भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1949

पचीसवाँ अध्याय 25/152-163 ] वासना-ग्रन्थियोंसे शून्य सभी मुनि भी बृहत्कर्मा श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करते हैं; क्योंकि जगत्के चित्तहारी श्रीहरिका ऐसा ही एक गुण है॥"152॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 6/186 संख्या देखें॥152॥ महाराष्ट्र अर्थोंकी व्याख्याकी क्षमताकी प्रशंसा :- हेनकाले सेइ महाराष्ट्र सभाते कहिल सेइ श्लोक-विवरण॥153॥ “एइ श्लोकेर अर्थ प्रभु 'एकषष्टि' प्रकार। करियाछेन, याहा शुनि' लोके चमत्कार॥"154॥ अनुवाद-उसी समय उन महाराष्ट्र सभामें 'आत्मारामः' श्लोकके विषयमें एक आश्चर्यजनक बातका उद्घाटन किया। उन्होंने कहा, - "महाप्रभुने इस श्लोकके 'इकसठ' प्रकारके अर्थ किये हैं।" यह सुनकर सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये॥153-154॥ सभीके आग्रह करनेपर महाप्रभुके द्वारा इकसठ प्रकारके अर्थोंकी व्याख्या :- तबे सब लोक शुनि' आग्रह करिल। 'एकषष्टि' अर्थ प्रभु विवरि' कहिल॥155॥ महाप्रभुके पाण्डित्यसे सभीको विस्मय और उनको परमेश्वर श्रीकृष्णरूपमें निर्धारण :- शुनिया लोकेर बड़ चमत्कार हैल। चैतन्यगोसाञि—"श्रीकृष्ण', निर्धारिल॥156॥ अनुवाद-सब लोग महाप्रभुसे उन इकसठ अर्थोंको सुनानेका आग्रह करने लगे। तब महाप्रभुने 'इकसठ' प्रकारके अर्थोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया। इसे सुनकर लोग बहुत आश्चर्यचकित हुए और उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि श्रीचैतन्य-गोसाईं स्वयं श्रीकृष्ण ही हैं॥155-156॥ महाप्रभुका घरमें लौटना :- एत कहि' उठिया चलिला गौरहरि। नमस्कार करे लोक हरिध्वनि करि'॥157॥ अनुवाद-इतना कहकर श्रीगौरहरि उठकर चल दिये। सभी लोगोंने हरिध्वनि करते हुए उन्हें प्रणाम किया॥157॥ काशीमें कीर्तनकी बाढ़ :- सब काशीवासी करे नामसङ्कीर्त्तन। प्रेमे हासे, काँदे, गाय, करये नर्त्तन॥158॥ महाप्रभुके द्वारा काशीका उद्धार :- संन्यासी पण्डित करे भागवत विचार। वाराणसीपुर प्रभु करिला निस्तार॥159॥ अनुवाद-तबसे समस्त काशीवासी प्रेमसे नाम- सङ्कीर्तन करने लगे। प्रेममें डूबकर कभी वे हँसते, कभी रोते, कभी गाते और कभी नृत्य करते। सभी मायावादी संन्यासी और पण्डितगण वेदान्तके स्थानपर भागवतपर विचार करने लगे। इस प्रकार महाप्रभुने वाराणसीका उद्धार कर दिया॥158-159॥ महाप्रभुके आगमनसे काशी श्रीकृष्ण-कोलाहलसे मुखरित :- निज-लोक लञा प्रभु आइला वासाघर। वाराणसी हैल द्वितीय नदीया-नगर॥160॥ अनुवाद-अपने भक्तोंको लेकर महाप्रभु अपने वासस्थानपर लौट आये। सर्वत्र श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तनके कारण वाराणसी दूसरी नदिया-नगरी बन गयी॥160॥ मायावादग्रस्त श्रीकृष्णनामप्रेमविमुख; भक्तोंके आग्रहसे थोड़ीसी श्रद्धाके बलसे महाप्रभुके द्वारा ब्रह्माके लिये भी दुर्लभ अक्षय नामप्रेम-भण्डारका काशीवासियोंके अधिकारका विचार किये बिना वितरण :- निजगण लञा प्रभु कहे हास्य करि'। “काशीते आमि आइलाङ बेचिते भावकालि॥161॥ काशीते ग्राहक नाहि, वस्तु ना बिकाय। पुनरपि देशे बहि' लओया नाहि याय॥162॥ आमि बोझा बहिमु, तोमा-सबार दुःख हैल। तोमा-सबार इच्छाय विनामूल्ये बिकाइल॥"163॥ । 503