भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1947

पचीसवाँ अध्याय 25/144-145 ] समान हैं और उनकी विरहके तापसे ही यह पका हुआ यह मधुर सुगन्धित केवल रस ही रस है। 'पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः'-साधारण लोगोंके लिये इसका अर्थ है कि 'हे रसिकों ! हे भावुक लोगों ! इस जगत्में आप आलय तक इसका पान करो। आलयका अर्थ देहावसान होता है अर्थात् इस जगत्में देहत्याग तक इसका निरन्तर पान करो।' परन्तु रसिक और भावुक लोगोंके लिये श्रीकृष्ण ही अखिल रसामृतसिन्धु हैं और व्रजमें गोपियाँ इस रसका सबसे अधिक पान करती हैं। उनके उच्छिष्टको यशोदा मैया, नन्दबाबा वात्सल्य रसमें पान करते हैं और उनके उच्छिष्टको श्रीदाम-सुबलादि सख्यरसमें पान करते हैं। उनसे जो बच जाता है, उसे रक्तक-पत्रक आदि सब लोग दास्यरसमें पान करते हैं। व्रजवासियोंके आनुगत्यमें भजन करते-करते अभी जो रागानुगा भक्त हैं, उनको यहाँ भावुक कहा गया है, क्योंकि वे भावावस्था तकके हो सकते हैं। और रसिक वे हैं जिनकी वस्तु सिद्धि हो गयी है और नारदादि वे लोग यदा-कदा ही इस संसारमें भ्रमण करते हैं। किन्तु यदि शुद्धभक्त लोग हरिकथाको कहते हैं, तो उसे श्रवण करनेके लिये हनुमानजी, शङ्करजी, ब्रह्माजी, नारदजी अथवा शुकदेव गोस्वामी आदिका वेश बदलकर आनेकी सम्भावना होती है। औरोंकी तो बात ही क्या है, जब शुद्धभक्तोंके द्वारा श्रीराधा-कृष्णकी कथाएँ होती है, तो स्वयं श्रीराधा और श्रीकृष्णचन्द्र भी आये बिना नहीं रह सकते। बिल्वमङ्गल आदि जिनमें अभी भाव उत्पन्न हुआ वे भावुक भक्त हो सकते हैं। विमुक्तप्रग्रह वृत्तिसे यदि विचार किया जाय, तो रसिक और भावुक एक भी कहे जा सकते हैं, जो भगवान्के लीलारूपी रसका पान करने वाले दुर्लभ महात्मा हैं। ये लोग कब तक पान करेंगे? हरिकथा सुनते-सुनते आँखोंसे अश्रुओंके बरसनेपर भी सुनेंगे, गला रुद्ध हो जाने तक भी सुनेंगे, शरीरमें पुलक-रोमाञ्च हो जाने तक भी सुनेंगे, किन्तु 'आलयम्' अर्थात् मूर्च्छावस्था आनेपर तो गिर जायेंगे, तब ये सुन नहीं पायेंगे। इसलिये अद्वैतवादी लोग यह अर्थ करते हैं कि जब तक शरीरमें चेतना रहे, तब तक इस दिव्य भगवद्रसका निरन्तर बार-बार पान करते रहो। अर्थात् जब तक ब्रह्ममें लय नहीं हो जाते, तब तक इस ग्रन्थका पाठ करो। उसके बाद तो जैसे जलकी बूँद सागरमें समाकर सागर बन जाती है, वैसे ही जीव भी ब्रह्ममें समाकर ब्रह्म हो जायेगा। परन्तु, यह सब सत्य नहीं है। एक व्यक्ति रसिक है और वह रसका पान करके रसका आस्वादन करता है। यदि रसिक न रहे, केवल रस ही रहे, तो रसका आस्वादन कौन करेगा ? इसलिये ब्रह्म और जीव एक हो जायेंगे, यह अर्थ ग्रहण नहीं किया जा सकता। रसकी स्थिति सम्पूर्ण है- श्रीकृष्ण परम रसिक हैं और श्रीमती राधिका परम रसिका हैं तथा दोनोंका परस्पर प्रेम और उनकी प्रेममयी लीला ही वह रस है। भावुक और रसिक भक्त लोग उस रसका छक-छककर आलय तक पान करते हैं। - “श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज" ॥ 144 ॥ भागवतमें जड़सुलभ तृप्ति नहीं :- श्रीमद्भागवत (1/1/19) में- वयन्तु न वितृप्याम उत्तमश्लोकविक्रमे। यच्छृ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - हम उत्तमश्लोक श्रीकृष्णके विक्रमके विषयमें जितना सुन रहे हैं, उतनी ही हमारी तृष्णा वर्द्धित हो रही है, तृष्णाकी शान्तिरूपी तृप्ति नहीं हो रही हैं; क्योंकि, रसज्ञ श्रोताओंमें श्रीकृष्णकथामें पद-पदपर स्वाद उदित होता है ॥ 145 ॥ अनुभाष्य-नैमिषारण्यमें शौनकादि ऋषि महाभागवत श्रील सूत गोस्वामीको आगे रखकर श्रीहरिकी लीलाओं और अवतारोंकी कथाओंका वर्णन करनेका अनुरोध करते हुए अपनी निरन्तर वर्द्धित होनेवाली श्रवणकी पिपासाका वर्णन कर रहे हैं, - । 501