श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1946, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 25/142-144 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
वास्तव-वस्तुके तत्त्व-ज्ञानको प्रदान करनेवाला है। इसको श्रवण करनेके इच्छुक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार ईश्वरको अपने हृदयमें अवरुद्ध करनेमें समर्थ होते हैं। इसलिये श्रीमद्भागवतके अतिरिक्त अन्य किसी शास्त्रकी क्या आवश्यकता है? ॥ 142 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/91 संख्या देखें ॥ 142 ॥ 'कृष्णभक्ति-रसस्वरूप' श्रीभागवत। ताते वेदशास्त्र हैते परम महत्त्व ॥ 143 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 143 ॥ अनुभाष्य-श्रीभागवत-श्रीकृष्णभक्तिरस-स्वरूप है। भगवद्-वाणीमय वेदशास्त्र-वृक्षके समान हैं, श्रीमद्भागवत- उसी वृक्षका पूर्णरूपसे पका हुआ फल है, इसलिये तारतम्यके विचारसे वेदकी अपेक्षा परम-उन्नत है ॥ 143 ॥ “वेदार्थपरिवृंहित”-वेदका परिपक्व फल :- श्रीमद्भागवत (1/1/3)में- निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुक्तम्। पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥ 144 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 144 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यह भागवत-शास्त्र वेदरूपी कल्पवृक्षका पूर्णरूपसे पका हुआ फल और श्रीशुकदेवके मुखके अमृतसे संयुक्त है, हे रसिकजनों, रसतत्त्वमें परमालय अर्थात् निमग्न-भाव जब तक न हो, तब तक इस जगत्में (अप्राकृत) भावुकरूपमें भागवतका आस्वादन करो, निमग्न होनेपर भी इस परम रसका पुनः पुनः नित्य ही पान करते रहना॥ 144 ॥ अनुभाष्य-श्रीमद्भागवतके प्रथम स्कन्धके प्रथम अध्यायके तृतीय श्लोकमें आशीर्वाद रूप मङ्गलाचरण- अहो (हे) रसिकाः (भगवत्सेवारसविदः,) भावुकाः (रसविशेषभावनचतुराः,) शुकमुखात् (व्यासशिष्यप्रशिष्यादि- पारम्पर्यक्रमेण) भुवि (पृथिव्यां) गलितम् (अखण्डमेव अवतीर्णं, स्वेच्छया पतितं, न तु बलात् पतितं परिपक्वत्वात्) अमृत- द्रवसंयुक्तम् (अमृतं परमानन्दः स एव द्रवः रसः तेन संयुक्तं विशिष्टं) निगमकल्पतरोः (वेदरूपकल्पवृक्षस्य) रसं (त्वगष्ट्यादि- कठिन-हेयांश-रहितं केवलं रसरूपं) फलं भागवतं आ-लयं (मोक्षानन्दामभिव्याप्य) मुहुः पिबतः (परमादरेण सेवेध्वम्)। श्लोक-भावानुवाद-हे रसिकजनों (भगवत्-सेवारसको जाननेवालों), भावुकजनों (रसपानमें विशेष चतुर लोगों) व्यासशिष्यप्रशिष्यादि परम्पराके क्रमसे पृथ्वीपर पूर्ण पक जानेपर स्वतः ही अखण्डरूपमें अवतीर्ण परमानन्दरससे संयुक्त वेदरूपकल्पवृक्षका (छिलका, गुठली आदि कठिन हेयांशसे रहित केवल) रसरूप फल श्रीमद्भागवतका आ-लय (मोक्षानन्द तक) पुनः पुनः परम आदरसे सेवन करो ॥ 144 ॥ अमृतानुकणिका-वेद-उपनिषद् आदि जितनी भी श्रुतियाँ हैं, उन्हें निगम कहते हैं। श्रुतियाँ, स्मृतियाँ आदि ये सब निगम और आगम हैं। ये वृक्ष हैं, उपनिषद् आदि इनकी शाखाएँ हैं। गोपालतापनी आदि इनके पत्ते हैं। भागवतकी उपमा निगम-आगम आदि रूप वृक्षके फलसे दी गयी है और दशम स्कन्ध पका हुआ फल है, जिसमें गुठली नहीं है, रेशे भी नहीं हैं जो दाँतोंमें फँस जाते हैं और छिलका भी नहीं है। उसमें फेंकने योग्य कोई वस्तु नहीं है। गोलोक वृन्दावनमें श्रीकृष्णके चरणकमलरूपी वृक्षकी शाखाओंपर प्रेमकी लता फैली है और वहाँसे यह वृक्षकी शाखाओंपर फल पकता है और नीचे इस माया-जगत्में गिरता है। इतनी दूर गिरनेपर भी फलके फटने और रसके बिखरनेकी सम्भावना नहीं है, क्योंकि वह हमारी गुरु-परम्पराके माध्यमसे नीचे आ रहा है। जब गिरा तो सर्वप्रथम ब्रह्माजीने उसे अपने हाथोंमें ले लिया, उनके द्वारा छोड़नेपर वह फल क्रमशः नारदजी, व्यासजीके द्वारा गुरु-परम्पराके माध्यमसे हमारे गुरुजीके पास आया। यह फल कच्चा नहीं है, अपितु सूर्यकी किरणोंसे तपकर एकदम पीला हो गया है, परिपक्व हो गया है और सुगन्धसे भरपूर हो गया है। श्रीकृष्ण ही सूर्यके
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