श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1948, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 25/145-152 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला यत् (यद्विक्रमं) शृण्वतां (श्रवणकारिणां) रसज्ञानां (रसिकानां) पदे पदे (प्रतिक्षणं) स्वादु स्वादु (स्वादुतोऽपि स्वादु भवतीति शेषः, तस्मिन्) उत्तमःश्लोकविक्रमे (उत् उद्गच्छति तमः यस्मात् स उत्तमः, तथाभूतः श्लोकः यशः यस्मिन् तस्य कृष्णस्य विक्रमे गुणवीर्यकथादौ) वयं तु (अन्ये तु तृप्यन्तु नाम) न वितृप्यामः (विशेषेण न तृप्यामः—अलमिति न मन्यामहे इत्यर्थः) । श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ भागवतमें ही श्रुतिका तात्पर्य निहित :- अतएव भागवत करह विचार। इहा हैते पाबे सूत्र-श्रुतिर अर्थ-सार ॥ 146 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 146 ॥ अनुभाष्य—भागवतका विचार करनेसे ब्रह्मसूत्र और उपनिषदोंका वास्तविक सार-अर्थ जान पाओगे। भागवतका विचार नहीं करके जो वेदान्त पढ़ना अथवा उपनिषद्का अर्थ जानना चाहता है, वह अवश्य ही असार-अर्थकी उपलब्धि करेगा ॥ 146 ॥ निरन्तर कीर्तन करनेका आदेश, नामाभाससे मुक्ति :- निरन्तर कर कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन। हेलाय 'मुक्ति' पाबे, पाबे प्रेमधन ॥ 147 ॥ अनुवाद—इसलिये आप लोग निरन्तर कृष्णनाम- सङ्कीर्त्तन कीजिये। इससे आपको अनायास ही 'मुक्ति'की प्राप्ति होगी और प्रेमधन पानेके अधिकारी भी बनोगे ॥ 147 ॥ श्रीमद्भगवद्गीता (18/54)में— ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ 148 ॥ अनुवाद—गीतामें कहा गया है,—अभेद ब्रह्मवादरूपी ज्ञानचर्चाके द्वारा स्वयं प्रसन्नात्माका शोक और कामनारहित होनेपर तथा सभी जीवोंमें समभावयुक्त ब्रह्मता प्राप्त करनेके बाद उसे मेरी पराभक्ति प्राप्त होती है। तात्पर्य यह है कि पहले कर्ममिश्रा-भक्तिका उल्लेख हुआ था, उसकी अपेक्षा ज्ञानमिश्रा भक्ति श्रेष्ठ है ॥ 148 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/65 संख्या देखें ॥ 148 ॥ श्रीमद्भागवत (10/87/21) श्लोकमें श्रीधर-उद्धृत सर्वज्ञ भाष्यकारकी व्याख्या और नृसिंह तापनी (2/5/16)में— मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते ॥ 149 ॥ अनुवाद—मुक्तगण भी लीलासे आकर्षित होकर विग्रह स्थापित करके भगवान्का भजन करते हैं ॥ 149 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 24/107 संख्या देखें ॥ 149 ॥ श्रीमद्भागवत (2/1/9)में— परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्ये उत्तमःश्लोकलीलया। गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ 150 ॥ अनुवाद—हे राजर्षे ! निर्गुण ब्रह्ममें प्रतिष्ठित होनेपर भी श्रीकृष्णलीलाके प्रति आकर्षित होकर मैंने श्रीमद्भागवतका पाठ किया था ॥ 150 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 24/46 संख्या देखें ॥ 150 ॥ श्रीमद्भागवत (3/15/43)में— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः। अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ 151 ॥ अनुवाद—उन कमल-नेत्र-भगवान्के पदकमलकी पराग-मिश्रित तुलसीकी मधुरगन्धयुक्त वायुने सनकादि चार कुमारोंकी नासिकाके छिद्रके माध्यमसे अन्दर जाकर निर्विशेष-ब्रह्मपरायण उनके चित्त और देहमें क्षोभ उत्पन्न कर दिया था ॥ 151 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 17/142 संख्या देखें ॥ 151 ॥ श्रीमद्भागवत (1/7/10)में— आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥ 152 ॥ अनुवाद—आत्मामें ही जिनकी रति है, ऐसे 502 ।