 20/169 | 'कृष्ण' कह बलि' प्रभु 17/31 | 'कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन'-कलि 20/337 कारो मन कोन गुणे 24/43 | 'कृष्ण' कहि' व्याघ्र-मृग 17/40 | कृष्णनाम, सेइ पूज्य 15/106 कार्यद्वारा ज्ञान,-एइ 20/355 | कृष्ण कहे,-"आमा भजे 22/38 | 'कृष्ण-नित्यदास'-जीव 22/24 कालवस्त्र परे सेइ 18/185 | कृष्ण कहे,-"एइ ब्रह्माण्ड 21/84 | कृष्णनिष्ठा, तृष्णा-त्याग 19/214 कालीयदहे मत्स्य मारे 18/104 | कृष्ण-कृपा तोमाते 20/104 | 'कृष्णपदार्त्चन' हय द्वापरेरे 20/334 कालीय-शिरे नृत्य करे 18/94 | कृष्णकृपा बिना कोन 17/75 | 'कृष्ण-पारिषद' नाम 22/11 कालीयेर शरीरे कृष्ण 18/105 | कृष्णकृपाय अज्ञ पाय 19/235 | 'कृष्ण'-प्राप्य-सम्बन्ध 20/124 काशीते आमि आइलाङ 25/161 | कृष्णकृपा याँरे, ताँरे के 16/241 | कृष्णप्रीतये भोगत्याग 22/113 काशीते ग्राहक नाहि 25/162 | कृष्णकृपाय साधुसङ्गे रति 24/182 | कृष्णप्रेम जन्माय एइ 22/126 काँहा मुक्ति पाब, काँहा 25/42 | कृष्ण-कृपालु, आमाय 17/69 | कृष्णप्रेम जन्मे, तँहो 22/80 'काँहारे रावण' प्रभु कहे 15/34 | 'कृष्ण' 'कृष्ण' कह, करि' 17/40 | 'कृष्णप्रेम', 'भक्तिरस' 24/348 काँहा हैते पाइले तुमि 17/165 | 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहि' व्याघ्र 17/29 | कृष्णप्रेमा ताँहा, याँहा 17/173 कि काय संन्यासे मोर 15/51 | कृष्ण, कृष्णभक्ति, प्रेम 20/143 | कृष्ण-बड़ दयामय 20/62 किन्तु काहाँ 'कृष्ण' 18/108 | कृष्ण, कृष्णभक्ति बिना 24/94 | 'कृष्ण'-वर्णे कराय लोके 20/334 किन्तु यदि लतार सङ्गे 19/158 | कृष्ण केने दरशन 18/101 | कृष्ण-बहिर्मुख-दोष 24/131 किवा युक्ति कैल दुँहे 15/38 | कृष्णगुणाकृष्ट हञा 24/108 | कृष्ण बिना अन्य-उपासना 15/142 किवा रघुनन्दन-पिता 15/114 | कृष्णगुणाख्याने करे 23/31 | कृष्ण बिना तृष्णा-त्याग 19/213 किम्वा निज-प्राण यदि 15/262 | 'कृष्णचरण'-कल्पवृक्षे 19/154 | कृष्णभक्तगण करे रस 23/94 कुण्डेर 'महिमा'-येन 18/11 | कृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व 25/258 | कृष्णभक्त-दुःखहीन 24/176 कुण्डेर 'माधुरी'-येन 18/11 | कृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व 19/115 | कृष्णभक्त-निष्काम, अतएव 19/149 कुण्डेर मृत्तिका लञा 18/14 | कृष्ण ताँरे करे तत्काले 22/99 | 'कृष्ण-भक्तवश' गुण 19/228 532 ।