भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1975, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1975

प्रयोजनीय अंशकी पद्य-सूची [वर्णक्रमानुसार प्रथम और द्वितीय चरण]

अ 'अद्वैत-ब्रह्मवाद' सेइ करिल 18/187 अन्य-वाञ्छा, अन्य-पूजा 19/168 अधम-काकेरे कैला गरुड़ 17/79 अन्यावतार शास्त्रद्वारा 20/350 अकरणे दोष, कैले भक्तिर 24/337 अधम यवनकुले केने 16/181 अपराध नाहि तब, लओ 15/285 अकाम, मोक्षकाम, सर्वकाम 24/84 अधिरूढ़-महाभाव-दुइ 23/54 अपराध-हस्तीर यैछे ना हय 19/157 अकिञ्चन हञा लय 22/90 अनन्त अवतार कृष्णेर 20/248 'अवज्ञा'ते नाम लय, शुनि' 17/127 अचिरात् कृष्ण तोमाय 16/239 अनन्त ऐश्वर्य कृष्णेर 15/175 अवतार नाहि कहे 20/352 अचिरात् पाइबारे चैतन्य 19/5 अनन्त कृष्णेर गुण, चौषष्टि 23/65 अवतार हय कृष्णेर 20/245 अजागलस्तन-न्याय अन्य 24/88 अनन्त गुण श्रीराधिकारे 23/81 अवैष्णव-सङ्ग-त्याग 22/115 अज्ञाने वा हय यदि 22/139 अनन्त-वैकुण्ठ-परव्योम 21/7 अभिधेय-नाम-'भक्ति' 20/125 अतएव आकर्षय आत्मारामे 17/139 अनन्तशक्ति-मध्ये कृष्णेर 20/252 'अभिधेय बलि' तारे 20/139 अतएव आपने सूत्रार्थ 25/90 अनन्त स्वरूप कृष्णेर 20/402 अमृत छाड़ि' विष मागे 22/38 अतएव कृष्णेर 'नाम', 17/134 अनर्गल प्रेमभक्ति करिह 15/42 अम्बरीषादि भक्तेर 'बहु' 22/131 अतएव ब्रह्मसूत्रेर भाष्य 25/98 अनर्थनिवृत्ति हैले भक्ति 23/11 अरिष्टे राधाकुण्ड-वार्त्ता 18/4 अतएव 'भक्ति'-कृष्णप्राप्त्ये 20/139 अनिकेत दुँहे, वने यत 19/127 अर्थाभिज्ञता, स्वरूपशक्त्ये 20/359 अतएव भागवत-सूत्रेर 25/136 अनिवेदित-त्याग, वैष्णव 24/333 अलक्षिते रहिं तोमार 15/44 अतएव भागवत करह 25/146 अनिरुद्धेर विलास-हरि 20/206 अलातचक्रप्राय सेइ लीला 20/391 अतएव मधुर-रसेर हय 19/231 अनिरुद्धेर मूर्त्ति-हृषीकेश 20/197 अलात-चक्रेर प्राय लगुड़ 15/25 अतएव माया तारे देय 20/117 अनुपम मल्लिक, ताँर नाम 19/36 अलौकिक 'प्रकृति' तोमार 18/120 अतएव याँर मुखे एक 15/111 'अनुभाव'-स्मित, नृत्य 23/47 अलौकिक लीला करे 16/201 अतएव 'शान्त' कृष्णभक्त 19/213 अनुषङ्ग-फले करे संसारेर 15/109 अलौकिक-लीला प्रभुर 18/225 अतएव शुद्धभक्तिर कहिये 19/166 'अन्तःपुर'-गोलोक 21/43 अलौकिक शक्ति-गुणे 24/39 अतएव सख्य-रसेर 19/223, 19/224 अन्तरे निष्ठा कर, बाह्ये 16/239 अलौकिक शक्ति तोमार 8/124 अतएव सब शास्त्र करये 25/47 अन्तरे सुख माने तैहो 15/65 अल्प-स्वल्प मूल्य पाइले 17/145 अतएव हरि भजे बुद्धिमान् 24/88 अन्न खाबे, पीठे बसिते 15/235 अष्टप्रहर कृष्णभजन, चारि 19/130 अति क्षुद्र जीव मुञि 20/349 अन्न, पीठ,—समान 15/235 असत्सङ्गत्याग, —एइ वैष्णव 22/84 अति क्षुद्र, ताते तोमार 21/84 अन्यकामी यदि करे कृष्णेर 22/37 'असत्ये सत्य भ्रम' 18/98 अद्यापिह ताँहार सेवा 17/168 अन्य त्यजि' भजे, ताते 22/94 असमर्थ नहे, कृष्ण 15/168 अद्वयज्ञान-तत्त्व, व्रजे 20/152 अन्यदेव, अन्यशास्त्र निन्दा ना 22/116 अस्त्रधृति-भेद-नाम 20/221 `` अद्वितीय-ज्ञान, याँहा बिना 24/69 अन्य-देशे प्रेम उछले 17/228 अस्त्रभेदे नाम-भेद 20/191

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