भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1950, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1950

[ 25/161-172 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-महाप्रभु अपने भक्तोंसे परिहास करते हुए कहने लगे,–"मैं काशीमें अपने भावकालिको (भावुक स्वभावको) बेचनेके लिये आया था। काशीमें कोई ग्राहक नहीं होनेके कारण मेरी वस्तु बिक नहीं रही थी। उसे ढोकर अपने देशमें वापिस ले जाना भी सम्भव नहीं था। यह सोचकर कि मैं पुनः बोझा ढोकर ले जाऊँगा, आप सबको बहुत दुःख हुआ, इसलिये मैंने आप सबकी इच्छासे उस वस्तुको बिना मूल्यके ही बाँट दिया॥"161-163 ॥ काशीको प्रेमकी बाढ़में डुबो देनेवाले महाप्रभुकी स्तुति :- सबे कहे,–"लोक तारिते तोमार अवतार। 'पूर्व' 'दक्षिण' 'पश्चिम' करिला निस्तार ॥ 164 ॥ 'एक' वाराणसी छिल तोमाते विमुख। ताहा निस्तारिया कैला आमा-सबार सुख॥"165 ॥ अनुवाद-सभी भक्त कहने लगे,–"पतित जीवोंका उद्धार करनेके लिये ही आपका अवतार हुआ है। आपने 'पूर्व', 'दक्षिण' और 'पश्चिम' भारतके सभी पतितोंका उद्धार कर दिया है। एकमात्र वाराणसीके लोग ही आपसे विमुख थे, उनका उद्धार करके आपने हम सबको बहुत सुख प्रदान किया है॥" 164-165॥ प्रतिदिन असंख्य लोगोंका समागम :- वाराणसी-ग्रामे यदि कोलाहल हैल। शुनि' ग्रामी देशी लोक आसिते लागिल ॥ 166 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके द्वारा वाराणसीके संन्यासियोंके उद्धारकी बात चारों ओर फैल गयी। इस बातको सुनकर आस-पासके ग्रामवासी तथा नगरवासी, सभी लोग महाप्रभुके दर्शनोंके लिये आने लगे ॥ 166 ॥ लक्ष कोटि लोक आइसे, नाहिक गणन। सङ्कीर्णस्थाने प्रभुर ना पाय दरशन ॥ 167 ॥ अनुवाद-लाखों-करोड़ों लोग महाप्रभुके दर्शनके लिये आने लगे। जितने लोग आये, उनकी गणना नहीं की जा सकती। किन्तु महाप्रभुका वासस्थान छोटासा था, इसलिये सभीको उनके दर्शन प्राप्त नहीं होते थे॥ 167 ॥ विश्वेश्वर दर्शनके लिये जाते समय असंख्य तृष्णार्त्त लोगोंको महाप्रभुके दर्शनकी प्राप्ति :- प्रभु यबे स्नाने यान, विश्वेश्वर-दरशने। दुइदिके लोक करे प्रभु-विलोकने ॥ 168 ॥ सभीके द्वारा हरिबोलकी ध्वनि :- बाहु तुलि' प्रभु कहे-बल 'कृष्ण' 'हरि'। दण्डवत् करे लोके हरिध्वनि करि' ॥ 169 ॥ अनुवाद-महाप्रभु जब गङ्गामें स्नान करने जाते और विश्वेश्वरके दर्शनके लिये जाते, तब लोग उनके दोनों ओर कतार बनाकर खड़े होकर उनके दर्शन करते। तब महाप्रभु अपनी भुजाओंको उठाकर सभीको 'कृष्ण' 'हरि' बोलनेके लिये कहते और लोग हरिध्वनि करते हुए उन्हें दण्डवत् प्रणाम करते ॥ 168-169 ॥ काशीमें पाँच दिन रहकर महाप्रभुकी पुरी यात्रा :- एइमत दिन पञ्च लोक निस्तारिया। आर दिन चलिला प्रभु उद्विग्न हञा ॥ 170 ॥ अनुवाद-इस प्रकार पाँच दिनों तक लोगोंका उद्धार किया। तब अगले दिन महाप्रभु वहाँसे जानेके लिये उत्कण्ठित हो गये ॥ 170 ॥ पाँच भक्तोंके द्वारा महाप्रभुका अनुसरण :- रात्रे उठि' प्रभु यदि करिला गमन। पाछे लाग् लइला तबे भक्त पञ्च जन ॥ 171 ॥ पाँच भक्तोंके नाम :- तपन मिश्र, रघुनाथ, महाराष्ट्र चन्द्रशेखर, कीर्त्तनीया-परमानन्द, - पञ्च जन ॥ 172 ॥ 504 |

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